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May 07, 2015

निपानी से इंडियाज डॉटर तक

[मुस्लिम टुडे के अप्रैल अंक में प्रकाशित]

किसी औरत को भरे बाजार में जिन्दा जलाने में कितना वक़्त लगता होगा? केरोसीन तेल डालने फिर आग लगाने से लेकर उसके जल उठने तक? फिर उस बाजार में मौजूद सैकड़ों लोगों को इस पर स्तब्ध होने, अपराधियों को रोकने और उस औरत को बचाने, या फिर सिर्फ देखते रहने में से कोई भी एक प्रतिक्रिया करने में कितना वक़्त लगता होगा? एक तीसरा सवाल भी है, यह कि दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद उमड़े देशव्यापी गुस्से के बाद क्या ऐसी वहशियाना वारदात देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए जिम्मेदार प्रशासन, मीडिया और नागरिक समाज तक को अनिवार्य रूप से उद्वेलित करेगी?

इन तीनों सवालों के जवाब तलाशने की जद्दोजहद आपको कर्णाटक के निपानी शहर के कृषि उपज विपणन बाजार तक ले जायेगी जहाँ 25 फ़रवरी 2015 को कुछ लोगों ने एक औरत को जिन्दा जला दिया. अफ़सोस कि वहाँ भी इन तीनों सवालों के जवाब में बस एक स्तब्धकारी चुप्पी ही हासिल होगी. एक ऐसी चुप्पी जो समाज के वहशी होते जाने के आत्मस्वीकार की चीख भी है. निपानी दिल्ली में नहीं है. सो निपानी में हुए ऐसे अपराधों में ‘थ्रिल’ नहीं है, वह टीआरपी नहीं है जो मीडिया चैनलों के कैमरों को खींच सके. ऐसा न होता तो क्या वजह हो सकती थी कि सिर्फ द हिन्दू की एक खबर के अलावा इतनी बड़ी वारदात अंग्रेजी के सभी अखबारों से गायब थी.

पर ऐसी सारी खबरें मीडिया से गायब नहीं थीं. निपानी पर चुप्पी के बीच ही बीबीसी की ‘इंडियाज डॉटर’ नाम की एक डाक्यूमेंट्री भारी चर्चा में थी. निर्भया नाम की दोस्त के साथ १६ दिसम्बर २०१२ को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या पर केन्द्रित यह डाक्यूमेंट्री भारत की ‘बलात्कार संस्कृति’ को समझने का दावा करती है. इस डाक्यूमेंट्री में वह सारे तत्व थे जो निपानी की घटना में नहीं थे. बरसों मीडिया में चर्चित रहा एक बड़ा मामला होने के साथ साथ एक सजायाफ्ता ‘बलात्कारी’ का इंटरव्यू इसे सनसनीखेज बनाने के लिए काफी था.

पर फिर यहाँ एक सवाल बनता है. दिल्ली में हुए एक बलात्कार से देश की बलात्कार संस्कृति कैसे समझी जा सकती है? इस देश में बलात्कार सिर्फ व्यक्तिगत यौन अपराध ही नहीं बल्कि समुदायों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाले राजनैतिक हथियार के बतौर भी इस्तेमाल किया जाता रहा है. गुजरात नरसंहार के वक़्त हिंदुत्व फासीवादियों ने अल्पसंख्यक समुदाय की स्त्रियों के शरीर को सिर्फ अपनी यौन कुंठा शांत करने का जरिया नहीं बनाया था- उन बलात्कारों का एक मकसद पूरे समुदाय को शर्मिंदा करते हुए डराना भी था. उन बलात्कारों के खिलाफ ऐसे सामुदायिक प्रतिरोध की कमी बहुत कुछ साफ़ नहीं कर देती? या फिर अभी पश्चिम बंगाल के नाडिया में एक बुजुर्ग नन के साथ हुए बलात्कार को क्या सिर्फ बलात्कार के बतौर देखा जा सकता है?

फिर इन साम्प्रदायिक साजिशों के तहत किये जाने वाले बलात्कारों से अलग एक और श्रेणी है जिसे भारतीय सैन्यबलों के जवान अंजाम देते रहते हैं. इंडियाज डॉटर वाले प्रतिरोध में शामिल एक तबका भी न केवल ऐसे बलात्कारों को बलात्कार मानने से ही इनकार कर देता है बल्कि वर्दी में छिपे इन अपराधियों को आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट्स जैसे कानूनों का कवच भी पहनाता है. और हाँ, इन बलात्कारों को सेना का मनोबल तोड़ने के लिए किया जाने वाला दुष्प्रचार बता कर ख़ारिज करने की कोशिश का कोई फायदा नहीं- आसाम राइफल्स के जवानों द्वारा अभिरक्षा में थोंगजम मनोरमा की 2004 में गयी हत्या के मामले में न्यायिक आयोग की हाल में सार्वजनिक की गयी रिपोर्ट साफ़ कहती है- “यह मणिपुरी ग्रामीण लड़की की अभिरक्षा में की गयी हत्या के सबसे भयानक मामलों में से एक है.” न्यायमूर्ति (अब सेवानिवृत्त) सी उपेन्द्र सिंह की यह रिपोर्ट इस पूरे मामले की भयावहता को उजागर करती है जिसमे जुलाई १०-११ की बीच की रात उसे असम राइफल्स के जवान घर से उठाकर ले गए थे और फिर जिसके बाद उसके गुप्तांगों तक में गोलियों से भरी लाश ही मिली थी.

अब यहाँ बात को रोकते हुए एक सवाल- हिंसा, वीभत्सता और जघन्यता- किसी भी पहलू पर यह मामला १६ दिसंबर २०१२ से अलग नहीं ठहरता. उल्टा यह तो शायद और भी आपराधिक होना चाहिए क्योंकि इसमें भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार सुरक्षाकर्मी ही संलिप्त हैं. पर फिर इस मामले ने मणिपुर के बाहर न कोई ख़ास गुस्सा पैदा किया न ही बलात्कारी सैनिकों को वैसा राक्षस बना कर पेश किया जैसा दिल्ली के एक सजायाफ्ता मुकेश सिंह को किया जाता रहा है.

सवाल उठता है क्यों- और शायद जवाब भी आसान ही है. पहला यह कि स्त्रियाँ सिर्फ स्त्रियाँ नहीं होतीं, वे भी अमीर, गरीब, हिन्दू, मुस्लिम, अंग्रेजीदां, अनपढ़, सवर्ण दलित आदि तमाम किस्म के विभाजनों में बंटी हुई हैं. अब चूंकि ये सारे विभाजन अपने होने में ही छुपे फायदों से लेकर दुश्वारियों बढ़ाने तक जाते हैं सो इन खांचों में फंसी स्त्रियों को अपने अपने खांचों की दुश्वारियां झेलनी होती हैं. इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि एक ब्राह्मण स्त्री को दलित स्त्री होने के साथ आने वाले दुहरे उत्पीड़न का बोझ नहीं झेलना पड़ता. यही मामला उलटी तरफ भी लागू होता है- सुविधाजनक/अमीर पृष्ठभूमि से आने वाले बलात्कारियों को उतनी आसानी से राक्षस नहीं बनाया जा सकता है जितनी आसानी से झुग्गीझोपडी से आने वाले बलात्कारियों को- झुग्गीझोपड़ियों को अपराध का गढ़ मानने वाले मध्यवर्गीय सहजबोध में यह करना आसान भी है.

पर आसान होने वाली हर चीज क्या ठीक भी हो जाती है? इस डाक्यूमेंट्री के निर्माताओं का मुकेश सिंह से सुविज्ञ सहमति लेने का दावा ही देखिये. पहली बात तो यह ही कि सरकारी अभिरक्षा में, फांसी की सजा पाए व्यक्ति की सहमति कितनी सुविज्ञ हो सकती है. अब इसमें एक बात जोड़िये- यह कि अपने इंटरव्यू में मुकेश सिंह ने अपने ऊपर लगाए सभी आरोप खारिज करते हुए दावा किया है कि वह पूरे समय बस ही चलाता रहा और बलात्कार और हिंसा अन्य अभियुक्तों ने की है. एक अपराध में संलिप्तता के चलते सजायाफ्ता अपराधी का अपने को दोषमुक्त करते हुए सह-अभियुक्तों पर आरोप लगाना क्या अब तक पूरी न हुई न्यायिक प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करेगा? इस डाक्यूमेंट्री के सामने आने के बाद उभरे गुस्से ने साफ़ किया है कि बेशक करेगा और वह भी नकारात्मक ढंग से.

ऐसे में यह देखना ठीक होगा कि इस डाक्यूमेंट्री ने किस तर्क को मजबूत किया है. सबसे पहले तो बलात्कार के लिए भी फांसी की सजा मांगने वाले उस खेमे को जिसकी सबसे बड़ी शिकायत ही यह है कि अब तक इन बलात्कारियों को टांग क्यों नहीं दिया गया है. मतलब उस खेमे को जो सभ्य समाजों में मृत्युदंड की सजा की जगह न होने वाले तर्क के खिलाफ खड़ा है. हाँ एक और बहस है जिसे इस डाक्यूमेंट्री ने फिर से पुनर्जीवित कर दिया है- बलात्कार के मामलों में किशोर अपराधियों को किशोर नहीं बल्कि वयस्क अपराधियों की तरह ही मानना, उन पर सामान्य अदालतों में मुकदमा चलाना और वयस्कों वाली ही सजा देना. मतलब फिर से वही- समाज की गलतियों की सजा किशोरों को देकर ऐसे अपराधों के खिलाफ गुस्से का विरेचन करना. बाकी ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं है जो मुकेश सिंह को इस देश के बहुसंख्यक पुरुषों की मानसिकता से अलग करता है. फिर वे पुरुष चाहे कहीं भी किन्हीं भी शक्लों में न हों- हरियाणा की खाप पंचायतों में, गुवाहाटी में एक पब के सामने एक युवा लड़की पर हिंसा कर रही उन्मादित भीड़ में, गुजरात के दंगों में, संसद भवन की बहसों में. हद यह कि यह भी जरूरी नहीं है कि वे शक्लें हमेशा ही पुरुषों की ही हों- वे शीला दीक्षितों की तरह यह भी पूछ सकती हैं कि कोई लड़की गयी रात अकेले क्या कर रही थी और तृणमूल कांग्रेस की नेता काकोली दास्तीदार की तरह सामूहिक बलात्कार के मामले को एक सेक्स वर्कर और ग्राहकों के बीच हो गया विवाद भी बता सकती हैं.

और इन सबके बीच अपने अपने गुस्से चुन लेने वाले उन्मादित समयों में निपानी भी होता रहेगा और कभी कभी फट पड़ने वाला गुस्सा भी. बस अफ़सोस यह कि चूंकि सारी औरते सिर्फ औरतें नहीं होतीं तो निपानी में कोई गुस्सा नहीं फूटेगा, भंडारा की दलित बेटियां सिर्फ एक आंकड़ा बन कर रह जायेंगी. हाँ, शिकार अपने वर्ग की, अपने घर परिवार जैसी कोई लड़की हो तो कभीकभार फट भी पड़ेंगे- और अपराधी मुकेश सिंह जैसे दूसरे वर्ग के तब तो और भी आसान हो जाएगा.

अफ़सोस, मगर यह कि जब तक निपानी की, मणिपुर की, काश्मीर की बेटियां भी भारत की बेटियां नहीं मानी जायेंगी तब तक भारत की कोई बेटी महफूज़ नहीं रहेगी. यह भी कि जब तक उनके बलात्कारी भी मुकेश सिंह की ही तरह अपराधी नहीं माने जायेंगे तब तक चुने हुए गुस्से हमें अपराध पर नियंत्रण कर पाने वाले कानूनों के लागू करने तक नहीं बल्कि बदला लेने को उन्मादित भीड़ में बदलते रहेंगे.

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