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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

September 21, 2014

मूर्तियों वाला महबूब


[दैनिक जागरण में अपने कॉलम परदेस से में 20 सितम्बर 2014 को प्रकाशित] 

महबूब भाई से मिलने कि कोई वजह नहीं थी. मुल्क से हजार किलोमीटर दूर धौलागिरी के इन पहाड़ों में तो बिलकुल ही नहीं. आखिर को हैदराबाद से निकली किसी सड़क पर नेपाल के बाग्लुंग का मील पत्थर नहीं लगा है. पर फिर इंसानी जज्बात को, इज्जत से जिन्दा रहने कि जिद को सड़कों कि जरुरत भी कब पड़ती है. वो अपनी नयी राहें निकाल ही लेती है. सो महबूब भाई कि राहें हमारी राहों से टकराई ही नहीं, बाग्लुंग बाजर के उस समिट होटल के ठीक सामने टकराईं जिसे अगले कुछ दिन अपना आशियाना होना था.

मोफस्सिल कस्बों के लिए भीड़ कही जा सकने वाली संख्या के बीच बैठे कुछ लोग- महबूब भाई से पहली भिड़ंत ऐसी ही हुई थी. लगा था कि सिनेमाघरों कि जद से बाहर पड़ने वाले ऐसे इलाकों में मनोरंजन की जरूरत पूरी करने वाला कोई कलाकार होगा, ऐसा कलाकार जिसकी कला तमाशा कह ख़ारिज कर दिए जाने को अभिशापित होती है. कोई मदारी, कोई नट, जवानी फिर से लौटा देने वाला तेल बेच रहा कोई ‘शाही’ हकीम या ऐसा ही कुछ. पर फिर गौर से देखा तो मामला बिलकुल अलग था.

सामने पीतल और चांदी कि चमकती मूर्तियां थीं, पानी कि टोंटियाँ, टूटे बर्तन, जूस निकालने की मशीन सा कुछ भी और यहाँ की मिट्टी से बिलकुल अलग तसला भर गहरी भूरी सी मिट्टी. और इन लगभग असंबद्ध सी दिखती चीजों के बीच महबूब भाई अपनी पत्नी और भतीजे जावेद के साथ बैठे थे. मतलब यह कि महबूब भाई कलईगर हैं, एक मर रही लोककला के झंडाबरदार. बात आगे बढ़ी तो पता चला कि जनाब हैदराबाद से हैं, साल के छह महीने ऐसे ही भटकते रहते हैं. कहीं डेरा डालके लोगों के टूटे, बेकार हो गए सामानों को खूबसूरत मूर्तियों में बदल देते हैं.

‘यहाँ पंहुचे कैसे, हैदराबाद तो बहुत दूर है’, मेरे पूछने पर उनकी पत्नी खिलखिला उठी थीं. फिर उन्होंने कहा था कि ‘पेट के लिए कोई जगह दूर नहीं हैं’. ‘हैदराबाद से रेलगाड़ी से हम उत्तर प्रदेश के गोंडा आते हैं, फिर वहाँ से तीन घंटे में रोवड़िया ‘बोर्डर’ पंहुच जाते हैं. फिर नेपालगंज और वहाँ से उस बार जिधर जाना तय किया हो’- जावेद ने जोड़ा था. तय कैसे करते हैं कि इस बार कहाँ जायेंगे- मैंने फिर पूछा था. ‘नक़्शे में देख लेते हैं’ महबूब भाई का जवाब वापस आया था. पूछने पर पता चला कि पूरा नेपाल घूम चुके हैं, काठमांडू, पोखरा, बुटवल, बीरगंज और न जाने कितनी जगहें.

कोशिश इतनी भर रहती है कि अगर कोई और कलईगर परिवार कहीं गया हो तो वहाँ न जाएँ, वहाँ ज्यादा काम नहीं मिलता. मेरे क्यों पूछने पर तीनों फिर खिलखिला उठे थे – यहाँ कितना पीतल और चांदी होगा लोगों के पास? और उसमें भी टूटे, खराब हो गए सामानों में जिससे हम काम करते हैं, जवाब फिर आया था. ‘हमारे जाने के बाद कोई यहीं आया तो उसे पूरे इलाके में कुछ नहीं मिलेगा’- जावेद ने फिर जोड़ा था. पूरे इलाके में इसलिए क्योंकि किसी काम् से बाजार आने वाले लोग उन्हें अपने गावों में बुला लेते हैं, फिर अगले लोग अगले गाँव और ये सिलसिला काम के लगभग खत्म हो जाने तक चलता रहता है.

महबूब भाई सपरिवार बस स्टैंड में रहते हैं, अपना टेंट बना के जिसे वे साथ ही लेकर चलते हैं. कुरेदने पर बताया कि यहाँ की पुलिस बिलकुल परेशान नहीं करती, उल्टा वे लोग बात करते हैं, हंसी मजाक करते हैं. इंडियन पुलिस की तरह टैक्स नहीं लेते, धमकाते नहीं. मेरे पूछने के पहले ही उन्होंने टैक्स का मतलब बता दिया था- हफ्ता. आगे जोड़ा कि इसी वजह से उन्होंने हिंदुस्तान में घूमना बंद कर दिया वरना जलपाईगुड़ी से जयपुर तक पूरा देश घूमते रहते थे. और हाँ,अब तो सस्ती और फैंसी चीनी मूर्तियां मिल जाती हैं, हमको कौन पूछता है- महबूब भाई की आवाज उदास हो आई थी. सो किस्सा यह कि पूरा परिवार डेढ़ क्विंटल वजन उठाये लोगों को उनकी इबादत का सामान मुहैया करवाता है.

मुश्किल सवाल पूछने का वक्त आ गया था. पर आप मुसलमान हैं जहाँ बुतपरस्ती हराम है. किसी मौलाना ने मन नहीं किया- मैंने सकुचाते हुए ही पूछा था. ‘हाँ, कई बार कहे वो लोग कि ये काम छोड़ दो, आखिरत में क्या मुंह दिखाओगे’- जावेद ने जवाब दिया था. और फिर जोड़ा था- ‘बाप दादों का सिखाया काम है. न और कुछ आता है न उनका बिरसा (विरासत) छोडना अच्छा लगता है’. मुझे सालों पहले आजमगढ़ में किसी दोस्त की शादी में शहनाई बजाते बुजुर्ग उस्ताद से इसी सवाल पर मिला यही जवाब याद आया ही था कि जावेद की चाची गुस्से से फट पड़ी थीं- ‘ईमान वाले रोटी देंगे’? ‘और ये काम निजाम के ज़माने में गलत नहीं था तो अब कैसे गलत हो गया? इनको पुराने मौलानाओं से ज्यादा इस्लाम आता है?- मुझे लगता है कि मैंने महबूब भाई की आँखों में उन्हें चुप होने की गुजारिश देखी थी. वह रुक भी गयीं पर ‘इन्ही में से चुनना है’ कहते हुए एक मूर्ती और खाली कटोरा सामने रख देने के बाद.

मुझे तमाम जवाब मिल गए थे.

September 15, 2014

अपनी हिंदी को कोई पखवाड़ा नहीं चाहिए, न श्राद्ध का न स्मृति का.

हिंदी तीन तरह की होती है, अरसे पहले भारतीय मूल की अमेरिकी दोस्त स्नेहा ने कहा था. पहली 'नीचे' वाली- आटो भैया, सीपी चलोगे? कितना हुआ? नहीं नहीं ज्यादा है. 

दूसरी बीच वाली- जिसमे दोस्त लोग बातचीत करते हैं, फिल्म देखते हैं, जिंदगी जीते हैं. अरे यार, शानदार थी मूवी, क्या एक्टिंग थी और क्या क्लाइमेक्स वाली। 
तीसरी हिंदी विभागों वाली- वो जो लगती है कोई और ही भाषा है. स्नेहा ने फिर कहा था. 

इसमें बस यह जोड़ देने की जरूरत है कि हिंदी विभाग ही नहीं ज्यादातर हिंदी साहित्य भी हिंदी की कब्रगाह हैं और साहित्यकार उसका मृत्युभोज खाने को तैयार बैठे महाब्राह्मण। संस्कृत की ओखली में मुसलिया दी गयी ये वाली हिंदी मरणासन्न है ही, कुछ दिन में गुजर भी जायेगी। 

बाकी पहली और दूसरी वाली महफूज़ हैं, जिंदाबाद हैं, पाइन्दाबाद हैं. 

तब तक जब तक बंगाली बोलने वाली कोई लड़की बेकराँ है बेकराँ गुनगुनाती रहेगी, जब तक 'आशिकी' के गाने अवाम की जुबान पर चढ़ते रहेंगे, जब तक गुलजार (मुझे न पसंद होने के बावजूद) की उर्दू/पंजाबी के बीच की किसी जगह वाली उर्दू लोगों के मन के तार खड़काती रहेगी। हिंदी महफूज़ है जब तक ओंकारा जैसी फिल्मों की हिंदी गुलाल वाली हिंदी से बिलकुल अलग होगी और दोनों कस्बों वाली टूरिंग टाकीज से लेकर मल्टीप्लेक्स तक बराबर 'हिट' होंगी, बराबर भीड़ खींचेगी।

क्या है कि इस हिंदी को सड़े 'मानकीकरण' उर्फ़ standardisation की जरूरत नहीं है. यह तो बहती नदी है, नए शब्द उठाती, पुराने बेकार वाले छोड़ती हुई. फिर इस हिंदी को राष्ट्रभक्ति के किसी नए प्रयोग से भी मतलब नहीं है, इसे तो व्यापार करना है, अधिकतम लोगों तक पँहुचना है. सो इसके लिए कोई किसी की शब और सुबह ही हो सकता है, रात्रि और प्रातःकाल नहीं। फिर इसमें प्यार भी आता है तो बेहद और बेशुमार ही आता है, अत्यधिक और असीमित नहीं। 

पहली और दूसरी वाली महफूज़ हैं जब तक अखबार हैं जिन्हें आसान शब्दों में अपनी बात आम आदमी तक पंहुचानी है. तब तक जब तक आप उन्हें जितनी गाली दे लीजिये, सरस सलिल जैसी पत्रिकाएँ हैं- एक पूरी पीढ़ी को पत्रिका खरीदने का पहला मौका देने वाली पत्रिकाएं।

वे महफूज़ हैं जब तक रिक्शे चलाने वाले दोस्त हैं, सड़क किनारे पानी की रेहड़ी वाला भाई है, बड़े शहरों में अपनी जमीन तलाशते पुरबिये हैं, पछुए हैं, मगही हैं, मागध हैं, बुन्देले हैं, बघेल हैं, रुहेले हैं.…… इन सबको साझे की एक जुबान चाहिए, वो जुबान हिंदी है. पर हमारी वाली, हिंदी विभागों वाली नहीं। क्या है कि इसे न राष्ट्रभाषा बनने की जिद है न राज भाषा बनने की। ये आम अवाम की जुबान बन के खुश है। 

और हाँ, इस हिंदी को कोई पखवाड़ा नहीं चाहिए, न श्राद्ध का न स्मृति का.  

September 13, 2014

पुरबिया लड़का, मद्रासन लड़की।

एक पुरबिया लड़का था, एक मद्रासन लड़की। पुरबिया लड़का न जाने कैसे किन राहों से जेएनयू पँहुच गया, मद्रासन लड़की तो खैर बनी ही वहीँ के लिए थी. लड़का तेज था, पढ़ने में ही नहीं, सब कुछ में. और लड़की, वो तो माशा अल्लाह। जाने कैसे दोनों लड़ते झगड़ते दोस्त हो गए. बहुत अच्छे, एक दूसरे पे जान छिडकने वाले दोस्त। इस कदर की दोनों की सुबह शाम एक दूसरे से ही हो. इस कदर भी कि क्लास मद्रासन लड़की ने टॉप की तो सबसे ज्यादा खुश वो पुरबिया लड़का ही हुआ. बावजूद इसके कि वो अपना सारा वक़्त इन्कलाब पे न लगा रहा होता तो दो नंबर पे न आता, टॉप करता. 


बखैर, इश्क न हुआ दोनों को कभी. पुरबिया लड़के की प्रेमिका थी एक, और मद्रासन लड़की को इश्क की जरूरत ही न पड़ी. वक़्त मगर फिर वक़्त ठहरा। मद्रासन लड़की एक डिग्री पूरी करके चली गयी. रेलवे स्टेशन छोड़ने भी पुरबिया लड़का ही गया. उस दिन भी लड़े थे दोनों। बेतरह। इतना कि ऑटो वाले भैया ने अचानक रेसकोर्स रोड से बाहर आते ही ऑटो रोका और मद्रासन लड़की को बोला कि मैडम बुरा न मानियेगा, लड़ाई कितनी भी बड़ी हो पति का घर छोड़ के थोड़े चले जाते हैं. और लीजिये साहब, पुरबिया लड़का और मद्रासन लड़की दोनों जो हँसे कि कहिये मत. 
फिर वही जालिम वक़्त, फोन कम होते गए, बातचीत भी. मगर दोस्ती, वैसे कि वैसे बनी रही. और एक दिन मद्रासन ने वापस फोन किया। अबे पुरबिये, मैं शादी कर रही हूँ. चले आना. पुरबिया चुनाव लड़ रहा था मगर फिर भी गया. खूब दूर, भोपाल के नीचे सब मद्रास में पड़ने वाली एक जगह बंगलौर में. खूब खुश खुश उसकी शादी में शामिल हुआ और उसके पति को बोला- हमारी क्लास में बेस्ट यही थी भाई. मैंने चाहां था होना, इसके चलते हो न सका. तीनों हँसे थे खूब उस दिन. दिल से. 

फिर पुरबिया लड़का लौट आया और मद्रासन लड़की विदेश चली गयी. कभी कभी बतियाते रहे दोनों। पुरबिया लड़के का सफ़र इश्क दर इश्क मात खाते हुए भी विदेश पँहुचा, पर उस मद्रासन के उलटे पड़ने वाला विदेश। बातें कम होती गयीं पर रुकी नहीं। एक दूसरे की खबर दोनों को मिलती रही, दोनों बताते रहे. पुरबिये का एक और शहीद हो गया इश्क, तो मद्रासन की एक और देश की यात्रा। मद्रासन की जिन्दगी में बेटा आया तो पुरबिये की जिंदगी में एक और ब्रेकअप। पर फिर वही, दोनों एक दूसरे के लिए वैसे ही रहे. 

फिर धीरे धीरे पुरबिये को लगने लगा कि उसकी मद्रासन परेशान है, उदास है. पूछता रहा वह, पर मद्रासन मुंह न खोले तो न खोले। फिर एक दिन उस मद्रासन ने पुरबिये को फोन किया। वो परेशान थी. कुछ कहीं बहुत गहरे तक गड़बड़ था. पुरबिया क्या कहता उसे? 

उस दिन उस पुरबिये को फिर से लगा कि औरत होना कितना मुश्किल है. बाकी ये कहा नहीं उसने। कह सिर्फ ये पाया, हमेशा कि तरह कि - मद्रासन यू हैव ऑलवेज बीन द बेस्ट। यू विल वी. फिर से. कसम से उसको यकीन है. उसकी क्लास की सबसे बेहतर वही थी यार, उससे भी. 

September 09, 2014

यू आर अनंतमूर्ति: प्रतिरोध के नए मुहावरों का चितेरा

[आगाज़ के सितम्बर अंक में प्रकाशित] 


उडिपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति, या सीधे यू आर ए अनंतमूर्ति कहने पर जो पहली चीज जेहन में आती है है वह है एक अनंत विद्रोह की चेतना। वह विद्रोह जो उनके उपन्यास 'संस्कार' मेंचरम पर दिखता है पर जो हकीकत में उनके सारे लेखन और जीवन की अंतर्धारा है. अनंतमूर्ति के लेखन की सबसे ख़ास बात है कि उनके यहाँ विद्रोह सायास लाया हुआ नहीं दिखता। न हीउनके लेखन में यह विद्रोह किसी ट्रोप, या प्रविधि की तरह नहीं आता बल्कि जिए हुए जीवन की सच्चाइयों से निकलता है.

अनंतमूर्ति का जिया हुआ जीवन भी बहुत दिलचस्प है. एक अति सांस्कारिक ब्राह्मण परिवार में पीला बढ़े बच्चे से प्रतिगामी मूल्यों के खिलाफ खड़े आधुनिक वैज्ञानिक चेतना से लैससाहित्यकार बनने का उनका सफर एक पूरी पीढ़ी का सफर है. उस पीढ़ी का जिसने औपनिवेशिक भारत के उतार के दौर से जीवन शुरू कर पहले एक बहुलतावादी लोकतान्त्रिक भारत को बनते देखा है और फिर 1980 से उस भारत पर बढ़ते हिन्दूवादी हमले भी.

कहने की जरूरत नहीं कि संकीर्णतावादी और प्रतिगामी चेतना के न केवल खतरे उन्हें साफ़ दिखते थे बल्कि वह उनसे लड़ने को तैयार थे. इसीलिए आशीष नंदी के शब्दों में एक शास्त्रीय फासीवादी नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बना उन्हें अस्वीकार ही नहीं असहनीय भी था और यह उनके ऐसी दशा में भारत छोड़ देने के बयान का कारण था. यहाँ फिर अनंतमूर्ति के जीवन विशिष्टता दिखती है- वह निष्क्रिय आलोचना या विरोध के पक्षधर नहीं बल्कि सक्रिय प्रतिरोध के झंडाबरदार थे, जनता के खेमे में खड़े अवययी बुद्धिजीवी थे.

फिर यह प्रतिबद्धता केवल मोदी के प्रधानमंत्री बनने जैसे 'बड़े' सवालों पर नहीं जागती थी बल्कि समसामयिक आंदोलनों के ऐसे मुद्दों पर भी अनंतमूर्ति पूरी ताकत से जनता खड़े होते थेजिनपर और 'बुद्धिजीवी' बचने की कोशिश करते थे. सिर्फ एक उदाहरण लें तो तेलंगाना में छात्रों के बीफ और पोर्क खाने की आजादी की मांग से शुरू होकर पूरे देश में फ़ैल गए भोजन केलोकतान्त्रिक अधिकार के आंदोलन के पक्ष में खड़े होने वाले गिनेचुने बुद्धिजीवियों में से अनंतमूर्ति एक थे. गौरतलब है कि उन्होंने अपना मत पेजावर मठ के मठाधीश की निर्मम आलोचनाके बाद भी नहीं बदला था.

फिर से लौटें कि अनंतमूर्ति के जीवन और लेखन दोनों में यह पक्षधरता आयी कहाँ से? इसी सवाल का जवाब हमें उनकी महत्वपूर्ण कहानी घाटश्राद्ध तक ले जाता है. वह कहानी जिसमेवैदिक संस्कृत विद्यालय में पढ़ने वाला एक बच्चा गर्भवती ब्राह्मण विधवा के साथ खड़ा होता है, की कोशिश करता है पर फिर हार जाता है और उस महिला का घाटश्राद्ध (जीवित व्यक्ति कामृत्यु संस्कार) होते हुए देखता है. इस कहानी और बाद में इसके फिल्मांकन ने कन्नड़ भाषा में नव्या आंदोलन ही नहीं शुरू किया बल्कि कन्नड़ सिनेमा को भी एक नयी चेतना, नयी भाषादी.

शुद्ध-अशुद्ध और ऊँचनीच की अवधारणा पर टिके ब्राह्मणवाद का प्रतिकार उनके लेखन का प्रतिनिधि स्वर बन के उभरता है. उससे भी दिलचस्प यह कि अनंतमूर्ति ब्राह्मणवाद की आलोचनाका हथियार अक्सर उसके अंदर की अमानवीयता और अंतर्विरोधों को बनाते हैं, उसकी मूल मान्यताओं पर हमला करते हैं. वे दिखाते हैं कि ब्राह्मणवादी पाखंड अंदर से कितना खोखला है.उनका प्रसिद्द उपन्यास 'संस्कार' उनकी इस विशिष्ट लेखन शैली का उरूज है. इस उपन्यास में वे एक कर्मकांडी ब्राह्मण और मांस मदिरा खाने वाले और एक वेश्या से मित्रता रखने वाले ब्राह्मण के अंतर्संबंधों को आधार बना कर पवित्रता के मिथक को ध्वस्त करते हैं.

अनंतमूर्ति के लेखन की यही विशिष्टता उनके गल्प लेखन को सामाजिक विज्ञान पर लाकर खड़ा कर देती है. उनके गांवों, विद्यालयों, परंपराओं और संस्कारों का वर्णन काल्पनिक नहीं बल्किसमाजशास्त्रीय वर्णन है, ऐसा वर्णन जिसके आधार पर जातीय परंपराओं पर निर्णायक शोध किये जा सकते हैं. यह एक बात है जो धीरे धीरे समाज से कटते जा रहे हिंदी साहित्य को अनंतमूर्ति सेसीखना चाहिए। दुनिया का कोई भी साहित्य निर्वात में टंगा नहीं हो सकता, उसे अपनी सार्थकता के लिए अपनी जमीन अपनी जड़ों से जुड़ना ही पड़ता है. अनंतमूर्ति का यह चुनाव अंग्रेजी का प्रोफ़ेसर होने केबाद भी कन्नड़ में लिखने में ही नहीं बल्कि उनकी कहानियों, उपन्यासों और सारे लेखन में दिखता है. यही है शायद जो उनकी सार्वकालिक महानता की एक वजह भी है.

मैंने इस लेख में उन्हें मिले ज्ञानपीठ से लेकर पद्मपुरुस्कारों तक का जिक्र नहीं किया है. यूँ तो यह कह देना ही काफी होता कि कोई ऐसा पुरूस्कार नहीं है जो उन्हें मिला न हो, पर फिर अनंतमूर्ति हमेशा अपनेलेखन के लिए याद किये जायेंगे, पुरुस्कारों के लिए नहीं। 

अलविदा अनंतमूर्ति।
आपको अभी नहीं जाना था, अभी ही तो आपकी जरूरत सबसे ज्यादा थी.

September 06, 2014

इस शहर दो बरस.

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम परदेस से में 6 सितम्बर 2014 को प्रकाशित]


नेपाल के पिछले सफ़र की तफसील मध्य पश्चिम पहाड़ों से निकल कर तराई तक पंहुची ही न थी कि अगला सफ़र आ धमका. इस बार बुलावा बरास्ते काठमांडू दक्षिण पूर्व नेपाल के सप्तारी से है. सागरमाथा जोन में पड़ने वाला महाकाय जिला जिसका 1950 से ही नगर निकाय का दर्जा प्राप्त मुख्यालय राजबिराज नेपाल के सबसे पुराने ‘शहरों’ में से एक है. खैर, हमेशा की तरह लम्बे सफ़र की सूचना मकानमालकिन को देने पंहुचा तो उन्होंने बेतरह चौंका दिया था.

समर, हमें किराये का कॉन्ट्रैक्ट फिर से करना पड़ेगा, पिछला खत्म हो गया. सच कहूँ तो यकीन नहीं हुआ. दो बरस बीत गए इस घर में जिसका मकान नंबर भी मेरे मकीं हो जाने के बाद पड़ा था. दो बरस इस गाँव में जिसका नाम शे शान चुन और तमाम नामों से बहुत आसान होने के बावजूद बहुत कवायद करके मुंह पर चढ़ा था. और जिसके बस स्टैंड का नाम गाँव का नाम नहीं बल्कि सन लॉन, यानी नयी सड़क, है. यह सबक तमाम बार शे शान चुन और पासी चामा उन्गाई (अगला स्टैंड, धन्यवाद) बोलकर भी आधा किलोमीटर आगे पड़ने वाले स्टैंड पर उतर वापस लौटने पर ही याद हुआ.

दो बरस उस गाँव में भी जिसकी भाषा आज तक न जानने के कारण लोगों से परिचय मुस्कराहट के आगे मुश्किल से ही बढ़ पाया है. हाँ, एक बात जरुर पता चली, कि अपने गुजारे इस वक़्त ने इस गांव के मन से दक्षिण एशियाई लोगो के बारे में बने कुछ सही ही पूर्वाग्रह दूर कर दिए हैं. नटैली, अंग्रेजी बोलने वाली और इस वजह से मुझसे सबसे ज्यादा संवाद में रहने वाली दोस्त, से पता चला था यह. तब जब गाँव में ‘अपने’ लोगों की बढ़ती आमद देख बेसाख्ता वजह पूछ बैठा था.

“अरे आपके पहले डरते थे लोग. एक आदमी मकान लेता है फिर धीरे धीरे वही और लोगों को बिस्तर या कमरे पर किराए के हिसाब से लाने लगता है. बहुत तेज तेज बोलते हैं. आपस में लड़ने लगते हैं. सफाई का बिलकुल ध्यान नहीं रखते, कुछ भी कहीं भी फेंक दिया”- नटैली बोलती रही थी. “फिर आपके आने के बाद देखा कि बस एक आदमी है दो साल से. बेशक कभी कभी दोस्त आते हैं, कुछ दिन रहते हैं पर वह तो हम सबके यहाँ भी आते हैं. तो आपको देख के लोगों को लगा कि रख सकते हैं, ये लोग भी अच्छे हैं वरना पहले तो श्वेत लोगों को ही देने का चलन था” उसने जोड़ा था.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि अच्छा बुरा करूँ या बुरा. ‘हमारी’ छवि सोच दुखी हूँ या जितनी भी सही उसको तोड़ने में अपनी भूमिका पर खुश. फिर लगा था कि नहीं, हमारे हिस्से का सच भी कहा जाना चाहिए. सो बताया था उसे लोगों की ज़िंदा रहने की उस जद्दोजहद के बारे में जो उन्हें इन अजनबी शहरों में उठा लाती है. पहले से ही कम वेतन पर काम करते हुए पीछे छूट गए उस परिवार की मजबूरी के बारे में जिसकी जिंदगी यहाँ से आते पैसे पर निर्भर रहती है. फिर क्या करें ऐसे दोस्त? हाँ, सफाई और उस यौनिक व्यवहार के बारे में जिसका जिक्र शायद नटैली ने जानबूझ के छोड़ दिया था मैं कहता भी क्या.

खैर, दो बरस में कोई भी शहर अपना हो जाता है. भाषा, नस्ल, पहचान जैसी तमाम दीवारों के पार, आपका अपना हो जाता है. फिर आप उस शहर की सड़कों से आगे बढ़ वहां की गलियाँ पहचानने लगते हैं. वे गलियां जो रात गये कोई और ही शहर हो जाती हैं. शिम शा शुई में उन चरसी गुरखों का शहर जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बहाए खून के बदले हांगकांग चीन को वापस किये जाने के बाद ब्रिटिश नागरिकता पाने वाला इकलौता समुदाय हुए. जॉर्डन में स्ट्रीट फ़ूड मार्केट के गयी रात बंद होने के बाद घर जाने को तैयार उनींदी आँखों का शहर. वानचाई में बदन खरीदने को आतुर अधेड़ शिकारी आँखों का शहर, और न जाने किस किस देश से आकर बिकने को मजबूर सूनी आँखों का शहर. और इन दोनों के बीच से निर्लिप्त भाव से उसी इलाके में अपनी रिहाइशों को लौटता शहर भी.


इन दो बरसों में एक और शहर मिला. आसमान छूती कांच की इमारतों वाला शहर, एक उड़ान से दूसरी उड़ान के बीच बच्चों का हालचाल नहीं, शेयर बाजार का रुख पूछने वाला शहर. सप्तारी में जिक्र आये तो गल्प कथा सा लगे ऐसा शहर. बस इसी शहर से अपना रिश्ता न बन सका, शायद कभी बन भी न सके. ये असली दुनिया पे टंगा हुआ सा कुछ है, आर्थिक मंदी के प्रेत से हमेशा डरा रहने वाला, नकली. खैर, इससे भी जूझेंगे कभी, जीना न सही मुठभेड़ कर समझने से कौन रोकेगा. तब तक नेपाल वापस चलते हैं, जिंदगी में भी, कॉलम में भी.

September 01, 2014

आजादी, इन्कलाब और लोकतंत्र के बीच पाकिस्तान

जनसत्ता में 1-09-2014 को प्रकाशित.


कुल्हाड़ियाँ और डंडे लेकर प्रधानमंत्री निवास की तरफ बढ़ते हजारों लोग, कंटेनर को अस्थायी मंच बना कर बाकी समर्थकों के साथ बैठा हुआ एक नेता किसी भी देश के लिए अपने आप में भयावह दुस्वप्न है. फिर इस आज़ादी जुलूस के बरक्स इन्कलाब जुलूस के नाम पर उसी राजधानी में कहीं पाकिस्तान को सुधार की हद से बाहर चला गया बताते हुए अपने हजारों समर्थकों के साथ बैठ कर एक इस्लामिक गणतंत्र में इस्लामिक राज्य लाने की मांग कर रहा मौलवी जोड़ दें. साफ़ दिखेगा कि पाकिस्तान अपने आंतरिक संकट के चरम पर खड़ा हुआ है. इस संकट की पहली विडम्बना इसी में है कि वहाबी इस्लाम के हमले झेल रहे पाकिस्तान में मौलाना ताहिर उल कादरी सूफी इस्लाम के करीब माने जाते हैं, तालिबान के मुखर आलोचक रहे हैं. ठीक उलटे, अभी सत्ताधारी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) उदार लोकतान्त्रिक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बरक्स दक्षिणपंथी इस्लामिक राजनीति ही करती रही है.

दूसरी विडम्बना यह कि यह उस पाकिस्तान में हो रहा है जिसने पिछले ही साल अपने इतिहास में पहली बार नागरिक सरकार से नागरिक सरकार में सत्ता परिवर्तन देखा था और पहली बार सेना को नागरिक मामलों से पीछे धकेलने की कोशिश की थी. तीसरी विडम्बना यह कि समाज के लोक्तान्त्रिकरण की वह कोशिश इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक ए इन्साफ के बेहद अलोकतांत्रिक और प्रतिगामी आज़ादी जुलूस में ही प्रतिबिम्बित हो रही है. नफरत और स्त्रीद्वेष की राजनीति करने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के बीच हजारों महिलाओं की उपस्थिति इस पूरे संकट की इकलौती आश्वस्तिकारी बात है.

खैर, इस दोतरफा हमले को ध्यान से देखें तो कई चीजें साफ़ होती हैं. पहली यह कि वढेरों, या जमींदारों के वर्गीय हितों की संरक्षक पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) समाज के बुनियादी गतिरोधों को हल करने में असफल तो रही ही है, इसने उन्हें बढ़ाया भी है. ज्यादातर कनाडा में रहने वाले कादरी की जून 2014 में पाकिस्तान वापसी के समय उनकी पार्टी पाकिस्तानी अवामी तहरीक के कार्यकर्ताओं पर पंजाब में पुलिसिया गोलीबारी के पहले कादरी की पाकिस्तानी राजनीति में कोई बड़ी हैसियत नहीं थी. बची खुची कसर नवाज़ शरीफ सरकार ने उनके विमान को इस्लामाबाद में उतरने की अनुमति न देकर पूरी कर दी. विमान अपहरण के दावे को छोड़ दें तो सरकार की इस बेवकूफाना हरकत ने उसका डर ही नहीं जाहिर किया बल्कि राजनीति की परिधि पर बैठे कादरी को रातोंरात मुख्यधारा का नायक बना दिया.

फिर कादरी के इस्लामिक राज्य का प्रतिदर्श जनता के एक बड़े हिस्से को लुभाता भी है. वह इस्लामिक राज्य को मुस्लिम बहुसंख्या वाले ऐसी राजनैतिक इकाई के बतौर देखते हैं जो स्वतंत्रता, विधि के शासन, धार्मिक आजादी सहित वैश्विक मानावाधिकार, सामाजिक भलाई, स्त्री अधिकार और अल्पसंख्यक अधिकारों पर टिका होता है. कहना न होगा कि ऐसा इस्लामिक राज्य आज की दुनिया के तमाम धर्मनिरपेक्ष राज्यों से बेहतर ही प्रतीत होता है. फिर लगातार हिंसा और अस्थायित्व झेल रहे पाकिस्तान में अवाम के एक बड़े हिस्से को यह सपना आकर्षित ही करेगा. बेशक इसके बाद कादरी को लेकर तमाम सवाल भी उठते हैं. जैसे कि यह कि पूरे पाकिस्तान को अपने पोस्टर और बैनरों से पाट देने वाले कादरी के धन का स्रोत क्या है, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों मीडिया में उनके विज्ञापन कौन प्रायोजित करता है और उनके पाकिस्तानी फौज से क्या रिश्ते हैं. एक गम्भीर सवाल यह भी है कि तालिबान के मुखर विरोधी कादरी मोटे तौर पर तालिबान समर्थक और तालिबानी दहशतगर्दों को शहीद बताने वाले इमरान खान के साथ सुविधा के गठजोड़ में कैसे शामिल हो सकते हैं. पर यह सभी सवाल एक राजनैतिक संवाद की मांग करते हैं न कि उस हठी हिंसा की जो पहले प्रधानमन्त्री के भाई शाहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने दिखाई और अब खुद केन्द्रीय सरकार दिखा रही है.

अब इस हमले के दूसरे पक्ष इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक ए इन्साफ को देखें. अपनी घोषित विचारधारा में इस्लामिक गणतंत्र की समर्थक यह पार्टी मूल रूप में भयानक दक्षिणपंथी और अवसरवादी समूह है. जाहिरा तौर पर तालिबान के खिलाफ कभी कभी बयान देते रहने के बावजूद फिर चाहे ड्रोन हमलों का मामला हो या सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों की तालिबान द्वारा हत्या का टीटीपी की राजनैतिक अवास्थितियाँ तालिबान के समर्थन में ही जाती रही हैं. आम चुनावों के समय पीपीपी पर लगातार हो रहे हमलों के बीच इस दल पर कोई तालिबानी हमला न होना इनके अंदर की समझ को प्रतिबिम्बित करता है. वहीँ मुख्यधारा के अन्य सभी दलों के विपरीत तहरीक ए इन्साफ फौज के साथ भी करीबी रिश्ते रखती है. पार्टी का दावा है कि जून 2013 में हुए चुनाव में भारी धांधली हुई थी इसलिए नवाज़ शरीफ सरकार इस्तीफ़ा दे और फिर से चुनाव हों.

इस दोतरफा हमले में फौज की शांत लेकिन असंदिग्ध उपस्थिति जोड़ दें तो सरकार का बच निकलना मुश्किल ही लगता है. वैसे तो अमेरिकी मदद पर टिकी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के मद्देनजर फौज सीधा तख्तापलट करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन सेनाध्यक्ष जनरल राहील शरीफ ने इमरान खान और कादरी से मुलाक़ात और मध्यस्थता के प्रस्ताव से अपनी पक्षधरता जाहिर कर दी है. यह होना भी था क्योंकि 1999 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ द्वारा तख्तापलट में अपदस्थ किये गए नवाज शरीफ और सेना में लगातार टकराव ही रहा है. मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने और सैनिकों की हत्या के बावजूद तालिबान पर कड़ी कार्यवाही की सेना की मांग के विरोध में खड़े प्रधानमंत्री से सेना पहले ही नाराज थी. बाद में जियो न्यूज़ के पत्रकार हामिद मीर पर जानलेवा हमले के बाद सेना पर लगे साजिश के आरोपों के बीच शरीफ के मीर और जियो न्यूज़ का साथ देने से यह टकराव और बढ़ा.

सेना अन्दर से शरीफ की बर्खास्तगी ही चाहती है और यह प्रधानमन्त्री आवास की तरफ हथियारबंद जुलूस से साफ़ होता है, ऐसी दुस्साहसिक कार्यवाहियां बिना किसी ठोस आश्वासन के नहीं की जा सकतीं. जनरल शरीफ की मध्यस्थता के प्रस्ताव पर ‘सौदा’ हो जाने की अफवाहों और अटकलबाजियों के बीच नवाज़ शरीफ ने सरकार द्वारा सेना से ऐसा कोई आग्रह न किये गये होने की बात सार्वजनिक कर इस टकराव को बहस में भी ला दिया है.

अब स्थिति यह है कि इमरान खान और कादरी समर्थक इस्लामाबाद में पुलिस से सीधे टकराव कर रहे हैं, सेना ऊपर से तटस्थ है और हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं. पंजाब पुलिस द्वारा कादरी समर्थकों के ‘मॉडल टाउन नरसंहार’ में नवाज़ शरीफ और शाहबाज शरीफ दोनों को ह्त्या आरोपी बना कर आन्दोलन को शांत करने की हालिया कोशिश भी असफल हो गयी है.
सो सवाल उठता है कि इस संकट के असली मायने क्या हैं? पाकिस्तान विशेषज्ञ आयेशा सिद्दीका की मानें तो नवाज़ शरीफ अगर इस हमले से बच भी गए तो अपने बाकी के कार्यकाल में वह बस रस्मी प्रधानमंत्री बन कर रह जायेंगे. पर उनकी असली चिंता कहीं बड़ी है. वह मानती हैं कि इस हमले ने बीते 8 सालों में लोकतंत्र मजबूत करने की तमाम कोशिशों को धक्का ही नहीं पंहुचाया है बल्कि मुल्क को वापस वहीँ ला खड़ा किया है. फिर क्या यह पाकिस्तान में जम्हूरियत कायम करने के एक और प्रयास की हार है?
शायद नहीं, क्योंकि संकट की इस घडी में विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी अपने तमाम मतभेद भुला कर पूरी ताकत से सरकार के साथ खड़ी हुई है. जरूरत है कि नवाज़ शरीफ सरकार लोकतंत्र समर्थक बाकी सारी पार्टियों को भी विश्वास में लेकर सेना का एक मजबूत और लोकतान्त्रिक प्रतिपक्ष खड़ा करे. जरूरत इस बात की भी है कि सरकार उन तमाम अटकलों को दृढ़ता से खारिज करे जिनमे ‘समस्या’ के समाधान के लिए सौदेबाजियों का जिक्र है. कहा जा रहा है कि सेना नवाज़ शरीफ सरकार द्वारा भारत से रिश्ते सुधारने के प्रयासों से भी नाराज है और चाहती है कि यह प्रक्रिया तुरंत बंद हो. इस संकट के बीच भारत पाक सीमा पर पाकिस्तानी सेना द्वारा संधिविराम के लगातार उल्लंघन इसकी तरफ साफ़ इशारा भी करते हैं. पाकिस्तान को समझने वाले हलकों में यह खबरें भी है कि सेना नवाज़ शरीफ सरकार की मदद करने को तैयार है बशर्ते वह महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे, खासतौर पर भारत और पाकिस्तान के प्रति रक्षा नीति, को फौज के लिए छोड़ दें. सेना की एक मांग यह भी है कि नवाज़ शरीफ भारतीय सैनिक पोस्टों पर पाकिस्तानी गोलीबारी में जांच न करने का वादा करे.

नवाज़ शरीफ सरकार को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में लोकतंत्र समर्थक पूरे तबके को समझना होगा कि ऐसी कोई सौदेबाजी लोकतंत्र के लिए स्थायी खतरा होगी. वैसे भी शरीफ सरकार के पास संसद में पूर्ण बहुमत ही नहीं है बल्कि मुख्य विपक्षी दल उनके साथ है. फिर दुनिया मानती है कि चुनावों में धांधली के आरोप झूठे हैं, वैसे भी पिछले चुनाव पीपीपी सरकार के दौर में अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में हुए थे. तमाम साजिशों के बावजूद सेना भी जानती है कि वह कोई तख्तापलट नहीं कर सकती. उसकी ऐसी कोई कोशिश पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी मदद रोक देगी और उस मदद के बिना पाकिस्तान ही नहीं बल्कि सेना भी एक दिन नहीं चल सकती.

सो ऐसे हालात में पाकिस्तान सरकार को संसद की संप्रभुता को चुनौती देने वाले, लोकतंत्र को नुकसान पंहुचाने वाले आन्दोलन से शान्ति लेकिन सख्ती से निपटना चाहिए. यही पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के हक में है.