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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

September 28, 2016

उड़ी का बदला लेने वाले पठानकोट पे सो रहे थे क्या?

हम कभी फौज से कोई ख़ास प्यार नहीं कर पाए. लड़ाकू पायलट बनने के सपने, और उसे लगभग पूरा कर लेने के बाद भी, जी एनडीए में फाइनल सेलेक्शन लिया था-पिता ने इनडेम्निटी बांड ही न भरा तो रह गए! हमें हमेशा फौजी भी समाज का वैसा ही एक जरुरी हिस्सा लगे जैसे और सारे- जैसे शिक्षक जिनसे परिवार भरा हुआ है और जो न हों तो फौजी फौजी बन ही न पायें, या सफाईकर्मी- जो न हों तो दुश्मन की जरुरत न पड़े, हैजे से शहर के शहर ख़त्म हो जाएँ. बाकी मामलों में भी वैसे ही- कुछ अच्छे, कुछ बहुत बुरे, बाकी सामान्य. ऐसे भी फौजी जो चलती ट्रेन में डाकुओं से महिलाओं को बचाने के लिए अकेले 35-40 से जूझ जाएँ तो ऐसे भी जो न्यायिक आयोग के मुताबिक निर्दोष लड़की मनोरमा की हत्या कर दें, बलात्कार की पुष्टि भले न हो. ऐसे भी जो पाकिस्तानी शेलिंग के बीच डोडा में काश्मीरी बच्ची को बचाने गोलीबारी के बीच घुस जाएँ, ऐसे भी जो प्रमोशन और मैडल के लिए निर्दोष मजदूरों को फर्जी मुठभेड़ में मार दें- बाद में अगर पकड़े जाएँ जैसे केचप कर्नल पकड़ा गया तो सेना अदालत की दी हुई उम्रकैद काटें नहीं तो सच में प्रमोशन पायें. 

बाकी हम तो युद्धविरोधी घोषित देश'द्रोही' ठहरे! 


हाँ, कुछ और लोग तो थे जिनके देशभक्ति के दावे थे, और जिन्होंने उस भक्ति को सेना के लिए बिना शर्त बिना सवाल प्यार और सम्मान में समेट दिया था. वे अब कहाँ हैं? जैसे एक सुषमा स्वराज थीं. विपक्ष में एक शहीद के बदले दस सिर माँगती थीं, अभी विदेश मंत्री हैं, लाईं? एक राजनाथ सिंह थे. ख़ुद सीमा पर जाने को तैयार रहते थे- गृहमंत्री हैं- गए? कहते रहते हैं कि पहला हमला न करेंगे पर पाकिस्तान ने किया तो गोलियाँ न गिनेंगे. न गिनीं? गुरदासपुर, पठानकोट, कुलगाम, पैम्पोर, पुलवामा और अब उड़ी  के बाद? एक मोदी तो थे ही- मौखिक बमबाज! मुँह से बमबारी करते थे, पाकिस्तान घुस जाते थे। अभी प्रधानमंत्री हैं- गुरदासपुर, पठानकोट, कुलगाम, पुलवामा, उड़ी- सब हो गया- घुसे? अलबत्ता पाकिस्तानी  प्रधानमंत्री  नवाज़ शरीफ के सालगिरह के जश्न में बिना बुलाये जरुर घुस गए थे! खूब गले मिले थे, मिठाई खाए थे! 


तमाम देशभक्त इनसे कुछ नहीं पूछ रहे- अब कहाँ गयी सारी देशभक्ति, सारा सेना प्रेम. (हिम्मत भी न हो शायद). न ये कि हमला वमला तो छोड़िये, इन्हें भी पता था कि अभी की वैश्विक स्थिति में संभव ही नहीं है, पर इन सेनाप्रेमी देशभक्तों की अपनी सरकार के 2 साल, गुरदासपुर के साल भर और पठानकोट के 8 महीने बाद भी पाकिस्तान भारत का सबसे चहेता देश कैसे बना हुआ था. (कमाल ये भी कि ये दर्जा भी इन्हीं की पुरखी अटल बिहारी वाजपेयी  सरकार ने दिया था!) न ये कि ये सिन्धु नदी समझौते को रद्द करने का खयाल तब क्यों नहीं आया था, और आया था तो किया क्यों नहीं? न तब, न अब.न ये कि इसका मतलब पठानकोट वाले उड़ी वालों से कम शहीद थे क्या! क्या पता ये सच में मानते हों, वरना पाकिस्तानी जांच दल को उसी वायुसेना अड्डे पर बुला बिरयानी क्यों खिलाते! 


और हाँ, ये भी कि अब सार्क मीटिंग का बहिष्कार कर रहे हैं तो पठानकोट के बाद सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह दोनों क्यों गए थे? एक एक करके! फिर से वही, पठानकोट वाले कम शहीद थे क्या? 

कहने को तो ये इनको नहीं कह रहे कि हमला कर दो- सीमा पर फौज देख लेगी अन्दर हम. न, उनसे कुछ नहीं पूछ रहे ये. फिर किससे पूछ रहे हैं? उनसे जिनसे पूछना आसान है? जिनको देशद्रोही बता देना देशभक्ति के फर्जी सर्टिफिकेट पाने का सबसे आसान रास्ता है.

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