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July 31, 2016

कई के दामन काले करेगा कोयला घोटाला

[राज एक्सप्रेस में 14 जुलाई 2016 को प्रकाशित] 


कहते हैं कि भ्रष्टाचार भारत की जीवनशैली भी है और जिन्न भी. यह हर जगह हैं- राशन कार्ड बनवाना हो तो क्लर्क को घूस देने से लेकर अचानक कहीं जाना पड़े तो रेलगाड़ी में निरीक्षक को घूस देकर सीट लेने तक में. पर फिर जिन्न की तरह ये दिखता भी नहीं, कम से कम न्यायिक व्यवस्था के साथ तो लंबा अनुभव यही रहा है.

पर फिर, कल कोयला खदान घोटाले की सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जांच में आये नए मोड़ ने बहुत कुछ बदल दिया है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही नियुक्त विशेष जांच दल ने पाया है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व (और तत्कालीन) निदेशक रंजीत सिन्हा के इस घोटाले के तमाम आरोपियों से अपने आधिकारिक निवास पर मिले. इस पुष्टि के बाद भारत के महान्यायवादी मुकुल रोहतगी ने भी स्वीकार किया है कि इन मुलाकातों की वजह से सिन्हा के खिलाफ प्रथम दृष्टया जांच को करने की कोशिश का मामला बनता है.

यहाँ एक क्षण को ठहर कर सोचें तो साफ़ दिखता है किस यह भारत में भ्रष्टाचार के सर्वव्यापी होने के सच के आत्म-साक्षात्कार के साथ साथ उससे लड़ाई की जरुरत- दोनों के लिए एक निर्णायक पल है. सर्वव्यापी होने का ऐसे कि भारत की केन्द्रीय जांच एजेंसी के निदेशक का खुद उस आरोप के अपराधियों से अपने सरकारी निवास पर मिल सकने का ही नहीं, बार बार मिल सकने का साहस निर्वात से नहीं आ सकता. दंडाभाव (इम्प्युनिटी) की लंबी परम्परा ही नहीं बल्कि सत्ता का साथ पाने की निश्चिन्तता हुए बिना यह साहस आ ही नहीं सकता.

ऐसा नहीं है कि यह कोई दबी छुपी बात रही हो. इसके ठीक उल्ट दरअसल यह एक ऐसा खुला राज था जिसे आम जनता से लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठा हर व्यक्ति जानता था. याद करें तो यही सर्वोच्च न्यायालय इसी सीबीआई को सरकारी ‘पिंजड़े में कैद तोता’ बता चुका है. पर फिर, खुले राज को, उससे निकले गुस्से को आवाज देना एक बात है, और कार्यवाही करना दूसरी. जनता हो या न्यायपालिका, पिंजड़े में कैद तोते पर दोनों सिर्फ उबल सकते थे, कोई कार्यवाही नहीं कर सकते थे. अब, पहली नजर में ही सही, जांच को प्रभावित करने का मामला बनना गुस्से को आगे ले जाता है, कार्यवाही करने पर मजबूर करता है.

और इसी जगह से एक दूसरा नुक्ता निकलता है. ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार पर पहले कभी कार्यवाही नहीं हुई. इस देश ने पूर्व केंद्रीय मंत्रियों जैसे ए राजा, और उससे भी बहुत पहले सुखराम, और सांसद कनिमोझी जैसे तमाम बड़े नामों को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाते देखा है. पर फिर, उन मामलों और इनमें एक बुनियादी फर्क है- पहला यह कि सामान्य भाषा में कहें तो ये सभी छुटभैये या दूसरी तीसरी कतार के नेता थे जिन्हें सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों को बचाने के लिए दाँव पर लगाया जा सकता था. 

यह पहली बार हो रहा है कि लपटें पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर जांच एजेंसी के निदेशक तक, माने सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुँच रही हों. दूसरे शब्दों में कहें तो यह युद्ध अपराधों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र के ‘शिखर उत्तरदायित्व’ (या यामाशिता/मदीना मानक) नाम के उस सिद्धांत का अंततः भारत में पहुँचना है जो बाकी दुनिया में प्रशासन, व्यापर समूहों तक में आपराधिक विचलनों से निपटने के लिए कबका इस्तेमाल किया जाने लगा है.

पर फिर, वर्तमान सरकार की नीति और नीयत दोनों देखें तो अभी बहुत उत्साहित नहीं हुआ जा सकता. कुछ तो वजह होगी कि सरकार अब तक हुई प्रारंभिक विवेचना के दस्तावेच सर्वोच्च न्यायालय के विशेष जांच दल को देने से इनकार कर रही है. वह भी इस तथ्य के बावजूद कि यह घोटाला भी विरोधी दल की पिछली सरकार के समय का है और तत्कालीन निदेशक नियुक्त भी उन्हीं के द्वारा किये गए थे. साफ़ है कि प्रारम्भिक विवेचना में कुछ तथ्य तो ऐसे हैं जो इस सरकार को भी कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी हैं.

यही इस मामले का फ़िलहाल अंतिम नुक्ता है. यूँ तो उनकी पकड़ कभी कमजोर नहीं थी, पर अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद कारपोरेट घरानों की सत्ता पर पकड़ दलीय मतभेदों के बहुत पार चली गयी है. वर्तमान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की विपक्षी नेता रहते हुए कही यह बात याद करें कि चार काम वो हमारे करते हैं , दो हम उनके तो यह बात और साफ़ हो जाती है. कोयला घोटाले की आंच अब तक राजनेताओं और नौकरशाहों तक टिकी हुई है पर फिर खदानें तो उद्योगपति घरानों ने लीं- सो अब जांच आगे बढ़ी तो तपिश उन तक पहुँचेगी. फिर हमने एस्सार से लेकर तमाम मामलों में देखा है कि वे किस स्तर तक जाकर इसे रोकने की कोशिश करते हैं, अक्सर सफल भी होते हैं.

फिलहाल बस ये उम्मीद की जाय कि सर्वोच्च न्यायालय अपना सुरक्षित रखा फैसला जब खोलेगा तो रंजीत सिन्हा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा अपनी निगरानी में जाँच का आदेश भी देगा, और अपने जाँच दल को प्रारंभिक विवेचना के दस्तावेज भी. ऐसा नहीं हुआ तो यह पूरी कवायद फिर बेमानी साबित हो जायेगी.


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