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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 20, 2014

ज्वालामुखी की गोद में

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 20-12-2014 को प्रकाशित]

टगाताई शहर से नीचे उतरती वादी की सड़क पर कार बहुत झटके से रुकी थी. फिर ड्राईवर ने इशारा किया था- ‘वो देख रहे हैं, एक अकेले पहाड़ सा? वही है ताल ज्वालामुखी.’ हमने ध्यान से देखा था उस खूबसूरत फरेबी को. गहरे नीले पानी के बीच खड़ा एक हरा पहाड़, क्रेटर न दिखे तो कोई कह ही न सके कि ये ज्वालमुखी है. वह भी जीवित, आग उगलता. पर फिर, यहाँ टगाताई रिज से दिख रहा वह ज्वालामुखी फिलिपीन्स के सबसे सुन्दर नजारों में एक माना ही नहीं जाता, है भी.

हाँ, नदी पहाड़ जंगल नाले तो सब देखते हैं, हमने जीता हुआ ज्वालामुखी देखा है। उससे निकलती लावे की नदी से खेलते हुए हवाओं में बिखरी सल्फर को भर सांस फेफड़ों में जिया है. अब याद आता है कि सब कुछ कितना सपनीला सा था. हमारे सामने वो ज्वालामुखी था जो बस बचपन की किताबों में होता था. याद है कि किताबों में लिखा हर हर्फ़ सच मानने वाले हम बस ज्वालामुखी की बातों पर ठहर जाते थे, शक और यकीन के बीच की किसी जगह से उसकी कल्पना करते रहते थे कि ऐसा भी हो सकता है भला?

और लीजिये, फ्रीडम आइलैंड ही नहीं, और भी तमाम जगहों से विस्थापित साथियों से मिलने उनके लिए बनायी गयी पुनर्वास बसावटों में पंहुचे और बात बात में जिक्र आया कि ताल ज्वालामुखी वहाँ से बस 50 किलोमीटर के फासले पर है. सचिन भाई, मैं, स्थानीय साथी लेया और डेजी- हममें से किसी ने कभी कोई ज्वालामुखी नहीं देखा था सो आँखों में कौतूहल के साथ सवाल भी था- सुरक्षित होगा? अगर हमारे पंहुचते पंहुचते जोर से फट पड़ा तो? फिर भारतीय बुद्धू बक्सों पर मिली सीख याद आ गई- डर के आगे जीत है और बैठकों के बाद अपना कारवां ज्वालमुखी की तरफ निकल पड़ा.

रास्ते में गूगल चाची ने जो बताया वह डराने भर को काफी था. ल्यूज़न द्वीप पर स्थित ताल ज्वालामुखी अपने इतिहास में कुल 33 विस्फोटों के साथ फिलीपींस का सबसे सक्रिय ज्वालामुखी है. मतलब यह कि 40000 वर्ग किलोमीटर में फैले दुनिया के 90 प्रतिशत भूकम्पों के घर ‘पैसिफिक रिंग ऑफ़ फायर’ उर्फ़ आग के गोले के नाम से जाने उस इलाके के सबसे बदमाश ज्वालामुखियों में से एक जिसने बहुतेरी जानें ली हैं.

बतांगास प्रांत के तालिसाय और सैन निकोलस शहरों के बीच ताल झील के बीच एक द्वीप के शिखर पर स्थित इस ज्वालामुखी तक पंहुचते पंहुचते शाम उतर आई थी. हमें तालिसाय से एक स्टीमर किराए पर लेना था और फिर द्वीप तक पंहुचना था जहाँ बसे हुए लोग घोड़ों से हमें ऊपर ले जाते. ‘ज्वालामुखी के बगल बसे हुए लोग’- इस ख्याल ने फिर सिहराया था. यहाँ बसना प्रतिबंधित है, पर फिर जिन्दा रहने की जद्दोजहद ऐसे प्रतिबंधों से कहाँ डरती है सो अतिउपजाऊ वोल्कैनिक राख और आने वाले घुमंतुओं को आजिवाका का आधार बना उस द्वीप पर ही एक पूरा समुदाय बस गया है.

उन घोड़ों के साथ हमें ऊपर ले जाने ले लिए हम सबके साथ अब एक एक बन्दा और जुड़ गया था. मेरे साथ सुलेमान था. 93 प्रतिशत ईसाई आबादी वाले देश में ज्वालामुखी के द्वीप पर सुलेमान? पूछा तो शक सही निकला, उसका परिवार दशक भर पहले मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांत मिंदानाओ की हिंसा और बेरोजगारी से भागकर यहाँ आ पंहुचा था और फिर यहीं का होकर रह गया था. खैर, दूरी कम थी सो आधे घंटे में ही हम ज्वालामुखी के करीब आ पंहुचे थे. बहता हुआ लावा हमारे सामने थे और दूर क्रेटर से निकल रहा धुंआ. हवाओं में घुली सल्फर अपने होने का ही नहीं बल्कि उससे पैदा हो सकने वाले खतरों का हलफिया बयान थी. हम चारों स्तब्ध खड़े थे, लगभग अविश्वास में कि हम सच में एक ज्वालामुखी के पास नहीं बल्कि उस पर खड़े हैं. ‘इस लावे में एक पाँव डाल के देखूं, बहुत गरम तो नहीं होगा’ मैंने डरते डरते पूछा था. जवाब में चारों बच्चे खिलखिला उठे थे, ‘डालिए डालिए, अभी बारिश हुई है न, कुछ नहीं होगा. जूते भी तो पहने हैं आपने, बस पाँव जल्दी जल्दी उठाते रहिएगा’. मैं और सचिन भाई दोनों लावे की उस बहुत धीमे मगर बहती नदी में पाँव डाल दिए थे.

उतरने का वक़्त हो आया था, सो बतौर यादगार लावे का एक टुकड़ा टिश्यू पेपर में सहेज कर रख लिया था मैंने, बाद में सिर्फ यह समझने के लिए कि लावा पिघलता ही नहीं, बूरा भी हो जाता है.

‘डर नहीं लगता सुलेमान’ मैंने उतरते हुए पूछा था. ‘लगता तो है पर ज्वालामुखी फटने पर वक़्त देता है, भाग जायेंगे झील के उस पार’- उसका जवाब था. ‘न भाग पाए तो’- मैंने फिर पूछा था. ‘तो क्या हुआ, मिंदानाओ में तो कोई भागने का वाट भी नहीं देता’- कहकर वो खिलखिला के हंस पड़ा था. हमारे स्टीमर तक पंहुचने तक उदास रात उतर आई थी.

December 11, 2014

A hunger free Asia is possible

[This is AHRC Statement on International Human Rights Day]

The more things change, the more they remain the same goes an adage. It holds true for hunger in Asia. Most Asian countries appear to have made momentous gains in addressing absolute hunger, as evidenced by the Global Hunger Report 2014 of the International Food Policy Research Institute. However, there have been no advances in fighting "hidden hunger", i.e. micronutrient deficiency. The percentage point gains showcased in the Report also fail to depict the enormity of the problem in absolute numbers, and the capacity to generate a vicious cycle: from malnutrition to stunting to poverty to more malnutrition.

For example, in 2014, more than 550 children died of drought-induced malnutrition in Tharparkar District of Sindh Province in Pakistan alone. The deaths did not arise suddenly or surprisingly; the story has remained the same year after year in the desert district chronically affected by drought. The story is no different across the heartland of India, where more than 40% children are malnourished.

What have governments done to address the crisis? Have they taken concrete steps to redress the situation policy level, programme level, and in the legal realms in 2014? No is the answer.

Unfortunately, the complete absence of redress mechanism remains the biggest hurdle in achieving the ideal of a hunger free Asia. Barring exceptions, like the battery of social welfare legislations enacted by India, the right to food – a basic prerequisite for the right to life with dignity – remains non justiciable in most of Asian countries. What this implies is that the state is legally bound to protect its citizens from say criminal offences but is not obliged to save a person, family, or community that is starving to death. To make matters worse, big business lobbies are fiercely opposing the legislations enacted in India and the incumbent political regime seems to be under pressure to dilute social welfare schemes. Given that these "exceptional" legislations – such as those on Food Security and Employment Guarantee for – have serious lacuna, there seems to be no end to hunger in Asia in the coming decade.

Most Asian countries are witnessing similar patterns of people being dispossessed from their lands in the name of development; of labour rights that ensure collective bargaining being suspended; and of livelihood opportunities being decimated in the countryside, which is forcing villagers into distress migration. Slavery too has returned in several of the countries in the region, albeit in different forms, such as that of debt bondage. A new era of Banana Republics has also arisen, with countries like Pakistan and the Philippines offering long tenure land leases to foreign companies for corporate farming where the local populace have no rights over the produce, not even during natural calamities and other emergencies.

Tackling such issues would be difficult for even well meaning governments responsive to the nutritional needs of their vulnerable populations, which are few and far between in the Asian region. Therefore, addressing the hunger and poverty at the root will take exceptional circumstances, where committed governments having the political will are supported by civil society to radically restructure the discourse on right to food, bringing in the idea of food security in place of that of the mere absence of hunger. It will require linking the right to food with other basic rights like right to shelter, clean potable water, secured land tenure and livelihood security. Until then, the dream of having a hunger free Asia cannot be realised despite the welcome decline in the incidence of absolute hunger.

December 08, 2014

चिड़ियों के गाँव में

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' 6 दिसंबर 2014 को प्रकाशित.]

जिंदगी भी एक हसीन इत्तेफाक ही है आखिर। यूँ कि निकलें आप मेट्रो मनीला के एक बहुत सुन्दर इलाके फ्रीडम आइलैंड के उन मछुआरे दोस्तों से मिलने जिनकी बेदखली खिलाफ लड़ाई में आप बरसों से साथ हैं. पर पँहुच जाएँ कहीं और माने लॉन्ग आइलैंड, जहाँ सीनेटर द्वारा समुद्र तट की सफाई और मैंग्रोव्स फिर से लगाने का कार्यक्रम आयोजित किया गया हो. और फिर आपके स्थानीय साथियों ने आपके आने की सूचना पहले से दे दी हो तो आपका स्वागत भी किया जाय और विशेष स्थान भी दिया जाय. उससे भी ज्यादा तब जब यह समझ आये कि यह ‘विशेष स्थान’ मूलतः कुछ विशेष नहीं है. तब जब आप देखें कि सीनेटर ‘सिंथिया विलार’ के साथ कोई सुरक्षा दस्ता नहीं है. तब जब आप देखें कि वे लोगों से और लोग उनसे बेझिझक मिल रहे हैं, तस्वीरों के साथ साथ सेल्फी भी ले रहे हैं.

खैर, लॉन्ग आइलैंड मनीला से कोई दो घंटे की दूरी पर स्थित लॉस पिनास - परान्क्वे क्रिटिकल हेबिटेट का हिस्सा है. करीब 175 वर्ग मीटर में फैले इस इलाके में तटीय लैगून है, जंगल हैं और फिर 36 हेक्टेयर में फैले मैन्ग्रोव्स भी. वो मैंग्रोव्स अरसे तक मनीला को समुद्री तूफानों से बचाते रहे है पर अब प्रदूषण से लेकर शहरों में जमीन की हवस की वजह से खुद ही संकट में है. वास्तव में मेनग्रोव का शाब्दिक मतलब होता है सदबहार. यह उष्णकटिबंधीय समुद्र तटीय इलाकों में वहाँ लगता है, जहाँ उच्च ज्वार के कारण पानी भर जाता है और इलाका दलदली हो जाता है. वास्तव में ये पेड मिलकर जमीन में ऊपर की तरफ निकली हुई जड़ों का समूह बनाते है. पर्यावरण के संकट और जलवायु परिवर्तन के कारण ये पेड़ सारी दुनिया में संकट में हैं. अब भी नहीं समझ आया तो कि मैन्ग्रोव क्या हैं तो अमिताव घोष के उपन्यासों में ही नहीं, असल जिंदगी में भी बेहद सुन्दर दिखने वाले पश्चिम बंगाल के सुन्दर वन याद करिए. जाने कब से जाने की ख्वाहिश थी वहाँ पर फिर जिंदगी के पहले मैंग्रोव्स वतन से तीन समन्दर पार यहीं देखने थे तो यही सही.

आप भी लगाइए न. मैंग्रोव्स देखने का मौका मिलने की ख़ुशी में सूफी हाल में चले गए अपने दिमाग को डेजी लॉन्ग आइलैंड वापस ले आयीं थीं. डेजी मतलब डिफेंड जॉब फिलीपींस की वह साथी जिनकी बेपनाह हिम्मत और लगन से अगले कुछ दिन तक हमारा साक्षात्कार होता रहना था. वे जो शहरी गरीबों के पुनर्वास के लिए बसाई गयी बस्ती में जाने के बीच बहुत सहजता से बताने वाली थीं कि उनका कोई ‘बॉयफ्रेंड’ नहीं है क्योंकि लड़के उनके काम ही नहीं उनके आत्मविश्वास से भी डरते हैं झिझकते हैं. डेजी, जिनकी इस बात पर दूसरी साथी लेया को खिलखिला पड़ना था और मुझे और सचिन भाई को हिंदुस्तान याद आना था. लेया की उस दिन की हंसी बहुत उदास हंसी थी. हमें हिंदुस्तान याद आना बहुत उदास याद आना था. दुनिया भर की लड़ाइयाँ ही नहीं, दुनिया भर के पूर्वाग्रह और भेदभाव भी इतने एक से क्यों हैं भला?

खैर, तीन पेड़ लगाने के बाद हम सब समुद्र तट की सफाई करने चल पड़े थे. फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ, एम्बुलेंस, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी- किसी आकस्मिक दुर्घटना की दशा में सुरक्षा की तैयारी पूरी थी. वहां मौजूद दस्ताने पहने, मास्क मिला वो हमने लगाया नहीं और जुट गए. और कोई रास्ता भी नहीं था, अपने खांटी भारतीय स्वच्छता अभियान के उलट उस सफाई में कैमरों और झाडुओं के साथ साथ गन्दगी भी असली थी, ‘ताज़ी मंगाई हुई’ नहीं . रेत में गहरे दबी हुई प्लास्टिक आर कांच की बोतलें, सिगरेट के पैकेट, एक गेंद, कोयलाती सी लकड़ियाँ, और न जाने क्या क्या. आजतक समझ नहीं पाया कि समुद्र से कोई रिश्ता न रखने वाली कुछ चीजें वहाँ तक पंहुच कैसे जाती हैं आखिर. कौन लोग ले जाते हैं और क्यों? न ले जाएँ तो दुनिया थोड़ी और साफ़ न हो जाए.

खैर, यूं सफाई में श्रमदान का कोई नियत समय नहीं था पर थोड़ी ही देर में समझ आ गया था कि कोई कम से कम एक बैग भरे बिना कोई वापस नहीं जा रहा था. दूर सीनेटर साहिबा भी पूरी मुस्तैदी से सफाई में लगी हुईं थीं. सो हम पाँचों ने भी पांच बैग सफाई कर ही डाली, पूरे दिल से. वक़्त वापस निकलने का हो आया था. ‘आपको पता है कि ये ‘रामसार’ साइट है’- डेजी ने अचानक पूछने जैसा बताया था. आँखों में उभर आया कौतूहल देख फिर खुद ही बोल पड़ी थी- ‘रामसार जगह माने अन्तराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स को संरक्षित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधि. और पता है यहाँ 80 किस्म की चिड़िया देखी जाती रही हैं जिसमे तीन लुप्तप्राय हैं. ‘वे हमेशा आती रहेंगी’ मैं बेसाख्ता बोल पड़ा था. ‘आमीन’- उनका जवाब भी उतना ही बेसाख्ता था.

December 06, 2014

22 बरस बाद बाबरी


मुस्लिम टुडे के दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित लेख का हिंदी लिप्यंतरण 

बाबरी कभी एक मस्जिद का नाम होता था, अब इस देश के सीने में पैबस्त खंजर का नाम है. वो खंजर जिसे लेकर एक पूरी पीढ़ी जवान हो गयी. वो जिसने बाबरी को बस तस्वीरों में देखा है, तकरीरों में सुना है. शुक्र है कि मैं उस पीढ़ी का नहीं हूँ. उम्र भले बहुत कम रही हो मैं उन लोगों में से हूँ जिन्होंने बाबरी को देखा है और बारहा देखा है. देखता भी कैसे नहीं, बाबरी और हनुमान गढ़ी दोनों वाली अयोध्या से कुल 28 किलोमीटर दूर गाँव की रिहाइश वाले मेरे लिए बाबरी जिंदगी के मील पत्थरों में से रही है, ठीक वैसे जैसे हनुमान गढ़ी या राम की पैड़ी थी. बचपन में अयोध्या के उस पार नानी के घर आनेजाने और फिर ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद रसीद हो जाने के बाद वो मील पत्थर जिन्हें पार करना हो होता था, जिनसे हजार यादें पैबस्ता थीं.

तब बाबरी चौंकाती थी, कि अखबारों में जब तब उसका जिक्र हवादिस के सबब से ही आता था और यहाँ बाबरी थी, उस अयोध्या में जिसमे कभी कोई दंगा न हुआ था. अयोध्या के पार हम थे उस बस्ती में फिर से जहाँ कभी कोई दंगा न हुआ था. बाबरी चौंकाती थी कि शहर में सबसे ज्यादा लोगों को रोटी रामनामी और खंड़ाऊं बना के बेच के मिलती थी और ये दोनों ही काम ज्यादातर मुसलमान करते थे. तब समझ नहीं आता था कि सरयू किनारे बसे इस छोटे से मुफस्सिल कस्बे में इस जरा सी इमारत के लिए पूरे साउथ एशिया में फसाद क्यों होते रहते हैं. पर फिर तब ये भी कहाँ पता था कि ये इमारत जरा सी इमारत नहीं सैकड़ों साल का माजी अपने में समाये गंगाजमनी तहजीब का परचम है. उस तहजीब का जिसमे जातिपात से लेकर हजार बुराइयां थीं पर कम से कम मजहब के नाम पर फैलाया जाने वाला जहर नहीं था. बेशक तब भी लोग कभी कभी लड़ लेते थे, अपनी अच्छाइयां और बुराइयाँ दोनों समेटे बैठे आम से लोग थे आखिर, दुनिया में हर जगह लड़ते हैं. पर फिर वे लड़ाइयाँ ख़त्म हो जाती थीं, एक दूसरे से अफ़सोस जता लोग फिर एक हो जाते थे.

हाँ, बाबरी को देखते हुए कभी डर न लगता था. ठीक है कि हर अगली बार गुजरने के वक़्त खाकी वर्दियां थोड़ी और बढ़ गयी होती थीं, हर बार बड़ों की आँखों में थोडा और तनाव, थोड़ा और डर पसर जाता था पर बस, बात उतने पर ही ख़त्म भी हो जाती थी. लोगों को यकीन होता था कि मामला अदालत में है, एक दिन फैसला हो ही जाएगा. पर फिर एक दिन फैसला तो हुआ पर अदालत ने नहीं किया, हिन्दू धर्म के स्वयंभू (खुदमुख़्तार) ठेकेदारों ने कर दिया. तैयारी तो वो बहुत पहले से कर रहे थे और अफ़सोस कि उस तैयारी में तब की सरकारें उनसे लड़ नहीं रही थीं बल्कि उनकी मदद कर रही थीं. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी शहीद की गयी थी पर बस उसी दिन नहीं की गयी थी. बाबरी 1949 में तब भी शहीद की गयी थी जब रातों रात एक तालाबंद कमरे में भगवान् राम की मूर्ति रख दी गयी थी. फिर 1986 में भी जब डिस्ट्रिक्ट जज ने विवादित जगह पर ताले खोल हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दे दिया था, उसी जज ने जो बाद में भारतीय जनता पार्टी का सांसद हुआ. बाबरी 1989 में भी शहीद हुई थी जब तब की कांग्रेस सरकार ने विवादित जगह के ठीक बगल विश्व हिन्दू परिषद को शिलापूजन (नींव रखने) की इजाजत दे दी थी. 6 दिसंबर 1992 को तो बस ये हुआ था कि बाबरी के साथ बहुत कुछ शहीद हो गया था, अमन, गंगाजमनी तहजीब और लोगों का एक दूसरे में यकीन, बहुत कुछ.

पर उससे भी बड़ा था कुछ जिस पर उस दिन हमला हुआ था. ये हमला इस मुल्क में इन्साफ की, हक की रवायतों पर था. बाबरी ऐसे ही नहीं शहीद कर दी गयी थी. बाबरी के शहीद होने के एक दिन पहले सूबे के तत्कालीन भाजपाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को लिखित हलफनामा दिया था कि वे बतौर मुख्यमंत्री बाबरी की हिफाज़त करेंगे. सुप्रीम कोर्ट और तत्कालीन कांग्रेसी केंद्र सरकार ने इस हलफनामे पर यकीन किया और फिर कल्याण सिंह की सरपरस्ती और लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार जैसे भाजपा/विश्व हिन्दू परिषद के तमाम कद्दावर नेताओं की उपस्थिति में बाबरी जमींदोज कर दी गयी. फिर उस हलफनामे का क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही की. सालों बाद कल्याण सिंह को अदालत की अवमानना के लिए एक दिन के लिए जेल भेजने की सख्त कार्यवाही की. अभी कल्याण सिंह कहाँ है? अभी कल्याण सिंह भारत के सबसे बड़े सांविधानिक पदों में से एक राज्यपाल पर बैठ देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के मुखिया हैं. 6 दिसंबर 1992 को इस देश की अकिलियत का सुप्रीम कोर्ट में, इन्साफ में भरोसा बच भी गया हो तो भी अब वह इसी ऐतबार के साथ कह पाना जरा मुश्किल है.

सवाल सिर्फ कल्याण सिंह का नहीं था. बाद में साफ़ ही हो गया कि बाबरी को शहीद करना कोई हादसा नहीं एक सोची समझी साजिश थी. वह साजिश जिसमें हलफनामा देकर केंद्र सरकार को कारसेवकों के आने के पहले उत्तर प्रदेश के निज़ाम को बर्खास्त करने से बचा जा सके. मान भी लें कि इस साजिश में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव नहीं शामिल थे तो बाबरी पर हमले के बाद उन्होंने तुरंत कार्यवाही क्यों नहीं की? बाबरी छोटीमोटी इमारत नहीं, 400 साल से खड़ी एक मजबूत ईमारत थी, ऐसी की उसे गिराने में घंटों लगे थे. नरसिम्हाराव सरकार हमला होते ही राष्ट्रपति शासन लगा सकती थी, उसने शाम भर और कल्याण सिंह के इस्तीफे (दोनों लगभग साथ ही हुए थे) का इन्तेजार क्यों किया? ऐसा भी नहीं कि केंद्र सरकार के पास फैजाबाद में संसाधन नहीं थे, कमिश्नरी मुख्यालय होने के साथ साथ फैजाबाद हिन्दुस्तानी फौज की डोगरा रेजिमेंट का मुख्यालय भी है और बाबरी की सुरक्षा में उन्हें मोबिलाइज करने में ज्यादा वक़्त न लगता.

अफ़सोस यह कि लोगों का, अकिलियत का ही सही, इन्साफ में, अदालतों में, सरकार में यकीन टूट जाए तो बहुत कुछ टूट जाता है. आडवाणी की रथयात्रा ने अपने पीछे हुए दंगों में खून की एक नदी छोड़ी थी. बाबरी की शहादत ने इस नदी को समन्दर में बदल देना था. 6 दिसंबर 1992 के घंटों भर बाद देश सुलग उठा था और इस आग ने कम से कम 2000 हिन्दुस्तानियों को निगल लिया था. पर फिर यह संख्या 2000 भी कहाँ? उसके बाद के तमाम दंगे फिर धीरे धीरे नरसंहारों में बदलने लगे थे और अकिलियत का गुस्सा बदलों में. मुझे साजिश के सिद्धांतों में कोई यकीन नहीं पर मैं जानता हूँ कि 1992 के पहले बाहर गए बेटे की माँ, बीबी का पति बम धमाकों के डर से हलकान नहीं रहता था. हिंदुस्तान ने उसके पहले भी तमाम हवादिस झेले थे पर वह उनकी सोच का हिस्सा नहीं बना था. खालिस्तान और ऑपरेशन ब्लू स्टार दोनों होकर गुजर चुके थे पर उनकी लपटें पंजाब और दिल्ली के बाहर तक नहीं पंहुचीं थीं. अबकी वाली आग की जद में पूरा हिंदुस्तान था.  
 
पर फिर सिर्फ हिंदुस्तान भी कहाँ? उस दिन के बाद से वो सोया सा कस्बा क़स्बा नहीं, पूरे पूरे साउथ एशिया भर में अकिलियत के लिए डर का दूसरा नाम बन गया. न न, सिर्फ हिंदुस्तान की मुस्लिम अकिलियत के लिए ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश की हिन्दू अकिलियत के भी. यहाँ कुछ करिए और बांग्लादेश के हिन्दुओं की रीढ़ में डर उतर आएगा. आये भी कैसे नहीं, यहाँ की एक मस्जिद, जिसमे इबादत तक बंद थी, का बदला बांग्लादेश के फ़सादियों ने, पाकिस्तान के फ़सादियों ने अपने यहाँ के हिन्दुओं से जो लिया था. 

बाबरी की शहादत पर, बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर, हिंदुत्ववादी  कट्टरपंथ के उभार पर पहले भी बहुत बार लिखा है. जो नहीं लिखा है वह यह कि जब बाबरी ढाई गयी तब मैं आरएसएस के बनाये पहले सरस्वती शिशु मंदिर में पढता था उसी के छात्रावास में रहता था. शिशु मंदिरों के छात्रावासों में शाखा जाना अनिवार्य होता है तो शाखा भी जाता था. खेलना कूदना अच्छा भी लगता था. बौद्धिकों में आने वाले राष्ट्रप्रेम, समरसता जैसे शब्दों को सुनकर लगता था कि ये भले लोग हैं. वैसे भी 13 साल की उम्र बहुत कुछ जानने समझने की कहाँ होती है? पर उस दिन हवाओं में उतर आया तनाव आज भी याद है. आरएसएस का स्कूल होने की वजह से मामला संवेदनशील था, बाबरी पर हमला होते होते तो पुलिस ने हिफाज़त के लिए पूरी तरह से घेर लिया था. फिर शाम तक आचार्य जी (उस्तादों) के चेहरे पर उतर आई मुस्कुराहटों ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया था. हाँ उस दिन शाखा नहीं आरएसएस पर प्रतिबंध लगा था. फिर हम लोग भीतर बुलाये गए कि आज शाखा भीतर लगेगी. मुझे अब भी याद है कि मैंने बस इतना पूछा था कि अपनी थी तो क्यूं ढहा दी? कोर्ट के फैसले का इन्तेजार क्यों नहीं किया? उनकी थी तो क्यों ढहा दी.

ये अपने हम और उन के फरक से परे इंसान बनने की राहों पर चलने की शुरुआत थी. उस दिन मन से आरएसएस के अच्छे होने का यकीन भी दरका था और बस यही एक दरकना अच्छा था.


आज इतने साल बाद बाबरी को याद करता हूँ तो लगता है कि अपनी कौम, हिन्दुस्तानी कौम, की दिक्कत बस इतनी है कि वह माजी को ज्यादा देर याद नहीं रखता. मुल्क का बंटवारा याद रखा होता, उसमे बहा खून याद रखा होता तो शायद 1984 न होता. 1984 याद रखा होता तो शायद 1992 न होता. हाँ 1992 के बाद की कहानी अलग है. उसके बाद की कहानी हिंदुस्तान के हिन्दू पाकिस्तान बनने की राह पर चल पड़ने की कहानी है. वक़्त अब भी है, काश हम रोक पायें.

December 04, 2014

22برس بعد بابری





مسلم ٹوڈے کے دسمبر شمارے میں شائع

بابری کبھی ایک مسجد کا نام ہوتا تھالیکن اب اس ملک کے سینے میں پیوست ایک خنجر کا نام ہے۔ وہ خنجر جسے لے کر
ایک پوری نسل جوان ہو گئی۔ وہ جس نے بابری کو بس تصویروں میں دیکھا ہے ، تقریروں میں سنا ہے لیکن شکر ہے کہ میں اس نسل کا نہیں ہوں۔ عمر بھلے ہی بہت کم رہی ہو لیکن میں ان لوگوں میں سے ہوں جنھوں نے بابری کو دیکھا ہے اور بارہا دیکھا ہے۔ دیکھتا بھی کیسے نہیں، بابری اور ہنومان گڑھی دونوں والی اجودھیا سے کل 28کلو میٹر دور گاؤں کی رہائش والی میرے لئے بابری زندگی کے سنگ میلوں میں سے رہی ہے، ٹھیک ویسے ہی جیسے ہنومان گڑھی یا رام کی پیڑی تھی۔ بچپن میں اس پار نانی کے گھر اور پھر گریجویشن کے لئے الہ آباد جانے کے بعد وہ میل کا پتھر جنہیں پار کرنا ہی ہوتا تھا، جن سے ہزاروں یادیں وابستہ تھیں۔

اس وقت بابری حیران کرتی تھی کہ اخباروں میں جب تک اس کا ذکر آتا تھا کہ بابری تھی ، اس اجودھیا میں جس میں کبھی کوئی فساد نہیں ہوا تھا۔ اجودھیا کے پار ہم تھے ، اس بستی میں پھر سے جہاں کبھی کوئی فساد نہیں ہوا تھا۔ بابری حیران کرتی تھی کہ شہر میں سب سے زیادہ لوگوں کو روٹی رام نامی اور کھنڈاؤ بنا کے فروخت کرنے سے ملتی تھی اور یہ دونوں ہی کام بیشتر مسلمان کرتے تھے۔ اس وقت سمجھ میں نہیں آتا تھا کہ سریو کے کنارے بسے اس چھوٹے سے مفصل قصبے میں اس ذرا سی عمارت کے لئے پورے جنوبی ایشیا میں فساد کیوں ہوتے رہتے ہیں، لیکن پھر اس وقت یہ بھی کہاں پتہ تھا کہ یہ عمارت ذرا سی عمارت نہیں سینکڑوں سالوں کا ماضی اپنے اندر سمائے ہوئے گنگا جمنی تہذیب کی علمبردار ہے۔اس تہذیب کا جس میں ذات پات سے لے کر ہزاروں برائیاں تھیں لیکن کم سے کم مذہب کے نام پر پھیلایا جانے والا زہر نہیں تھا۔ بے شک اس وقت بھی لوگ کبھی کبھی لڑ لیتے تھے ۔ اپنی اچھائیاں اور برائیاں دونوں سمیٹے بیٹھے عام سے لوگ تھے۔ آخر، دنیا میں ہر جگہ لڑتے ہیں، لیکن پھر وہ لڑائیاں ختم ہو جاتی تھیں، ایک دوسرے سے افسوس جتا کر لوگ پھر ایک ہو جاتے تھے۔


ہاں، بابری کو دیکھتے ہوئے کبھی ڈر نہیں لگتا تھا۔ ٹھیک ہے کہ ہر اگلی بار گزرنے کے وقت خاکی وردیاں تھوڑی اور بڑھ
گئی ہوتی تھیں، ہر بار بڑوں کی آنکھوں میں تھوڑا اور تناؤ ، تھوڑا اور ڈر بیٹھ جاتا تھا لیکن بس بات اتنے پر ہی ختم ہو جاتی تھی۔ لوگوں کو یقین ہوتا تھا کہ معاملہ عدالت میں زیر سماعت ہے، ایک دن فیصلہ ہو ہی جائے گا۔ لیکن پھر ایک دن فیصلہ تو ہوا لیکن عدالت یہ فیصلہ عدالت نے نہیں کیا بلکہ ہندو مذہب کے خودمختار ٹھیکیداروں نے کیا۔ تیاری تو وہ بہت پہلے سے کر رہے تھے اور افسوس کہ اس تیاری میں اس وقت کی حکومتیں ان سے لڑ نہیں رہی تھیں بلکہ ان کی مدد کر رہی تھیں۔ 6دسمبر 1992کو بابری مسجد شہید کر دی گئی تھی لیکن بس اسی دن نہیں کی گئی۔ بابری 1949میں اس وقت بھی شہید کی گئی تھی ، جب راتوں رات ایک تالہ بند کمرے میں بھگوان رام کی مورتی رکھ دی گئی تھی پھر 1986میں بھی جب ڈسٹرک جج نے متنازعہ جگہ پر تالے کھول کر ہندوؤں کو پوجا کا اختیار دے دیا تھا، اسی جج نے جو بعد میں بی جے پی کا ممبر پارلیمنٹ ہوا۔ بابری 1989میں بھی شہید ہوئی تھی جب اس وقت کی کانگریس حکومت نے متنازعہ جگہ کے عین بغل میں وشو ہندو پریشد کو شیلا پوجن (بنیاد رکھنے) کی اجازت دے دی تھی۔ 6دسمبر 1992کو تو بس یہ ہوا تھا کہ بابری کے ساتھ ساتھ بہت کچھ شہید ہو گیاتھا۔ جس میں امن، گنگا جمنی تہذیب اور لوگوں کا ایک دوسرے کے تئیں اعتماد شامل ہے۔

لیکن اس سے بھی بڑا کچھ اور تھا جس پر اس دن حملہ ہوا تھا اور وہ حملہ تھا ملک کے انصاف اور حق پرستی کی روایتوں پر ۔ بابری ایسے ہی شہید نہیں کر دی گئی تھی۔ بابری کے شہید ہونے کے ایک دن پہلے صوبے کے اس وقت کے بی جے پی کے وزیر اعلیٰ کلیان سنگھ نے سپریم کورٹ کو تحریری حلف نامہ دیا تھا کہ وہ بطور وزیر اعلیٰ بابری کی حفاظت کریں گے۔ سپریم کورٹ اور اس وقت کی کانگریس کی مرکزی حکومت نے اس حلف نامے پر بھروسہ کیا اور پھر کلیان سنگھ کی سرپرستی اور لال کرشن اڈوانی، مرلی منوہر جوشی، اوما بھارتی، سادھوی رتمبھرا اور ونے کٹیار جیسے بی جے پی؍وشو ہندو پرشید کے تمام قدآور لیڈروں کی موجودگی میں بابری مسجد منہدم کر دی گئی ۔ پھر اس حلف نامے کا کیا ہوا؟ سپریم کورٹ نے اس پر کوئی کارروائی کیوں نہیں کی؟ سپریم کورٹ نے کارروائی کی۔ سالوں بعد کلیان سنگھ کو عدالت کی توہین کرنے کے لئے ایک دن کے لئے جیل بھیجنے کی سخت کارروائی کی گئی۔ ابھی کلیان سنگھ کہاں ہیں؟ ابھی کلیان سنگھ ہندوستان کے سب سے بڑے آئینی عہدوں میں سے ایک گورنر یعنی راجستھان کے گورنر ہیں۔6دسمبر 1992کو اس ملک کی اقلیت کا سپریم کورٹ سے ، انصاف سے بھروسہ بچ بھی گیا تو بھی اب وہ اسی اعتبار کے ساتھ کہہ پانا ذرا مشکل ہے۔

سوال صرف کلیان سنگھ کا نہیں تھا۔ بعد میں صاف ہو ہی گیا کہ بابری مسجد کو شہید کرنا کوئی حادثہ نہیں تھا بلکہ ایک سوچی سمجھی ساز تھی۔ وہ سازش جس میں حلف نامہ دے کر مرکزی حکومت کو کار سیوکوں کے آنے سے قبل اتر پردیش کے نظام کو برخاست کرنے سے بچا جا سکے۔ مان بھی لیں کہ اس سازش میں مرکزی اور نرسمہا راؤ شامل نہیں تھے تو بابری مسجد پر حملے کے بعد انھوں نے فوراً کارروائی کیوں نہیں؟ بابری کوئی چھوٹی موٹی عمارت نہیں تھی بلکہ 400سال پرانی ایک مضبوط عمارت تھی ، ایسی مضبوط کہ اسے منہدم کرنے میں گھنٹوں لگے تھے۔ نرسمہا راؤ حکومت حملہ ہوتے ہی صدر راج نافذ کر سکتی تھی، لیکن نہیں اس نے ایسا نہیں کیا بلکہ اس نے کلیان سنگھ کے استعفیٰ کا انتظار کیا۔ ایسا بھی نہیں ہے کہ مرکزی حکومت کے پاس فیض آباد میں وسائل نہیں تھے۔ کمشنری ہیڈ کوارٹر ہونے کے ساتھ ساتھ فیض آباد ہندوستان کی ڈوگرا ریجیمنٹ کا صدر دفتر بھی ہے اور بابری کی حفاظت میں انہیں موبلائز کرنے میں وقت نہیں لگتا۔

افسوس کا مقام یہ ہے کہ لوگوں کا ، اقلیتوں کا ہی صحیح، انصاف سے ، عدالتون سے ، حکومت سے اعتماد ٹوٹ جائے تو بہت کچھ ٹوٹ جاتا ہے۔ اڈوانی کی رتھ یاترا نے اپنے پیچھے ہوئے فسادوں میں خون کی ایک ندی چھوڑی تھی۔ بابری کی شہادت نے اس ندی کو سمندر میں بدل دینا تھا۔ 6دسمبر 1992کے گھنٹوں بھر بعد ملک سلگ اٹھا تھا اور اس آگ نے کم سے کم 2000ہندوستانیوں کو نگل لیا تھا، لیکن پھر یہ تعداد 2000بھی کہاں؟ اس کے بعد کے تمام فساد دھیرے دھیرے قتل عام میں بدلنے لگے تھے اور اقلیتوں کا غصہ انتقام میں۔ مجھے سازش کے اصولوں پر یقین نہیں پر میں جانتا ہوں کہ1992کے پہلے باہر گئے بیٹے کی ماں، بیوی کا شوہر بم دھماکوں کے ڈر سے پریشان نہیں رہتا تھا۔ ہندوستان نے اس کے پہلے بھی تمام حادثے دیکھے تھے پر وہ ان کی سوچ کا حصہ نہیں بنا تھا۔ خالصتان اور آپریشن بلو اسٹار دونوں ہو کر گزر چکے تھے لیکن ان کی لپٹیں پنجاب اور دہلی کے باہر تک نہیں پہنچی تھیں۔ اب کی والی آگ کی زد میں پورا ہندوستان تھا۔

لیکن پھر صرف ہندوستان بھی کہاں؟ اس دن کے بعد سے وہ سویا سا قصبہ قصبہ نہیں، پورے جنوبی ایشیا میں ڈر کا دوسرا نام بن گیا ۔ نہ صرف ہندوستان کی مسلم اقلیت کے لئے ہی نہیں بلکہ پاکستان اور بنگلہ دیش کی ہندو اقلیت کے لئے بھی۔ یہاں کچھ اور بنگلہ دیش کے ہندوؤں میں دہشت پھیل جائے گی۔ پھیلے بھی کیسے نہیں، یہاں کی ایک مسجد، جس میں عبادت تک بند تھی کا بدلا بنگلہ دیش کے فسادیوں نے ، پاکستان کے فسادیوں نے اپنے یہاں کے ہندوؤں سے جو لیا تھا۔ بابری کی شہادت پر ۔ بعد میں الہ آباد ہائی کورٹ کے فیصلے پر ہندوتوادیوں کے ابھار پر پہلے بھی بہت بار لکھا ہے جو نہیں لکھا ہے وہ یہ کہ جب بابری منہدم کی گئی اس وقت میں آر ایس ایس کے بنائے گئے سرسوتی ششو مندر میں پڑتا تھا ، اسی کے ہوسٹل میں رہتا تھا۔ ششو مندروں کے ہوسٹلوں میں شاکھا جانا لازمی ہوتا ہے ،تو شاکھا بھی جاتا تھا۔ کھیلنا کودنا اچھا لگتا تھا۔ دانشوری میں آنے والی حب الوطنی ، ہم آہنگی جیسے الفاظ کو سن لگتا تھا کہ یہ بھلے لوگ ہیں۔ ویسے بھی 13سال کی عمر بہت کچھ جاننے سمجھنے کی کہاں ہوتی ہے؟ لیکن اس دن ہواؤں میں اتر آیا تناؤ آج بھی یاد ہے۔ آر ایس ایس کا اسکول ہونے کی وجہ سے معاملہ حساس تھا، بابری پر حملہ ہوتے ہوتے توپولس نے حفاظت کے لئے پوری طرح سے گھیر لیا تھا پھر شام تک پرنسپل صاحب (استادوں) کے چہرے پر اتر آئی مسکراہٹ نے بہت کچھ صاف کر دیا تھا۔ ہاں اس دن شاکھا نہیں آر ایس ایس پر پابندی لگی تھی پھر ہم لوگ اندر بلائے گئے کہ آج شاکھا اندر لگے گی۔ مجھے اب بھی یاد ہے کہ میں نے بس اتنا پوچھا کہ اپنی تھی تو کیوں منہدم کر دی؟ کورٹ کے فیصلے کا انتظار کیوں نہیں کیا؟ ان کی تھی تو کیوں منہدم کر دی۔

یہ اپنے ہم اور ان کے فرق سے پڑے انسان بننے کی راہوں پر چلنے کی شروعات تھی۔ اس دن دل سے آر ایس ایس کے اچھا ہونے کے یقین کو بھی دھچکا لگا تھا ۔

آج سالوں بعد بابری کو یاد کرتا ہوں تو لگتا ہے کہ اپنی ہندوستانی قوم کی دقت بس اتنی ہے کہ وہ ماضی کو زیادہ دیر یاد نہیں رکھتی۔ ملک کی تقسیم یاد رکھی ہوتی تو اس میں بہا خون یاد رکھا ہوتا تو شاید 1984نہ ہوتا۔ 1984یاد رکھا ہوتا تو شاید 1992نہ ہوتا۔ ہاں 1992کے بعد کی کہانی الگ ہے۔ اس کے بعد کی کہانی ہندوستان کے ہندو پاکستان بننے کی راہ پر چل پڑنے کی کہانی ہے۔ وقت اب بھی ہے، کاش ہم روک پائیں۔