Featured Post

नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

October 11, 2014

लोकतंत्र की छतरी उर्फ़ हांगकांग का अम्ब्रेला रेवलूशन

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 11 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित]

इस बार हांगकांग हवाई अड्डे पर उतरते हुए मन को वही सुकून मिला था जो बस घर पँहुच के मिलता हैमन जाने कब अपने हो गए इस शहर के लिए परेशान जो था नेपाल में भटकते हुए हांगकांग से चीनी वर्चस्ववादी नीतियों के खिलाफ बड़े छात्र प्रतिरोध और दमन की खबरें डरा रही थीं. सेंट्रल, एडमिरलटी, वानचाई, कॉजवे बे- दुनिया की आर्थिक राजधानियों में से एक हांगकांग का अपना आर्थिक दिल छात्रों के कब्जे में था

हांगकांगर होने की वजह से मुझसे सवाल होने लाजमी थे. दमन, आंदोलन का भविष्य, मुद्दे- सवाल तमाम थे और अपने पास जवाब कम. कम क्योंकि अखबारों में रही खबरें अपने जिए हांगकांग से बहुत अलग थींसवाल तो खैर कम्युनिस्ट चीन की इस हरकत पर अपनी हुई चुप्पी पर भी थे. उन्हें क्या बताता कि संगठन का रुख साफ़ है यूँ भी चीन अपना आदर्श कभी नहीं रहापर पुलिसिया दमन- उस शहर में जिसमे राजनैतिक रैलियों की व्यवस्था के लिए भेजी जाने वाले पुलिस की रिवाल्वरें रखवा ली जाती हैं? उसमे जिसमे तियेनएनमेन नरसंहार का विरोध होता है, जिसमे चैटर पार्क में चीन में प्रतिबंधित धार्मिक समूह फालुन गोंग के सदस्यों का धरना चलता रहता है

मन कैसे मान लेता कि वहीँ ऐसा दमन संभव है. सो वापस पँहुचते ही शाम को प्रतिरोध स्थल पर पँहुच गयाप्रतिरोध ख़त्म करवाने की सरकार की तमाम कोशिशों को धता बता सेन्ट्रल गयी शाम भी छात्रों से भरा हुआ थाहजारों छात्र बीच सड़क पर पुलिस की रेलिंग्स को अपने बैरिकेड्स में तब्दील कर बैठे हुए छात्र पहली नजर में जमावड़ा प्रतिरोध नहीं कार्निवल सा लगा. गाते हुए, बारबेक्यू पर कुछ भूनते हुए, अपने आईपैड्स पर कुछ देखते हुए छात्र- ये दिखे कि जनता उस सड़क पर जमीं हुई है जिसपर कल तक गाड़ियाँ फर्राटे भरती थीं तो उत्सव ही लगे

बखैर, ये कोई उत्सव था  प्रतिरोध तात्कालिक. यह तो 1997 में हस्तांतरण के वक़्त एक देश दो व्यवस्थाओं के तहत हांगकांग को मिली तमाम आजादियों को दरकिनार कर चीन के लगातार बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ कई साल से उमड़ रहे गुस्से का विस्फोट थाहाल में यह गुस्सा प्राथमिक शिक्षा में राष्ट्रवादी पाठ्यक्रम के बहाने चीन भक्ति सिखाने को लेकर भी उमड़ा था और फिर एडवर्ड स्नोडेन के शहर में शरण लेने के वक़्त उनको अमेरिकी सरकार को सौंप दिए जाने की संभावनाओं की अफवाहों के वक़्त भी. शिक्षा वाले संघर्ष में तो लगभग पूरा हांगकांग सड़कों पर आया था. एक लाख से ज्यादा लोगों की उस गोलबंदी का हिस्सा होना मुझे आज भी रोमांचित करता है जिसने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था

इस बार की लड़ाई मगर जरा मुश्किल है. आंदोलनकारियों की मुख्यतः दो मांगें हैं. पहली हांगकांग के चीफ एग्जीक्यूटिव लंग चुन यिंग के तत्काल इस्तीफे की. दूसरी नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति के अगस्त 31 को लिए उस निर्णय को वापस लेने की जो २०१७ में चीफ एग्जीक्यूटिव पद के लिए होने वाले चुनावों को केवल प्रत्याशियों तक सीमित करता है. हद यह कि इन तीन प्रत्याशियों को भी नामांकन समिति के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए 

कहना होगा कि सार्वभौमिक मताधिकार का सपना देख रहे हांगकांग निवासियों को यह दोनों शर्तें नागवार गुजरनी थीं और सड़कों पर उतर पड़ना था. सो हुआ भी वही. पहली योजना के मुताबिक ऑक्युपाई सेन्ट्रल नाम के साझा संगठन के 10000 लोग सेन्ट्रल की कुछ खास जगहों पर कब्ज़ा कर सिविल नाफरमानी अभियान शुरू करेंगे कहानी में मोड़ तब आया जब उनकी गिरफ्तारी को लेकर आशंकित छात्र भी उनके साथ उतर पड़े और उन्होंने एडमिरलटी में हांगकांग सरकार के मुख्यालय पर कब्ज़ा कर लिया 

सरकार इतने बड़े आंदोलन से निपटने के लिए तैयार नहीं थी. सो जब उसने छात्रों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस भेजी तो बाकी लोगों का भी गुस्सा उमड़ पड़ा और सड़कें खचाखच भर गयीं फिर पुलिस ने आंसूगैस के गोले दागने शुरू किये और प्रतिरोधियों ने चूहे बिल्ली का खेल. गोले दगे तो जनता गायब और प्रभाव हटते ही वापस. कुछ तो मुखौटे वगैरह भी ले आये. जल्द ही हांगकांग की जीवन रेखा माने जाने वाले छह लेन हाईवे से लेकर बाकी सारे इलाके पर छात्रों का कब्ज़ा था. बदली बस एक चीज थी. आंसूगैस के गोले दाग रही पुलिस को अब छात्र बारिश होने पर अपनी छतरियों में जगह दे रहे थे, माने असली हांगकांग अपनी रौ में  लौट आया है


हालात अब भी वहीँ टिके हुए हैं. आंदोलन के बीच प्रेमप्रस्ताव देते स्वीकारते छात्र हैं, बारिशों में निकलती छतरियाँ हैं, उनके और पुलिसवालों दोनों के लिए खाना लाते स्वयंसेवक हैं और गतिरोध हैशुक्रवार को छात्रों से प्रस्तावित वार्ता स्थगित कर दिए जाने के बाद उसके ख़त्म होने की उम्मीद भी नहीं है. सलाम हांगकांग को, फिर से साबित करने के लिए कि जिन्दा क़ौमें लड़ती हैं फिर चाहे उनके सामने चीन जैसी अलोकतांत्रिक महाशक्ति ही क्यों हो

No comments :

Post a Comment