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May 16, 2015

मोदी के जुमलों का एक साल

[Youth Ki Awaaz में प्रकाशित]  
आज हिन्दुस्तान ने वह नैतिक लक्ष्मणरेखा पार कर ली है जो हिंदुस्तान को पाकिस्तान से अलग करती थी, जो हम सेकुलर पाकिस्तानियों की आँखों में एक दिन हिन्दुस्तान जैसा बन पाने की उम्मीद जगाती थी,” कहते हुए मेरे पाकिस्तानी दोस्त की आवाज भर आई थी। वह ठीक आज का दिन था जब हिन्दुस्तान में लोकसभा चुनावों के परिणाम आने लगे थे, और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलना साफ़ हो गया था। “हम पाकिस्तानियों ने अपनी आधी उम्र फौजी तानाशाही में गुजारी है यार, बाकी इस्लामिस्टों से लड़ते हुए। पर हमने उन्हें कभी जम्हूरियत के रास्ते जीतने न दिया।” इस बार उनकी आवाज पूरी तरह भर्रा आई थी।
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विकास और हिंदुत्व के उस विस्फोटक मिश्रण को सत्ता में आये आज एक साल हुआ है, पर इस साल के लेखेजोखे की शुरुआत उस उग्र हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के सेना से मोह से शुरू करते है। सैनिकों को एक रैंक एक पेंशन न मिलना उनके लिए सेना, और इसलिए राष्ट्र का अपमान था। सेना के लिए एक रैंक – एक पेंशन के वादे को आज एक साल हुआ, शुक्र सिर्फ यह कि मोदी सरकार ने अभी तक इसे जुमला घोषित नहीं किया है। बाकी इस एक साल में चुनावी जनसभाओं में मोदी काश्मीर में फर्ज़ी मुठभेड़ के लिए सेना से माफ़ी भी मँगवा चुके हैं और नेपाल में भूकम्प राहत के लिए सेनाध्यक्ष से उन 100 करोड़ रुपयों का चेक भी ले चुके हैं जो सेना ने कभी दिए ही नहीं।
फर्ज़ी मुठभेड़ों के लिए सेना के माफ़ी मांगने का स्वागत होना चाहिए। पर किसी प्रधानमंत्री का इस माफ़ी का श्रेय लेना सैन्य मामलों में वह राजनैतिक हस्तक्षेप है जो लोकतंत्र को तानाशाही के रास्ते पर ले जाता है। मोदी का वह भाषण सुनते हुये लगा था कि इससे बुरा सेना का राजनैतिक फायदों के लिए इस्तेमाल हो नही सकता था, और मोदी ने नेपाल राहत के लिए सेना से न मिले पैसों का चेक लेकर वह भी कर दिया।
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मोदी का दूसरा प्रिय विषय था विकास, जिसका सपना उन्होंने देश भर में बेचा था। यह विकास कितना हुआ वह तो खैर साफ़ दिख ही रहा है, पर इसमें अंतर्राष्ट्रीय वित्त संगठनों की राय जोड़ दें तो तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जाएगी। वैश्विक वित्तीय निवेश के लिए देशों की रेटिंग करने वाली तीन विश्वसनीय संस्थायें हैं- मूडीज इन्वेस्टर सर्विसेज, स्टैण्डर्ड आफ पुअर और फिच रेटिंग्स। इन तीनों ने पूंजीनिवेश के लिए भारत को सबसे निचली श्रेणी में रखा है। चीन, फिलीपींस जैसे तमाम देश इस सूची में भारत से बहुत ऊपर हैं, इसका मतलब समझाने की जरूरत तो शायद नहीं ही पड़नी चाहिए।
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बाकी क्षेत्रों में भी मोदी का रिकॉर्ड देखते हैं। ‘मन की बात‘ करने जैसे शोशों के ऊपर उठ कर 150 दिन में काला धन वापस लाने, स्वच्छता अभियान चला भारत को साफ़ सुथरा बनाने, कृषि संकट खत्म करने जैसे तमाम वादों की जमीनी हकीकत देखिये और कहने को कुछ नहीं बचता। जो बचता है वह यह कि मोदी सरकार ने सबसे हालिया फैसले में 14 साल से छोटे बच्चों से काम करवाने को कानूनी दर्जा देने वाले गिने चुने देशों में एक बना दिया है।
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फिर क्या मोदी ने कुछ नहीं किया? बेशक किया है। उन्होंने देश को रामजादा हरामजादा जैसी जुबान और महिलाओं के रंग पर टिप्पणी कर नाइजीरिया की शिकायत कमाने वाले केन्द्रीय मंत्री, और गुजरात जनसंहार को हिन्दू गौरव बताने वाले राज्यपाल दिए हैं। उन्होंने देश को घरवापसी से लेकर बच्चे पैदा करने की फैक्ट्री में तब्दील करने वाली बहसें दीं हैं। उन्होंने बचावकार्य को प्रोपेगंडा में बदल देने वाले मंत्री और मीडिया दिए हैं। और हाँ, उन्होंने एफडीआई, बांग्लादेश से सीमा समझौते से लेकर, जनरल सेल्स टैक्स तक पर यूपीए के विरोध पर यूटर्न दिए हैं। और इन्हीं पर क्यों, अपनी पार्टी के समर्थन से बने भूमि क़ानून को रद्द कर अडानियों को किसानों की जमीन पर कब्जे और किसानों को आत्महत्या की कोशिशें दी है।
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तो क्या मोदी राज में सब कुछ खराब ही है? नहीं, एक चीज अच्छी है। यह कि चुनावी ‘जुमलों‘ की जल्दबाजी के विपरीत इस सरकार के पास अब भी वक़्त है। वह अब भी भड़काऊ भाषणों पर लगाम कसने के वादों को पूरा कर सकती है, बाकी आर्थिक मुद्दों पर कारपोरेट हितों को पूरा करने के सिवा कोई उम्मीद नहीं है तो नहीं है। अपनी गलती की सज़ा हमें ही भुगतनी होती है सो किसानों, मध्यवर्ग, गरीबों को भी भुगतनी होगी। अच्छी बात यह है कि वक़्त उनके पास भी है, चुनाव हर 5 साल में होते हैं।

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