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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

January 24, 2015

No one killed 22 Dalits- Jehanabad Court

This is an AHRC Statement

Citing lack of evidence against those accused of killing 22 Dalits in Shankar Bigha of Jehanabad, the district civil court acquitted all of the suspects. Coming a full 15 years after the massacre on the eve of 26 January 1999 - ironically the Republic Day - the verdict is not a standalone case of justice being first delayed for the Dalits and then altogether denied to them. The denial did not come from the lower judiciary alone, the higher judiciary has also acquitted many of the accused as well; often by setting aside the convictions by lower judiciary.

In October 2013, Patna High Court had set aside the convictions of all 26 accused of killing 58 Dalits in Laxamanpur Bathe massacre in 1997. The accused were convicted and sentenced by a lower court in 2010. Vijay Prakash Mishra, additional district and sessions judge, Patna, had given sentences of capital punishment to 16 convicts and life imprisonment to 10 others (while acquitting 19). The High Court found the prosecution witnesses unreliable and the appellants deserved the benefit of doubt. It went on to order their immediate release if they were not wanted in any other case.

In July of the same year, the Court had reversed the conviction and sentencing of 9 out of 10 accused of perpetrating the Miyapur Massacre. All of them had been convicted and sentenced to life by a court in Aurangabad in 2007. The High Court upheld the conviction of only one accused who was identified by an eyewitness while letting all the others go.

A few months before, in March 2013, the same High Court acquitted all 11 persons accused of Nagari Bazaar massacre case in which 10 Communist Party of India (Marxist-Leninist) supporters were killed in Bihar’s Bhojpur district in 1998. Previously, a court in Ara, Bhojpur had found them guilty of committing the massacre and handed a death sentence to three while handing down life sentence to the remaining eight. The acquittals came on the ground of “lack of adequate evidence” and absence of any eyewitnesses. That verdict also ordered immediate release if the accused were not wanted in any other case.

A year before, in 2012, the same high court had acquitted all the 23 persons accused of killing 21 Dalits at Bathani Tola in Bhojpur in 1996. All of the accused were originally convicted and sentenced by the sessions court in Ara in 2010 with three of them getting death sentence and remaining received life. The reason behind acquittals in this case was “defective evidence”.

A noteworthy point in all these acquittals is that they were all booked under the stringent provisions of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act 1989 and the lower courts have found sufficient evidence to sentence the accused. The High Court acquittals, on the other hand, are a practical claim that no one killed hundreds of massacred Dalits. It neither asked the prosecution to investigate who killed the victims; nor did it ask how this impunity for the murderers of the Dalits, oppressed by the system for thousands of years, perpetuates itself. It may never ask, as the impunity for the perpetrators of atrocities against Dalits is not limited to Bihar but runs across the judicial structure of the country. One may recall the horrendous murder of a Dalit family in Khairlanji, Maharashtra in which the prosecution has not pressed the Prevention Act at all! That shows how systematic and institutionalised casteism functions to deny the constitutionally guaranteed rights of the victims.

The citizenry of the country deserves to know who killed the Dalits. It deserves to see the perpetrators of such hate crime serve their sentences. A country allowing the murderers of a section of its citizens to go free is merely a delinquent democracy after all, not a republic.

January 19, 2015

पेशावर, पाकिस्तान और इस्लाम का आत्मसंघर्ष

[मुस्लिम टुडे (हिंदी) के जनवरी 2015 अंक में प्रकाशित] 


किसी नरसंहार से अल कायदा का सीना ‘दुःख और दर्द से छलनी हो जाय’ यह हादसा रोज नहीं होता. पर फिर पेशावर में फौजी स्कूल पर हमला कर 138  बच्चों सहित डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों को बर्बर ढंग से मारना और उसे सही ठहराना, यह हादसा भी तो रोज नहीं होता. पर अंधेरी गली के आखिर में दिखने वाली रौशनी पेशावर के वहशियाना हमले के बाद भी दिख रही है. यही रोशनी पाकिस्तान को आतंकवाद की उस बंद गली से निकाल सकती है जिसका मुहाना एक असफल राष्ट्र बनने की नियति में खुलता है. 

इस रोशनी की तमाम परतों में पहली यह है कि इसने तालिबान के समर्थक आम नागरिकों से लेकर राजनेताओं तक का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया है. कल तक तालिबान लड़ाकों को शहीद बताने वाले इमरान खान जैसे लोग इस ‘हमले की जिम्मेदारी लेने वाली’ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की सशर्त ही सही निंदा करने को मजबूर हुए हैं. यह पाकिस्तान के लिए अच्छी खबर है. इसमें लाल मस्जिद के नाम पर आतंक का गढ़ चलाने वाले मौलाना अब्दुल अज़ीज़ की पहले हमले को उचित ठहराना और फिर अवाम के गुस्से के बाद माफ़ी मांगते हुए टीटीपी की निंदा को मजबूर होना जोड़ लें. साफ़ है कि जनरल जिया उल-हक के बाद से लगातार कट्टरपंथी होते गए पाकिस्तान में उदारवादी ताकतों के लिए वक्ती जीत ही नहीं, आगे की लड़ाई की शुरुआत का मौका भी है.

सरकारों के लिए आतंकवादी अवाम या कमसेकम अवाम के एक हिस्से के लिए आजादी के लड़ाके हो सकते हैं, होते रहे हैं. पर फिर सरकारों के साथ हथियारबंद लड़ाई और आतंकी घटनाओं में साफ़ फर्क है- आजादी के लड़ाके बेगुनाह और गैरलड़ाकू(non-combatant) आबादी पर हमले नहीं करते. इस हिस्से पर हमला करने वाले आतंकवादी के सिवा कुछ नहीं हो सकते. यह हास्यास्पद विडम्बना ही है कि इस हमले की चार पेज लम्बी निंदा में यह बात अल कायदा को भी माननी पड़ी है. उसने स्वीकारा है कि अमेरिका की गुलाम बन मुसलमानों के नरसंहार में सबसे आगे पाकिस्तानी सेना की हरकतों का बदला “दबे कुचले मुसलमानों से’ नहीं लिया जा सकता. अल कायदा की दक्षिण एशियाई शाखा के प्रवक्ता उसामा महमूद द्वारा जारी इस बयान में यह भी दोहराया गया है कि उसकी लड़ाई अमेरिका के पिट्ठुओं से हैं और वह  ‘बच्चों, महिलाओं और अपने मुसलमान लोगों’ को निशाना नहीं बनाता है’. भले ही इस हास्यास्पद झूठ के लिए अल कायदा से पूछा जा सकता है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से लेकर बाली हमलों तक में मारे गए लोगों पर उसने कोई मुकदमा चलाकर उन्हें दोषी पाया था. पर हमले के अगले ही दिन आ गयी अफ़ग़ान तालिबान की निंदा के बरक्स हफ्ते भर बाद ही सही इस निंदा के मायने बहुत बड़े हैं.

यह शायद पहली बार है जब जेहादी इस्लाम एक अंतर्संघर्ष से गुजरते हुए दिख रहा है.  गोकि इस लड़ाई के संकेत अल कायदा द्वारा इस्लामिक स्टेट को आधिकारिक रूप से अपने से अलग करने के दौर से ही मिलने लगे थे पर अब सूरत और साफ़ हुई है. जेहादी इस्लाम अब खुद से पूछता हुआ दिख राह है कि मजहब के नाम पर कितनी हिंसा की जा सकती है, कितनी निर्ममता पर उतरा जा सकता है. पर फिर अफ़सोस, यह हमला न तो पहला था और न ही यह आखिरी होने जा रहा है. पाकिस्तान के कार्यकर्ता परवेज हुडबाय के शब्दों में कहें तो “लक्की मारवात में वोलीबाल मैच देख रहे दर्शकों पर फिदायीन हमले में 105 लोगों के मारे जाने के बाद कुछ नहीं बदला था. एक स्नूकर क्लब में आत्मघाती हमले में 96 हजारा लोगों के मारे जाने के बाद भी. पेशावर में ही आल सेंटस चर्च विस्फोट में मारे गए 127 लोग हों या प्रार्थना करते मारे गए 90 से ज्यादा अहमदी- अब बस सूखे आंकडे हैं... पाकिस्तान में अगर कोई सामूहिक अंतरात्मा या विवेक होता तो इनमें से कोई एक ही उसे झकझोर देने के लिए काफी था.”

पर नहीं, इस हमले ने बहुत कुछ बदला है. पाकिस्तान में उदारवादी साथियों की लड़ाई हमेशा से बहुत मुश्किल रही है, सलमान तासीर की तरह तमाम साथियों ने उस लड़ाई की कीमत अपनी जान से अदा की है. पर फिर जेहादी नफरत के अड्डे लाल मस्जिद पर ही मोर्चा निकाल देने के फैसले पर ज्यादातर लोगों का चुप ही सही समर्थन देना बता रहा है कि इस घटना ने तस्वीर काफी बदल दी है. लोगों को समझ आ रहा है कि हिन्दू, ईसाई और अहमदी अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जेहाद के नाम पर हो रही हिंसा का रुख शिया और हजारा समुदाय की तरफ मुड़ जाना पहली चेतावनी थी. वह चेतावनी न सुनना इस हिंसा को वहाँ ले आया है जहाँ पाकिस्तान में कोई सुरक्षित नहीं है, न अवाम न इस्लाम..

बात अजीब लगे तो याद करिए कि पेशावर के हत्यारों ने कैसे एक अध्यापिका को कुर्सी से बाँध कर जिन्दा जला दिया, उस इस्लाम की बता करते हुए जिसमें मरने के बाद भी जलाने की इजाजत नहीं है. यह भी कि कैसे उन्होंने मारने के पहले बच्चों से कलमा पढ़वाया, उनके साथ ‘जिन आठ को बचना है वे बाहर आ जाएँ’ जैसे दिमागी खेल खेले. हद यह कि नरसंहार के बाद जब पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया सदमे में थी (अल कायदा को एक हफ्ता लगना था) तब भी टीटीपी का प्रवक्ता उसे जायज और इस्लामिक बता रहा था. कथित रूप से सहीह बुखारी, पांच, की 148वीं हदीस उद्धृत करते हुए उसने यह दावा भी किया कि हमलावरों को केवल बड़े बच्चों को मारने का आदेश था..
हम लाख कहते रहें कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं है, पर इस्लाम का जेहादियों के हाथ अपहरण ही वह नुक्ता है जिससे जूझे बिना न पाकिस्तान को आतंकवाद से निजात मिल सकती है न दुनिया को. नाइजीरिया में बोको हराम, लेवांत में इस्लामिक स्टेट, केन्या में अल शबाब- ये सारे के सारे आतंकवादी संगठन न केवल इस्लाम के नाम पर लड़ रहे हैं बल्कि अपने हमलों को न्यायोचित ठहराने के लिए कुरआन और हदीस का प्रयोग करते रहे हैं. जब तक उन्हें कुरआन के ऐसे बेजा इस्तेमाल से रोका नहीं जाएगा, इस्लाम में यकीन रखने वाले मासूम उनके जाल में फंसते रहेंगे. सोमालियन मुस्लिम लेखिका अयान हिरसी की बात जरा सी बदल कर कहें तो इस्लाम में हो या न हो, इस्लामिक समाज के भीतर कुछ बहुत गड़बड़ है और इस्लाम बचाने के लिए उस गड़बड़ से जूझना ही होगा.

लगता नहीं कि पाकिस्तान इस लड़ाई के लिए तैयार है. पहले तो यही कि उसी का खड़ा किया हुआ यह भस्मासुर उसमें बहुत गहरे तक धंसा हुआ है. सरकार को पता ही नहीं है कि कौन दुश्मन है और कौन दोस्त. ये तालिबान फौज की नकली वर्दियां पहन के आये थे पर गवर्नर सलमान तासीर को मारने वाले सुरक्षाकर्मी की वर्दी असली थी. हक्कानी नेटवर्क कितना बड़ा है किसी को नहीं मालूम. उन जेहादियों से कोई कैसे लड़ सकता है जो राज्य के संस्थागत ढाँचे के हर हिस्से में शामिल हैं? फिर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज की बात सुनिए ‘पाकिस्तान उन आतंकी समूहों को निशाना नहीं बनाएगा जो ‘(पाकिस्तान) राज्य के लिए खतरा नहीं है’ और तस्वीर साफ़ हो जाती है. इन समूहों में हाफ़िज़ सईद के जमात उद-दावा जैसे संगठन शामिल हैं जो पूरे पाकिस्तान में घूम घूम के नफरत फैलाते हैं और जेहाद की मशीन के लिए रंगरूट तैयार करते हैं. 

तुर्रा यह कि जनरल जिया द्वारा पाकिस्तान के इस्लामीकरण की कोशिशों से शुरू हुआ ये सिलसिला अब केवल फौज, पुलिस या सुरक्षाकर्मियों तक सीमित नहीं है. स्त्रीविरोधी हुदूद कानूनों से शुरू कर ईशनिंदा विरोधी कानून बनाने के इस सफ़र ने पाकिस्तानी न्यायपालिका में भी खूब जहर भरा है. याद करिए कि रिंकल कुमारी अपहरण और जबरन धर्मपरिवर्तन मामले में पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ्तेखार चौधरी ने मस्जिद में आरोपियों से मुलाक़ात की थी. यह भी कि कैसे ईशनिंदा के एक मामले में वकीलों ने आरोपी के पक्ष में फैसला देने वाले लाहौर हाईकोर्ट न्यायाधीश को धमका कर फैसला बदलवा लिया था. कहना न होगा कि न्यायाधीशों का ये हाल है तो वकीलों का क्या होगा. कार्यपालिका की स्थिति भी कोई अलग नहीं है.

ऐसे हालात में कार्यवाही को सिर्फ खैबर पख्तून ख्वाह, फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज), अफगानिस्तान सीमावर्ती इलाके और कुछ हद तक कराची और इस्लामाबाद तक सीमित रखने से भी कुछ नहीं होगा. जेहादी पूरे पाकिस्तान में हैं और सरकार को उनसे निपटना भी पूरे पाकिस्तान में पड़ेगा. अफ़सोस कि यह काम सोशल मीडिया पर उमड़ पड़े आम नागरिकों के गुस्से के बस का नहीं है, यह बस पाकिस्तान सरकार कर सकती है और वह इसके लिए तैयार मालूम नहीं पड़ती. ऐसे में यह एक हारी हुई लड़ाई को थोड़ा सा और हार जाने का मामला ही बनता दिख रहा है.


अंत में सबसे बड़ा अफ़सोस यह कि दुनिया के दीगर मुस्लिम इलाकों में इस वहशियाना हमले के खिलाफ गुस्सा वैसा नहीं दिखा जैसा गाजा हमलों या पैगम्बर के कार्टूनों के खिलाफ दिखा था. ठीकठाक मुस्लिम आबादी वाले हिंदुस्तान के हर शहर में तब हुए प्रदर्शनों के बरक्स इस बार की खामोशी अफसोसनाक है. यह इस्लाम के लिए भी आत्मसंघर्ष का समय है. यह समझने का समय है कि दुनिया की कोई किताब इतनी पाक नहीं हो सकती कि उसके नाम पर लोगों की हत्या को सही ठहराया जा सके. यह भी कि किसी किताब के नाम पर मासूमों का खून बहाने वालों पर चुप नहीं रहा जा सकता है. ऐसी हर चुप्पी उनके हौसले ही बुलंद नहीं करती बल्कि अपने मुल्क के भीतर की वैसी ताकतों को बढ़ावा भी देती है. पाकिस्तान की आम अवाम ने इस बड़ी और जरुरी लड़ाई में अपने लिए जरा जमीन बना ली है. बाकी दुनिया के हर इंसान, खासतौर पर मुसलमानों को, तय करना होगा कि उन्हें इस मुश्किल वक़्त में पाकिस्तान के आम इंसान के साथ खड़ा होना है या अपनी चुप्पी लेकर तालिबान के साथ. 

January 17, 2015

फेरी वाले सपने

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 17 जनवरी 2015 को प्रकाशित]

फ्रेडी की आँखें अब भी चमक रहीं थी, वैसे जैसे अपने उजड़ने का डर बयान करते किसी शख्श की चमक ही नहीं सकतीं. मनीला के रिजाल पार्क की उतरती शाम में उनके चेहरे पर पड़ती सुनहली किरणें जोड़ लीजिये, और समझ आएगा कि थोड़ी देर पहले जोएल ने क्यों कहा था कि कभी कभी फ्रेडी जीसस क्राइस्ट जैसा लगता है.

हम मनीला के रिजाल पार्क में बैठे थे. हम माने मैं, स्थानीय साथी मेलोना, दयान और रिजाल के साथ साथ लुनेटा के नाम से भी जाने जाने वाले पार्क में फेरी लगाने वाले दोस्त. उस पार्क में जो अब 56 साल के हो चुके फ्रेडी का 1972 से ही घर है. हाँ, घर, बोले तो एक रेहड़ी जिसमें ऊपर सामान होता है और नीचे पाँव मोड़कर सो जाने भर की जगह. हम वहाँ इसलिए थे क्योंकि सरकार विकास के नाम पर पीपुल्स डेमोक्रेटिक हॉकर्स और वेंडर्स अलायंस नाम से संगठित रेहड़ी और फेरी वाले दोस्तों का यह घर छीनने की कोशिश में थी. फ्रीडम आइलैंड के मछुआरे दोस्तों की बसावट ध्वस्त करने की ऐसी ही कोशिश को दो साल से रोके रहने की हमारी छोटी से कामयाबी के बाद मेलोना ने हमें इस लड़ाई में शामिल किया था. सो एक साल तक सरकार से जद्दोजहद के बाद खतरा बढ़ता देख हम सरकार पर दबाव डालने के लिए खुद वहाँ पंहुच गए थे.

यूं तो पार्क में फेरी रेहड़ी दोनों ही कभी कानूनी नहीं थे पर फिर सरकार ने सैकड़ों लोगों को रोजगार देने वाले इस काम पर कभी ऐसा कहर भी नहीं तोड़ा था. “मेरे पास इस रेहड़ी के सिवा कुछ नहीं है, न पति न बच्चे”- ज़म्बोंगा मिंडान ने अचानक खामोशी तोड़ी थी- “वे मुझसे यह भी क्यों छीनना चाहते हैं”. “है तो, तुम्हारे पास वो बिल्ली भी तो है”-इस बार बीच में कूदने वाली ‘मिला’ थीं और एक साझा ठहाका हवा में बिखर गया था. किसी भी हालत में, कितनी भी परेशानियों के बीच हंस सकने की यह क्षमता मैंने श्रमिकों को छोड़ और किसी समूह में कभी नहीं देखी.

“इन लोगों की ‘जीरो वेंडिंग पालिसी’ बस एक बहाना है, ये लोग एक कोरियन फ़ूडजॉइंट की शाखाएं यहाँ खोलना चाहते हैं. हमें उनके दस्तावेज मिल गए हैं.” संगठन के अध्यक्ष जोएल बात को फिर पटरी पर ले आये थे. “यह कहते हैं कि हम लोगों से लोगों को दिक्कत होती है, फिर हमारे खाने में साफसफाई की भी कोई गारंटी नहीं है, पर हम भी तो शीतल पेय, नूडल्स, बिस्किट और ऐसी ही चीजें बेचते हैं. यह भी वही बेचेंगे, फिर साफसफाई की दिक्कत कहाँ से आ गयी”. बात आगे बढ़ाते हुए जोएल की आवाज में अब गुस्सा उतर आया था. पर ठीक यही तर्क तो दिल्ली में कनाट प्लेस और इंडिया गेट से रेहड़ी-फेरी वालों को निकालने के लिए दिल्ली सरकार ने इस्तेमाल किया था. सारी दुनिया के मजदूर कभी एक हो पायें या नहीं, दुनिया भर के हुक्मरान बिलकुल एक से हैं.

“पिछली बार हमने बड़ी मुश्किल से रोका था’ बात एडविन ने आगे बढ़ायी थी. “हमारा सारा सामान जब्त कर लिया था, पुलिस ने कुछ लोगों को मारा पीटा भी था. कुछ लोग डर कर चले भी गए थे, हमें अलविदा कहने का भी वक़्त नहीं मिला था. पर फिर संगठन ने लम्बी लड़ाई लड़ कर आगे की कार्यवाही रोक दी थी. तब सरकार ने एक आजीविका परियोजना शुरू कर हमें यहाँ काम करने की इजाजत दे दी थी, मगर इस शर्त पर कि पार्क की साफ़ सफाई की जिम्मेदारी हमारी होगी. अब वो फिर से निकालने का आदेश लेकर आ गए हैं.”

अफ़सोस यह कि इस बार का आदेश पोप फ्रांसिस की यात्रा के मद्देनजर था. उन पोप फ्रांसिस को जिन्हें लगभग कम्युनिस्ट समझा जाता है, गरीबों का हितैषी और मसीहा माना जाता है. लगभग 98 प्रतिशत रोमन कैथोलिक आबादी वाले इस देश में पोप का बहुत सम्मान है और रेहड़ी-फेरी वालों को यकीन कि उन्हें पता चल जाय तो वे नहीं निकाले जायेंगे. ‘उन्हें पार्क में एक दिन ही तो मॉस करना है, उसमें तो हम भी शामिल होना चाहते हैं. ऐसा शुभ अवसर कौन नहीं चाहेगा’ मिला की आवाज में अद्भुत ख़ुशी भर आई थी. “हम कहाँ कभी वैटिकन जा पाते, इसी अपने जीसस फ्रेडी को देखते रह जाते’- जोएल की चुहल भरी टिप्पणी ने साझा हंसी का दूसरा मौका दे दिया था. काश उनका यकीन सच निकले. रात उतर आई थी. कॉफ़ी और नाश्ता आ गया था, हमेशा की तरह जानता था कि ये मजदूर दोस्त पैसे नहीं देने देंगे सो निकलते हुए प्रस्ताव भी नहीं रखा था. लड़ाई जारी रहनी थी. हाँ अचानक जम्बोंगा ने अपनी रेहड़ी में लेटकर देखने का प्रस्ताव रखा था- तीन तरफ अलमुनियम से बंद चार गुने चार की उस रेहड़ी में मिनटों में ही दम घुटने लगा था और जिम्बोंगा उसी में दशकों से सो रही थीं.

लड़ाई जारी रहेगी. इस बार सरकारी अधिकारियों के साथ साथ पेपल नुन्सियो (पोप के राष्ट्रीय प्रतिनिधि) से भी बात करनी होगी सोचते हुए हम सब बाहर निकल आ

January 16, 2015

پشاور، پاکستان اور اسلام کی جدوجہد

ماہنامہ مسلم ٹوڈے میں شائع
کسی قتل عام سے القاعدہ کا سینہ ’ دکھ اور درد سے چھلنی ہو جائے‘ یہ حادثہ روز نہیں ہوتا، لیکن پھر پشاور میں فوجی
اسکول پر حملہ کر کے 138بچوں سمیت 150سے زائد لوگوں کا وحشیانہ قتل کرنا اور اسے جائز ٹھہرانا ، یہ حادثہ بھی تو روز نہیں ہوتا، لیکن اندھیری گلی کے آخر میں نظر آنے والی روشنی پشاو رکے وحشیانہ حملے کے بعد بھی نظر آ رہی ہے۔ یہی روشنی پاکستان کو دہشت گردی کی اس بند گلی سے نکال سکتی ہے، جس کا مہانہ ایک ناکام قوم بننے کے مقدر میں کھلتا ہے۔
اس روشنی کی تمام تہوں میں پہلی یہ ہے کہ اس نے طالبان کے حامی عام شہریوں سے لے کر حکمرانوں تک کا منھ ہمیشہ کے لئے بند کر دیا ہے۔ کل تک طالبان لڑکوں کو شہید بتانے الے عمران خان جیسے لوگ اس ’حملے کی ذمہ داری لینے والے ‘ تحریک طالبان پاکستان (ٹی ٹی پی) کی بشرطہی صحیح مذمت کرنے کو مجبور ہوئے ہیں۔ یہ پاکستان کے لئے اچھی خبر ہے۔ ا س میں لال مسجد کے نام پر دہشت گردی کا اڈہ چلانے والے مولانا عبدالعزیز کے پہلے ملے کو مناسب ٹھہرانا اور پھر عوام کے غصے کے بعد معافی مانگتے ہوئے ٹی ٹی پی کی مذمت کو مجبور ہونا جوڑ لیں۔ واضح ہے کہ جنرل جیا ء الحق کے بعد سے مسلسل بنیاد پرست ہوتے گئے پاکستان میں اعتدال پسند طاقتوں کے لئے موقع کی جیت ہی نہیں ، آگے کی لڑائی کی شروعات کا موقع بھی ہے۔
سرکاروں کے لئے دہشت گرد عوام یا کم سے کم عوام کے ایک حصے کے لئے مجاہدین آزاد ی ہو سکتے ہیں، ہوتے رہے ہیں ، لیکن سرکاروں کے ساتھ ہتھیار بند لڑائی اور دہشت گردانہ واقعات میں واضح فرق ہے۔ آزادی کے مجاہد بے گناہ اور غیر مجاہد آبادی پر حملے نہیں کرتے۔ اس حصے پر حملہ کرنے والے دہشت گردکے سوا کچھ نہیں ہو سکتے۔مضحکہ خیز پہلو یہ ہے کہ اس حملہ کی چار صفحات پر مبنی مذمت میں یہ بات القاعدہ کو بھی ماننی پڑی ہے۔ اس نے اعتراف کیا ہے کہ امریکہ کے غلام بن کر مسلمانوں کے قتل عام میں سب سے آگے پاکستانی فوج کی حرکتوں کا بدلا دبے کچلے مسلمانوں سے نہیں لیا جا سکتا۔ القاعدہ کی جنوبی ایشیائی شاکھ کے ترجمان اسامہ محمود کے ذریعہ جاری اس بیان میں یہ بھی دہرایا گیا ہے کہ اس کی لڑائی امریکہ کے پٹھوؤں سے ہے اور وہ بچوں ، خواتین اور اپنے مسلمان لوگوں کو نشانہ نہیں بناتا ہے۔ بھلے ہی اس مضحکہ خیز جھوٹ کے لئے القاعدہ سے پوچھا جا سکتا ہے کہ ورلڈ ٹریڈ سینٹر سے لے کر بالی حملوں تک میں مارے گئے لوگوں پر اس نے کوئی مقدمہ چلا کر انہیں قصوروار پایا تھا، لیکن حملے کے اگلے ہی دن آ ئی افغان طالبان کی مذمت کے برعکس ہفتے بھر کے بعد ہی صحیح اس مذمت کے معنی بہت ہیں۔
یہ شاید پہلی بار ہے جب جہادی اسلام ایک انتہائی جدوجہد کے دور سے گزرتے ہوئے نظر آ رہا ہے۔ گوکہ اس لڑائی
کے اشارے القاعدہ کے ذریعہ اسلامک اسٹیٹ کو باضابطہ طور پر خود سے الگ کرنے کے دور سے ہی ملنے لگے تھے، لیکن اب صورتحال مزید واضح ہو گئی ہے۔جہادی اسلام اب خود سے پوچھتا ہوا نظر آ رہا ہے کہ مذہب کے نام پر کتنا تشدد کیا جا سکتا ہے، کتنی بے رحمی اور وحشی پنے پر اترا جا سکتا ہے، لیکن پھر افسوس، یہ حملہ نہ توپہلا تھا اور نہ ہی یہ آخری ہونے جا رہا ہے۔ پاکستان کے کارکن ہڈ بائے کے الفاظ میں کہیں تو ہکی ماروات میں والی بال میچ دیکھ رہے ناظرین پر فدائین حملے میں 105لوگوں کے مارے جانے کے بعد کچھ نہیں بدلا تھا۔ ایک اسنوکر میں خودکش حملے میں96ہزار لوگوں کے مارے جانے کے بعد بھی۔ پشاور میں ہی آل سینٹس چرچ دھماکے میں مارے گئے 127لوگ ہوں یا عبادت کرتے وقت مارے گئے 90سے زیادہ احمدی۔ اب بس سوکھے اعداد و شمار ہیں۔ پاکستان میں اگر کوئی اجتماعی خود احتسابی یا عقل و شعور ہوتا تو ان میں سے کوئی ایک ہی اسے جھنجھوڑ دینے کے لئے کافی تھا۔
لیکن نہیں، اس حملے نے بہت کچھ بدلا ہے۔ پاکستان میں اعتدال پسند ساتھیوں کی لڑائی کی قیمت اپنی جان سے ادا کی ہے، لیکن پھر جہادی منافرت کے اڈے لال مسجد پر ہی محاذ کھولنے کے فیصلے پر بیشتر لوگوں کی خاموشی ہی صحیح حمایت دینا بتا رہا ہے کہ اس واقعہ نے تصویر کو بہت حد تک بدل دیا ہے۔ لوگوں کو سمجھ آ رہا ہے کہ ہندو، عیسائی اور احمد اقلیتی فرقوں کے خلاف جہاد کے نام پر ہو رہے تشدد کا رخ شیعہ اور ہزارہ فرقہ کی طرف سے مڑ جانا پہلا انتباہ تھا۔ وہ انتباہ نہ سننا اس تشدد کو وہاں لے آیا ہے، جہاں پاکستان میں کوئی محفوظ نہیں ہے، نہ عوام نہ اسلام...
بات عجیب لگی ہو تو یاد کریں کہ پشاور کے قاتلوں نے کیسے ایک خاتون پرنسپل کو کرسی سے باندھ کر اسے زندہ جلا دیا، اس اسلام کی بات کرتے ہوئے جس میں مرنے کے بعد بھی جلانے کی اجازت نہیں ہے۔ یہ بھی کہ کیسے انھوں نے مارنے سے قبل بچوں کو کلمہ پڑھوایا، ان کے ساتھ ’جن آٹھ کو بچنا ہے وہ بار آ جائیں‘ جیسے دماغی کھیل کھیلے۔ حد یہ ہے کہ قتل عام کے بعد جب پاکستان ہی نہیں پوری صدمے میں تھی (القاعدہ کو ایک ہفتہ لگنا تھا) اس وقت بھی ٹی ٹی پی کا ترجمان اسے جائز اور اسلامی بتا رہا تھا۔ مبینہ طور پر صحیح بخاری ، پانچ کی 148ویں حدیث کا حوالہ دیتے ہوئے اس نے یہ دعویٰ بھی کیا کہ حملہ آوروں کو صرف بڑے بچوں کو مارنے کا حکم تھا۔
ہم لاکھ کہتے رہیں کہ اسلام کا دہشت گردی سے کوئی تعلق نہیں ہے، لیکن اسلام کا جہادیوں کے ذریعہ ہائی جیک کیا جانا ہی وہ نقطہ ہے ، جس سے متاثر ہوئے بنا نہ پاکستان کو دہشت گردی سے نجات مل سکتی ہے اور نہ دنیا کو۔ نائیجریا میں بوکو حرام ، لیوانت میں اسلامکا سٹیٹ، کینیا میں الشباب یہ سبھی دہشت گرد تنظیمیں نہ صرف اسلام کے نام پر لڑ رہی ہیں بلکہ اپنے حملوں کو انصاف پسند ٹھہرانے کے لئے قرآن اور حدیث کی دہائی بھی دیتی ہیں۔ جب تک انہیں قرآن کے ایسے بیجا استعمال سے روکا نہیں جائے گا، اسلام کو ماننے والے معصوم لوگ ان کے جال میں پھنستے رہیں گے۔ صومالیا کی مسلم مصنفہ عیان ہرسی کی بات ذرا سی بدل کر کہیں تو اسلام میں ہو یا نہ ہو، اسلامی سماج کے اندر بہت کچھ گڑ بڑ ہے اور اسلام کے لئے اس گڑبڑ سے متاثر ہونا ہی ہوگا۔
لگتا نہیں کہ پاکستان اس لڑائی کے لئے تیار ہے۔ پہلے یہی کہ اسی کی لگائی ہوئی یہ آگ اسے بہت حد تک جلا چکی ہے۔ حکومت کو معلوم ہی نہیں ہے کہ کون دشمن ہے اور کون دوست۔ یہ طالبانی پاک فوج کی نقلی وردیاں پہنچ کر آئے تھے، لیکن آنجہانی گورنر سلمان تاثیر کو مارنے والے سیکورٹی گارڈ کی وردی اصلی تھی۔ حقانی نیٹ ورک کتنا بڑا ہے کسی کو نہیں معلوم۔ ان جہادیوں سے کوئی کیسے لڑ سکتا ہے جو ریاست کے ادارہ جاتی ڈھانچے کے ہر حصے میں شامل ہیں؟ پھر وزیر اعظم نواز شریف کے خارجی امور کے صلاح کار سرتاج عزیز کی بات سنئے ’پاکستان ان دہشت گرد تنظیموں کو نشانہ نہیں بنائے گا جو (پاکستان) ملک کے لئے خطرہ نہیں ہے، مزید تصویر واضح ہو جاتی ہے۔ ان تنظیموں میں حافظ سعید کی جماعت الدعوۃ جیسی تنظیمیں شامل ہیں جو پورے پاکستان میں گھوم گھوم کے نفرت پھیلاتے ہیں اور جہاد کی مشین کے لئے جنگجو تیار کرتی ہیں۔
طرہ یہ ہے کہ جنرل ضیاء کے ذریعہ پاکستان کو اسلامی ملک بنانے کی کوششوں سے شروع یہ سلسلہ اب صرف فوج، پولس یا سیکورٹی اہلکاروں تک محدود نہیں ہے۔ نسواں مخالف حدود قوانین سے شروع ہو کر توہین رسالت قانون بنانے کے اس سفر نے پاکستانی عدلیہ میں بھی خوب زہر بھرا ہے۔ یاد کریئے کہ رنکل کماری کے اغوا اور جبراً مذہب تبدیلی کے معاملہ میں پاکستان کے چیف جسٹس افتخار چودھری نے مسجد میں ملزمین سے ملاقات کی تھی۔ یہ بھی کہ کیسے توہین رسالت کے ایک معاملہ میں وکلاء نے ملزم کے حق میں فیصلہ دینے والے لاہور ہائی کورٹ کے چیف جسٹس کو دھمکا کر فیصلہ بدلوا لیا تھا۔ کہنے کی ضرورت نہیں کہ جب ججوں کا یہ حال ہے تو وکیلوں کی حالت کا اندازہ بآسانی لگایا جاسکتا ہے۔ عاملہ کی صورتحال بھی کوئی الگ نہیں ہے۔
ایسے حالات میں کارروائی کو صرف خیبرپختونخواہ، فاٹا (فیڈرلی ایڈمنسٹریٹیو ٹرائبل ایریاز) ، افغانستان کے سرحدی علاقے اور کچھ حد تک کراچی اور اسلام آباد تک محدود رکھنے سے بھی کچھ نہیں ہوگا۔ جہادی پورے پاکستان میں ہیں اور حکومت کو ان سے نمٹنا بھی پورے پاکستان میں پڑے گا۔ افسوس کہ یہ کام سوشل میڈیا پر عام شہریوں کے غصے کے بس کا نہیں ہے، یہ صرف حکومت پاکستان کر سکتی ہے اور وہ اس کے لئے تیار نظر نہیں آتی۔ ایسی صورت میں یہ ایک ہاری ہوئی لڑائی کو تھوڑا ور ہارجانے کا معاملہ بنتا نظر آ رہا ہے۔
آخر میں سب سے بڑا افسوس یہ کہ دنیا کے دیگر مسلم ممالک کے علاقوں میں اس وحشیانہ حملے کے خلاف غصہ ویسا نظر نہیں آیا جیسا غزہ یا پیغمبر ؐ کے کارٹونوں کے خلاف نظر آ یا تھا۔ معقول مسلم آبادی والے ہندوستان کے ہر شہر میں اس وقت ہوئے مظاہروں کے برعکس اس بار کی خاموشی افسوسناک ہے۔یہ اسلام کے لئے بھی جدوجہد کا وقت ہے۔یہ سمجھنے کا وقت ہے کہ دنیا کی کوئی کتاب اتنی پاک نہیں ہو سکتی کہ اس کے نام پر لوگوں کے قتل کو صحیح ٹھہرایا جا سکے۔یہ بھی کہ کسی کتاب کے نام پر معصوموں کا خون بہانے والوں پر خوشی نہیں رہا جا سکتا۔ایسی ہر خاموشی ان کے حوصلے ہی بلند نہیں کرتی بلکہ اپنے ملک کے اندر کی ویسی طاقتوں کو تقویت بھی دیتی ہے ۔ پاکستان کے عوام نے اس بڑی اور ضروری لڑائی میں اپنے لئے تھوڑی سی زمین بنا لی ہے۔ باقی دنیا کے ہر انسان، خصوصاً مسلمانوں کو طے کرنا ہوگا کہ اس مشکل وقت میں پاکستان کے عوام کے ساتھ کھڑنا ہونا ہے یا اپنی خاموشی لے کر طالبان کے ساتھ۔