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July 09, 2014

आपराधिक हो गयी न्याय व्यवस्था कैसे रोकेगी यौन हिंसा?

[इंडियन इरा के जुलाई अंक में प्रकाशित]
फरजाना इकबाल की (अ)सम्मान हत्या लाहौर हाईकोर्ट के सामने न होकर किसी गाँव में या किसी और चौराहे पर होती तो आप मुझसे मिलने आतीं? फरजाना के पति के पत्रकार मेहरीन जेहरा-मलिक से पूछे गए इस सवाल के जवाब में सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में यौन हिंसा के अनवरत चलते रहने के कारणों के सूत्र मिलते हैं. यूं कि फरजाना बीते बरस पाकिस्तान में अपनी मर्जी से शादी करने का ख्वाब देखने के जुर्म में क़त्ल कर दी गयी कुल 869 महिलाओं में से एक हैं, बस एक. उनमें से ज्यादातर के पास कोई पत्रकार नहीं पंहुचा, उनके नाम मीडिया चैनलों की गरमागरम चर्चाओं में नहीं लिए गए. वे तो बस अपराध के आंकड़ों को दर्ज करने वाली किताबों के पीले होने को अभिशापित पन्नों पर एक और नाम बन कर रह गयीं.

ठीक वैसे जैसे उनकी हिन्दुस्तानी बहनें हो जाती हैं. कभी किसी बदायूं में सामूहिक बलात्कार के बाद पेड़ों पर लटके मिलना, कभी हरियाणा के किसी गाँव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिले सुरक्षाकर्मी के सामने अपने ही परिवार वालों के हाथ पति समेत क़त्ल हो जाना तो कभी आसाम में एक पागल हो गयी भीड़ के द्वारा लाइव टेलीविजन पर निर्वस्त्र कर दिए जाना, उनकी नियति में सुरक्षा का चुनाव नहीं किसी तरह हिंसा से बच निकलना भर होता है. ऐसा भी नहीं कि यह हिंसा केवल गरीब या पिछड़े तबकों की महिलाओं पर होती है. भले ही मुद्दा केवल मध्य या उच्चवर्गीय महिलाओं पर हुई हिंसा बन पाती हो, शिकार हर वर्ग की महिलायें होती हैं.

फिर सवाल बनता है कि तालिबानी ताकतों के उभार की वजह से बर्बरता की तरफ लौटता पाकिस्तान हो या फिर ‘लोकतान्त्रिक’ भारत, दोनों में यौन हिंसा के अपने सबसे गलीज रूपों में भी लगातार चलते रहने के पीछे क्या वजहें हो सकती हैं? आखिर भारत में तो महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनों की कमी नहीं है. जवाब सादा भी है और आसान भी. पहला यह कि यह यौनहिंसा का सैद्धांतिक स्रोत भले ही पितृसत्ता हो, सभी पितृसत्तातमक समाजों में यौनहिंसा न इतने व्यापक रूप में मौजूद है न इतने हिंस्र में. कोई भूले से भी यह दावा कर सकता है कि पश्चिमी समाज हमसे कम पितृसत्तातमक हैं? पर फिर क्या कोई भूले से यह भी कह सकता है कि वे आज अपनी स्त्रियों पर ऐसी हिंसा करते हैं या करने की सोच भी सकते हैं?

उनमें और हममें फर्क बस यह है कि उनकी आपराधिक न्याय व्यवस्था यौनहिंसा को केवल गैरकानूनी नहीं बनाती बल्कि यौनहिंसा की स्थिति में पीड़ित को न्याय भी देती है और अपराधियों को सजा भी. ठीक उलटे, हमारे यहाँ पाकिस्तान जैसे देशों में या तो हुदूद आर्डिनेंस जैसे क़ानून खुद ही स्त्रीविरोधी हैं या भारत जैसे देशों में जहाँ क़ानून चाहे प्रगतिशील हों, उन्हें लागू करवाने वाली संस्थाएं या तो हैं ही नहीं या फिर पूरी तरह भ्रष्ट और असक्षम हैं. क़ानून जितने भी कड़े हों, अगर उनके अनुपालन के लिए जिम्मेदार पुलिस भ्रष्ट हो, अपराधियों से घूस खाकर मिल जाती हो तो पीड़ित जायेंगे भी कहाँ? फिर पीड़ित जिद्दी ही हों और लड़भिड़कर अदालत तक पंहुच भी जाएँ और अदालतें भी भ्रष्ट निकलें तो? ध्यान रखा जाय कि यह कोई अभिकल्पना नहीं बल्कि भारत के मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा कमसेकम निचली अदालतों के बारे में स्वीकारा हुआ तथ्य है और उच्च न्यायपालिका के खिलाफ गंभीर आरोप.

इन सबके बावजूद कोई जान पर खेल कर लड़ने को आमादा हो ही तो स्थानीय रूप से ताकतवर अपराधियों से लेकर खाप पंचायत जैसी संविधानेतर शक्तियों तक सारी व्यवस्था ही न्याय नहीं अन्याय के पक्ष में खड़ी मिलती है. इस कदर कि बाद में मध्यवर्गीय गुस्से के विस्फोट के चलते सजा पाने वाले जेसिका लाल जैसे साफ़ मामले में भी अपराधी अदालत से एक बार तो बच ही निकलते हैं. बाकी कभी कभी हुक्मरानों को मजबूर कर न्याय हासिल कर पाने वाले मध्यवर्गीय गुस्से की एक बड़ी दिक्कत है. यह कि या तो वह अपने वर्ग के शिकार हो जाने पर फटता है या फरजाना, बदायूं या दिल्ली बस गैंगरेप जैसे अतिवीभत्स मामलों पर. दिल्ली बम्बई जैसे महानगरों की बात हो, टीवी स्टूडियो सुविधाजनक पंहुच के दायरे में हों और आरोपी खुद को नुकसान पंहुचा सकने में सक्षम अपने इलाकों के ताकतवर न हों तो एक बार जाएँ भी, न हों तो इस मध्यवर्गीय गुस्से को न महाराष्ट्र के भंडारा जाने की फुर्सत मिलती है न हरियाणा के भगाणा.

फिर रास्ते कहाँ हैं? रास्ते न तो और कड़े कानून बनाने में हैं न बलात्कारियों को मौत की सजा देने में. यौनहिंसा के मामलों में दोषसिद्धि प्रतिशत 24 रहेगा तो फिर कानून जो बना लें, मतलब यही होगा कि वह काम नहीं कर रहे. रास्ता सिर्फ एक है, गवाहों की सुरक्षा से लेकर त्वरित न्याय तक आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़े सुधार कर अभी मौजूद क़ानूनों को लागू करवाने का. यह नहीं किया तो हम कभी कभी दुखी होते रह अपनी न्यायप्रियता पर खुश हो भी सकते हैं

1 comment :

  1. पहले बलात्कार होने पर पीड़िता और उसके परिवार वाले उसे छिपाते थे। जब से उनमें इस अत्याचार के विरुद्ध खड़े होकर उसे उजागर करने की हिम्मत आई है तब से बलात्कार के बाद उनकी हत्याएँ बढ़ती ही जा रही हैं। पूरा माहौल बड़ा वीभत्स है, समर।

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