इस्लामिक स्टेट हमले के बाद अफ़ग़ानिस्तान

कल, यानी कि 26 अगस्त को काबुल एयरपोर्ट के बाहर 13 अमरीकी सैनिकों सहित अब तक कम से कम 83 लोगों की हत्या करने वाले इस्लामिक स्टेट के बर्बर आत्मघाती हमलों ने अफ़ग़ानिस्तान पर चल रही बहस फिर एक बार घुमा दी है. हमले की भयावहता इसी से समझी जा सकती है कि 6 अगस्त 2011 के बाद यह एक दशक में अमेरिकी सेना की सबसे बड़ी छति तो है ही, फ़रवरी 2020 में तालिबान से वार्ता शुरू करने के बाद पहली भी है। 

तालिबान उधर अलग बता रहा है कि उसके भी 28 आतंकवादी मारे गए हैं. इस हमले का सबसे पहला, और बेहद दुखद, परिणाम तो यह है कि कनाडा सहित तमाम नाटो देशों ने अपनी तरफ से बचाव और नागरिकों और अफ़ग़ान सहयोगियों की निकासी का काम तुरंत बंद कर दिया है जिससे उनके नागरिकों सहित हज़ारों, असल में लाखों अफ़ग़ान सहयोगियों की जान पर बन आई है. इसमें यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों की मूर्खता भरी बर्बरता देख लें- वे अपने दूतावास में अफ़ग़ान सहयोगियों की सूचियाँ छोड़ आये हैं! तालिबान उस सूची का क्या करेगा किसी को नहीं पता! 

खैर, इस हमले का असर बहुत दूर तक जायेगा, और हम यानी भारतीय भी प्रभावित होंगे. सिर्फ इसी लिए नहीं कि अब भी सैकड़ों भारतीय अफ़ग़ानिस्तान में फंसे हुए हैं बल्कि इस लिए भी क्योंकि इस्लामिक स्टेट खोरासान में पाकिस्तानी जेहादियों की संख्या भी काफी है और यह हमारे लिए अच्छी खबर नहीं है. 

पर इस्लामिक स्टेट खोरासान है क्या? 

इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस असल में इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया (आइसिस) या दाएश का हिस्सा है. 2014-15 में जब इस्लामिक स्टेट अपने चरम पर था और इराक और सीरिया के एक बड़े हिस्से पर काबिज था तब इसकी स्थापना की गई थी. मोटा मोटा इसमें तालिबान से असंतुष्ट वे अफ़ग़ान और पाकिस्तानी जेहादी शामिल हुए थे जिन्हें तालिबान भी थोड़ा कम इस्लामिक लगने लगा था. इसमें तालिबान के पाकिस्तानी हिस्से तहरीक ए तालिबान के उन लड़ाकों की भी बड़ी तादाद थी जो आर्मी पब्लिक स्कूल पेशावर पर तहरीक ए तालिबान के बर्बर हमले के बाद पाकिस्तानी सेना की बड़ी कार्रवाई के वक़्त मुल्ला फज़लुल्लाह उर्फ़ मुल्ला रेडियो के पाकिस्तान से बातचीत करने को लेकर नाराज़ थे. उनका मानना था कि यह मुजाहिदीन के हत्यारों के सामने समर्पण है. 

इसी के खिलाफ अक्टूबर 2014 में ओमर खालिद खोरासानी सहित 6 बड़े तहरीक़ ए तालिबान आतंकियों के नेतृत्व में एक धड़े ने विद्रोह कर अपना संगठन बना लिया और इस्लामिक स्टेट में आस्था जताई. उस वक़्त ये खुद को जमात उल अहरार कहते थे. इनके रिश्ते तमाम जेहादी संगठनों से थे जिनमें लश्कर ए झांगवी शामिल है. जनवरी 2015 में इस्लामिक स्टेट के तत्कालीन प्रवक्ता अबू मोहममद अल अदनानी ने इनकी आस्था स्वीकार कर इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस की स्थापना की घोषणा की. अपने चरम पर इनके कुल लड़ाकों की संख्या को लेकर अलग अलग इंटेलिजेंस एजेंसियों के अलग अलग ख़याल हैं- वे 3000 से लेकर 8000 तक की संख्या बताते हैं. इसमें कमाल ये है कि भारतीय एजेंसियाँ हीं इनको 8000 तक ले जाती हैं। पश्चिमी वाली सब 3000 के नीचे रखती हैं। 

नाम में खोरासान क्यों? क्योंकि इस्लामिक स्टेट को भी नाम बदलने की, अतीत में जाने की की वही बीमारी है जो हर अतिवादी को होती है. खोरासन ऐतिहासिक ग्रेटर ईरान के उत्तर पूर्वी इलाके का हिस्सा था जिसमें ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पूर्व सोवियत संघ के कुछ हिस्सों के इलाक़े पड़ते थे. खोरासान असल में एक ईरानी शब्द है जिसका अर्थ होता है वह जगह जहाँ सूरज उगता है. 

इनकी करतूतें क्या हैं? बेहद बर्बर: इनके हमलों में काबुल के एक अस्पताल में मटर्निटी वार्ड पर हमला शामिल है जिसमें इन्होंने 24 नवजात बच्चों और माओं को मार गिराया था। इन्होंने काबुल में गुरुद्वारे पर भी हमला किया है, और एक शादी पर भी जिसमें 63 लोग मारे गए थे। 

पर सितम्बर 2018 आते आते ये काफ़ी कमजोर हो चुके थे- वजह थी इनके नए अमीर का एक पाकिस्तानी पशतून होना- शेख़ असलम फ़ारूकी जो पहले लश्कर ए तैयबा के साथ था। यूँ तो वह बग़दादी के लड़कों के साथ सीरिया में भी लड़ चुका था पर पशतून होना, पाकिस्तानी होना दोनों उसके ख़िलाफ़ गया। उस वक्त इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान तालिबान से भी जूझ रहा था- सो इस नियुक्ति के बाद इनमें फूट पड़ गई। इसके सेंट्रल एशिया वाले लड़ाकों ने अपना नया गुट बना लिया। 

फ़ारूक़ी बाद में पकड़ा भी गया, काबुल गुरुद्वारे पर हमले के मामले में। उसके साथ एक कश्मीरी आतंकवादी ऐजाज आहंगर भी। इससे यह बात और साफ़ हुई कि इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान के पाकिस्तान से सीधे रिश्ते हैं- और यह संगठन भारत से लड़ाके लाने की पूरी कोशिश कर रहा था। भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियाँ मानती हैं कि काबुल में गुरुद्वारे पर हमला करने वाला आतंकवादी भी केरल का ही था। 

इन सब कुछ के बावजूद- तस्वीर न इतनी सीधी है ना साफ़। तालिबान और इस्लामिक स्टेट के सीधे रिश्ते हों ना हों, दोनों हक्कानी नेटवर्क से जुड़े हुए हैं और हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान से। तालिबान ने बीते कुछ महीनों में जितनी जेलें तोड़ कर लोग आज़ाद कराए हैं वहाँ कहीं अलग से इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान वालों की पहचान नहीं की- उनको भी निकलने दिया। यह क्रम बस काबुल पर क़ब्ज़े के बाद टूटा जहां उन्होंने क़ब्ज़ा करते ही कभी इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान के अमीर माने सरग़ना रहे ओमार ख़ोरासानी को क़त्ल कर दिया- बावजूद इसके कि ओमार को पूरा यक़ीन था, वह वाशिंगटन पोस्ट से लेकर वॉल स्ट्रीट जर्नल तक को अपनी मौत के दो दिन पहले तक के इंटरव्यूज़ में यक़ीन जाता रहा था कि तालिबान उसे आज़ाद कर देगा। 

यह क्यों हुआ, तालिबानम अल क़ायदा और इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान के अपने रिश्तों पर कल बात करेंगे। थोड़ा हक्कानी नेटवर्क पर भी- पर उस पर एक पूरा वीडियो अलग से भी बनता है! बस अभी यह जान लें कि तालिबान का काबुल सिक्यरिटी चीफ़ भी एक हक्कानी है जो आज भी अमेरिका घोषित अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी है और जिसके सर पर लाखों अमेरिकी डॉलर का इनाम है।

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