पीले फीते वाली मुस्कान

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 25 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित

हांगकांग मेट्रो में आपको देखकर कोई चीनी नागरिक मुस्कुराए यह हादसा रोज नहीं होता. पर इसके पीछे नस्लवाद नहीं बस इतना सा मसला है कि ज्यादा सम्भावना आपके कैंटोनीज़ और उसके अंग्रेजी न जानने की है. अब बिना भाषा संवाद हो कैसे? बाकी इस मुस्कराहट का सबब तलाशने में वक़्त न लगा, हम दोनों एक पीले फीते से बंधे जो थे.

पीला फीता माने लोकतंत्र और सार्वभौमिक मताधिकार के लिए और चीनी हस्तक्षेप के खिलाफ ओक्यूपाई सेंट्रल के शुरू किये और अब पूरे शहर में फ़ैल गये प्रतिरोध का प्रतीक. वह प्रतिरोध जिसने हांगकांग की सबसे व्यस्त सड़कों को छात्रों के आशियाने में बदल दिया है. वह जिसने हमेशा भागते शहर के कुछ हिस्सों की रफ़्तार थाम ली है.

‘आप आक्युपाई के साथ हैं”? उसने लड़खड़ाती अंग्रेजी में पूछा था. हाँ, अपने अपने कब्जे वाले कुल जमा चार पांच केंटोनीज़ शब्दों में से एक से जवाब दिया था और तुरंत जोड़ा था कि बस इतनी ही आती है. ‘कल हुए छात्र-प्रशासन संवाद के बारे में आप क्या मानते हैं,’ उसका अगला सवाल था. “चीन के मांगें स्वीकारने और गतिरोध ख़त्म होने की कोई उम्मीद नहीं है, पर छात्रों का प्रदर्शन शानदार था. बदलाव कर पायें या नहीं, वे बदलाव की आवाज तो हैं ही. सत्ता के सामने खड़ा होना इतना आसान नहीं है.’ उसे ये कहते हुए मेरी आँखों की चमक शायद दिख गयी थी और उसने हाथ बढ़ा दिया था. यह एक दिन में हुआ दूसरा हादसा था.

लड़कों का हाथ थाम के या गले में हाथ डालकर चलना सिर्फ अपने समाजों में सहज माना जाता है. शायद आप यह जान के चौंकेंगे कि विश्व बैंक से लेकर तमाम संगठन भारत में कोई कार्यक्रम आयोजित करने पर भागीदारों को जारी की जाने वाली ‘एडवाइजरी’ में साफ लिखते हैं कि लड़कों का ऐसे चलना यहाँ की संस्कृति का हिस्सा है, उसे समलैंगिकता का प्रतीक समझने की गलती न की जाय. खैर, भाषाई नदी के दो किनारों पर खड़े हम ने अपना कमजोर सा ही सही पुल बना लिया था.

मुलाकात का जिक्र प्रदर्शनकारी छात्रों और खुद सीईओ सीवाई लेउंग सहित हांगकांग प्रशासन के बीच टीवी पर सजीव प्रसारण के साथ हुई वार्ता का था. कमाल यह कि दोनों पक्ष रंग संयोजित थे, एक तरफ फ्रीडम नाऊ लिखी काली टीशर्टें पहने छात्र तो दूसरी तरफ नीले और बैंगनी शेड्स लिए काले सूट पहने अधिकारी. हो सकता है कि इस रंग संयोजन के राजनैतिक निहितार्थ न हों, पर फिर प्रदर्शनकारियों के पीले फीते के विरोधी चीन समर्थकों का प्रतिरोध प्रतीक नीला फीता है और उसी नीले की वहां मौजूदगी दर्ज तो की ही गयी.

खैर, रंग संयोजन के अलावा प्रशासन ने और भी बहुत कुछ गड़बड़ किया. जैसे कि दोस्ताना माहौल बनाने के सांविधानिक और मेनलैंड मामलों के मंत्री लिए रेमंड टैम ची-युन की कोशिश- “मैंने तीन बार चीफ एग्जीक्यूटिव चुनावों के लिए काम किया है पर मुझे भी वोट देने का अधिकार नहीं है. मुझे प्रगति की उम्मीद है कहने पर फेडरेशन ऑफ़ स्टूडेंट्स के नेता शुम ने तीखा जवाब दिया. मैं भी तीन बार वोंग चुक हैंग (सरकारी कार्यालय और वार्तास्थल) गया हूँ पर आजाद आदमी की तरह आज पहली बार. वह भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था और मताधिकार की उस लड़ाई के लिए जिसका इन्तेजार हांगकांग के लोग ३० साल से कर रहे हैं. शुम दो बार अपनी गिरफ्तारी के बाद उसी जगह अस्थायी जेल में रखे जाने की तरफ इशारा कर रहे थे.

‘उन्होंने बहुत शानदार प्रदर्शन किया’ नए बने दोस्त ने ‘मुझे उम्मीद है’ कहते हुए फिर जोड़ा था. सच कहूँ तो मुझे तुरंत ऐसी कोई उम्मीद नहीं है हवाओं में उलटे ही इशारे हैं. आखिर सीईओ की सचिव ने वार्ता में ही साफ़ कर दिया था “कि उन्हें सच में समझ नहीं आ रहा कि चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस का प्रस्ताव छात्रों को प्रतिगामी क्यों लग रहा है”. प्रशासन में यह भी साफ़ कर दिया कि वह सिर्फ बीजिंग समर्थकों, वह भी केवल तीन को ही चुनाव लड़ने देने के फैसले से पीछे नहीं हटेगी. सार्वभौमिक मताधिकार को लेकर भी उसकी स्थिति वही है.

मेरा स्टेशन आ चला था सो दोस्त का नम्बर ले इस शनिवार प्रतिरोध स्थल पर मिलने के वादे के साथ मैं उतर गया था. हाँ, यह जरुर है इस आन्दोलन को लेकर विदेशी मीडिया में आ रही खबरें अतिरंजित हैं. हांगकांग किसी बड़े टकराव या दमन के मुहाने पर नहीं खड़ा है. न ही शेनजेन सीमा पर चीनी सेना हमले के लिए तैयार है. शहर भी मोटा मोटा वैसा ही है जैसे पहले था. बस राजनैतिक चेतना बढ़ गयी है और यह आश्वस्तकारी बात है.



Comments

  1. Huhhhh.....आप तो पूरी दुनिया घूम लिए हैं😊

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