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June 07, 2014

वर्जित शहर

[दैनिक जागरण के अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 07-06-2015 को प्रकाशित] 

उनके अपने हमेशा रहने के भरम जितने भी बड़े हों, महल रह जाते हैं, महाराजा नहीं. और महल रहते हैं तो उनमें किस्से भी रहते हैं, ताकत की लड़ाइयों के किस्से, साजिशों के किस्से, मुहब्बतों के किस्से. महाराजा जितने ज्यादा रहे हों किस्से भी उतने ही ज्यादा होते हैं. सो साहिबान, ह्वेन सांग का थोड़ा ही सही कर्ज उतार रहा यह खाकसार 24 महाराजाओं का आशियाना रहे बीजिंग के ठीक दिल में बसे उस महल के अन्दर भटक रहा था जिसे बैंगनी वर्जित शहर उर्फ़ फोर्बिडन सिटी कहते हैं. यूं रहने को इस महल में कुछ लुटेरे भी रहे थे पर उनका जिक्र फिर कभी.

सच में कस्बाई बसावटों से बड़े इस महल में भटकते हुए जाने क्यों चंद्रकाता संतति याद आई थी, देवकीनंदन खत्री और उनके ऐयार याद आये थे. कुछ तो तिलिस्म था उसमे जिसने आँखें चौंधिया के रख दी थीं. खूंटे से भी छोटे मुंह वाले उस बंद कुँए के सामने खड़े होकर कुछ तो सिहर गया था कहते हैं जिसमे तब की रानी सीची ने राजा की सबसे प्यारी कान्क्युबाइन जेन को फिंकवा दिया था. तिलिस्म तो इसमें भी था कि इस महल में कान्क्युबाइन होने का आधिकारिक खिताब मिलता था, कि यहाँ खुद की इच्छा से नपुंसक हो गए लोग सरकारी अधिकारियों से ज्यादा ताकतवर होते थे. वर्जित शहर में शाही खानदान के अलावा प्रवेश कर सकने का हक़ उन्हें छोड़ किसी को नहीं था.

महल पर लौटें तो कमाल यह कि नाम से बैंगनी इस महल की सारी छतें महाराजा के रंग की यानी पीली हैं. यह भी कि दुनिया के तमाम महल देखे पर अगाध ज्ञान का पुस्तकालय नाम की इमारत है जिसकी छत काली है ताकि वह इमारत आग से बची रहे. सदियों का इतिहास समेटे इस महल की तामीर मिंग वंश के महाराजा युंग लो ने 1406 में शुरू करवाया था. दस लाख से ज्यादा मजदूरों के पसीने से बनी यह इमारत पूरे 14 साल में बनी थी. जाने क्यों वर्जित शहर में मेरी आँखें बहुत छोटे समय के लिए राजा रहे शुन वंश के उस ली जेंग के पदचिन्ह ढूंढ रही थीं जो कहाँ गायब हो गया पता ही नहीं चला. लगातार हार के भी लड़ते और जिन्दा रहने वाले ली जेंग के किस्से आज भी चीन भर में सुनाये जाते हैं. कोई कहता है कि वह साधू हो गया तो कोई कुछ और.

खैर, शुन वंश के बाद यह महल किंग वंश का आशियाना बना और फिर कुछ समय के लिए चीनी गृह युद्ध हार रहे च्यांग काई शेक का जिन्होंने ताइवान भागते हुए महल की तमाम चीजें चुरा लीं थीं. पर इस महल के इतिहास का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद वह था जब पहले 1860 में अंग्रेज-फ्रांसीसी सैनिकों ने और बाद में मित्र देशों की फौज ने इसमें डेरा डाल लिया. सोचिये तो, उस महल में विदेशी सैनिक जिसमे वहां के आभिजात्य वर्ग के पुरुषों का घुसना भी प्रतिबंधित था. इतिहास ऐसे ही आश्चर्यजनक तरीकों से बदलता है. शुक्र यह कि झाऊ एन लाऊ ने सांस्कृतिक क्रान्ति के वक़्त सेना लगा कर इस महल को बामियान बन जाने से बचा लिया.

वर्जित शहर बाद की पूरी यात्रा में साथ चलता रहा. बेशक एकाधिकारवादी राजशाही के उन दिनों में महल वर्जित जगहें होते थे, फिर राजा चाहे तो पूरे शहर को ही वर्जित घोषित कर सकता था. पर अब के शहर कम वर्जित हैं क्या? शहर के बीच निजी शहर बन कितनी तो ‘गेटेड कम्युनिटीज’ उग आयी हैं. अपने उन बोर्डों के साथ जिनमें फेरी वालों से लेकर न जाने किस किसके आने की मनाही की मुनादी होती है. और फिर जहाँ जा सकते हैं वहां भी सब कहाँ जा सकते हैं. एक दिन की दिहाड़ी छूट जाने पर भूख का ख़तरा झेलने वाले मजदूरों के लिए कौन सा शहर वर्जित नहीं होता.

जेहन में चलते वर्जित शहर के ख़याल के साथ ट्रेन से शुरू हुआ सफ़र वापसी में फ्लाइट से शेन्ज़ेन, यानी कि हांगकांग के जुड़वाँ शहर और चीन के पहले स्पेशल इकोनॉमिक जोन, के हवाई अड्डे पर पँहुच आया था. बीजिंग और वर्जित शहर बहुत पीछे छूट गए थे, क्या क्रान्ति भी? इतिहास ऐसे भी बदलता है कि मजदूरों और किसानों के लिए क्रान्ति करने वाले ही मजदूरों के अधिकार को मुल्तवी कर दें, ऐसी जगहें बना दें जहाँ पूँजी पूरी तरह से आज़ाद हो. और फिर यह स्पेशल इकनोमिक जोन आज नहीं बल्कि 1979 में ही बन गया था माने तब जब माओ की स्मृतियाँ गए जमाने की बात नहीं हुयीं थीं.

बस शेनजेन मेट्रो के आखिरी स्टेशन पर रुक गयी थी, अब बस सीढियां पार कर लो वू यानी हांगकांग में घुसना था. उस शहर में जो अपनी हजार कमियों के बावजूद कुछ कम वर्जित शहर तो है ही.

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