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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

July 02, 2014

बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था

[दैनिक प्रभात खबर में 02-07-2014 को प्रकाशित

सबसे पहले आंकड़ों की बात करते हैं. भारत के पिछले आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया था कि देश ने  स्वास्थ्य  व्यय पर पिछले साल से 13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है पर हम अब भी दुनिया भर में सकल घरेलू उत्पाद का सबसे कम स्वास्थय पर खर्चा करने वाले देशों में से हैं. इस कदर की इस मामले में हम नाइजीरिया से ही नहीं, 175 सर्वेक्षित देशों में से 171 से पीछे हैं. इस बात का अपने आप में कोई महत्व न  होता अगर हम सब सहारन देशों में एक होते। पर फिर हमारी इच्छाएं तो विश्व की महाशक्ति बनने की हैं. दूसरे शब्दों में हम विजन इंडिया 2020 जैसे भ्रम भी पाल के बैठे हैं जिनके तहत हमारे सपने बहुत बड़ेहैं और उन पर मेहनत करने के हमारे कदम बहुत छोटे।

इसको सैद्धांतिक भाषा में कहें तो दुनिया के सारे देशों में  स्वास्थ्य  सेवाओं और खर्चों दोनों को तीन ही रूप में समझा जाता है. पहला यह कि उनको नवउदारवादी और नव रूढ़िवादी देशों में एक उत्पाद माना जाता है कि लोग उनपर खर्च करें और उन्हें खरीद लें. इस तरह कि लोग संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह मेडिक्लेम जैसी इन्स्योरेंस योजनाओं के तहत पहले से तैयार रहें और किसी बीमारी की स्तिथि में उन्हें खरीद लें. पर जैसे कि अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस मामले पर नीति ने दिखाया है कि न ज्यादातर गरीब लोग इस बात पर सक्षम होते हैं न तैयार।

स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दूसरा सिद्धांत है लोककल्याणकारी राज्यों यानी मोटा मोटा कीन्सियन अर्थव्यवस्था पालन करने वाली देशों का, यह देश स्वास्थ्य सेवाओं को अन्य पूंजीवादी उत्पादों की तरहउत्पाद नहीं वरन एक निवेश मानते हैं. निवेश इन अर्थों में कि किसी भी देश के लिए स्वस्थ और सजग नागरिक सिर्फ नागरिक नहीं बल्कि बौद्धिक से लेकर शारीरिक श्रम करने को तत्पर समूह भी होते हैं सो उनके स्वास्थ्य पर खर्च राज्य का दायित्व ही नहीं बल्कि राज्य का निवेश भी होता है. स्वस्थ नागरिक मतलब देश के लिए बेहतर स्वस्थ कार्मिक और इसीलिए वह राज्य  स्वास्थ्य  सेवाओं को सहज औरनागरिको की पंहुच में रखने का प्रयास करते हैं. ऐसे राज्यों में सबसे प्रमुख स्कैण्डिनेवियन राज्य नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फिनलैंड प्रमुख हैं.

 स्वास्थ्य  सेवाओं के बारे में तीसरा सैद्धांतिक नजरिया मार्क्सवादी देशों का है जो उन्हें उत्पाद या निवेश नहीं बल्कि अधिकार मानते हैं. अफ़सोस यह कि ऐसे देशों में चीन जैसा घोषित मार्क्स-माओवादी देशभले न शामिल हो क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देश जरुर शामिल हैं. यह देश यह मानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएँ नागरिकों का अधिकार हैं और उन्हें मिलनी ही चाहिए फिर वह इसका मोल चुका पाने में सक्षम होंया न हों.

फिर से आंकड़ों की भाषा में इसी बात को देखें तो यह साफ होगा कि इन देशों के राष्ट्रीय बजट का एक बड़ा हिस्सा यहीं खर्च या नहीं खर्च होता है. नार्वे अपने बजट का लगभग 18 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पेखर्च करता है, उसके बगल का स्वीडेन लगभग 14 प्रतिशत इसी व्यय ने खर्च करता है. ठीक इस के बरक्स क्यूबा जैसे देश अपने बजट का सिर्फ 9 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं पर उनके स्वास्थ्य सूचकांक इन देशों के मुकाबले में पीछे नहीं बल्कि आगे खड़े होते हैं?

ऐसा क्यों है यह पूछने के पहले मगर इस सूची में भारत कहाँ है यह पूछना जरुरी है? इन देशों के मुकाबले भारत अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद का 1 से 3 प्रतिशत तक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता रहाहै. वह भी उन स्तिथियों में जब इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य कर्मियों के वेतन से लेकर सरकारी संस्थानों को बनाये रखने की लागतों में जाता रहा है. इसका अर्थ यह हुआ कि भारत दुनिया मेंस्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से है. उन देशों में से जिसने 2009 से 2012 तक अपने जीडीपी का 3.9, 3.7, 3.9, 4.0 प्रतिशत ही अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया है.इनका भी एक बड़ा हिस्सा चूंकि वेतन और संस्थानों के बनाये रखने के खर्चों में चला जाता है सो असली खर्च इसके भी बहुत कम प्रतिशत में हुआ. 

इसको जेएनयू की प्राध्यापिका डॉ रितुप्रिया के हवाले से लिखें तो मतलब यह आएगा कि दुनिया भर में अपने बजट का 15 प्रतिशत तक स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे देशों के बरक्स अपना देश बस 5 प्रतिशत के अंदर सिमट के रह जाता है.इसको और भी व्याख्यायित करें तो मसला और भी दुष्कर निकलता है. डॉ रितुप्रिया के ही अध्ययनों के मुताबिक जहाँ और देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का 5 से 10 प्रतिशत तकस्वास्थ्य पर खर्चते हैं वही भारत के लिए यह व्यय 10वीं (2002-2007) पंचवर्षीय योजना में 0.9 प्रतिशत था और 11वीं (2007-2012) पंचवर्षीय योजना में यह 1.04 प्रतिशत तकपंहुचा था. इसको और शब्दों में कहें तो यह व्यय प्रति भारतीय नागरिक 200 रुपयों तक आएगा, मतलब उतना जितना हम सरदर्द की दवा खरीदने में खर्च कर सकते हैं.

अब सवाल यह कि इन सब आंकड़ों का मतलब क्या है? इन का पहला मतलब यह है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओ पर हम दुनिया में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में हैं. और इस बात का मतलब यह कि अपनी जेब से इन्ही सेवाओं पर खर्चा करने वालोंमें हम बहुत आगे हैं. तमाम देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि स्वास्थ्य सम्बंधित आकस्मिक घटनाओं पर हुए खर्चे वर्तमान समय में कर्ज-गुलामगीरी का दुष्चक्र शुरू करने में सबसे आगे हैं और अफ़सोस यह कि मेरे अपने निजी अनुभव यही पुष्ट करतेहैं. सो सवाल उठता है कि रास्ते क्या हैं? पहला यह कि सरकार अपने व्यय व्याख्यायित करे और उन्हें न्यायोचित ठहराए। अब तक के अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि आकस्मिक स्वास्थ्य समस्यायों केचलते हर साल 4 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी की गर्त में चले जाते हैं और यह हमारे निजी अनुभओं से भी ठीक मालूम होता है.

होता यह है कि स्वास्थ्य संबंधी आकस्मिक घटनाओं में व्यक्ति आसपास के लोगों से, और उससे भी ज्यादा सूदखोरों से, कर्ज लेता है और यह कर्ज अपनी अति ब्याज के चलते बड़ा होता जाता है. अफ़सोस यह कि यह स्वास्थ्य आकस्मिक घटनाएँ बड़ीघटनाएँ नहीं बल्कि गर्भावस्था जैसी सामान्य घटनाओं से भी जुड़ी होती हैं. सो अब सवाल उठता है कि सरकार को करना क्या चाहिये? कायदे से कहें तो इसी सवाल में सारे जवाब छिपे हुए हैं. भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था मेंअब तक जोर लाइफस्टाइल डिजीजेज कही जाने वाली उन बीमारियों पर रहा है जो समाज के अगड़े तबके को प्रभावित करती हैं. सरकार ने अब तक देश की असली अस्वास्थ्यकर परिस्थितयों के बारे मेंसोचा ही नहीं। सो बावजूद इस बाद के कि देश में सबसे बड़ी हत्यारी बीमारी ट्यूबरकुलोसिस के बारे में 70 प्रतिशत खोज दर के दावों के बीच भी यह बीमारी घटती नहीं, बढती ही जाती है.

सो सवाल है कि सरकार को करना क्या चाहिए? जवाब यह कि सरकार को सबसे पहले लाइफस्टाइल बीमारियों की अपनी परिभाषा को दुरुस्त कर उनके भीतर कैंसर और रक्तचाप जैसी उच्चवर्गीय बीमारियों के साथ निम्नवर्गीय 'लाइफस्टाइल' बीमारियों कोभी लाना चाहिए। जरुरी यह भी है कि मसला आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एम्स) जैसे तृतीयक निदान के संस्थान बनाने का नहीं बल्कि प्राथमिक रोकथाम पर जोर देने का है. सिर्फ एक उदाहरण दें तो डेंगू जैसी बिमारी दिल्ली में हमला करनेके एक साल के अंदर संभाल ली जाती है जबकि ऐसी ही बीमारी जापानी बुखार और एक्यूट इंसेफ़्लाइटिस हर साल देश उत्तर प्रदेश और बिहार में हाजरों बच्चों का क़त्ल कर देती है.

अंततः बस यह कि भारत सरकार बस क्यूबा की तरह प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केन्द्रित कर चीजें बेहतर कर सकती है. यहाँ मृत्यु दर से लेकर आकस्मिक घटनाओं की पूरी मार ऐसी ही दरों पर केन्द्रित है, कैंसर और कार्डियोवास्कुलर बीमारियोंपर नहीं। सो अगर ध्यान उधर रहेगा तो देश वहीं अटका रहेगा, भारत की बहुसंख्यक जनता के रोग ठीक करने पर नहीं आएगा.

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