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February 15, 2014

ट्रेन टू बीजिंग

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' से बीजिंग एक्सप्रेस 15-02-2014 को प्रकाशित]  

मिस्टर पानाडी... फिर वही ध्वनि गूंजी थी जिससे अपरिचय से शुरू हुआ सफ़र बरास्ते नफरत सहज होने तक पंहुच आया था. याद है कि शुरूआत में वीजा बढ़वाने का इन्तेजार करते हुए इसे सुन समझ ही नहीं आता था कि अपना ही बुलावा है. धीरेधीरे पता चला कि चीनी सभ्यता में उपनाम से बुलाने का चलन है. अब अपने उपनाम से उनका और उनकी भाषा से अपना, दोनों अपरिचय ठीक करने में उम्र गँवा देने से बेहतर सरकारी दफ्तरों में कभी कभी होने वाली इस त्रासदी को झेलना ही लगा था. 
पर उतरते अगस्त की उस चिपचिपी दोपहर को हांगकांग में चीनी कांसुलेट में इस आवाज ने बहुत असहज किया था. मानवधिकार कार्यकर्ता होकर भी चीन घूमने जाने की उस ख्वाहिश ने नहीं जिसपर सहकर्मी लगभग समवेत स्वर में कह उठे थे.. वीजा अप्लिकेशन में एशियन ह्यूमन राइट्स कमीशन मत लिखना वरना नहीं मिलेगा. इसलिए भी कि आम अवाम की मुक्ति के सपने वाली विचारधारा को मानने वाला देश मानवाधिकारों को लेकर इतना बंद कैसे हो सकता है? आखिर भारत सहित दुनिया भर के तथाकथित उदारवादी लोकतान्त्रिक समाज मानवाधिकार संगठनों को दुश्मन देशों का एजेंट बताने तक के बावजूद उन्हें एक सीमा तक काम तो करने ही देते हैं न? फिर चाहे वह सीमा भारत के काश्मीर और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में उन सामूहिक कब्रों को सामने ले आने तक ही न चली जाय जिन्हें खोदने का आरोप उनकी अपनी सेनाओं पर है. 
मिस्टर पानाडी, आप चीन क्यों जाना चाहते हैं पूछते हुए अधिकारी ने खयालों में गुम अपने आपे को चौंका दिया था, जी.. बैकपैकिंग, बस इतना ही निकला था और लगा था कि आदतन रूखे दिखने वाले इमिग्रेशन अधिकारी होने के बावजूद उसके होंठो पर मुस्कराहट और आँखों में उतर आयी थी. बैकपैकिंग? नी शी यिन्दू- आप हिन्दुस्तानी हो न? पता नहीं था कि इस सवाल का बैकपैकिंग से क्या रिश्ता है इसका जवाब चीन में भटकते हुए बार बार मिलेगा. बाकी दुनिया भर के यायावर जानते हैं कि वजह कोई भी हो इमिग्रेशन अधिकारी के मुस्कुरा देने के बाद पासपोर्ट पर वीजा बेसाख्ता ही चिपक जाता है सो चिपक भी गया. यातना हो सकने वाले वीजा इंटरव्यू के इस आसानी से निपट जाने पर वापस ऑफिस आते हुए उस अधिकारी की मुस्कराहट मेरे चेहरे पर उतर आयी थी. 
अगला सवाल जरा मुश्किल था. जाएँ कहाँ माने ऐतिहासिक बीजिंग, दुनिया भर को चौंका देने वाले शंघाई, हांगकांग से बस सटे हुए ही गुआंगदोंग या कहीं और? और जाएँ कैसे माने रेल से या हवाई जहाज से क्योंकि सस्ती हवाई उड़ानों और ठीकठाक आरामदेह रेलयात्राओं के किराए में कोई ख़ास फर्क नहीं होता. फिर फैसला हो गया था कि इस मुल्क से अपनी मुठभेड़ें चीन की दीवाल, मिंग और किंग दोनों साम्राज्यों की राजधानी रही फोर्बिडन सिटी, टेम्पल ऑफ़ हेवन जैसे इतिहास से लेकर हाल में ही ओलिंपिक खेल आयोजित करने वाले बीजिंग से ही शुरू करनी हैं. वह भी ट्रेन से कि २७०० किलोमीटर और २४ घंटे में खिडकियों से ही सही बहुत कुछ देखने को मिलेगा. फिर यह फैसला कि लोनली प्लेनेट जैसी गाइड बुक ले के नहीं जाना है, बचपन में समझ न वाली सरकारी नीलामियों की ‘जहाँ है जैसा है’ की भाषा में ही चीन देखना है. एक बहुत सस्ते यूथ हॉस्टल में रहने की व्यवस्था कर ही ली थी सो अगला निर्णय यह कि रिटर्न टिकट नहीं लेना है, बीसेक दिन की इस छुट्टी में जब मन भर जायेगा, लौट आयेंगे. 
कमाल यह कि नियत दिन पर हंग होम स्टेशन पर ट्रेन टी 98 (भला सा नाम रख देते) में अपने कूपे में घुसने के पहले तक नहीं पता था कि इमिग्रेशन के चक्कर वाली यह ट्रेन ‘थ्रू’, बोले तो बीजिंग तक कहीं न रुकने वाली. अजब मगर अच्छा लगा था कि अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी अपने स्टेशन पर न रुकने वाली ट्रेन को थ्रू या रनथ्रू ही कहते हैं. देश भी जाने कहाँ कहाँ से यादों में घुस आने के रास्ते खोज ही लेता है. फिर पता चला कि कोई सहयात्री अंग्रेजी नहीं बोलता, पर सम्वाद सिर्फ भाषा से नहीं किये जाते यह हांगकांग ने कब का सिखा दिया. 

ट्रेन चल पड़ी थी और साथ में हमारी बातों का सिलसिला भी. सिर्फ जुबान नहीं बल्कि इशारों और हवा में बनाई गयी आकृतियों तक के सहारे की गयी बातें. मेरा हिन्दुस्तानी होना जान सहयात्री को अचानक ख्याल आया था. खाना? पैंट्री? वेज? हाँ कहने पर चेहरे पर उतर आई दहशत, पैंट्री में कुछ भी शाकाहारी नहीं है. फिर अपने साथ पर्याप्त भोजन लेकर चल रहे होना समझा पाने पर चेहरे पर उतर आई आश्वस्ति के बावजूद उसने सेब निकाल साझा जगह पर रख दिए थे. सरपट भागती रेलगाड़ी की खिड़की के बाहर चीन था, बदल रहा चीन. खेतों के बीच बहुमंजिला इमारतें उगा रहा चीन. खुद की हवा में जहर भर रहा चीन. बातों बातों में रात उतर आई थी और सोने के पहले उस नयी दोस्त ने अपना नंबर दिया था.. एनी प्रोब्लम कहने के बाद अपना फोन कानों से लगाते हुए. सरकारों की भाषा से अलग नागरिकों की भाषा में यह बताते हुए कि हम दोनों अच्छे लोग हैं.  बीजिंग बस एक नींद दूर रह गया था. 

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