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November 20, 2016

नोटबंदी के बाद भारत: वर्तमान अनिश्चित, भविष्य चिंतित

[नवभारत में 20 नवम्बर 2016 को रविवासरीय परिशिष्ट में प्रकाशित।]

भारत किस दिशा में बढ़ रहा है? आगे आने वाले साल देश और देशवासियों के लिए कैसे होंगे! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद के ढाई सालों में बुद्धिजीवी हलकों में ये सवाल लगातार पूछा जाता रहा है. सांप्रदायिक तनाव बढ़ाते गौरक्षकों के बढ़ते हमले हों या विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण की कोशिशें, विरोध को देशद्रोह का पर्याय बना देने के बयान हों या भारतीय सेना को सवालों के परे ले जा खड़े कर भारत को पाकिस्तान जैसे भविष्य के खतरे में डाल देने को लेकर चिंताएं, सरकार और उसके समर्थकों ने इस सवाल को बल भी खूब दिया है. हाँ, नोट बंदी के फरमान के बाद अब यह सवाल हर आम इन्सान की जुबान पर है!

पर इस सवाल से जूझने के पहले एक नुक्ता साफ़ कर लेना जरुरी है! ये कि दुनिया के हर हिस्से में, हर समाज में ज्योतिषियों और नजूमियों की मौजूदगी साबित करती है कि भविष्य की चिंता और उसे पहले से जान सकने का कौतूहल सबसे सहज मानवीय स्वभावों में से एक है. अब चूँकि परिवार, समाज, देश ये सब शुरू इंसानों से ही होते हैं, उन्हीं की संवेदनाओं का सामुदायिक विस्तार होते हैं सो उनको भी अपने भविष्य का कौतूहल होना लाजिमी है! शायद ये कौतूहल ही दुनिया के तमाम राष्ट्रों में उनकी स्थिति और भविष्य पर राज्याध्यक्षों के उन सालाना भाषणों की परंपराओं में दिखता है जिन्हें ‘स्टेट ऑफ़ द यूनियन’ (संयुक्त राज्य अमेरिका) या ‘स्टेट ऑफ़ द नेशन’ (फिलीपींस) जैसे नामों से जाना जाता है. इन भाषणों में मूलतः सरकारें अपने देश के हालात का लेखा जोखा जनता के सामने रखती हैं, बताती हैं कि देश कहाँ खड़ा है, आगे किधर जा रहा है!

काश कि भारत में भी ऐसी कोई परंपरा होती. इसलिए भी कि प्रधानमंत्री की मोदी की या तो अंधसमर्थन या अतिविरोध पैदा करने वाली विभाजक छवि के अनुरूप इस सवाल के जवाब के दो अतियों में मिलने की जगह एक दस्तावेज सामने होता जिसे देख एक निष्पक्ष राय बनायी जा सकती. पर अफ़सोस, उसकी अनुपस्थिति में हमें खुद ही इस सवाल से जूझना होगा. वह भी कोशिश कर के उन आंकड़ों और तथ्यों की रोशनी में जो मोदी समर्थन और विरोध की अतियों को लेकर पक्षपाती न हों! सो सिर्फ उन आंकड़ों पर नजर डाली जाय जो खुद सरकार ने दिए हैं!

शुरुआत करते हैं देश में बढ़े सांप्रदायिक और सामुदायिक तनाव से- खासतौर पर इसलिए क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने गौरक्षा के बहाने की जा रही हिन्सा पर सवाल उठा, 80% गौरक्षकों को मूलतः अपने आपराधिक कारनामों को छुपाने की कोशिश में मुब्तिला बता एक असल दिक्कत साबित कर दिया था! ठीक इसी तरह दिल्ली में 2012 के बार्बरिक सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद पूरे देश की नजर महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर भी टिकी हुई है सो इन दोनों को एक पल को किनारे रख सिर्फ अनुसूचित जातियों पर हमलों पर नजर डालें.

खुद राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में दलितों के खिलाफ अपराध में 2013 की तुलना में 2014 में 19 प्रतिशत का इजाफा हुआ जिनमें 744 तो हत्या के मामले थे! 2015 में इनमें 4.4 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज हुई है- 2014 में 47,064 के बरक्स 2015 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 45,003 मामले दर्ज हुए. पर फिर, कुल संख्या को 2012 के बरक्स देखें तो साफ होता है कि दलितों पर हमलों में एक तिहाई से भी ज्यादा का इजाफा हुआ है. इसमें यह भी जोड़ें कि ब्यूरो के ही मुताबिक जहाँ भारत में दंड संहिता के अंतर्गत सभी संज्ञेय अपराधों में दोषसिद्धि की दर 45% है वहीँ दलित और आदिवासियों के खिलाफ अपराधों के मामले में यही दर सिर्फ 28 प्रतिशत है. स्थिति की भयावहता और साफ़ हो जाती है!

पर क्या स्थिति सिर्फ सामुदायिक और सांप्रदायिक विद्वेष के मामलों में ही ख़राब है? न, ब्यूरो के ही आंकड़ों पर और नजर डालें तो समझ आता है कि सरकारी कृषि नीतियों की वजह से खेती के दम पर जीने के दुरूह होते जाने के दौर में भारत के गाँव भुखमरी और किसानों की आत्महत्यायों के साथ साथ एक दूसरी आग की चपेट में भी हैं.

बीते साल भारत में कृषि सम्बंधित दंगों में भी 2014 में 628 से बढ़ 2,683 पर जा पहुँचे और इनमें दर्जनों से ज्यादा जानें गयी हैं! कृषि दंगों में 327% का यह इजाफा तब हुआ है जब विकास के दावे वाले गुजरात में ऐसे 126 दंगों के स्वीकार के बावजूद लगातार किसान असंतोष झेल रहे पंजाब जैसे राज्यों ने इनकी संख्या शून्य बताई है! इन दंगों के मूल में सामुदायिक विद्वेष नहीं बल्कि किसानों में बढती जा रही निराशा है जो उनके और सरकारी सुरक्षाबलों में सीधे टकराव के रूप में सामने आती है! इस साल नोटबंदी के पहले ही महाराष्ट्र से लेकर बुन्देलखंड तक देश सूखे से हुई हजारों मौतों और पानी वाली रेलगाड़ियाँ चलाने की जरूरतों से जूझता रहा है. नोटबंदी के बाद देश भर से रबी की बुवाई के बेतरह प्रभावित होने की ख़बरों के बीच अगले साल की तस्वीर बहुत आशाजनक नहीं लगती.

पर क्या इन निराशाजनक सूचनाओं के बीच कहीं से कोई उम्मीद की किरण भी नजर आती है? क्या मुश्किल में पड़े ग्रामीण भारत को डिजिटल इंडिया बचा नहीं सकता? अफ़सोस, अखबारी दावों और जुमलों से इतर यहाँ भी खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह लगभग नामुमकिन है! अभी जुलाई में लोक सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारामन ने श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से माना था कि भारत में नए रोजगारों के सृजन के दर में कमी आई है! अफ़सोस यह आधा सच था- उन्होंने खुद ही आगे जोड़ा था कि 2014 में 4.21 लाख नए रोजगारों की तुलना में 2015 में कुल 1.35 लाख नए रोजगार सृजित हुए थे! तीन चौथाई की गिरावट ‘कमी’ नहीं बल्कि ढह जाना होती है!

अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों पर भी नजर डालें तो आलम यही है! निर्माण क्षेत्र दशक भर में सबसे बुरी स्थिति में है, निर्यात गिरा है और खुद विश्व बैंक की व्यापार करने की आसानी की सूची बता रही है कि 2015 में भारत में व्यापार शुरू करना पहले से और ज्यादा मुश्किल हो गया है! अब नए व्यापार शुरू नहीं होंगे तो रोजगार सृजन का क्या होगा? रोजगार नहीं होंगे तो विकास का क्या होगा? जोड़ते रहें और स्थिति फिर अच्छी नहीं नजर आती!



हद यह कि प्रधानमंत्री मोदी की एक बड़ी ताकत मानी जाने वाली आक्रामक विदेश नीति भी यहाँ भारत की मदद करती नजर नहीं आती. आर्थिक मंदी की मार झेल रहे ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन से निकलने के आप्रवासन नियमों को कड़ा करना शुरू कर दिया था और अब उसने वह लागू भी कर दिए हैं. इन नए नियमों की सबसे बड़ी मार भारतीय आईटी और अन्य कुशल पेशेवरों पर पड़ी है! अभी यही चोट नहीं सँभली थी कि आप्रवासी विरोध के वादे के साथ चुनाव जीते डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता सँभालते ही आप्रवासियों को वापस भेजने का फैसला दोहरा दिया! बेशक कुछ लोगों ने इस घोषणा को हिस्पैनिक और मुस्लिम आप्रवासियों पर केन्द्रित बता ध्यान भटकाने की कोशिशें कीं, पर आज उनके प्रमुख सलाहकार स्टीव बैनन ने सिलिकॉन वैली (अमेरिका में प्रौद्योगिकी का गढ़) के कुछ ज्यादा ही ‘दक्षिण एशियाई’ होने का बयान देकर साफ़ कर दिया है कि असली निशाना कौन है!

दरअसल नोटबंदी के ‘कड़क’ फैसले के पीछे की इन सारी स्थितियों को ध्यान से देखें तो साफ़ समझ आता है कि यह दरअसल एक हताश दाँव है! समाज और अर्थव्यवस्था की हालत में मोदी सरकार की उद्योग जगत को दी गयी 1.14 लाख करोड़ रुपये की कर्जमाफी जोड़ें (मनमोहन सरकार ने अपने 10 सालों में इसकी आधी भी नहीं दी थी) और समझ आएगा कि भारतीय बैंक किस बोझ से चरमरा रहे थे! अफ़सोस कि जनता तो पैसे होने के बावजूद खाने और इलाज बिना मर ही रही है, बैंक भी शायद ही इस नए जमा धन पर जरुरी ब्याज का बोझ झेल पायें!

कुल मिलाकर यह कि बिना प्रशासन का प्रदर्शन अक्सर प्रहसन में बदल जाता है और देश उसी प्रहसन का मोल चुकाने की स्थिति में आ खड़ा हुआ है! सांप्रदायिक तनाव, सामुदायिक विद्वेष, कृषि संकट से उपजता गुस्सा और डूबती अर्थव्यवस्था का घोल भारत को एक अभूतपूर्व संकट की तरफ ले जा सकता है. पर फिर भी, अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, बशर्ते सरकार सुनने को और कुछ करने को तैयार हो!
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