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September 21, 2014

मूर्तियों वाला महबूब


[दैनिक जागरण में अपने कॉलम परदेस से में 20 सितम्बर 2014 को प्रकाशित] 

महबूब भाई से मिलने कि कोई वजह नहीं थी. मुल्क से हजार किलोमीटर दूर धौलागिरी के इन पहाड़ों में तो बिलकुल ही नहीं. आखिर को हैदराबाद से निकली किसी सड़क पर नेपाल के बाग्लुंग का मील पत्थर नहीं लगा है. पर फिर इंसानी जज्बात को, इज्जत से जिन्दा रहने कि जिद को सड़कों कि जरुरत भी कब पड़ती है. वो अपनी नयी राहें निकाल ही लेती है. सो महबूब भाई कि राहें हमारी राहों से टकराई ही नहीं, बाग्लुंग बाजर के उस समिट होटल के ठीक सामने टकराईं जिसे अगले कुछ दिन अपना आशियाना होना था.

मोफस्सिल कस्बों के लिए भीड़ कही जा सकने वाली संख्या के बीच बैठे कुछ लोग- महबूब भाई से पहली भिड़ंत ऐसी ही हुई थी. लगा था कि सिनेमाघरों कि जद से बाहर पड़ने वाले ऐसे इलाकों में मनोरंजन की जरूरत पूरी करने वाला कोई कलाकार होगा, ऐसा कलाकार जिसकी कला तमाशा कह ख़ारिज कर दिए जाने को अभिशापित होती है. कोई मदारी, कोई नट, जवानी फिर से लौटा देने वाला तेल बेच रहा कोई ‘शाही’ हकीम या ऐसा ही कुछ. पर फिर गौर से देखा तो मामला बिलकुल अलग था.

सामने पीतल और चांदी कि चमकती मूर्तियां थीं, पानी कि टोंटियाँ, टूटे बर्तन, जूस निकालने की मशीन सा कुछ भी और यहाँ की मिट्टी से बिलकुल अलग तसला भर गहरी भूरी सी मिट्टी. और इन लगभग असंबद्ध सी दिखती चीजों के बीच महबूब भाई अपनी पत्नी और भतीजे जावेद के साथ बैठे थे. मतलब यह कि महबूब भाई कलईगर हैं, एक मर रही लोककला के झंडाबरदार. बात आगे बढ़ी तो पता चला कि जनाब हैदराबाद से हैं, साल के छह महीने ऐसे ही भटकते रहते हैं. कहीं डेरा डालके लोगों के टूटे, बेकार हो गए सामानों को खूबसूरत मूर्तियों में बदल देते हैं.

‘यहाँ पंहुचे कैसे, हैदराबाद तो बहुत दूर है’, मेरे पूछने पर उनकी पत्नी खिलखिला उठी थीं. फिर उन्होंने कहा था कि ‘पेट के लिए कोई जगह दूर नहीं हैं’. ‘हैदराबाद से रेलगाड़ी से हम उत्तर प्रदेश के गोंडा आते हैं, फिर वहाँ से तीन घंटे में रोवड़िया ‘बोर्डर’ पंहुच जाते हैं. फिर नेपालगंज और वहाँ से उस बार जिधर जाना तय किया हो’- जावेद ने जोड़ा था. तय कैसे करते हैं कि इस बार कहाँ जायेंगे- मैंने फिर पूछा था. ‘नक़्शे में देख लेते हैं’ महबूब भाई का जवाब वापस आया था. पूछने पर पता चला कि पूरा नेपाल घूम चुके हैं, काठमांडू, पोखरा, बुटवल, बीरगंज और न जाने कितनी जगहें.

कोशिश इतनी भर रहती है कि अगर कोई और कलईगर परिवार कहीं गया हो तो वहाँ न जाएँ, वहाँ ज्यादा काम नहीं मिलता. मेरे क्यों पूछने पर तीनों फिर खिलखिला उठे थे – यहाँ कितना पीतल और चांदी होगा लोगों के पास? और उसमें भी टूटे, खराब हो गए सामानों में जिससे हम काम करते हैं, जवाब फिर आया था. ‘हमारे जाने के बाद कोई यहीं आया तो उसे पूरे इलाके में कुछ नहीं मिलेगा’- जावेद ने फिर जोड़ा था. पूरे इलाके में इसलिए क्योंकि किसी काम् से बाजार आने वाले लोग उन्हें अपने गावों में बुला लेते हैं, फिर अगले लोग अगले गाँव और ये सिलसिला काम के लगभग खत्म हो जाने तक चलता रहता है.

महबूब भाई सपरिवार बस स्टैंड में रहते हैं, अपना टेंट बना के जिसे वे साथ ही लेकर चलते हैं. कुरेदने पर बताया कि यहाँ की पुलिस बिलकुल परेशान नहीं करती, उल्टा वे लोग बात करते हैं, हंसी मजाक करते हैं. इंडियन पुलिस की तरह टैक्स नहीं लेते, धमकाते नहीं. मेरे पूछने के पहले ही उन्होंने टैक्स का मतलब बता दिया था- हफ्ता. आगे जोड़ा कि इसी वजह से उन्होंने हिंदुस्तान में घूमना बंद कर दिया वरना जलपाईगुड़ी से जयपुर तक पूरा देश घूमते रहते थे. और हाँ,अब तो सस्ती और फैंसी चीनी मूर्तियां मिल जाती हैं, हमको कौन पूछता है- महबूब भाई की आवाज उदास हो आई थी. सो किस्सा यह कि पूरा परिवार डेढ़ क्विंटल वजन उठाये लोगों को उनकी इबादत का सामान मुहैया करवाता है.

मुश्किल सवाल पूछने का वक्त आ गया था. पर आप मुसलमान हैं जहाँ बुतपरस्ती हराम है. किसी मौलाना ने मन नहीं किया- मैंने सकुचाते हुए ही पूछा था. ‘हाँ, कई बार कहे वो लोग कि ये काम छोड़ दो, आखिरत में क्या मुंह दिखाओगे’- जावेद ने जवाब दिया था. और फिर जोड़ा था- ‘बाप दादों का सिखाया काम है. न और कुछ आता है न उनका बिरसा (विरासत) छोडना अच्छा लगता है’. मुझे सालों पहले आजमगढ़ में किसी दोस्त की शादी में शहनाई बजाते बुजुर्ग उस्ताद से इसी सवाल पर मिला यही जवाब याद आया ही था कि जावेद की चाची गुस्से से फट पड़ी थीं- ‘ईमान वाले रोटी देंगे’? ‘और ये काम निजाम के ज़माने में गलत नहीं था तो अब कैसे गलत हो गया? इनको पुराने मौलानाओं से ज्यादा इस्लाम आता है?- मुझे लगता है कि मैंने महबूब भाई की आँखों में उन्हें चुप होने की गुजारिश देखी थी. वह रुक भी गयीं पर ‘इन्ही में से चुनना है’ कहते हुए एक मूर्ती और खाली कटोरा सामने रख देने के बाद.

मुझे तमाम जवाब मिल गए थे.

2 comments :

  1. ‘पेट के लिए कोई जगह दूर नहीं हैं’. .....कितना कुछ ख दिया गया है इसमें ......पेट -धर्म ,जात-पात भी नहीं देखता
    बहुत अच्छा आलेख ....एक सुलझन

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