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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

March 05, 2015

जिन्दा परम्पराओं के इतिहास नहीं होते उर्फ़ झेलम चाट सम्मेलन

अपनी ही समाधि को प्रणाम करते हुए हम ही, और कौन 
लोक परम्पराओं के इतिहास नहीं होते. उनका बस स्मृतियों के सहारे वर्तमान तक पंहुच आया स्वरुप होता है, उस स्वरूप को समझने के साथ उसकी मौलिकता बरक़रार रखते हुए भी उसे वर्तमान के साथ ढाल देने की कोशिशें होती हैं.

झेलम चाट सम्मेलन भी ऐसी ही एक परम्परा है. कोई भी ठीक ठीक नहीं जानता कि ये कब और कैसे शुरू हुआ, किसने शुरू किया. बेशक इस शुरुआत के बीज होली नाम के महापर्व के उत्तर भारत भर में बिखरे हजारों आख्यानों में छिपे हुए हैं पर यह जेएनयू के झेलम हॉस्टल में कब और कैसे अवतरित हुआ इसके बस अपने अपने दावे हैं. दो बड़े (और विश्वसनीय लगने वाले) दावे देखें तो ८० के दशक के दूसरे हिस्से में जेएनयू में लगातार बढ़ रही पुरबिया आबादी (जी हाँ, इंडो-गैंजेटिक बार्बेरिंयस उर्फ़ गंगा मैदानों के बर्बर नाम से जानी जाने वाली आम तौर पर बहुसंख्यक यह प्रजाति तब के पहले जेएनयू की अल्पसंख्यक कौम थी) के कुछ लोगों पर होली की किसी पूर्वसंध्या पर पिनक में या बिना पिनक में इसे शुरू करने के आरोप लगते रहे हैं. (नाम बाद में जोड़े जायेंगे). जो तयशुदा रूप से पता है वह यह कि अंग्रेजी आतंक से दबे रहने वाले जेएनयू में झेलम छात्रावास के नेतृत्व में प्रतिरोध की यह परंपरा झेलम मेस में शुरू हुई थी. कारवां बढ़ता रहा और 2002 में जेएनयू में मेरे गिरने के वक़्त तक यह सम्मेलन झेलम की दोनों विंग्स के बीच के गड्ढे में होता रहा जिसे तब चाटलीला मैदान कहा जाता था.

एक और बात जो तथ्यतः पता है वह यह कि शुरुआत से लेकर लम्बे दौर तक तमाम वरिष्ठ अध्यापक (मेरे समय झेलम अध्यक्ष रहे वसीम अकरम पुरुषोत्तम अग्रवाल सर की उपस्थिति याद करते थे) सम्मेलन में मौजूद  होते  थे. हाँ, न जाने  कब यह सम्मेलन लोकधर्मिता से फिसल कर होली की तत्कालीन अश्लीलता की गोद में लुढ़क गया सो अध्यापकों का आना भी बंद हो गया. बखैर, अपना पहला चाट सम्मेलन 2003-04 का था जो हाई नोट पर शुरू होकर उसी अश्लीलता की तरफ बढ़ चला था. याद करूँ तो तब के सम्मेलनों का अघोषित नियम सा बन गया था कि ९-१० बजे शुरू होगा, भरी संख्या में लडकियां भी होंगीं. कुछ अच्छी प्रस्तुतियां होंगी और रात ढलने के साथ ढलते कुछ और के साथ ११ बजे तक प्रस्तुतियों का तेवर कुछ ऐसा होगा कि बस पुरुष ही बचेंगे.

खैर, सितम्बर 2002 से मार्च 2003 तक के उस समय में हम भी अपनी थोड़ी बहुत में बहुत पर बलाघात के साथ चाट पहचान बना चुके थे सो मंच पर बुलाये गए, (जहाँ तक याद है संचालन जाहिद उल-हक और असग़र भाई कर रहे थे). कुछ पढ़ा और जनता चट के सफ़ेद हो गयी. सिर्फ इस बात पर नहीं कि बन्दा गंदे से चाट गया, ज्यादा इस बात पर कि बिना द्विअर्थी या अश्लील हुए भी चाट गया. सो सफ़र शुरू यहाँ से हुआ, अगले साल लोगों ने संचालन का आग्रह किया. (तब तक हम खयालन चाट बन चुके थे- मने किसी के मन में मेरा ख्याल भी आ जाए तो वो चट के सफ़ेद- चाट श्रेणियों पर विस्तार से आगे). अपनी गंभीर राजनैतिक (और इसीलिए खयालन चाट तक पंहुची कि बन्दा राजनीति के सिवा कुछ नहीं बोलेगा और उसमें भी जो बोलेगा वह अल्बानिया की कम्युनिस्ट पार्टी के हवाले से होगा) छवि को पंहुच सकने वाले खतरे के मद्देनजर बहुत सोचा विचारा गया मगर फिर कुछ शर्तों पर कि कोई अश्लीलता करने की इजाजत नहीं होगी, किसी समूह का मजाक नहीं उड़ाया जाएगा और सम्मेलन झेलम के अन्दर नहीं झेलम लॉन में होगा. ये झेलम लॉन भी कमाल की जगह है- है गंगा के सामने और नाम पीछे वाले झेलम का, पर फिर यही तो कड़ापा है झेलम का.

सो जनाब तैयारियां शुरू हुईं और सबसे पहले गठन हुआ चाट सिक्यूरिटी का. राहुल सिंह, दीपक भास्कर, दीपक राज, सुभाष बैठा, रितेश और (बाद के सालों में सबसे धमाकेदार सिक्यूरिटी ऑफिसर- राना रंजन) टीम में शामिल हुए. इस टीम को एक ही निर्देश था- यह कि जिसे जनता मंच से उखाड़ दे वह मंच न छोड़े तो उसे मंच से जबरिया उखाड़ दिया जाय. दूसरा यह कि अगर किसी के परफॉरमेंस में जरा अश्लीलता आई तो संचालक इशारा करेगा और उसे उखाड़ दिया जाय. यह दूसरा उखाड़ना बड़ा कमाल होता है- संचालक ने उस बार चुनी हुई भाव भंगिमा अपनाई- पहले साल दोनों हाथ गले के पीछे रख लेना था- और सिक्यूरिटी ने भाई को उठा के चोट न लगे इस सावधानी से सामने बैठी भीड़ में फेंक दिया. शुरुआत में कुछ लोगों को दिक्कत हुई मगर एक बात है कि फैसले का सम्मान ही नहीं किया गया, इस कदर किया गया कि यह साझा फैसला है. और लीजिये साहब, अश्लीलता की कोशिश के बाद उखाड़ दिए चाट होने के फर्जी दावे वाले कुछ ही लोगों के बाद जनता खुद ही सतर्क. उस साल सम्मेलन गयी रात तक चला और क्या धूम से चला. फिर तो बस...

ये सफ़र की शुरुआत थी. 2005-06 में थोड़ा और आगे ले जाने की जब चाट मंच पर किसी लड़की ने पहली बार पांव रखा और अगले ही साल बाकायदा जीत कर ले जाने का. अब तक चाट सम्मलेन अपने पुराने रूप में लौट आया था- उस रूप में जिसमें इसे शहर द्वारा विद्रूप बना दिए गया भदेस नहीं बल्कि सच में भदेस (देशज) परम्पराओं का उत्सव होना था. उस रूप में जिसमें इसे जेएनयू में गूंजते बॉब मारली के गानों के बीच अपनी चैती, कजरी और फगुवा को वापस ले कर आना था. उस रूप में जिसमें इसे बताना था कि भोजपुरी और अवधी जैसी लोकभाषाएँ निरहुआ और रमपत हरामी की नहीं, भिखारी ठाकुर की, शारदा सिन्हा की, कबीर की परम्पराएं हैं. याद रहे कि यह आना सामूहिकता का आना था किसी को हटा देना नहीं. इस उत्सव में किसी को हरा देने की जिद नहीं, साझेपन का संगीत था. आगे सफ़र और बढ़ा, जब इसमें हिंदी के साथ साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ भी शरीक हो गयीं- हमने इस मंच पर तमिल, तेलगू कन्नड़ चाट भी आते देखे.

पर सबसे कमाल शायद 2008 था जब ताप्ती से आने वाली और हमेशा खाली लौट जाने वाली बारात की अगुवाई वहाँ की महिला प्रेसिडेंट ने की. उसके पहले प्रेसिडेंट महिला हो तो कोई निमंत्रण पत्र से लेकर गधे और मंच तक पर कोई पुरुष छात्र आता था. कमाल साल था वह, कमाल सम्मेलन भी.
इसमें एक बात और- इस सम्मेलन में कुछ जीवित पिशाच भी हैं. जैसे प्रकाश के रे और उनका हर साल का “सम्मेलन मंच पर पी के आना और अश्लीलता करना दोनों मना है और मैं एक करके आया हूँ दूसरा करूंगा के साथ शुरू होने वाला बयान”. पर काश और लोग भी प्रकाश की तरह खिलंदड़ई ठिठोली वाली बदमाशियों और अश्लीलता में सच में फर्क कर पाते. जैसे मामू और उनका 1993 से चला आ रहा आलाप, और तमाम नये रूप- मंच पर खुद मैंने उन्हें साधू, भयानक घायल व्यक्ति, नववधु और न जाने कितने रूपों में देखा है. जैसे नेताजी अभिनन्दन जो शायद जेएनयू में दो ही कामों के लिए आये थे- चुनाव समिति का अध्यक्ष बनने और चाट सम्मेलन का निर्णायक. जैसे फैज़ अशरफी- जिनका मंच पर होना न होना बराबर था पर न होना हौसला तोड़ देता था. जैसे जाहिद उल हक जिनकी सदरी से कलफ उतरते देखने की ख्वाहिश ही रह गयी. जैसे धीरेन्द्र बहादुर सिंह जिनका मंच पर होना अनिवार्य था पर जिनको बोलते मुश्किल से कभी बोलते सुना. जैसे मारुफ़ हुसैन उर्फ़ समधी- जो जेएनयू में सिर्फ ताप्ती अध्यक्ष और चाट बारात का समधी बनने आये थे. जैसे भारत कुमार- जिन्होंने समधी बनने की परम्परा को संभाल लिया था. जैसे आनंद पाण्डेय जो जब तक रहे सबसे वेलड्रेस्ड चाट रहे. जैसे अमित राय उर्फ़ लार्ड राय.

उधर वालों की ज्यादा खबर कभी नहीं रही पर जैसे प्रेम चंद भाई जिनके दूल्हे के लिए तैयार की गयी मालाएं अद्भुत होती थीं, जूते चप्पल से शुरू कर बरास्ते रोस्टेड चिकेन सब्जियों तक. जैसे जब तक रहे शाश्वत दूल्हा रहे कृष्ण देव उर्फ़ कड़ादेव जो ऊंट, गधे, ट्रेक्टर किस पर बैठ कर नहीं आये. और जब नहीं रहे तब से चाट शपथ दिलवाते रहे. (तमाम लोग छूट गए होंगे, पर यह बस बहुत फौरी तौर पर लिखा गया है, ठीक किया जाएगा.)

खैर, इस सबका नशा यह कि हर साल किसी और को सौंप देने की कोशिशों के बावजूद 2009 की जनवरी में जेएनयू से खेत हो जाने के बाद भी 2012 तक चाट सम्मेलन का संचालन करते रहना पड़ा. पर फिर हम शहर दिल्ली नहीं ही, देश से भी गुजर कर हांगकांग रसीद हो गए तो करते भी क्या. हाँ यह जरुर किया कि 2013 में बिना बताये सम्मेलन में पंहुच गए (कुछ बहुत ख़ास लोगों को छोड़ किसी को नहीं पता था) तो जनता स्तब्ध थी. हम भी- सम्मेलन मंच के सामने अपनी समाधि थी. अपनी ही समाधि को लोबान फूल चढ़ा प्रणाम किया और मंच रसीद ही गए. हाँ इस बार संचालन न किया.  तब से फिर जाना न हो पाया पर यादों का क्या!
आज फिर चाट सम्मेलन मुबारक हो. पर मने वैसा ही जैसा हम सब छोड़ आये थे.


3 comments :

  1. कुछ लिखना हैं पर कुछ नहीं..!!😝

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  2. चाट गये उस्ताद!! मज़ा आ गया। चाटते रहिये।

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