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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

July 26, 2014

पार्टी बुलेटिन वाले पहाड़ में

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 26 जुलाई 2014 को प्रकाशित] 


पहाड़ खोद उग आये उस छोटे से गाँव को देख जो सुकून मिला था उसे शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता. रारा झील से गमगढ़ी के हाड़ तोड़ देने वाले घंटों लम्बे ट्रेक में यह पहली और आखिरी जगह थी जहाँ थोड़ा सा आराम और ज्यादा सा खाना मिलना था. सो मिला भी, बस हुआ यह कि चारपाई देख लम्बे हो गए मुझ को जगाये जाने के बाद. खाना भी तो क्या, भुने आलू, नमक मिर्च और पनीली सी दाल. यहाँ सब लोग हमेशा यही खाते हैं, मैंने रेस्टोरेंट चलाने वाले दंपत्ति से पूछा था. नहीं, हम लोग तो मांस भी खाते हैं न. बताया कि आप शाकाहारी हैं इसलिए. उस दिन समझ आया था कि शाकाहार को नैतिक सिद्धांत मानने वाले कितने गलत हैं. ऐसी जगहों में जहाँ कुछ पैदा ही न होता हो लोग खाएं भी तो क्या? उनकी पोषक तत्वों की जरूरत कहाँ से पूरी होगी? उस पनीली दाल से जिससे प्रोटीन ढूंढना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा भी लगा था.

नजर ऊपर गयी तो दिखा कि नूडल्स और शराब वहाँ भी मौजूद थी. यह नेपाल की खासियत है, उन सुदूर और निर्जन स्थानों पर जहाँ ऑक्सीजन तक कम पड़ने लगे वहां भी शराब मिल ही जाती है. वह भी स्थानीय नहीं बल्कि देशी विदेशी हर किस्म की शराब. यहाँ पीता कौन है, लाते कहाँ से हैं पूछने पर दोनों बुजुर्ग मुस्कुरा भर दिए थे. पीते तो सब हैं, न पियें तो इतनी सर्दी में जिन्दा कैसे रहेंगे? बाकी विदेशी आप जैसे ट्रेक वाले पर्यटकों के लिए है, यहाँ वाले सस्ती ही पीते हैं. इतने पर्यटक आ जाते हैं यहाँ? हाँ, आते ही रहते हैं, मार्च से अक्टूबर तक. उसके बाद? फिर हम लोग मेंढक हो जाते हैं, सो जाते हैं. इस बार ठहाका समवेत था. गाँव के कुछ और लोग भी हमारी तरफ बढ़ आये थे.

इंडियन? इंडियन लोग बहुत अच्छे होते हैं, सरकार बहुत ख़राब है, मेरे हाँ कहने पर जवाब आया था. क्यों? क्योंकि विस्तारवादी होते हैं. हमारी सरकार पर दबाव डालते हैं. आप सबको यह सब पता कैसे चलता है? अखबार आता है यहाँ? नहीं, पार्टी बुलेटिन आता है. मैं फिर चौंका था. पार्टी बुलेटिन? हाँ हमलोग एमाले के हैं. एमाले माने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट एकीकृत. यह कामरेड बम थे. और पार्टियाँ भी हैं इस गाँव में? है न, साझा जवाब आया था. ये एनसी (नेपाली कांग्रेस), वो माओवादी वैद्य और कुछ और उँगलियों ने कुछ और इशारे भी किये थे. ये जो एनसी है न, आपके यहाँ का कांग्रेस है. हर गाँव में एक आदमी तो मिल ही जाता है, पता नहीं कब तक लड़ाई की कीमत खाते रहेंगे. पर आपके यहाँ इनकी खाली की जगह प्रगतिशील ताकतों ने भरी है, हमारे यहाँ दक्षिणपंथी भर रहे हैं. मन उदास हो आया था. फिर याद आया कि नेपाल में और कुछ हो न हो, राजनैतिक चेतना दुर्धर्ष है. काठमांडू में रेस्टोरेंट्स वर्कर्स यूनियन से लेकर क्रांतिकारी हिंदूवादी पार्टी तक दोनों ध्रुव देख ही आया था.

अरे हाँ, शराब आती कैसे है? मैंने फिर पूछा था. थोड़ी हवाई जहाज से, थोड़ी नीचे जुमला से. खच्चर पर भी कंधे पर भी. लोग तो आते जाते रहते हैं न, कुछ भी जरूरत पड़ने पर. और बीमार हो गए तो? तो गमगढ़ी में अस्पताल है, वहाँ चले जाते हैं. बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं तक से मरहूम होने के बावजूद यह लोग कितने खुश थे, संतुष्ट भी. प्रकृति के साथ रहने का अपना अलग ही मजा है शायद. और हाँ, पढ़ते कहाँ हैं, फिर से सवाल उभरा था. जानके राहत मिली थी कि गाँव में एक स्कूल था. युवराज भाई फिर से कोहनी मार रहे थे, सफ़र अभी आधे से ज्यादा बाकी था और मेरी गति बहुत ख़राब. सबसे विदा ले हम फिर चल पड़ने को थे ही कि एक ब्रिटिश युवती हमारे बीच आ पंहुची थी. छह फुटा कद और उसपर टंगा चार फीट लम्बा और दो फीट चौड़ा रकसैक. मैं कुछ खा सकती हूँ, हुजूर. पसीने से लथपथ चेहरे पर पानी छिडकते हुए उसने पूछा था. हुजूर नेपाल में सम्मान प्रदर्शित करने का सामान्य शब्द ही नहीं, वार्तालाप का मूल आधार भी है. किसी को फोन करिए, हेलो नहीं हुजूर सुनाई पड़ेगा. पर यहाँ इस अजनबी लड़की के मुंह से यह सुनकर बहुत अच्छा लगा था. किसी को भी सम्मान देने की परम्परा हम कब सीख पायेंगे? फंस जाने की स्तिथि में ऐसे ही किसी गाँव की किसी दुकान पर कुछ खरीदने के लिए उतरते लोगों से ऐसे सम्मानजनक संबोधन की कल्पना की, हो ही नहीं सकी.

फिर उस लड़की से बातें शुरू हो गयीं. यहाँ अकेले ट्रेकिंग करते हुए डर नहीं लगता. नहीं, नेपालियों से अच्छे लोग कहीं नहीं होते, कोई खतरा नहीं है. इस बार फिर अपने वतन हिंदुस्तान में लड़कियों के ऐसे अकेले ट्रेक पर निकल पड़ने की कल्पना करने की कोशिश की, वह भी नहीं हुई.


July 15, 2014

पराजय का सम्मोहन

[जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे स्तम्भ में 15-07-2014 को प्रकशित.]


मैदान में लगभग उन्मादमय उल्लास में डूबे जर्मन खिलाड़ियों को छोड़ मेरी आँखें मेसी पर टिकी हुई थीं. उस मेसी पर जो अपन देशवासियों ही नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार अकेले अपने कंधे पर लिए अर्जेंटीना की टीम को फीफा विश्वकप फाइनल तक खींच लाया था. यूं भी सेमीफाइनल में इसी जर्मनी से ब्राजील के मैच की स्मृतियाँ जेहन में अभी ताजा थीं. वह स्मृतियाँ जिनमें स्तब्ध दर्शक हैं, बरसती आँखें हैं, मिनटों में हो गए चार गोलों के बाद स्टेडियम भर में पसर गया सन्नाटा है. उन स्मृतियों में जिनमे हार के बाद तीन फफकते ब्राजीली खिलाड़ी हैं और उनको सांत्वना देता हुआ एक जर्मन हाथ है.

उन स्मृतियों में जिनमे हजारों भीगी आँखें ने फिर बताया कि देश की जर्सी अब भी आम लोगों के लिए कितनी बड़ी होती है. यह भी कि सिर्फ चार शताब्दी पहले तक गैरमौजूद यह राष्ट्रराज्य भले ही सच में सिर्फ कल्पित समुदाय हों, भले ही मजदूरों का कोई स्वदेश न होना तल्ख़ सच हो, फिलहाल दिल और दिमाग दोनों पर उन्हीं का कब्ज़ा है. पर बात उस दिन की थी जिसमे उस जर्मन की आँखें दुनिया की सबसे ईमानदार आँखें सी लगीं थी. ऐसे जैसे उस एक क्षण में उसे अपने जीत जाने का अफ़सोस हुआ हो, जैसे उसे सच में लगा हो कि काश यही लोग जीत जाते.

पर वह एक जीते हुए खिलाड़ी का औदात्य था और मुझे पराजय हमेशा से ही जीत से ज्यादा चमत्कृत करती रही है. सिर्फ इसलिए नहीं कि जीत का हासिल समारोही रातें होतीं हैं और हार की उदास सुबहें. इसलिए भी नहीं की हार व्यक्ति, टीम या देश को और प्रतिबद्ध बना सकती है, और ताकत से जीत हासिल करने की कोशिशों में मुब्तिला कर सकती है. हार का सम्मोहन बस उसके होने के क्षण में होता है. शायद इसलिए कि हार का क्षण शायद जीवन का सबसे ईमानदार क्षण होता है. वह क्षण जब व्यक्ति अपनी सारी ताकत गंवा बिलकुल अकेला, कमजोर और सुभेद्य होता है. बाहर वाला कोई नहीं जान सकता कि पराजित योद्धा के मन में ठीक उस वक़्त क्या चल रहा होगा. 

पर आत्मसाक्षात्कार का वही पल महानता और सामान्यता का फर्क भी साफ़ कर देता है. मैं मेसी की आँखों में तिरते भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था और दिमाग में कुछ और हारें चल रही थीं. कामरेड चेगुआरा की हार याद आई थी जब दो देशों में असफल और एक में सफल क्रांति का नेतृत्व करने के बाद चौथे बोलीविया में उन्हें सीआईए के साथ स्थानीय फ़ौज ने घेर लिया था. क्या होता अगर चे ने ‘गोली दागो कायर, तुम सिर्फ एक व्यक्ति को मार सकते हो’ कहने की जगह समर्पण या समझौते की बात की होती? फिर चे दुनिया भर में प्रतिरोध का प्रतीक ही नहीं, मिथक भी बन पाते?

हार से मुझे 1993 में वेनेजुएला में अपनी पहली क्रांति की कोशिश के असफल हो तख्तापलट में बदल जाने के बाद के ह्यूगो चावेज याद आते है. वह चावेज जिन्होंने अपने साथियों की जान बचाने के लिए उन्हें हथियार रखने का सन्देश देने के पहले अपनी वर्दी पहनी थी. वह जिन्होंने तब भी अपने मोर्चों पर लड़ रहे बहादुर बोलिवारियन सैनिकों को कहा था कि ‘कामरेड्स: दुर्भाग्य से हमअभी के लिएअपने उद्धेश्यों को पूरा कर पाने में असफल रहे हैं... दुश्मनों की कैद में उस सुबह चावेज़ के पास कुल 72 सेकण्ड थे. और उन बहत्तर सेकण्ड में उन्होंने हार की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए भी साफ़ कर दिया था कि क्रांति रुक नहीं रही, सिर्फ स्थगित की जा रही है, वह भी बस ‘अभी के लिए’. चेगुआरा वाला सवाल दोहराने की शायद जरुरत भी नहीं है.

इसके ठीक उलट सद्दाम हुसैन और मुअम्मर गद्दाफी की हार के क्षण याद करिए. जीवन भर विरोधियों का निरंकुश दमन करने के बाद एक ने शांति से समर्पण कर दिया था जबकि दूसरे ने तो अपनी जान की भीख भी मांगी थी. कहने की जरूरत नहीं कि राजनैतिक विचार के परे सिर्फ उस क्षण के आधार पर हम उन्हें कैसे याद करते हैं. इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हार अंतिम होती है. समर्पण करने वाले सद्दाम से फांसी के वक़्त वाला खुद को निडरता से ईराक़ का राष्ट्रपति बताने वाला सद्दाम हुसैन बेशक बिलकुल अलग नजर आये पर फिर इस विमोचन तक आने का रास्ता पहले कभी झुक गए होने की ही तरफ इशारा करता है.

मेसी पे लौटें तो, भले ही देश की जर्सी और देश की वर्दी एक ही जैसा उन्माद खड़ा करते हों, मैं फुटबाल को युद्धों के बरक्स नहीं खड़ा कर रहा. बस यह कह रहा हूँ कि हारे हुए मेसी की आँखों में तिरते भाव पढ़ने की मेरी असफल कोशिश में ही मेसी की जीत है. और सिर्फ एक बार बाल संवारने की मुद्रा में उठे हाथों के अलावा दुखी पर धैर्यवान खड़े रहने में यह की जीतना अच्छा है पर गरिमामयी हार में भी अपनी एक अमरता है. आखिर ऊँचे खड़े खंडहर किसी दौर के गौरव की कथा कहते ही हैं. हम याद रखेंगे मेसी को, यही इस हार की जीत है. 

July 12, 2014

माओवादी पहाड़ों में

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 12-07-14 को प्रकाशित]

ताल्चा एअरपोर्ट से सीधे उठते रास्ते को देख नजरें एक बार फिर थर्राई थीं. ट्रेकिंग और हाइकिंग दोनों बहुत की पर यह तो सचमुच का पर्वतारोहण ठहरा, अबकी बार अशोक भाई और युवराज कोइराला, दोनों स्थानीय साथियों ने पीठ थपथपा दी थी. रारा के रास्ते का पहला घंटा तो बस यूं ही निकल गया, यह सोचते हुए कि इन पहाड़ों और मुझमे ज्यादा स्तब्ध कौन है. थोड़ा और आगे बढ़ने के बाद दूर तक पसरा घास का मैदान दिखा. और उसमे दिखे बकरियां चरा रहे दो बच्चे, यह इतनी देर में पहली मानवीय उपस्थिति से मुठभेड़ थी. उनमें बड़ी बिंदु से पूछा गाँव कहाँ है क्योंकि यहाँ तो कुछ नजर नहीं आ रहा. उसकी उँगलियों के इशारों तक जा रही निगाहें फिर थर्राई थीं, इतनी दूर से आते हो? हाँ. क्यों? क्योंकि घास यहीं है. रोज आते हो? हाँ. पढ़ते हो? नहीं? क्यों? क्योंकि स्कूल नहीं है. इसके बाद तो फिर कहता ही क्या.

खैर, रास्ता लम्बा था और अनुभव कम तो फिर आगे बढ़ चले. दूर तक कहीं न जा रहे रास्ते पर तीन लोग, कुछ हो जाय तो मदद भी न मिले का खयाल बड़ी मुश्किल से झटका था. पर ये अचानक से एक घुड़सवार बगल से कहाँ से निकल गया था? चौंकी आँखों ने पीछा किया तो दिखा कि घुड़सवार ही नहीं बल्कि उस कहीं नहीं सी जगह में एक पूरी आबादी ही उग आयी थी. यह नेपाल सेना का एक कैम्प था. ताल्चा एअरपोर्ट को माओवादियों की जद स दूर रखने के लिए बनाया गया वह कैम्प जिसने गृहयुद्ध के समय कई हमले झेले थे. खैर, अभी तो गृहयुद्ध ख़त्म हुए अरसा हुआ तो अपनी तरफ सिपाहियों की चौकन्नी नज़रों के सिवा कोई सवाल तक न उछला था. हाँ, अपने मन में जरुर आया था कि इस अनजान सी जगह से लेकर सियाचिन जैसी दुरूह जगहों पर जहाँ और कुछ नहीं उगता ये फौजी कैम्प कैसे उग आते हैं? उन जगहों पर जहाँ सांस लेना मुहाल हो वहाँ जाने को ये सिपाही क्यों तैयार हो जाते हैं? किससे लड़ते हैं ये? क्यों और किसके लिए लड़ते हैं? और इनके हथियारों के बावजूद जो इनसे लड़ते हैं उन्हें अपनी जान का डर क्यों नहीं सताता? खैर, हर सवाल को जवाब की दुआ नहीं मिलती सो ये सवाल भी दिमाग से वक्ती तौर पर झटक दिए थे.

नीरवता को तोड़ते भयानक शोर ने चौंकाया तो दिखा अब दूर दिख रही ताल्चा हवाई पट्टी से जहाज वापसी की उड़ान भर रहा था. एक बार फिर वही दहशत, लगा कि सामने वाले पहाड़ से टकराने ही वाला है कि 90 डिग्री पे मुड़ हवाओं में गायब हो गया. खैर, अगला साक्षात्कार बर्फ से होने वाला था. चमकते दिन में जमीन पर बिछी बर्फ से. युवराज भाई ने बताया था कि करीब 3500 मीटर की उंचाई पर इन गर्मियों में भी यहाँ बर्फ नहीं गलती. थोड़ी दूर पर ही कुछ औरतें पौधों में कुछ खोजती सी दिखीं. दोनों दोस्तों के सहारे बात की तो पता चला कि कुछ औषधियां मिलती हैं यहाँ जिनको दिन भर ढूँढने पर लोगों को 100 नेपाली रुपये मिलते हैं, बाजार में उन्हीं की कीमत हजारों में हो जाती है.

बाजार भी अजब चीज है न, जहाँ नहीं पंहुच पाता वहां अपने गुमाश्ते भेज देता है. बड़ी देर तक बात हुई उनसे, सहज, निश्छल, सादा सी हंसी वाली उन औरतों की आँखों की चमक में कुछ तो था जो कहीं नहीं मिलता. शायद वंचित होने का अहसास ही न होना, वंचना की समझ भी वंचना बढ़ा देती है. पर फिर वहां से आगे निकलने के बाद मिली जानकारी ने चौंकाया था. उनमें से एक जो सबसे चुप थीं वो नेपाली नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी- प्रचंड) की सक्रिय सदस्य थीं. वह मजदूरी बढाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही थीं और पुरानी 50 रुपये की मजदूरी को दुगना करवाने के लिए जिम्मेदार थीं.

सेना के कैम्प के इतने पास उन्हें डर नहीं लगता? नहीं, अभी तो पूरी शान्ति है, माओवादी लड़ाकों में से ज्यादातर को सेना में एकीकृत कर लिया गया है. बस किरण वैद्य के नेतृत्व वाला माओवादी एकीकृत समूह ही थोड़ा उग्र है पर झडपें तो उनसे भी नहीं होतीं. पाँव जवाब दे रहे थे और सफ़र था कि ख़त्म ही नहीं हो रहा था. अगले मोड़ पर दूसरे किसी ट्रेक से आ रहा खच्चरों का एक पूरा काफिला मिल गया. पता चला कि वर्ल्ड फ़ूड प्रोजेक्ट का चावल ढो रहे ये खच्चर ही इस इलाके की जीवनरेखा हैं, इनकी पीठ पर लदे हुए बोरे ही यहाँ की जितनी भी मिटे भूख मिटाते हैं.

अगला मोड़ जिसका हमें था इन्तेजार जैसा था. एक गाँव, जहाँ रेस्टोरेंट कह सकें ऐसा कुछ था और आधे दिन की कमर तोड़ चढ़ाई के बाद कुछ खाना मिलना था. 

July 11, 2014

बजट 2014: फिर ठगा गया सामाजिक क्षेत्र



बात एक उदाहरण से शुरू करें. एनडीए सरकार ने इस साल 500 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे चार और शीर्ष संस्थान खोलने का फैसला किया है. उससे भी बेहतर यह कि यह संस्थान मस्तिष्क ज्वर जैसी बीमारी से हर साल हजारों बच्चों की मौत देखने वाले पूर्वांचल, भुखमरी से तबाह विदर्भ, सबसे गरीब राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल और बुनकरों की बदहाली के साथ कृषि संकट झेल रहे आंध्र प्रदेश में बनेंगे. पर फिर, इन सारे इलाकों की प्रमुख स्वास्थ्य समस्यायें लाइफस्टाइल डिजीजेज के रूप में जाने जानी वाली कार्डियोवैस्कुलर (ह्रदय सम्बन्धी), रक्तचाप आदि नहीं बल्कि टीबी और आंत्रशोध जैसी पावर्टी पैनारोमा (गरीबी परिदृश्य) से उपजने वाली वह बीमारियाँ हैं जो अक्सर पीने का साफ़ पानी न होने या सफाई की कमी से होती हैं. उनसे निपटने के लिए एक कारगर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और सफाई और साफ़ जल की जरूरत है.

बजट में प्राथमिक चिकित्सा पर कुछ न कहने की बात छोड़ भी दें तो पीने के साफ़ पानी के किये 2013-14 में आवंटित 11000 करोड़ रुपयों के बरक्स सिर्फ 3600 करोड़ की व्यवस्था की गयी है. यह धनराशि भी आर्सेनिक, फ्लुरोइड और अन्य जहरीले पदार्थों से प्रदूषित पानी वाली 20000 बसावटों जगहों को पहचान कर तीन साल में खर्च की जायेगी. 2013-14 के बजट में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को उसके पहले के वित्तीय वर्ष के 13000 करोड़ रुपये से बढ़ कर 15260 करोड़ का आवंटन मिला था. इस साल की राशि की अभी घोषणा न करते हुए सरकार ने स्वस्थ भारत अभियान के तहत 2019 तक सभी घरों को पूरी  सफाई सुविधा सुनिश्चित करने का इरादा भर दिखाया है उसके लिए किसी विशिष्ट कार्यक्रम/नीति या आवंटन की घोषणा नहीं की है.

इसी तरह सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भी सर्व शिक्षा अभियान के तहत 28635 करोड़ रुपये, माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिए 4966 करोड़ रूपये का आवंटन करते हुए भी माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा के में जरुरी सुधार के लिए कोई नयी सोच नहीं दिखाई है. दिलचस्प यह कि भारत में कुपोषण की व्यापकता को लेकर पिछली यूपीए सरकार को लगातार घेरते रहने के बावजूद इस सरकार ने अपने पहले बजट में इस मुद्दे की पूरी तरह से अनदेखी ही कर दी है. यह कहने के बावजूद कि कुपोषण के उन्मूलन के लिए वर्तमान हस्तक्षेप काफी नहीं हैं और इसके लिए युद्ध स्तर पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू किये जाने की जरुरत है, सरकार ने यह काम छह महीने में योजना बनाने के लिए मुल्तवी कर दिया है. सरकार का यही लचीला रवैया खाद्य सुरक्षा को लेकर भी है. फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया के पुनर्गठन, परिवहन और वितरण में होने वाले नुकसानों को कम करने, जन वितरण प्रणाली की प्रभाविता बढाने के दावे छोड़ दें तो सरकार ने यह बताया नहीं है कि यह होगा कैसे. ठीक इसी तरह जैसे सरकार ने कृषि उपज में कमी होने की स्तिथि में सार्वजनिक बिक्री कर कीमतें काबू में रखने का वादा तो किया है पर वह यह करेगी कैसे उस पर कुछ नहीं कहा.

सरकार की औद्योगिक क्षेत्र की कार्ययोजनाएं देखें तो साफ होता है कि सामाजिक क्षेत्र के लिए यह ढीलापन किसी चूक का नतीजा नहीं बल्कि उसकी प्राथमिकताओं का प्रतिबिम्बन है. एक तरफ यह सरकार साफ़ पानी उपलब्ध कराने जैसी कार्ययोजना को तीन सालों तक टालती है, कुपोषण पर 6 महीने में नीति बनाने की बात करती है. दूसरी तरफ वही ई-बिज को आसान बनाने के लिए इससे जुड़े सभी विभागों के सहयोग से व्यापार और निवेश सम्बन्धी सभी अनुमतियाँ देने के लिए इकलौते पोर्टल को इसी साल 31 दिसंबर तक चालू कर देने के लिए कटिबद्द है.

सरकार का यह रवैया अन्य समाज कल्याणकारी नीतियों और योजनाओं को लेकर भी दिखता है. इस सरकार ने अनुसूचित जाति के युवा उद्यमियों को नयी शुरुआत करने के लिए 200 करोड़ रूपये का अनुदान आवंटित किया है. आदिवासियों के लिए बनायी गयी ‘वन बंधु कल्याण योजना’ में अनुदान उसका भी आधा माने 100 करोड़ है. इसकी तुलना मूर्तियों के लिए आवंटित हजार करोड़ रूपयों से की जा सकती है. पर इसकी तुलना सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए आवंटित 10000 करोड़ रुपये की राशि से की जाय तो सरकार की प्राथमिकतायें वंचित और शोषित समुदायों का उपहास करने में तब्दील होती हुई सी दिखने लगती हैं.  


हालांकि इस बजट में यह कोई नयी शुरुआत नहीं है. सामाजिक आन्दोलनों के दबाव में शुरू की गयी महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और अंतिम दौर में लाये गए खाद्य सुरक्षा विधेयक को छोड़ दें तो बरस दर बरस यूपीए सरकार के बजट भी अमूमन ऐसे ही रहे थे. इस बार बदला सिर्फ यह है कि सरकार ने यह स्वीकार लिया है कि 900 से ज्यादा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप योजनाओं के साथ वह विश्व में निजी और सरकारी क्षेत्रों की भागेदारी में पहले स्थान पर है. इस स्वीकार में एक और स्वीकार जुड़ा हुआ है. यह कि यहाँ सरकार सामाजिक मोर्चे पर न ध्यान दे रही है न ही उसमें सक्षम है. कारण यह कि निजी क्षेत्र कभी भी गैर मुनाफे वाले क्षेत्र में निवेश नहीं करता और अगर सरकार का पूरा ध्यान उधर ही केन्द्रित है तो निश्चित है कि लोक कल्याणकारी योजनायें कहीं पीछे छूट जायेंगी. 

July 09, 2014

आपराधिक हो गयी न्याय व्यवस्था कैसे रोकेगी यौन हिंसा?

[इंडियन इरा के जुलाई अंक में प्रकाशित]
फरजाना इकबाल की (अ)सम्मान हत्या लाहौर हाईकोर्ट के सामने न होकर किसी गाँव में या किसी और चौराहे पर होती तो आप मुझसे मिलने आतीं? फरजाना के पति के पत्रकार मेहरीन जेहरा-मलिक से पूछे गए इस सवाल के जवाब में सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में यौन हिंसा के अनवरत चलते रहने के कारणों के सूत्र मिलते हैं. यूं कि फरजाना बीते बरस पाकिस्तान में अपनी मर्जी से शादी करने का ख्वाब देखने के जुर्म में क़त्ल कर दी गयी कुल 869 महिलाओं में से एक हैं, बस एक. उनमें से ज्यादातर के पास कोई पत्रकार नहीं पंहुचा, उनके नाम मीडिया चैनलों की गरमागरम चर्चाओं में नहीं लिए गए. वे तो बस अपराध के आंकड़ों को दर्ज करने वाली किताबों के पीले होने को अभिशापित पन्नों पर एक और नाम बन कर रह गयीं.

ठीक वैसे जैसे उनकी हिन्दुस्तानी बहनें हो जाती हैं. कभी किसी बदायूं में सामूहिक बलात्कार के बाद पेड़ों पर लटके मिलना, कभी हरियाणा के किसी गाँव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिले सुरक्षाकर्मी के सामने अपने ही परिवार वालों के हाथ पति समेत क़त्ल हो जाना तो कभी आसाम में एक पागल हो गयी भीड़ के द्वारा लाइव टेलीविजन पर निर्वस्त्र कर दिए जाना, उनकी नियति में सुरक्षा का चुनाव नहीं किसी तरह हिंसा से बच निकलना भर होता है. ऐसा भी नहीं कि यह हिंसा केवल गरीब या पिछड़े तबकों की महिलाओं पर होती है. भले ही मुद्दा केवल मध्य या उच्चवर्गीय महिलाओं पर हुई हिंसा बन पाती हो, शिकार हर वर्ग की महिलायें होती हैं.

फिर सवाल बनता है कि तालिबानी ताकतों के उभार की वजह से बर्बरता की तरफ लौटता पाकिस्तान हो या फिर ‘लोकतान्त्रिक’ भारत, दोनों में यौन हिंसा के अपने सबसे गलीज रूपों में भी लगातार चलते रहने के पीछे क्या वजहें हो सकती हैं? आखिर भारत में तो महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनों की कमी नहीं है. जवाब सादा भी है और आसान भी. पहला यह कि यह यौनहिंसा का सैद्धांतिक स्रोत भले ही पितृसत्ता हो, सभी पितृसत्तातमक समाजों में यौनहिंसा न इतने व्यापक रूप में मौजूद है न इतने हिंस्र में. कोई भूले से भी यह दावा कर सकता है कि पश्चिमी समाज हमसे कम पितृसत्तातमक हैं? पर फिर क्या कोई भूले से यह भी कह सकता है कि वे आज अपनी स्त्रियों पर ऐसी हिंसा करते हैं या करने की सोच भी सकते हैं?

उनमें और हममें फर्क बस यह है कि उनकी आपराधिक न्याय व्यवस्था यौनहिंसा को केवल गैरकानूनी नहीं बनाती बल्कि यौनहिंसा की स्थिति में पीड़ित को न्याय भी देती है और अपराधियों को सजा भी. ठीक उलटे, हमारे यहाँ पाकिस्तान जैसे देशों में या तो हुदूद आर्डिनेंस जैसे क़ानून खुद ही स्त्रीविरोधी हैं या भारत जैसे देशों में जहाँ क़ानून चाहे प्रगतिशील हों, उन्हें लागू करवाने वाली संस्थाएं या तो हैं ही नहीं या फिर पूरी तरह भ्रष्ट और असक्षम हैं. क़ानून जितने भी कड़े हों, अगर उनके अनुपालन के लिए जिम्मेदार पुलिस भ्रष्ट हो, अपराधियों से घूस खाकर मिल जाती हो तो पीड़ित जायेंगे भी कहाँ? फिर पीड़ित जिद्दी ही हों और लड़भिड़कर अदालत तक पंहुच भी जाएँ और अदालतें भी भ्रष्ट निकलें तो? ध्यान रखा जाय कि यह कोई अभिकल्पना नहीं बल्कि भारत के मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा कमसेकम निचली अदालतों के बारे में स्वीकारा हुआ तथ्य है और उच्च न्यायपालिका के खिलाफ गंभीर आरोप.

इन सबके बावजूद कोई जान पर खेल कर लड़ने को आमादा हो ही तो स्थानीय रूप से ताकतवर अपराधियों से लेकर खाप पंचायत जैसी संविधानेतर शक्तियों तक सारी व्यवस्था ही न्याय नहीं अन्याय के पक्ष में खड़ी मिलती है. इस कदर कि बाद में मध्यवर्गीय गुस्से के विस्फोट के चलते सजा पाने वाले जेसिका लाल जैसे साफ़ मामले में भी अपराधी अदालत से एक बार तो बच ही निकलते हैं. बाकी कभी कभी हुक्मरानों को मजबूर कर न्याय हासिल कर पाने वाले मध्यवर्गीय गुस्से की एक बड़ी दिक्कत है. यह कि या तो वह अपने वर्ग के शिकार हो जाने पर फटता है या फरजाना, बदायूं या दिल्ली बस गैंगरेप जैसे अतिवीभत्स मामलों पर. दिल्ली बम्बई जैसे महानगरों की बात हो, टीवी स्टूडियो सुविधाजनक पंहुच के दायरे में हों और आरोपी खुद को नुकसान पंहुचा सकने में सक्षम अपने इलाकों के ताकतवर न हों तो एक बार जाएँ भी, न हों तो इस मध्यवर्गीय गुस्से को न महाराष्ट्र के भंडारा जाने की फुर्सत मिलती है न हरियाणा के भगाणा.

फिर रास्ते कहाँ हैं? रास्ते न तो और कड़े कानून बनाने में हैं न बलात्कारियों को मौत की सजा देने में. यौनहिंसा के मामलों में दोषसिद्धि प्रतिशत 24 रहेगा तो फिर कानून जो बना लें, मतलब यही होगा कि वह काम नहीं कर रहे. रास्ता सिर्फ एक है, गवाहों की सुरक्षा से लेकर त्वरित न्याय तक आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़े सुधार कर अभी मौजूद क़ानूनों को लागू करवाने का. यह नहीं किया तो हम कभी कभी दुखी होते रह अपनी न्यायप्रियता पर खुश हो भी सकते हैं

July 08, 2014

A Discordant Note on the Supreme Court's Dowry Order

[This is an AHRC article.]
The Indian Supreme Court’s decision to disallow blind arrest of the accused in dowry cases seems baffling at first sight. After all, the same court has often turned down bail applications, usually granted in such cases by Sessions Courts and High Courts. InSamunder Singh v. Rajasthan (1987), the Rajasthan High Court granted anticipatory bail to the father-in-law of a girl who died soon after her marriage; the girl’s family had made an accusation of dowry murder. In that case, the Supreme Court had not only cancelled the anticipatory bail granted to the father-in-law of the deceased girl by the Rajasthan High Court. The Supreme Court had stated that the bail is evidence to the widely held belief that “dowry deaths are even now treated with some casualness at all levels”.
In this context, the Supreme Court’s order, prohibiting immediate arrest, and ensuring that the accused get arrested only after a 9-point checklist, seems to be a departure from its past stance. Interestingly, the order ensures that the accused will be detained only after the Magistrate is satisfied with the investigation officer’s justification of detention. The Magistrate, in turn, will put on record reasons for the same, and failing to do so will invite departmental action and amount to contempt of court for the investigating officer.  The Court had further added that the order stands not only for dowry cases but also for all cases where the offence is punishable with imprisonment for less than seven years or up to seven years with or without fine.
The judgment is not a standalone order of a bench breaking the norm. It falls in line with another recent order of Justices Vikramjit Sen and S.K. Singh that prohibits auto arrest on allegations of rape that follow live in relationships gone sour. The Bombay High Court and many other lower courts have regularly expressed similar concerns.
The judgment has, expectedly, unnerved feminists and certain sections of civil society. Some have even blamed the order as a reflection of the misogyny and patriarchy that defines Indian society. However, despite their legitimate concerns, the judgment is neither representative of a patriarchal or misogynist mindset. Yes, women are treated as lesser citizens in India. Yes, the statistics from the National Crime Records Bureau expose the endemic nature of violence against women in India.  The problem of dowry is widespread. And, the anti dowry act is not the only one that gets misused. Many other acts, aimed at protecting the marginalized, get misused too.
This is exactly where the Supreme Court judgment turns out to be a rather progressive one, which takes one problem of India’s criminal justice system head on. Consider the statistics quoted by the bench itself. A total of 1,97,762 persons were arrested in 2012 for the offence under Section 498-A of the India Penal Code and nearly a quarter of those arrested were women. These women, ranging from elderly and often sick grandmothers to young daughters, all belong to the family of dowry accused. What if a single one of them is innocent? Presumption of innocence, not guilt, is a basic tenet of the rule of law. But here there appears to be a mad rush to send people to jail. What will happen to these women when the courts release them? Will society be less patriarchal to them? But then, this judgment is not only about women.
Presumption of innocence, not guilt is what all systems using common law must practice. Barring those caught red-handed or to stop someone from committing a crime, bail not jail should be the norm. The bench, in this case, has merely reaffirmed the principle. It has asserted that arrest curtails freedom, brings humiliation and scars people forever, and no arrest should be made only because the offence is non-bailable and cognisable. Who can disagree with this?
The judgment has also brought the role of Magistracy to the fore. The idea of Magistracy was born to curtail the unlimited power of arrest vested in law enforcement agencies. It was borne to protect the citizens from unlawful confinement and to defend them against unjustified arrest. Can anyone question the fact that both the Indian lower judiciary and the Indian police are corrupt and that they often use cognizable offences as a bargaining tool for bribes? What else explains that over 90% charge sheets in dowry cases result in 15% conviction?
The power to arrest even the female members of the family of the accused, thusly becomes problematic, as it gives the police unlimited power of harassment. Even from a different perspective, in a country where more than 90% of marriages are ‘arranged’, the bride and bridegroom’s families are often of the same socioeconomic status. In the case of a failing marriage, patriarchal idea of avenging the ‘honour’ of the bride becomes reason enough for pressing dowry charges and to teach the family a lesson.
Indian jails are already overcrowded. Under-trials sometimes serve more years than offence for which they get booked. This judgment might help the situation a bit. And, after all it does not bar arrest. It just brings in magisterial scrutiny to the police’s decision to arrest a person. And, it does this in a time-bound manner. The police will have to explain their decision about arresting or not within 14 days. What is wrong with that?
Civil society has always fought against the arrest of countless innocent youth under charges of terrorism. They have been seen being exonerated after years, sometimes even decades, of confinement, which can be called nothing but illegal. This judgment will help, not harm, fighting such cases too.
Harsh and draconian laws are not going to resolve problems. They will merely embolden an already corrupt and inefficient police into harassing more innocents. They will be misused by the lower judiciary, which is acknowledged as corrupt by the Supreme Court.
Britain, where India’s legal system emanates from, does not have auto arrest provisions even for rape charges. Does it mean that it sees more violence against women? Have the women there broken free of the shackles of patriarchy? In both cases, no is the answer. Britain sees less crime against women because it has a more honest and efficient criminal justice system.
That is what India also needs, not harsher laws. Legitimate public anger over the 16 December gang rape and murder of a young girl has not resulted in reducing violence against women. The anger, however, was used by the system to add the draconian death sentence to rape cases. This positive judgment should be welcome, and not derided. A time bound investigation, under magisterial scrutiny, to decide the detention of those charged with offences carrying a sentence less than 7 years, is a step forward in the reforms that India’s criminal justice system needs.
Arrest is the last resort in all civilized countries. Criminal investigations do not begin with arrest in rule of law countries and they should not do so India as well. The judgment is progressive in that it has set the process aright.
That said, the real test would be in the enforcement of the ruling; it demands immediate reform in police capability of carrying out forensic and criminal investigations. The judgment may also curtail torture as a rampant tool of investigation, in times where the police arrests the accused and then tortures him/her into confession and providing evidence. In other words, the judgment restores the right to silence and not being forced into serving as a witness against oneself.
It may not look politically correct at the moment, but the judgment will be remembered as a step forward in reforming India’s criminal justice system.

July 05, 2014

न्याय, नारीवाद और दहेज़ उत्पीड़न

 [दैनिक जागरण में 05-07-2014 को प्रकाशित

सर्वोच्च न्यायालय का दहेज़ को आपराधिक और दंडनीय बनाने वाले भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के दुष्प्रयोग की बात करते हुए ससुराल पक्ष के लोगों को तुरंत गिरफ्तार न करने का निर्देश चौंकाने वाला है. ख़ास तौर पर इसलिए कि इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय ऐसे ही मामलों में निचली अदालतों ही नहीं बल्कि उच्च न्यायालयों तक द्वारा दी गयी जमानतों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्हें निरस्त करता रहा है. उदाहरण के लिए समुन्दर सिंह विरुद्ध राजस्थान राज्य (1987) का फैसला याद किया जा सकता है. उस फैसले में शादी के कुछ ही दिनों के भीतर पुत्रवधु की ससुराल में हुई मृत्यु के मामले में आरोपियों को उच्च न्यायालय द्वारा दी गयी अग्रिम जमानत को खारिज कर दिया था. साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को दहेज़ जैसे मामलों में पूर्वाग्रह का सबूत बताते हुए उसने निचली अदालतों को ऐसे सभी मामलों में सतर्कता बरतने का आदेश भी दिया था.

फिर ऐसा क्या हुआ कि उसी सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज़ उत्पीड़न के ही मामलों में मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी न करने का निर्देश ही नहीं दिया बल्कि 9 बिन्दुओं की एक जांच सूची भी बना दी जिनके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकती है. दिलचस्प यह है कि यह आदेश इसके बाद यह भी सुनिश्चित करता है कि विवेचना अधिकारी के इन बिन्दुओं पर निश्चिन्त होने के बावजूद भी मजिस्ट्रेट उनका परिक्षण करेगा और स्वयं संतुष्ट होने के बाद ही आरोपियों को अभिरक्षा में भेजा जाएगा. इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रक्रिया का दायरा सिर्फ आईपीसी 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम के सेक्शन 4 तक ही सीमित नहीं रखा है. अदालत ने इसे ऐसे सभी मामलों के लिए लागू किया है जिनमे अपराध की सजा जुर्माने के साथ या बिना सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक ही बढ़ाई जा सकती हो.

दिलचस्प यह भी है कि यह आदेश कोई अकेला आदेश नहीं कि इसे किसी एक न्यायमूर्ति का निजी विचार कह कर खारिज किया जा सके. इस मामले के ठीक पहले लिव इन संबंधों में दरार के बाद महिलाओं द्वारा लगाए गए बलात्कार के आरोपों पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने तुरंत गिरफ्तारी न करने का आदेश दिया था. 27 जून 2014 को दिए गए उस फैसले में न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और एस के सिंह की पीठ ने पूछा था कि क्या सहमति के संबंधों का असफल हो जाना पुरुष के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाने तक जा सकता है? ऐसी ही चिंता पिछले साल बॉम्बे उच्च न्यायालय समेत और भी न्यायालय जता चुके हैं.

आशानुरूप, इस फैसले से नारीवादी संगठनों से लेकर सिविल सोसायटी के अन्य हिस्सों को भी गहरी निराशा हुई है. उनमें से तमाम ने इस फैसले को भारतीय समाज में अब भी मौजूद पितृसत्ता और स्त्रीद्वेष का प्रतिफलन भी लगा है. उनका तर्क अपने आप में गलत भी नहीं है. भारतीय समाज आज भी स्त्रियों को दोयम दर्जे का समझने वाला मर्दवादी समाज है. यह समझने के लिए कहीं दूर जाने की भी जरुरत नहीं है. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के सालाना आंकड़े अपने समाज में स्त्रियों की सामान्य तौर पर भयावह स्तिथि ही नहीं बल्कि दहेज़ के मामलों में भी कोई ख़ास कमी न आने की तरफ साफ़ इशारा करते हैं. फिर अभियोग साबित न होने की दर भी दहेज़ के मामलों में अन्य अपराधों से कुछ ख़ास अलग नहीं है. कानून के दुरुपयोग की बात भी अकेले दहेज़ और बलात्कार के मामलों पर लागू नहीं होती बल्कि तमाम अन्य मामलों में स्तिथि ऐसी ही है.

पर इसी जगह अपने आप में नकारात्मक दिखता हुआ यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की तमाम बड़ी दिक्कतों की तरफ इशारा भी करता है. जैसे कि पीठ का खुद का ही दिया आंकड़ा कि अकेले 2012 में इस कानून के तहत गिरफ्तार कुल लोगों का चौथाई हिस्सा महिलाओं का था. कहना न होगा कि यह सभी महिलाएं आरोपी पुरुष की रिश्तेदार होंगी. अब बताएं कि हजार दोषी छूट जाएँ एक निर्दोष सजा न पाए जिस न्याय व्यवस्था का मूल आधार हो उसमे इन महिला बंदियों में सालों जेल काट कर बाइज्जत बरी होने वाली महिलाओं को न्याय कौन देगा? फिर सवाल केवल महिलाओं का ही नहीं है.

भारतीय न्यायव्यवस्था ही नहीं बल्कि अभियोग साबित होने तक निर्दोषता की अवधारणा कॉमन लॉ मानने वाली सभी आपराधिक न्यायव्यवस्थाओं का मूल आधार है.  इसके आगे यह कि विधि के शासन वाली इसी राज्य व्यवस्था में किसी भी आरोपी को खुद अपने खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. यहाँ तक कि यह अधिकार रंगे हाथ पकडे गए आरोपी को भी है. विधि के शासन को स्वीकार करने वाली सभी न्याय व्यवस्थाओं का अगला मूल आधार है कि जमानत सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए और गिरफ्तारी केवल अंतिम विकल्प. इस मामले में भी बेंच ने साफ़ किया है कि क्योंकि गिरफ्तारी नागरिकों के अधिकारों को सीमित करती है, उन्हें अपमानित करती है और उनके  ऊपर एक अमित धब्बा लगा देती है, इसीलिए वह मानते हैं कि कोई भी गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि आरोप संज्ञेय और गैरजमानती हैं.

अगला सवाल इससे भी बड़ा है. मैजिस्ट्रसी की अवधारणा का उदय न केवल इसीलिए हुआ था कि क़ानून लागू करवाने वाली संस्थाओं का नागरिकों की आजादी छीनने का असीमित आधार सीमित किया जा सके बल्कि इसलिए भी ताकि यह आजादी गलत तरीके से न छीनी जा सके. क्या इस मामले में कोई संशय है कि भारतीय पुलिस अक्षम ही नहीं बल्कि भ्रष्ट भी है और वह तमाम मामलों में गिरफ्तारी को घूस का सबसे बड़ा जरिया बनाने के लिए जानी जाती रही है? अफ़सोस यह है कि दहेज़ उत्पीड़न के मामलों में परिवार की महिला सदस्यों की गिरफ्तारी की आजादी एक मर्दवादी समाज में पुलिस की इस ताकत को असीमित बना देती रही है. एक दूसरी नजर से भी देखें ज्यादातर परिवार द्वारा तय किये गए विवाहों वाले देश में वर और वधू पक्ष लगभग समान सामाजिक और आर्थिक स्तिथि के होते हैं. कितने भी कम मामलों में सही, विवाह विच्छेद को सामाजिक अपमान मानने वाले ऐसे समाज में फिर किसी भी कारण से हुए विच्छेद को दहेज़ उत्पीड़न का रूप देने में कितनी देर लगेगी?

या फिर दहेज़ के ही मामलों में क्यों, सालों से विचाराधीन कैदियों से भरी हुई भारतीय जेलें इस समस्या का एक और सबूत हैं. ऐसे में 7 साल की कम सजा में समयबद्ध विवेचना के बाद गिफ्तारी स्तिथि को बेहतर बनाएगी ख़राब नहीं.
बेशक इस फैसले की नारीवादी आलोचना कुछ पहलुओं पर ठीक है. पर शायद उन्हें भी याद करना चाहिए कि विधि के शासन वाली किसी न्यायप्रणाली में आरोप लगते ही गिरफ्तारी का प्राविधान नहीं है. यह भी कि वे स्वयं अन्य मामलों जैसे आतंकवाद के अभियोग में सिर्फ आरोपों के आधार पर दशकों जेल में सड़ने को मजबूर किये जाने वाले अल्पसंख्यक युवकों के लिए लड़ते रहे हैं. पर फिर, इस समस्या का समाधान क्रूर कानून बनाने में नहीं बल्कि विवेचना से लेकर न्याय तक आपराधिक न्यायवस्था को ठीक करने में ही है. और वह सुप्रीम कोर्ट के द्वारा संगठित अपराधियों का गिरोह कही गयी पुलिस और उच्चतम न्यायालय के द्वारा स्वीकार की गयी भ्रष्ट निचली न्यायपलिका के रहते होगा नहीं.
हमें याद करना चाहिए कि ब्रिटेन, जहाँ से हमारी न्यायव्यवस्था निकलती है से लेकर दुनिया के किसी देश में बलात्कार का या अन्य प्रकार की यौन हिंसा का आरोप लगते ही गिरफ्तारी का कोई प्राविधान नहीं है. फिर क्या वह हमसे ज्यादा स्त्रीद्वेषी हैं या वहां स्त्रियों के खिलाफ हमसे ज्यादा अपराध होते हैं? नहीं न, और यह इसलिए नहीं है कि वे पितृसत्तामुक्त हैं या वहाँ स्त्रियों ने बराबरी हासिल कर ली है. क्रूर कानून न होने के बावजूद वहाँ यह अपराध इसलिए कम हैं क्योंकि उनकी न्यायव्यवस्था काम करती है.

हमें यह भी ख्याल रखना होगा कि १६ दिसंबर गैंगरेप प्रतिरोध के खिलाफ हमारा न्यायोचित गुस्से का इस्तेमाल पितृसत्ता ने एक और अपराध में मृत्युदंड जैसी सजा ले आने में किया था. इस बार का फैसला अगर 7 साल से कम सजा वाले सभी अभियोगों में सीआरपीसी की धारा 41 के तहत दी गयी सुरक्षाओं के बाद ही गिरफ्तारी सुनिश्चित कर रहा है तो यह कतई गलत नहीं है.

July 02, 2014

बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था

[दैनिक प्रभात खबर में 02-07-2014 को प्रकाशित

सबसे पहले आंकड़ों की बात करते हैं. भारत के पिछले आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया था कि देश ने  स्वास्थ्य  व्यय पर पिछले साल से 13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है पर हम अब भी दुनिया भर में सकल घरेलू उत्पाद का सबसे कम स्वास्थय पर खर्चा करने वाले देशों में से हैं. इस कदर की इस मामले में हम नाइजीरिया से ही नहीं, 175 सर्वेक्षित देशों में से 171 से पीछे हैं. इस बात का अपने आप में कोई महत्व न  होता अगर हम सब सहारन देशों में एक होते। पर फिर हमारी इच्छाएं तो विश्व की महाशक्ति बनने की हैं. दूसरे शब्दों में हम विजन इंडिया 2020 जैसे भ्रम भी पाल के बैठे हैं जिनके तहत हमारे सपने बहुत बड़ेहैं और उन पर मेहनत करने के हमारे कदम बहुत छोटे।

इसको सैद्धांतिक भाषा में कहें तो दुनिया के सारे देशों में  स्वास्थ्य  सेवाओं और खर्चों दोनों को तीन ही रूप में समझा जाता है. पहला यह कि उनको नवउदारवादी और नव रूढ़िवादी देशों में एक उत्पाद माना जाता है कि लोग उनपर खर्च करें और उन्हें खरीद लें. इस तरह कि लोग संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह मेडिक्लेम जैसी इन्स्योरेंस योजनाओं के तहत पहले से तैयार रहें और किसी बीमारी की स्तिथि में उन्हें खरीद लें. पर जैसे कि अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस मामले पर नीति ने दिखाया है कि न ज्यादातर गरीब लोग इस बात पर सक्षम होते हैं न तैयार।

स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दूसरा सिद्धांत है लोककल्याणकारी राज्यों यानी मोटा मोटा कीन्सियन अर्थव्यवस्था पालन करने वाली देशों का, यह देश स्वास्थ्य सेवाओं को अन्य पूंजीवादी उत्पादों की तरहउत्पाद नहीं वरन एक निवेश मानते हैं. निवेश इन अर्थों में कि किसी भी देश के लिए स्वस्थ और सजग नागरिक सिर्फ नागरिक नहीं बल्कि बौद्धिक से लेकर शारीरिक श्रम करने को तत्पर समूह भी होते हैं सो उनके स्वास्थ्य पर खर्च राज्य का दायित्व ही नहीं बल्कि राज्य का निवेश भी होता है. स्वस्थ नागरिक मतलब देश के लिए बेहतर स्वस्थ कार्मिक और इसीलिए वह राज्य  स्वास्थ्य  सेवाओं को सहज औरनागरिको की पंहुच में रखने का प्रयास करते हैं. ऐसे राज्यों में सबसे प्रमुख स्कैण्डिनेवियन राज्य नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फिनलैंड प्रमुख हैं.

 स्वास्थ्य  सेवाओं के बारे में तीसरा सैद्धांतिक नजरिया मार्क्सवादी देशों का है जो उन्हें उत्पाद या निवेश नहीं बल्कि अधिकार मानते हैं. अफ़सोस यह कि ऐसे देशों में चीन जैसा घोषित मार्क्स-माओवादी देशभले न शामिल हो क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देश जरुर शामिल हैं. यह देश यह मानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएँ नागरिकों का अधिकार हैं और उन्हें मिलनी ही चाहिए फिर वह इसका मोल चुका पाने में सक्षम होंया न हों.

फिर से आंकड़ों की भाषा में इसी बात को देखें तो यह साफ होगा कि इन देशों के राष्ट्रीय बजट का एक बड़ा हिस्सा यहीं खर्च या नहीं खर्च होता है. नार्वे अपने बजट का लगभग 18 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पेखर्च करता है, उसके बगल का स्वीडेन लगभग 14 प्रतिशत इसी व्यय ने खर्च करता है. ठीक इस के बरक्स क्यूबा जैसे देश अपने बजट का सिर्फ 9 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं पर उनके स्वास्थ्य सूचकांक इन देशों के मुकाबले में पीछे नहीं बल्कि आगे खड़े होते हैं?

ऐसा क्यों है यह पूछने के पहले मगर इस सूची में भारत कहाँ है यह पूछना जरुरी है? इन देशों के मुकाबले भारत अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद का 1 से 3 प्रतिशत तक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता रहाहै. वह भी उन स्तिथियों में जब इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य कर्मियों के वेतन से लेकर सरकारी संस्थानों को बनाये रखने की लागतों में जाता रहा है. इसका अर्थ यह हुआ कि भारत दुनिया मेंस्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से है. उन देशों में से जिसने 2009 से 2012 तक अपने जीडीपी का 3.9, 3.7, 3.9, 4.0 प्रतिशत ही अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया है.इनका भी एक बड़ा हिस्सा चूंकि वेतन और संस्थानों के बनाये रखने के खर्चों में चला जाता है सो असली खर्च इसके भी बहुत कम प्रतिशत में हुआ. 

इसको जेएनयू की प्राध्यापिका डॉ रितुप्रिया के हवाले से लिखें तो मतलब यह आएगा कि दुनिया भर में अपने बजट का 15 प्रतिशत तक स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे देशों के बरक्स अपना देश बस 5 प्रतिशत के अंदर सिमट के रह जाता है.इसको और भी व्याख्यायित करें तो मसला और भी दुष्कर निकलता है. डॉ रितुप्रिया के ही अध्ययनों के मुताबिक जहाँ और देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का 5 से 10 प्रतिशत तकस्वास्थ्य पर खर्चते हैं वही भारत के लिए यह व्यय 10वीं (2002-2007) पंचवर्षीय योजना में 0.9 प्रतिशत था और 11वीं (2007-2012) पंचवर्षीय योजना में यह 1.04 प्रतिशत तकपंहुचा था. इसको और शब्दों में कहें तो यह व्यय प्रति भारतीय नागरिक 200 रुपयों तक आएगा, मतलब उतना जितना हम सरदर्द की दवा खरीदने में खर्च कर सकते हैं.

अब सवाल यह कि इन सब आंकड़ों का मतलब क्या है? इन का पहला मतलब यह है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओ पर हम दुनिया में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में हैं. और इस बात का मतलब यह कि अपनी जेब से इन्ही सेवाओं पर खर्चा करने वालोंमें हम बहुत आगे हैं. तमाम देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि स्वास्थ्य सम्बंधित आकस्मिक घटनाओं पर हुए खर्चे वर्तमान समय में कर्ज-गुलामगीरी का दुष्चक्र शुरू करने में सबसे आगे हैं और अफ़सोस यह कि मेरे अपने निजी अनुभव यही पुष्ट करतेहैं. सो सवाल उठता है कि रास्ते क्या हैं? पहला यह कि सरकार अपने व्यय व्याख्यायित करे और उन्हें न्यायोचित ठहराए। अब तक के अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि आकस्मिक स्वास्थ्य समस्यायों केचलते हर साल 4 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी की गर्त में चले जाते हैं और यह हमारे निजी अनुभओं से भी ठीक मालूम होता है.

होता यह है कि स्वास्थ्य संबंधी आकस्मिक घटनाओं में व्यक्ति आसपास के लोगों से, और उससे भी ज्यादा सूदखोरों से, कर्ज लेता है और यह कर्ज अपनी अति ब्याज के चलते बड़ा होता जाता है. अफ़सोस यह कि यह स्वास्थ्य आकस्मिक घटनाएँ बड़ीघटनाएँ नहीं बल्कि गर्भावस्था जैसी सामान्य घटनाओं से भी जुड़ी होती हैं. सो अब सवाल उठता है कि सरकार को करना क्या चाहिये? कायदे से कहें तो इसी सवाल में सारे जवाब छिपे हुए हैं. भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था मेंअब तक जोर लाइफस्टाइल डिजीजेज कही जाने वाली उन बीमारियों पर रहा है जो समाज के अगड़े तबके को प्रभावित करती हैं. सरकार ने अब तक देश की असली अस्वास्थ्यकर परिस्थितयों के बारे मेंसोचा ही नहीं। सो बावजूद इस बाद के कि देश में सबसे बड़ी हत्यारी बीमारी ट्यूबरकुलोसिस के बारे में 70 प्रतिशत खोज दर के दावों के बीच भी यह बीमारी घटती नहीं, बढती ही जाती है.

सो सवाल है कि सरकार को करना क्या चाहिए? जवाब यह कि सरकार को सबसे पहले लाइफस्टाइल बीमारियों की अपनी परिभाषा को दुरुस्त कर उनके भीतर कैंसर और रक्तचाप जैसी उच्चवर्गीय बीमारियों के साथ निम्नवर्गीय 'लाइफस्टाइल' बीमारियों कोभी लाना चाहिए। जरुरी यह भी है कि मसला आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एम्स) जैसे तृतीयक निदान के संस्थान बनाने का नहीं बल्कि प्राथमिक रोकथाम पर जोर देने का है. सिर्फ एक उदाहरण दें तो डेंगू जैसी बिमारी दिल्ली में हमला करनेके एक साल के अंदर संभाल ली जाती है जबकि ऐसी ही बीमारी जापानी बुखार और एक्यूट इंसेफ़्लाइटिस हर साल देश उत्तर प्रदेश और बिहार में हाजरों बच्चों का क़त्ल कर देती है.

अंततः बस यह कि भारत सरकार बस क्यूबा की तरह प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केन्द्रित कर चीजें बेहतर कर सकती है. यहाँ मृत्यु दर से लेकर आकस्मिक घटनाओं की पूरी मार ऐसी ही दरों पर केन्द्रित है, कैंसर और कार्डियोवास्कुलर बीमारियोंपर नहीं। सो अगर ध्यान उधर रहेगा तो देश वहीं अटका रहेगा, भारत की बहुसंख्यक जनता के रोग ठीक करने पर नहीं आएगा.