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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

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May 24, 2014

जिला 798 उर्फ़ मजदूर अधिकार एक्सप्रेस

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में  'कला के ये नमूने' शीर्षक से 24-05-2014 को प्रकाशित]


माओ के संरक्षित किये गए शरीर को देखने को लगी मीलों लम्बी कतार को देखने के बाद कौन सोच सकता था कि उन्हें कोई यहाँ, वाशरूम के सामने दरबान बना कर भी खड़ा कर सकता है. आखिरकार चीनी जनता अपनी सरकार माने कम्युनिस्ट पार्टी से चाहे जितनी ज्यादा नाराज हो, बीते दिन चेयरमैन माओ के लिए उसकी मुहब्बत देखते ही गुजरे थे. फिर चाहे ये मुहब्बत टीशर्ट से लेकर तौलिया तक बेचने के उस मुकाम पर ही न पंहुच जाय जिससे माओ होते तो और कुछ होते खुश तो न होते. खैर, इस इज्जत का सबब चीन का वह सफ़र है जिसकी शुरुआत कामरेड माओ ने की थी. अफीम युद्धों में बेइज्जती भरी हार और उसके पहले निरंकुश तानाशाही का कहर झेलने वाला चीनी समाज उनके इस योगदान को बड़े खुलूस से याद करता है. यह और बात है कि इस याद करने में वह सांस्कृतिक क्रान्ति जैसे निर्मम प्रयोगों और पार्टी/सरकार की बेवकूफियों से पैदा हुए अकाल में लाखों नागरिकों की जान जाने को मजे से भूल जाता है. ये भूल जाना अकेले हम हिन्दुस्तानियों की बीमारी थोड़े है आखिर, चीन भी अपने शासकों का इतिहास साफ़ सुथरा कर, अप्रिय प्रसंगों को निकाल कर के ही याद करता है.

फिर यह मूर्ति न पहली थी, न अकेली. 798 जैसे अजीब नाम वाले बीजिंग के कला जिले में घुमते हुए ऐसी तमाम चीजें नज़रों से टकराई थीं जिनका ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर होना तो भूल ही जाएँ,  'तानाशाह' चीन में होना ही संभव नहीं लगता. पर यह 798 क्यों? इसलिए कि यह स्थान मूलतः वायरलेस जॉइंट इक्विपमेंट फैक्ट्री हुआ करता था और उसकी सबसे बड़ी ईकाई 798 थी. कंपनी ने अपना उत्पादन कहीं और स्थानांतरित करते समय यह फैक्ट्री कलाकारों को लीज पर दे दी और फिर धीरे धीरे यह इलाका बीजिंग में कला का पता ही बन गया. और कला भी कमाल, वह सब कुछ जो चीन में खयाल से भी खारिज है यहाँ बाकायदा हाज़िर भी है और मंजिर भी. एक बार सोचा कि सरकार को पता तो होगा ही, फिर याद आया कि अपने मुल्क के हुक्मरानों को भी तो जंतरमंतर का पता है ही.

बाकी यह इलाका पैदा ही 80 के दशक में पनप रही अवान्गार्ड कला को लेकर सरकार की नाराजगी से हुआ था. सत्ता से आजाद कलाकार हर दौर में हर देश में शहर और समाज के हाशिये पर रहे हैं. बीजिंग वालों की जिंदगी में बस एक हास्यास्पद विसंगति और जुड़ गयी थी, यह कि वे निकाले जाने के पहले राजवंशों के समर पैलेस के आसपास के खंडहर हो रहे घरों में रहते थे. फिर नब्बे के दशक के बीच के किसी साल में बीजिंग की सेन्ट्रल अकादमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स ने बंद हो गयी फैक्ट्री नंबर 706 में अड्डा जमाया और लीजिये, इस इलाके का कलात्मक पुनर्जन्म हो गया था.

अब तक जो समझ आ चुका था वह यह कि जो चौंकाए न वह बीजिंग कैसा. सो यहाँ नीचे वाशरूम के दरवाजे पर खड़े कर दिए गए माओ थे तो दूसरी तरफ कला गैलरी में बदल गयी फैक्ट्री की दीवारों पर दशकों पहले के मजदूरों लाल स्याही में लिखे नारे भी. थोड़ा और आगे बढ़ें तो उन पटरियों पर खड़ी हुई एक रेलगाड़ी जो पहले विशालकाय भट्ठियों में भरने को कोयला लाती थी पर अब कहीं नहीं जाती. मजदूर अधिकार एक्सप्रेस- रेलगाड़ी पर उकेर दी गयी एक ग्राफिटी ने ध्यान खींचा ही था कि साथ घूमते हुए दोस्त बन गयी एक स्थानीय लड़की ने अनुवाद कर दिया था. हम दोनों बस मुस्कुरा के रह गए थे, बीजिंग में खड़े होकर सरकार की इससे ज्यादा आलोचना के बारे में सोचना भी ठीक नहीं था.

अगली गैलरी और भी स्तब्ध करने वाली थी. न, मुझे स्तब्ध उन बेहद भड़काऊ यौनिक मुद्राओं वाले इन्स्टलेशन आर्ट ने नहीं, उनको लेकर दर्शकों की सहजता ने किया था. अपनी बेटी के साथ आया कोई पिता अचानक बाहर नहीं भागा था, किसी माँ ने अपने युवा हो रहे बेटे से नजरें नहीं चुराई थीं. अपने मन में दूरदर्शन के जमाने में फिल्म देखते हुए दैहिक प्रेम दर्शाता कोई सामान्य सा दृश्य भर आ जाने पर पैदा हो जाने वाली हड़बड़ी याद हो आई थी.

खैर, माओ अब भी याद आ रहे थे. और उनको लेकर सरकारी उदासीनता भी. फिर एक छोटी सी खबर पता चली. यह कि यहाँ कुछ बरस पहले एक भाई साहब ने बस हवा लाने को दो नली छोड़ खुद को सीमेंट में चुनवा दिया था और चौबीस घंटे उसी मुद्रा में खड़े रहे थे. उनके बाद यह सवाल खड़ा हो गया था कि कला आखिर है क्या और किस सीमा तक जाती है. नग्नता, अमूर्तता से लेकर रॉक एंड रोल और साहित्यिक कामुकता तक रचनात्मक स्वतंत्रता के हर पहलू को लम्बे दौर तक प्रतिबंधित करते रहने के बाद सरकार को शायद समझ आ गया था कि ऐसे प्रयोगों के बाद उसकी जरुरत ही नहीं है. हम भी वापस सागा यूथ हॉस्टल की तरफ बढ़ चले थे.

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