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July 17, 2015

क़तर की क़त्लगाह पर भारत की चुप्पी

[11 जून 2015 को प्रभात खबर में प्रकाशित] 

2014 में 279, 2013 में 218  और 2012 में 237-  ये फ़ुटबाल विश्वकप 2022 के मेजबान क़तर में हुई भारतीय मजदूरों की मौतों के आंकड़े हैं. कस्टम और आप्रवासन की सारी औपचारिकताएं पूरी करके बॉडी बैग्स में देश लौटते उन मजदूरों के आंकड़े जिन पर क़तर और हिंदुस्तान, दोनों सरकारें चुप है. कमाल यह कि भारत की यह चुप्पी पड़ोसी मुल्क नेपाल के 2012 और 2013 में अपने 385 मजदूरों की मौत पर क़तर सरकार से तीखे प्रतिरोध के बावजूद है. खैर, फ़ुटबाल की वैश्विक नियामक संस्था फीफा में आ रही भ्रष्टाचार की खबरों ने इस मसले को फिर से चर्चा में ला दिया है.
ऐसा नहीं कि सरकार को इन मौतों के बारे में खबर नहीं है. लगभग गुलामी वाली स्थितियों में काम करवाने की वजह से हो रही यह मौतें 2012 से ही लगातार चर्चा में बनी हुई हैं. उदाहरण के लिए इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फ़ेडरेशन क़तर में श्रम कानूनों की अवहेलना के मामले सामने लाता रहा है. कॉन्फ़ेडरेशन ने दर्ज किया है कि कैसे मजदूरों को लगातार 24 घंटे और यहाँ तक कि तापमान के 50 डिग्री के पार चले जाने पर भी काम करने को मजबूर किया जाता रहा है. ऐसी स्थितियों में काम करने पर हृदयाघात जैसी संभावनाएं आम हैं और इसी वजह से वहाँ तमाम मजदूर मारे भी गए हैं. श्रम संगठनों को छोड़ भी दें तो खुद यूरोपियन संसद में इस मुद्दे पर सवाल उठाये गए हैं और शुरुआती नकार के बाद फीफा को मानना पड़ा है कि क़तर में काम करने की स्थितियां भयावह हैं. इतनी भयावह कि हजारों मौतों के बरक्स लन्दन और वैंकोवर ओलम्पिक खेलों (2012 और 2010) के लिए हुए निर्माण कार्यों के दौरान दौरान सिर्फ 1, 1 मजदूर की मृत्यु हुई थी तो दक्षिण अफ्रीका में फीफा विश्व कप के दौरान सिर्फ 2.
क़तर में काम करने की शुरुआत ही गुलामी की आधुनिक अवतार कफाला व्यवस्था से होती है जिसमें मजदूर अपने नियोक्ता से बंधे होते हैं और उन्हें अनुबंध के बीच में काम बदलने या देश छोड़ने की अनुमति नहीं होती. इस बर्बर व्यवस्था के साथ ही दुर्घटनाओं की स्थिति में इलाज की जवाबदेही से बचने के लिए नियोक्तायों द्वारा मजदूरों को निवास परमिट दिलाने की जगह उनके पासपोर्ट जब्त कर अपने पास रख लेना आम है.
मजदूरों की मौतों को स्वीकारते हुए भी उन्हें निर्माण कार्यों से जुड़ा मानने से सीधा इनकार करते रहने के बावजूद पूरे विश्व में हुई तीखी आलोचना के बाद क़तर ने 2014 में ही आप्रवासी मजदूरों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना की घोषणा की थी मगर वह 2016 में ही शुरू होगी. इसी आलोचना के मद्देनजर क़तर सरकार ने 294 श्रम निरीक्षकों (लेबर इंस्पेक्टर्स) की नियुक्ति करने और 250,000 मजदूरों के लिए आवास मुहैया कराने की घोषणा करने जैसे कदम उठाये हैं. क़तर सरकार द्वारा गठित एक कमिटी ने नियोक्ता एजेंसियों द्वारा मजदूरों से शुल्क लेने, सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी करने वाले नियोक्ताओं को काली सूची में डालने और आप्रवासी मजदूरों की शिकायतों के त्वरित निवारण के लिए एक व्यवस्था बनाने जैसी सिफारिशें भी की हैं. इन तमाम क़दमों और सिफारिशों के बावजूद 2014  में भारतीय आप्रवासी मजदूरों की मौतों में हुई वृद्धि जमीनी हकीकत साफ़ कर देती है.
इस मसले में बड़ा सवाल भारत सरकार और समाज दोनों की चुप्पी है, उस समाज की जो कोई किताब, फिल्म या कुछ और भी पसंद न आने पर गुस्से से उबल पड़ता है, सड़कों पर उतर आता है. यह उस सरकार की भी अपने कर्तव्य के निर्वहन की आपराधिक उपेक्षा है जो देश में ही नहीं विदेश में भी मौजूद नागरिकों के जीवन की सुरक्षा के लिए संविधान से वचनबद्ध है. आखिर यही तो उस ‘पैरेंस पैट्रियाई’ सिद्धांत का आधार है जो सरकार को नागरिकों के माता-पिता का दर्जा देते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उनका इकलौता प्रतिनिधि होने का अधिकार देता है.

सैकड़ों जाने चली जाने के बाद भी अब भी सरकार को चेत जाना चाहिए. जो चले गए उन्हें वापस लाना संभव नहीं पर जो हैं उन्हें बचाया जा सकता है और यह सरकार और समाज दोनों का कर्तव्य है. दुनिया का कोई भी खेल एक भी मानव जीवन से बड़ा नहीं है और यहाँ तो हजारों जानें जा चुकी हैं और हजारों और जा सकती हैं. सरकार को क़तर सरकार के साथ हस्तक्षेप भी करना चाहिए और स्थितियों में सुधर न होने की दशा में अपने मजदूरों को वापस बुला लाना चाहिए.

2 comments :

  1. सरकार कभी कुछ नहीं करेगी और आम इन्सान हमेशा यूँ ही बेवजह अपनी जान की आहुति देता रहेगा:(

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  2. बेहद शर्मनाक ......

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