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August 30, 2014

लव जिहाद का सच

[दैनिक जागरण में 30-08-2014 को प्रकाशित] 


लव जिहाद। बीच बीच में सुर्ख़ियों में आते रहने वाले इस शब्द को सुनने पर तमाम ख़याल आ सकते हैं. जैसे साम्प्रदायिकता या नफ़रत की राजनीति के ख़याल, समाज की, समुदाय की जनसांख्यिकी बदलने के ख़याल। पर एक और सम्भावना है, कि लव जिहाद शब्द सुनने पर भारत के संविधान के रचयिता बाबासाहेब अंबेडकर को याद किया जाय. उनको, जिन्होंने अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को जाति के उस ब्रह्मराक्षस को मारने का इकलौता तरीका बताया था जिसको मारे बिना इस समस्या से मुक्ति संभव नहीं है. पर फिर, इस पर बाद में लौटते हैं, पहले लव जिहाद क्या है, यह समझते हैं. 

इस बार लव जिहाद का मामला पहले मेरठ के एक सनसनीखेज काण्ड और बाद में निशानेबाज तारा सहदेव के अपने पति पर आरोपों से फिर से सुर्ख़ियों में आया है. मेरठ मामले से इस मुद्दे पर बिलकुल विपरीत ध्रुवों पर खड़ी राय भी सामने आई. उग्र हिंदुत्ववादी जहाँ इसे एक बड़ी साजिश मानते हैं वहीँ प्रदेश का सत्तापक्ष इसे विरोधियों
द्वारा धार्मिक नफरत भड़काने का तरीका भर समझता है. अफ़सोस यह, कि इन दोनों तर्कों में विधि के शासन द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था का नकार है. चाहे यह साजिश हो या नहीं, प्रदेश में कानून और व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है और उसमें असफलता के लिए वही दोषी है.

खैर
, लव जिहाद के इस ख़याल के पीछे हिंदूवादी संगठनों का मूल तर्क था कि यह मुस्लिम कट्टरपंथियों की वह साजिश है जिसके द्वारा वह अन्य धर्मों को मानने वाली महिलाओंविशेषकर हिन्दू, को शादी करने के बाद प्रेम या दबाव से मुस्लिम बना सकें। वह मानते हैं कि अंततः यह देश की जनसांख्यिकी बदल कर हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना देने का प्रयास है. पर हिंदूवादी ‘दबाव’ को परिभाषित नहीं करते हैं. अगर ऐसे कोई मामले सच में हों भी, और दबाव प्रेम के बहाने दिया जा रहा हो तो वह नैतिक रूप से भले गलत हो, गैरकानूनी नहीं है. पर यदि दबाव आपराधिक हथकंडों और/या मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से दिया जा रहा है तो वह उसी तरह गैरकानूनी है जैसे शादी के वादे से किसी स्त्री को सहवास के लिए राजी करना, और इसके अपराधियों को सजा मिलनी ही चाहिए। 

अब जरा ठहरें और याद करें कि ऐसे मामले भावनाओं से हल नहीं किये जा सकते, उन्हें सुलझाने के लिए ठन्डे आंकड़ों की जरुरत पड़ती है. वैसे भी यह मामला पहली बार नहीं उभरा है बल्कि दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठन 2009 से ही केरल और कर्नाटक में लव जिहाद का भय खड़ा करते रहे हैं. एक बार तो मामले की गंभीरता देखते हुए केरल उच्च न्यायालय को इसका संज्ञान भी लेना पड़ा है. लव जिहाद के इस आभासी खतरे के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह कि इस एक मामले में हिन्दू दक्षिणपंथ के साथ ईसाई दक्षिणपंथी भी कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे हैं. याद करें तो याद आएगा कि कैसे केरल कैथोलिक बिशप कौंसिल ने दावा किया था कि 2006 से लेकर 2012 तक कुल 2600 ईसाई युवतियों ने विवाह के लिए धर्म परिवर्तन किया था. 

अब जरा सही आंकड़े देख लें. केरल विधानसभा में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की विधायक के के लतिका के सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री ओमेन चैंडी ने केरल में धर्म परिवर्तन के आंकड़े पेश किये थे. उनके मुताबिक़ केरल में 2006 से 2012 के बीच 7713 लोगों ने अपना धर्म छोड़ इस्लाम स्वीकारा था, जबकि हिन्दू धर्म में शामिल होने वालों की संख्या 2803 थी. इस्लाम स्वीकारने वाले 7713 लोगों में से 2267 युवा महिलायें थीं, जिनमे 2195 हिन्दू थीं और 492 ईसाई। इसके उलट 2009-12 (2006-12 नहीं) की समयावधि में हिन्दू और ईसाई धर्मों में शामिल होने वाली महिलाओं की संख्या क्रमशः 79 और 2 थी. 

इन आंकड़ों से एक बात तो साफ़ होती है कि लव जिहाद कोई हकीकत हो या नहीं, धर्म परिवर्तन हो रहे हैं और सभी धर्मों में हो रहे हैं. फिर वह जब तक आपराधिक तरीकों से किये गए साबित न कर दिए जाएँ, किसी भी धर्म को मानना भारतीय नागरिकों को संविधानप्रदत्त अधिकार है. फिर क्या वजह है कि इस्लाम के पक्ष में हुए धर्मपरिवर्तन लव जिहाद बन जाते हैं जबकि इस्लाम से अन्य धर्मों में हुए धर्मपरिवर्तनों पर सुगबुगाहट भी नहीं होती

इसी सवाल के जवाब से और कई जवाब समझने के रास्ते खुलते हैं. सबसे पहले यह कि लव जिहाद नाम जितना भी नया हो, यह धारणा बहुत पुरानी है. इतनी पुरानी कि यह धारणा स्वातंत्र्य पूर्व औपनिवेशिक भारत में भी हिंदूवादियों का सबसे बड़ा हथियार थी. ऐसा हथियार जिसे इतिहासकार चारु गुप्ता ने अपनी किताब "सेक्सुअलिटी, ऑब्सीनिटी एंड कम्युनिटी: वीमेन, मुस्लिम्स एंड द हिन्दू पब्लिक इन कोलोनियल इंडिया" में बेनकाब किया है. उस किताब को ध्यान से पढ़ें तो साफ़ समझ आएगा कि लव जिहाद का यह नया नारा हिन्दुत्ववादी राजनीति का हकीकत में कितना पुराना हथियार है. चारु गुप्ता की किताब में हिंदुत्ववादियों की कोई पक्षधर आलोचना नहीं है बल्कि उनके खुद के पैम्फ्लेट, किताबों और नारों का विश्लेषण है. चारु साफ़ करती हैं कथित आक्रामक मुस्लिम यौन सक्रियता और हिन्दू महिलाओं की सुग्राह्यता और नादानी का वितंडा खड़ा करना हिन्दूवादियों का बड़ा हथियार था. फिर 1857 के बाद से ही इस्लाम पर अति हमलावर रहे अंग्रेजों ने भी इस मान्यता को फैलाने में खूब साथ दिया.

और अब सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल- तब जो भी नाम रहा हो उस आक्रामक मुस्लिम यौनिकता का असर क्या हुआ? क्या भारत के किसी हिस्से में जनसांख्यिकी में कोई बड़ा बदलाव आया? इतने दशकों से चल रही साजिश के बावजूद मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर न तो हिन्दुओं से ज्यादा हुई न ही पूरी जनसँख्या में उनका प्रतिशत बढ़ा. फिर लव जिहाद के मायने क्या हुए? यह कि हिन्दू महिलायें बेवकूफ हैं जो फर्जी नाम वाले मुस्लिमों के साथ प्रेम विवाह कर लेंगी?  वह भी भारत जैसे समाज में जहां सजातीय प्रेम विवाह करना तक आसान नहीं, उनमें भी परिजनों के इनकार से लेकर दहेज तक के मसले घुस आते हैं. साफ़ है कि लव जिहाद नाम का यह भय सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने के साथ महिलाओं की यौनिकता और जीवन दोनों पर पुरुष नियंत्रण बनाये रखने के लिए खड़ा किया गया है. यह इसलिए गढ़ा गया है कि महिलायें न अपना जीवन चुन सकें, न जीवनसाथी न चुनें, यह काम पुरुषों के ही हवाले रहे. 

लव जिहाद नाम के इस नए नारे की यही हकीकत ही इसकी हिन्दू और मुस्लिम दोनों कट्टरपंथियों के काम आती है। यूं भी सामुदायिक नियमों को धता बता के किये गए प्रेम और प्रेम विवाह नफ़रत पर टिके इरादों के लिए बड़ा खतरा होते हैं. वे यह साबित करते हैं कि जबरदस्ती की सीमायें मानवीय भावनाओं को नहीं रोक सकती हैं. सो इजरायल एक गाज़ा पट्टी पर लगातार की जा रही बमबारी के बीच भी किसी इजरायली और गाजा वाली के बीच प्रेम पनप सकता है, फल फूल सकता है. और हाँ, वह शादी तक भी पंहुच सकता है. 


सो साहिबान, विधर्मियों का प्रेम में पड़ जाना गैरकानूनी नहीं है। धर्मपरिवर्तन के ही नहीं, जनसँख्या के आंकड़े भी बताते हैं कि ईसाई और पारसी आबादी में अलग वजहों से आने वाली गिरावट छोड़ दें तो धार्मिक जनसांख्यिकी तीन दशकों से एक ही जगह टिकी हुई है. यह भी कर्नाटक में भाजपा की सरकार रहने के बावजूद लव जिहाद का कोई मामला साबित नहीं किया जा सकता था. बात साफ़, कि बालिग़ लोगों को प्रेम और विवाह दोनों करने का हक है और उनकी इस आजादी पर हमला करने वाले लोगों को सजा मिलनी चाहिए. जबरन धर्म परिवर्तन एक अलग मुद्दा है, अपराध है और वह करने वालों को उसकी सजा मिलनी चाहिए.

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