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September 06, 2014

इस शहर दो बरस.

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम परदेस से में 6 सितम्बर 2014 को प्रकाशित]


नेपाल के पिछले सफ़र की तफसील मध्य पश्चिम पहाड़ों से निकल कर तराई तक पंहुची ही न थी कि अगला सफ़र आ धमका. इस बार बुलावा बरास्ते काठमांडू दक्षिण पूर्व नेपाल के सप्तारी से है. सागरमाथा जोन में पड़ने वाला महाकाय जिला जिसका 1950 से ही नगर निकाय का दर्जा प्राप्त मुख्यालय राजबिराज नेपाल के सबसे पुराने ‘शहरों’ में से एक है. खैर, हमेशा की तरह लम्बे सफ़र की सूचना मकानमालकिन को देने पंहुचा तो उन्होंने बेतरह चौंका दिया था.

समर, हमें किराये का कॉन्ट्रैक्ट फिर से करना पड़ेगा, पिछला खत्म हो गया. सच कहूँ तो यकीन नहीं हुआ. दो बरस बीत गए इस घर में जिसका मकान नंबर भी मेरे मकीं हो जाने के बाद पड़ा था. दो बरस इस गाँव में जिसका नाम शे शान चुन और तमाम नामों से बहुत आसान होने के बावजूद बहुत कवायद करके मुंह पर चढ़ा था. और जिसके बस स्टैंड का नाम गाँव का नाम नहीं बल्कि सन लॉन, यानी नयी सड़क, है. यह सबक तमाम बार शे शान चुन और पासी चामा उन्गाई (अगला स्टैंड, धन्यवाद) बोलकर भी आधा किलोमीटर आगे पड़ने वाले स्टैंड पर उतर वापस लौटने पर ही याद हुआ.

दो बरस उस गाँव में भी जिसकी भाषा आज तक न जानने के कारण लोगों से परिचय मुस्कराहट के आगे मुश्किल से ही बढ़ पाया है. हाँ, एक बात जरुर पता चली, कि अपने गुजारे इस वक़्त ने इस गांव के मन से दक्षिण एशियाई लोगो के बारे में बने कुछ सही ही पूर्वाग्रह दूर कर दिए हैं. नटैली, अंग्रेजी बोलने वाली और इस वजह से मुझसे सबसे ज्यादा संवाद में रहने वाली दोस्त, से पता चला था यह. तब जब गाँव में ‘अपने’ लोगों की बढ़ती आमद देख बेसाख्ता वजह पूछ बैठा था.

“अरे आपके पहले डरते थे लोग. एक आदमी मकान लेता है फिर धीरे धीरे वही और लोगों को बिस्तर या कमरे पर किराए के हिसाब से लाने लगता है. बहुत तेज तेज बोलते हैं. आपस में लड़ने लगते हैं. सफाई का बिलकुल ध्यान नहीं रखते, कुछ भी कहीं भी फेंक दिया”- नटैली बोलती रही थी. “फिर आपके आने के बाद देखा कि बस एक आदमी है दो साल से. बेशक कभी कभी दोस्त आते हैं, कुछ दिन रहते हैं पर वह तो हम सबके यहाँ भी आते हैं. तो आपको देख के लोगों को लगा कि रख सकते हैं, ये लोग भी अच्छे हैं वरना पहले तो श्वेत लोगों को ही देने का चलन था” उसने जोड़ा था.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि अच्छा बुरा करूँ या बुरा. ‘हमारी’ छवि सोच दुखी हूँ या जितनी भी सही उसको तोड़ने में अपनी भूमिका पर खुश. फिर लगा था कि नहीं, हमारे हिस्से का सच भी कहा जाना चाहिए. सो बताया था उसे लोगों की ज़िंदा रहने की उस जद्दोजहद के बारे में जो उन्हें इन अजनबी शहरों में उठा लाती है. पहले से ही कम वेतन पर काम करते हुए पीछे छूट गए उस परिवार की मजबूरी के बारे में जिसकी जिंदगी यहाँ से आते पैसे पर निर्भर रहती है. फिर क्या करें ऐसे दोस्त? हाँ, सफाई और उस यौनिक व्यवहार के बारे में जिसका जिक्र शायद नटैली ने जानबूझ के छोड़ दिया था मैं कहता भी क्या.

खैर, दो बरस में कोई भी शहर अपना हो जाता है. भाषा, नस्ल, पहचान जैसी तमाम दीवारों के पार, आपका अपना हो जाता है. फिर आप उस शहर की सड़कों से आगे बढ़ वहां की गलियाँ पहचानने लगते हैं. वे गलियां जो रात गये कोई और ही शहर हो जाती हैं. शिम शा शुई में उन चरसी गुरखों का शहर जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बहाए खून के बदले हांगकांग चीन को वापस किये जाने के बाद ब्रिटिश नागरिकता पाने वाला इकलौता समुदाय हुए. जॉर्डन में स्ट्रीट फ़ूड मार्केट के गयी रात बंद होने के बाद घर जाने को तैयार उनींदी आँखों का शहर. वानचाई में बदन खरीदने को आतुर अधेड़ शिकारी आँखों का शहर, और न जाने किस किस देश से आकर बिकने को मजबूर सूनी आँखों का शहर. और इन दोनों के बीच से निर्लिप्त भाव से उसी इलाके में अपनी रिहाइशों को लौटता शहर भी.


इन दो बरसों में एक और शहर मिला. आसमान छूती कांच की इमारतों वाला शहर, एक उड़ान से दूसरी उड़ान के बीच बच्चों का हालचाल नहीं, शेयर बाजार का रुख पूछने वाला शहर. सप्तारी में जिक्र आये तो गल्प कथा सा लगे ऐसा शहर. बस इसी शहर से अपना रिश्ता न बन सका, शायद कभी बन भी न सके. ये असली दुनिया पे टंगा हुआ सा कुछ है, आर्थिक मंदी के प्रेत से हमेशा डरा रहने वाला, नकली. खैर, इससे भी जूझेंगे कभी, जीना न सही मुठभेड़ कर समझने से कौन रोकेगा. तब तक नेपाल वापस चलते हैं, जिंदगी में भी, कॉलम में भी.

1 comment :

  1. वक़्त-बेवक्त धीरे-धीरे हम जहाँ बसते हैं वो ही शहर बन जाता हैं हमारा अपना!!😊

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