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November 08, 2014

प्रतिरोध के आगे

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम परदेस से में 8 नवम्बर को प्रकाशित लेख से]

सड़कें खाली हों और आपको यूँ ही विचरणें की दावत दें, ऐसा इस शहर में रोज नहीं होता  पर फिलहाल, केवल ठीक यह हो रहा है बल्कि महीने भर से हो रहा है

ऑक्युपाई सेन्ट्रल महीना पार कर चुका, तमार माने हांगकांग सरकार के कार्यालयों के ठीक सामने वाली सड़क पर अब भी विरोधियों का कब्जा है. मॉंग काक माने विरोध की दूसरी जगह पर  बैंकों को बंद हुए चार हफ्ते गुजर चुके बोले तो इंकलाब सही,  इंकलाब का ये छोटा सा नारा हांगकांग को हिला देने के लिए काफी ठहरा है. पर सवाल ऑक्युपाई से बहुत बड़ा है. सवाल कि इसके बाद क्या 

यह वह सवाल है जिसका जवाब चीन समर्थक प्रशासन ही नहीं बल्कि फ्रीडम नाऊ' लिखी टीशर्टें पहने लोकतंत्रवादियों के पास भी नहीं है. यूं ऑक्युपाई सेन्ट्रल के मूल नेतृत्व से आंदोलन छीन लेने वाले इन बच्चों के पास जवाब होना मुश्किल था भी, पर हांगकांग के आर्थिक ह्रदय की रफ़्तार थाम देने के बाद लगभग तीन हफ्ते भर बाद हुई प्रशासन से बात में उनके शानदार हौसले और तर्कों, दोनों ने ही दिल जीतने के साथ आगे के रास्तों की तरफ इशारा किया था. ठीक बात है कि चीन 2017 में होने वाले चुनावों को लोकतांत्रिक कर देगा यह किसी ने सोचा था, पर तब इस आंदोलन ने हांगकांग में 'विधि के शासन' के बने रहने की आश्वस्ति जरूर दे दी थी

गतिरोध तोड़ने के सवाल पर अब लगने लगा है कि आंदोलन के पास तमाम और आन्दोलनों की तरह समस्यायों की सूची तो थी पर समाधान कोई थे. अभी फ्रीडम नाऊ के नेतृत्वकारी तबके ने जो नवीनतम समाधान सुझाया है वह यह है कि लेजको, माने यहाँ की संसद, में पैन डेमोक्रैट सांसद सामूहिक इस्तीफ़ा दें और उन खाली हुई सीटों पर चुनाव को जनमत संग्रह माना जाय. इस सुझाव में समाधान काम, दिक्कत ज्यादा दिखती है. यह भी नहीं कि अगर वह सांसद चुनाव हार गए, जो बिलकुल संभव है तो क्या होगा, बल्कि यह कि ऐसे 'जनमत संग्रह' के परिणाम ही उलटे गए तो क्या होगा? इससे भी खतरनाक सुझाव ऑक्युपाई सेन्ट्रल, माने आंदोलन के पुराने नेतृत्व, की तरफ से आया है कि मुख्य प्रशासनिकनअधिकारी पूरे लेजको को ही भांग कर नए चुनाव करवायें और उसके परिणामों को जनमतसंग्रह मानें 
उस सुझाव की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह वहाँ से आया है जिसका नेतृत्व नैतिक प्रतिरोध की सबसे बड़ी वजह है. चीन समर्थकों से ही हल निकालने थे तो इतना लड़ने की जरूरत ही क्या थी आखिर

बेहतर होता कि छात्रों ने यह सब सोचा होता और आगे के रास्ते ढूंढें होते, पर देर अभी भी नहीं हुई है. इस प्रतिरोध ने हांगकांग को बहुत कुछ दिया है-एक नयी सौंदर्य दृष्टि जो इस प्रतिरोध की हर जगह पर दिखती है- नए टेंट्स में लहराते छोटे छोटे छातों में, पीले फीतों में, मेसेज बोर्ड कही जानी वाली दीवालों पर आने जाने वालों के चिपकाए संदेशों में. वह दिखती है टिन हाउ के गतिशील मंदिरों में, जीसस क्राइस्ट के नाम पर बनाये गए चल-चर्चों में. पर इन सबसे बेहतर इस प्रतिरोध ने शहर को वापस संवाद दिया है. पश्चिमी सभ्यता की तरह ही पड़ोसी का नाम तक पूछने वाले इस शहर में, मुस्कुराहट तक को वाणिज्यिक बना देने वाले इस शहर में 'मुफ्त' काफी वाली जगहों से लेकर सड़कों में बनाये गए टेंटों में मुफ्त सोने तक के प्रस्ताव चौंकाते तो हैं, पर ये चौंकना बहुत आश्वस्त करता है. कोई भी निश्चिन्त हो सकता है कि यह विश्व शहर इन प्रतिरोध की इन नयी कलाकृतियों को, इस नयी मिली साझेपन की संवेदना को, लड़ सकने की ताकत को संजो लेगा 

सवाल प्रतिरोध का है. अब कहाँ? चीन, और उसके समर्थक स्थानीय प्रशासन ने साफ़ कर दिया है कि वे लोकतंत्र लाने नहीं जा रहे, उल्टा उनके कदमों में 1997 में हुए हस्तांतरण में 50 सालों तक यही, ब्रिटिशकालीनव्यवस्था बने रहने के खिलाफ गुस्सा ही दिख रहा है. हमारी 'बाहरी' आँखों में वक़्त शायद इस नजाकत को, इस नुक्ते को, समझने का है कि प्रतिरोध जिन्दा रहे और हांगकांग को चीन बना देने की साजिशें कामयाब हों

यह उस सवाल है जिसका जवाब झाऊ फेंगसुओ, माने तियेनआनमन प्रतिरोध के नेता और चीन की वांछित अपराधियों की सूची में चौथे स्थान पर रहे व्यक्ति, की आँखों में हांगकांग के प्रतिरोध स्थलों पर पँहुचते आंसू बन बह निकला था. यही चीन का भविष्य है कहते हुए मातृभूमि से हमेशा के लिए निर्वासित उस अादमी के लिए इस आंदोलन को सोचना पड़ेगा कि आगे का रास्ता किस तरफ निकलता है



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