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September 13, 2014

पुरबिया लड़का, मद्रासन लड़की।

एक पुरबिया लड़का था, एक मद्रासन लड़की। पुरबिया लड़का न जाने कैसे किन राहों से जेएनयू पँहुच गया, मद्रासन लड़की तो खैर बनी ही वहीँ के लिए थी. लड़का तेज था, पढ़ने में ही नहीं, सब कुछ में. और लड़की, वो तो माशा अल्लाह। जाने कैसे दोनों लड़ते झगड़ते दोस्त हो गए. बहुत अच्छे, एक दूसरे पे जान छिडकने वाले दोस्त। इस कदर की दोनों की सुबह शाम एक दूसरे से ही हो. इस कदर भी कि क्लास मद्रासन लड़की ने टॉप की तो सबसे ज्यादा खुश वो पुरबिया लड़का ही हुआ. बावजूद इसके कि वो अपना सारा वक़्त इन्कलाब पे न लगा रहा होता तो दो नंबर पे न आता, टॉप करता. 


बखैर, इश्क न हुआ दोनों को कभी. पुरबिया लड़के की प्रेमिका थी एक, और मद्रासन लड़की को इश्क की जरूरत ही न पड़ी. वक़्त मगर फिर वक़्त ठहरा। मद्रासन लड़की एक डिग्री पूरी करके चली गयी. रेलवे स्टेशन छोड़ने भी पुरबिया लड़का ही गया. उस दिन भी लड़े थे दोनों। बेतरह। इतना कि ऑटो वाले भैया ने अचानक रेसकोर्स रोड से बाहर आते ही ऑटो रोका और मद्रासन लड़की को बोला कि मैडम बुरा न मानियेगा, लड़ाई कितनी भी बड़ी हो पति का घर छोड़ के थोड़े चले जाते हैं. और लीजिये साहब, पुरबिया लड़का और मद्रासन लड़की दोनों जो हँसे कि कहिये मत. 
फिर वही जालिम वक़्त, फोन कम होते गए, बातचीत भी. मगर दोस्ती, वैसे कि वैसे बनी रही. और एक दिन मद्रासन ने वापस फोन किया। अबे पुरबिये, मैं शादी कर रही हूँ. चले आना. पुरबिया चुनाव लड़ रहा था मगर फिर भी गया. खूब दूर, भोपाल के नीचे सब मद्रास में पड़ने वाली एक जगह बंगलौर में. खूब खुश खुश उसकी शादी में शामिल हुआ और उसके पति को बोला- हमारी क्लास में बेस्ट यही थी भाई. मैंने चाहां था होना, इसके चलते हो न सका. तीनों हँसे थे खूब उस दिन. दिल से. 

फिर पुरबिया लड़का लौट आया और मद्रासन लड़की विदेश चली गयी. कभी कभी बतियाते रहे दोनों। पुरबिया लड़के का सफ़र इश्क दर इश्क मात खाते हुए भी विदेश पँहुचा, पर उस मद्रासन के उलटे पड़ने वाला विदेश। बातें कम होती गयीं पर रुकी नहीं। एक दूसरे की खबर दोनों को मिलती रही, दोनों बताते रहे. पुरबिये का एक और शहीद हो गया इश्क, तो मद्रासन की एक और देश की यात्रा। मद्रासन की जिन्दगी में बेटा आया तो पुरबिये की जिंदगी में एक और ब्रेकअप। पर फिर वही, दोनों एक दूसरे के लिए वैसे ही रहे. 

फिर धीरे धीरे पुरबिये को लगने लगा कि उसकी मद्रासन परेशान है, उदास है. पूछता रहा वह, पर मद्रासन मुंह न खोले तो न खोले। फिर एक दिन उस मद्रासन ने पुरबिये को फोन किया। वो परेशान थी. कुछ कहीं बहुत गहरे तक गड़बड़ था. पुरबिया क्या कहता उसे? 

उस दिन उस पुरबिये को फिर से लगा कि औरत होना कितना मुश्किल है. बाकी ये कहा नहीं उसने। कह सिर्फ ये पाया, हमेशा कि तरह कि - मद्रासन यू हैव ऑलवेज बीन द बेस्ट। यू विल वी. फिर से. कसम से उसको यकीन है. उसकी क्लास की सबसे बेहतर वही थी यार, उससे भी. 

2 comments :

  1. Ye aapka likha hai ,jante na the.kisi orki wall pr pdha tha.unki writing se hm bde prabhavit hue.
    aaj jana ye aapka likha hua he.nice one

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