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July 11, 2014

बजट 2014: फिर ठगा गया सामाजिक क्षेत्र



बात एक उदाहरण से शुरू करें. एनडीए सरकार ने इस साल 500 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे चार और शीर्ष संस्थान खोलने का फैसला किया है. उससे भी बेहतर यह कि यह संस्थान मस्तिष्क ज्वर जैसी बीमारी से हर साल हजारों बच्चों की मौत देखने वाले पूर्वांचल, भुखमरी से तबाह विदर्भ, सबसे गरीब राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल और बुनकरों की बदहाली के साथ कृषि संकट झेल रहे आंध्र प्रदेश में बनेंगे. पर फिर, इन सारे इलाकों की प्रमुख स्वास्थ्य समस्यायें लाइफस्टाइल डिजीजेज के रूप में जाने जानी वाली कार्डियोवैस्कुलर (ह्रदय सम्बन्धी), रक्तचाप आदि नहीं बल्कि टीबी और आंत्रशोध जैसी पावर्टी पैनारोमा (गरीबी परिदृश्य) से उपजने वाली वह बीमारियाँ हैं जो अक्सर पीने का साफ़ पानी न होने या सफाई की कमी से होती हैं. उनसे निपटने के लिए एक कारगर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और सफाई और साफ़ जल की जरूरत है.

बजट में प्राथमिक चिकित्सा पर कुछ न कहने की बात छोड़ भी दें तो पीने के साफ़ पानी के किये 2013-14 में आवंटित 11000 करोड़ रुपयों के बरक्स सिर्फ 3600 करोड़ की व्यवस्था की गयी है. यह धनराशि भी आर्सेनिक, फ्लुरोइड और अन्य जहरीले पदार्थों से प्रदूषित पानी वाली 20000 बसावटों जगहों को पहचान कर तीन साल में खर्च की जायेगी. 2013-14 के बजट में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को उसके पहले के वित्तीय वर्ष के 13000 करोड़ रुपये से बढ़ कर 15260 करोड़ का आवंटन मिला था. इस साल की राशि की अभी घोषणा न करते हुए सरकार ने स्वस्थ भारत अभियान के तहत 2019 तक सभी घरों को पूरी  सफाई सुविधा सुनिश्चित करने का इरादा भर दिखाया है उसके लिए किसी विशिष्ट कार्यक्रम/नीति या आवंटन की घोषणा नहीं की है.

इसी तरह सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भी सर्व शिक्षा अभियान के तहत 28635 करोड़ रुपये, माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिए 4966 करोड़ रूपये का आवंटन करते हुए भी माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा के में जरुरी सुधार के लिए कोई नयी सोच नहीं दिखाई है. दिलचस्प यह कि भारत में कुपोषण की व्यापकता को लेकर पिछली यूपीए सरकार को लगातार घेरते रहने के बावजूद इस सरकार ने अपने पहले बजट में इस मुद्दे की पूरी तरह से अनदेखी ही कर दी है. यह कहने के बावजूद कि कुपोषण के उन्मूलन के लिए वर्तमान हस्तक्षेप काफी नहीं हैं और इसके लिए युद्ध स्तर पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू किये जाने की जरुरत है, सरकार ने यह काम छह महीने में योजना बनाने के लिए मुल्तवी कर दिया है. सरकार का यही लचीला रवैया खाद्य सुरक्षा को लेकर भी है. फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया के पुनर्गठन, परिवहन और वितरण में होने वाले नुकसानों को कम करने, जन वितरण प्रणाली की प्रभाविता बढाने के दावे छोड़ दें तो सरकार ने यह बताया नहीं है कि यह होगा कैसे. ठीक इसी तरह जैसे सरकार ने कृषि उपज में कमी होने की स्तिथि में सार्वजनिक बिक्री कर कीमतें काबू में रखने का वादा तो किया है पर वह यह करेगी कैसे उस पर कुछ नहीं कहा.

सरकार की औद्योगिक क्षेत्र की कार्ययोजनाएं देखें तो साफ होता है कि सामाजिक क्षेत्र के लिए यह ढीलापन किसी चूक का नतीजा नहीं बल्कि उसकी प्राथमिकताओं का प्रतिबिम्बन है. एक तरफ यह सरकार साफ़ पानी उपलब्ध कराने जैसी कार्ययोजना को तीन सालों तक टालती है, कुपोषण पर 6 महीने में नीति बनाने की बात करती है. दूसरी तरफ वही ई-बिज को आसान बनाने के लिए इससे जुड़े सभी विभागों के सहयोग से व्यापार और निवेश सम्बन्धी सभी अनुमतियाँ देने के लिए इकलौते पोर्टल को इसी साल 31 दिसंबर तक चालू कर देने के लिए कटिबद्द है.

सरकार का यह रवैया अन्य समाज कल्याणकारी नीतियों और योजनाओं को लेकर भी दिखता है. इस सरकार ने अनुसूचित जाति के युवा उद्यमियों को नयी शुरुआत करने के लिए 200 करोड़ रूपये का अनुदान आवंटित किया है. आदिवासियों के लिए बनायी गयी ‘वन बंधु कल्याण योजना’ में अनुदान उसका भी आधा माने 100 करोड़ है. इसकी तुलना मूर्तियों के लिए आवंटित हजार करोड़ रूपयों से की जा सकती है. पर इसकी तुलना सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए आवंटित 10000 करोड़ रुपये की राशि से की जाय तो सरकार की प्राथमिकतायें वंचित और शोषित समुदायों का उपहास करने में तब्दील होती हुई सी दिखने लगती हैं.  


हालांकि इस बजट में यह कोई नयी शुरुआत नहीं है. सामाजिक आन्दोलनों के दबाव में शुरू की गयी महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और अंतिम दौर में लाये गए खाद्य सुरक्षा विधेयक को छोड़ दें तो बरस दर बरस यूपीए सरकार के बजट भी अमूमन ऐसे ही रहे थे. इस बार बदला सिर्फ यह है कि सरकार ने यह स्वीकार लिया है कि 900 से ज्यादा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप योजनाओं के साथ वह विश्व में निजी और सरकारी क्षेत्रों की भागेदारी में पहले स्थान पर है. इस स्वीकार में एक और स्वीकार जुड़ा हुआ है. यह कि यहाँ सरकार सामाजिक मोर्चे पर न ध्यान दे रही है न ही उसमें सक्षम है. कारण यह कि निजी क्षेत्र कभी भी गैर मुनाफे वाले क्षेत्र में निवेश नहीं करता और अगर सरकार का पूरा ध्यान उधर ही केन्द्रित है तो निश्चित है कि लोक कल्याणकारी योजनायें कहीं पीछे छूट जायेंगी. 

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