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March 25, 2015

फरेबी पहाड़


[दैनिक जागरण में अपने स्तम्भ परदेस से में 20-03-2015 को प्रकाशित] 

पहाड़ से उतरते हुए अचानक आई बारिश और भर आँख पसर गयी धुंध। ऐसी कि दो हाथ रास्ता भी न दिखे। भुनभुनाते हुए ड्राइवर भैया कि कह रहे थे जल्दी चलो पर आप लोग तो पता नहीं क्या क्या पूछते रहते हैं। थमी हुई हमारी सांसें और रुक गए मजाक। होना भी था, उन सर्पीली सड़कों पर दिन की रौशनी में गाडी चलाना मुश्किल काम है और यहाँ हम नीमअँधेरे में फंस गए थे. फिर जंगली जानवरों से लेकर जमीन धसकने तक के खतरों से भरे पहाड़ों में ऐसी हालत रुकना भी संभव नहीं होता. राहत की बात बस ये कि आगे पीछे कुछ और गाड़ियाँ भी थीं. न कोई परिचय होने न भविष्य में ऐसी कोई संभावना होने पर भी कठिन समयों में बस इंसानी उपस्थिति ही कितनी आश्वस्तिकारी होती है.

खैर, खुदा खुदा कर नीचे उतरने में अनंतकालिक सी लगी उस थोड़ी देर की यातना ने कार में एक अजब सी खामोशी भर दी थी. भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता सचिन कुमार जैन, हफ्ते भर पहले ही शादी करने वाले सहकर्मी प्रकाश और उनकी पत्नी नीरजा, ड्राईवर सब चुप, और फिर मैं अचानक से चीख ही पड़ा था- "मैं बचपन से ही बाग्लुंग आना चाहता था मितरों।“ “मैं बचपन से ही ऐसी धुंध में पहाड़ उतरने का रोमांच महसूस करना चाहता था मितरों”- जवाब नीरजा की तरफ से आया था. बाहर धुंध छंट जो गयी थी. पहाड़ी धुंध ऐसी ही होती है, कब छा जाये और कब छंट कोई नहीं जानता. पर शायद यह पहाड़ों का तरीका हो- याद दिलाने का कि इन बेहद सुन्दर मगर खतरनाक सड़कों पर सावधानी से चलना चाहिए. पहाड़ ऐसे ही होते हैं, स्नेहिल, सम्मोहक और खतरनाक भी. कब दुलरा लें और कब डरा दें, पता ही नहीं चलता.

हम नेपाल की काली गण्डकी घाटी में बसे बाग्लुंग से उतर रहे थे. धौलागिरी अंचल में बसे उस छोटे से मुफस्सिल कस्बे से जिसका रास्ता जिंदगी में देखे कुछ सबसे सुन्दर रास्तों में से एक है. जिसमे अनछुए जंगल हैं, कहीं किसी पहाड़ से उतर काली गण्डकी में फना हो जाने को भागती असंख्य धाराएँ हैं, जिसमें जिनमें अन्नपूर्णा की चोटियाँ साथ चलती हैं. और हाँ, जिसमें अन्नपूर्णा जाने वाले पर्वतारोहियों का बेस कैम्प भी है.

अपनी तमाम यात्राओं की तरह यह यात्रा भी पर्यटन नहीं बल्कि काम का हिस्सा थी. उस काम का जो महानगरों के बीचोंबीच बनी झुग्गीझोपड़ियों से लेकर बरास्ते छह महीने दुनिया से कटे रहने वाले मुगू मनीला तक ले जाता है. वह काम जिसने सिखाया कि स्वाभिमान और जिंदादिली- दोनों मध्यमवर्ग या अमीरों का ही विशेषाधिकार नहीं है. खैर, जिक्र काम का नहीं यात्रा का है सो वापस आते हैं. कुछ दिन पहले काठमांडू से शुरू हुआ हमारा सफ़र इसी रास्ते से बाग्लुंग लाया था. उस काठमांडू में जहाँ कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आये थे. और प्रकाश की शादी की तैयारियों में भागते दौड़ते मैं बचपन से ही काठमांडू आना चाहता था से लेकर मैं बचपन से यह शादी देखना चाहता था तक हमारा सहज मजाक बन गया था.

काली गण्डकी नदी के किनारे बसे बहुत सुन्दर से उस कस्बे से जो पर्यटन के साथ आने वाले कचरे से अब तक बचा हुआ है. कस्बे में मिले दोस्तों से यह शिकायत सुनता रहा कि यह सड़क अब भी अपने साथ बहुत सैलानी नहीं लाती. पर फिर, शायद उन्हें खुश होना चाहिए कि वह सैलानियों के साथ आने वाले बहुत कुछ से बचे हुए हैं.

पर शायद नहीं भी. इस कस्बे में सैलानी नहीं आते न सही, इस कस्बे, और हकीकत में पूरी घाटी के, लोगों को काम करने बाहर जाना ही पड़ता है. यूं तो इन पहाड़ों और जंगलों में पेट भरने भर के साधनों की कोई ख़ास कमी नहीं मगर फिर अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी तो नहीं हैं. और होतीं भी तो इंसानी जरूरतें पेट तक कहाँ सीमित रह पाती हैं. ‘यहाँ किताबें तक नहीं मिलतीं’ शाम यूं ही टहलते हुए स्थानीय साथी ने कहा था. कहाँ पता था कि अगले तीन दिन लगभग हर आँख में बाहर जाने का सपना ही नहीं, यहाँ से निकल भागने की यही अकुलाहट भी दिखने वाली है. काठमांडू से क़तर और दिल्ली से दोहा तक कोई शहर, देश ऐसा नहीं होगा जहाँ यहाँ के लोग काम न कर रहे हों. उनमें से ज्यादातर अकुशल मजदूर हैं.

मुझे मुगू याद हो आया था. जाने क्यों अप्रतिम सौन्दर्य वाले पहाड़ों में छिपी जिंदगी का सच उतना सुन्दर नहीं हो पाता. पर क्यों, हो भी तो पाता है. इसी दुनिया में स्विट्ज़रलैंड जैसे देश भी तो हैं. फिर अपने हिस्से वाली दुनिया में स्विटज़रलैंड का ख्वाब देख सकने के दुस्साहस पर मन ही मन हंस भी पड़ा था. वह बहुत उदास हंसी थी. पर फिर रात उतर आई थी और अभी मुझे खाने की तलाश में निकलना था. शाकाहारियों के लिए दक्षिणपूर्व एशिया ही नहीं बल्कि बड़े शहरों से निकलते ही नेपाल भी एक चुनौती ही है सो निकल पड़ा था.

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