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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

March 03, 2016

सलाम कामरेड कन्हैया, और जज साहब, न विरोध संक्रमण होता है न अंग काट देना इलाज

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष कामरेड कन्हैया कुमार को 20 दिन की हिरासत के बाद अंततः कल दिल्ली उच्च न्यायालय से जमानत मिल ही गयी. कामरेड कन्हैया ने फर्जी वीडियो, अंतहीन मीडिया ट्रायल और सरकारी बदनीयती की वजह से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये जाने के बाद इस हिरासत का पहला हिस्सा पुलिस और दूसरा न्यायिक रिमांड में गुजारा था. यह अफ़सोसनाक बात ही है कि देश के तमाम प्रख्यात न्यायविदों द्वारा देशद्रोह तो छोड़िये उनकी गिरफ्तारी तक को गैरकानूनी बताया था और फिर भी उन्हें इतना समय हिरासत में ही नहीं गुजारना पड़ा. उससे भी ज्यादा शर्मनाक यह कि मीडिया के बिकाऊ हिस्से द्वारा पैदा किये गए उन्माद के चलते कामरेड कन्हैया ही नहीं बल्कि उनके समर्थन में उतरे छात्रों, अध्यापकों और इस मामले की रिपोर्टिंग कर रहे मीडिया तक को पटियाला हाउस अदालत में चुप खड़ी पुलिस के सामने उन गुंडे वकीलों का हमला झेलना पड़ा जो अभी भी खुले घूम रहे हैं.

इस दृष्टि से देखें तो कामरेड कन्हैया की रिहाई एक स्वागतयोग्य फैसला है. पर फिर अगर उनको जमानत देने वाला आदेश पढ़ें तो साफ हो जाता है कि अभी लंबी लड़ाई बाकी है. निर्णय में पहली बात यह साफ़ होती है कि माननीय जज ने इस मामले में अपने अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए तमाम बातें की हैं. इस पूरे निर्णय में सबसे चिंताजनक बात है यह कामरेड कन्हैया ही नहीं बल्कि पूरे विश्वविद्यालय के खिलाफ निहित स्वार्थों की फुसफुसाहटों को तथ्यों की तरह सामने रखता है. यह निर्णय इसके साथ ही इस मामले में छात्रों के साथ ‘सीमा पर तैनात सैनिकों’ की न केवल गैरजरूरी बल्कि उन्हीं निहित स्वार्थों द्वारा भावनाएं भड़काने के लिए इस्तेमाल की गयी तुलना का जिक्र करता है.

इसके साथ ही यह निर्णय माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे तमाम निर्णयों के खिलाफ भी जाता है जिन्होंने किसी भी राजनैतिक विचारधारा के समर्थन और उसके लिए हिंसा भड़काने या हिंसा में संलिप्त होने में साफ़ अन्तर किया है और फिर सिर्फ हिंसा भड़काने को ही गैरकानूनी माना है.

उन कुछ मामलों को याद करें जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने बार बार आईपीसी 124 ए के मामलों में यही अवस्थिति ली है तो प्रमुख होंगे- केदारनाथ सिंह विरुद्ध बिहार मामले में 20 जनवरी 1962 का निर्णय (1962 AIR 955), बलवंत सिंह विरुद्ध पंजाब मामले में 1 मार्च 1995 (Appeal (crl.)  266 of 1985) का निर्णय, अरूप भुइंया विरुद्ध आसाम में 3 फ़रवरी 2011 का निर्णय (CRIMINAL APPEAL NO(s). 889 OF 2007) और श्री इंद्रा दास विरुद्ध आसाम में 10 फ़रवरी 2011 का निर्णय ((Criminal Appeal NO.1383 OF 2007).
इनमें से बलवंत सिंह विरुद्ध पंजाब मामला इसलिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि उसमें भी दो लोगों पर भारत के खिलाफ खालिस्तान समर्थक नारेबाजी करने का आरोप था. उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देखें- (अनुवाद मेरा)

“हमें लगता है कि दो लोगों द्वारा नारे लगाना जिनका जनता पर न कोई असर पड़ा न प्रतिक्रिया हुई न सेक्शन 124 ए का आरोप आमंत्रित करता है न सेक्शन 153 के तहत. इन अभियोगों को लागू करने के लिए सरकारी कर्मचारी वादियों द्वारा और स्पष्ट हरकतों की मांग करता है. वादियों को गिरफ्तार करने में पुलिस अधिकारियों ने अपरिपक्वता दिखाई है और उनकी यह कार्यवाही कानून और व्यवस्था को बिगाड़ सकती थी, खासतौर पर इसलिए कि श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या वाले उस दिन माहौल पहले से ही बेहद तनावपूर्ण था. ऐसी परिस्थितियों में अति संवेदनशीलता दिखाना प्रतिकूल प्रभाव पैदा करना और संकट को आमंत्रित करना है. दो अकेले लोगों द्वारा कुछ नारे लगाना, बिना उससे ज्यादा कुछ किये हुए, भारत सरकार को कोई खतरा नहीं पैदा करता क्योंकि स्थापित विधि में यह अलग समुदायों, धर्मों या अन्य समूहों के बीच शत्रुता या घृणा की भावनाएं नहीं पैदा कर सकता.”  

यहाँ इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि आरोपी स्वयं सरकारी कर्मचारी थे और उन्होंने खालिस्तान जिंदाबाद और राज करेगा खालसा जैसे नारे लगाने की बात स्वीकारी थी और फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें देशद्रोह का दोषी नहीं माना था.

अब इसके ठीक उलट इस जमानत आदेश को देखें-

40. यह ऐसे देश-विरोधी नारे लगाने का मामला है जो राष्ट्रीय अखंडता को खतरा पहुँचाने की क्षमता रखते हैं’. (अनुवाद मेरा)

साफ है कि यह वाक्य स्थापित विधि प्रक्रिया के खिलाफ जाता है. पर उससे कहीं ज्यादा दिक्कततलब यह है कि यह कार्यपालिका को अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर, कानून का अतिक्रमण कर मतभेदों और विचारों को भी आपराधिक बना उनपर देशद्रोह का मुकदमा लगा देने का हथियार थमा देता है.

पर इससे भी ज्यादा खतरनाक संक्रमण, गैंग्रीन, और अंगच्छेद जैसी वह असंगत और गैरजरुरी तुलनाएं हैं जिनका इस्तेमाल विद्वान जज ने इस निर्णय में किया है. यह निर्णय कहता है-

“48. जब भी किसी अंग में संक्रमण फ़ैल जाता है, एंटीबायोटिक्स खिलाकर उसका इलाज करने की कोशिश की जाती है और अगर यह काम न करे तो फिर इलाज का दूसरा रास्ता अपनाया जाता है. कभी कभी शल्य चिकित्सा करने की भी जरुरत पड़ती है. पर अगर संक्रमण अंग को पूरी तरह ही संक्रमित कर दे तो उसे काट देना ही एकमात्र इलाज है. (अनुवाद मेरा)

ऐसी खतरनाक तुलना के पीछे के कारण खोजना जितना मुश्किल है इस उन्मादित समय में इनका असर समझ सकना उतना ही आसान है. विद्वान जज का यह लिखना दुखद है खासतौर पर तब जब उनके सामने मामला सबूतों की रौशनी में जमानत याचिका पर फैसला देने भर का ही था. वहाँ मामला साफ़ है- देशद्रोह जैसे संगीन अपराध में जमानत देना पुलिसिया तहकीकात के घटिया, राजनैतिक पूर्वाग्रह और द्वेषपूर्ण होने का प्रमाण है. साफ है कि अगर कन्हैया कुमार के खिलाफ अकाट्य सबूत होते तो विद्वान जज ‘देशद्रोही’ संक्रमण को समाज में और ‘फैलाने’ के लिए उन्हें रिहा न कर देतीं- और कर देतीं तो देशद्रोह की इतनी हलकी परिभाषा में कोई इसे भी देशद्रोह मान ही सकता था!  

इसके आगे जाकर ऐसे कथन देना दिखाता है कि विद्वान न्यायाधीश ने अपने अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण किया है. अफ़सोस कि उन्हें यह भी समझना चाहिए था कि ऐसे कथन जांच को प्रभावित करने के साथ साथ पहले से ही उन्मादित भीड़ की हिंसा का शिकार हो रहे आरोपियों के खिलाफ और हिंसा भड़का सकते हैं.

दुर्भाग्य से किसी न्यायाधीश द्वारा अपनी सीमा के अतिक्रमण का यह पहला उदाहरण नहीं है. अभी हाल में ही देखें तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नेशनल हेराल्ड मामले में इसी दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले में से कई टिप्पणियाँ निकालने का आदेश दिया था.
उस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि-

“हमारा विचार है कि उच्च न्यायालय के सामने (इस मामले में) किसी ठोस निर्णय पर पहुँचने (का अधिकार) खुला नहीं था और उन्हें ट्रायल कोर्ट को सबूतों को सुनने के बाद दर्ज करने के लिए छोड़ देना चाहिए था. तदनुसार, हम इस मामले के तमाम तथ्यात्मक पहलुओं ओअर उच्च न्यायालय द्वारा लिए गए सभी अंतिम निष्कर्ष और अनुमानों को निकालते हैं’.

इसके पहले भी तमाम मामलों में ऐसे अतिक्रमण के सबूत मिलते हैं जिनमें से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा मुस्लिमों को अल्पसंख्यक समुदाय से बाहर करने की एक टिप्पणी सहज याद आती है. इस दृष्टि से देखें तो इस मामले में निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया के पालन और न्याय के लिए इन टिप्पणियों को जल्द से जल्द इस फैसले से निकाला जाना चाहिए. साथ ही तमाम न्यायाधीशों को फैसले लिखते वक़्त संयम से काम लेना चाहिए क्योंकि उनके फैसले उनके सामने कटघरे में खड़े व्यक्तियों को ही नहीं, देश की अंतरात्मा को प्रभावित करते हैं. 

1 comment :

  1. मैंने भी अभी-2 कन्हैया की रिहाई की खबर पढ़ी वो इन्सान मेरा कुछ नहीं लगता रिश्ते के तौर पर तो पर शायद कभी कभी इंसानियत का रिश्ता बेहद बड़ा होता हैं मुझे बेहद ख़ुशी हुई😊
    और मुझे आपसे इस पर एक पोस्ट की उम्मीद तो थी ही इसलिए यहाँ भी टपक ही गई😝

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