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January 18, 2014

रोज चल कहीं न पँहुचने का सफरनामा (हांगकांग 9)

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 18-01-2014 को
प्रकाशित] 

हांगकांग में ट्रैफिक जाम नहीं होता, फूटपाथ जाम लगता है. ऐसे कि सुबह और शाम दोनों हांगकांग में यूं उतरते हैं कि लगता है कि ७० लाख की आबादी वाले इस शहर के सारे बाशिंदे सड़कों पर, फुटपाथ पर उतर आये हैं. और फिर सबको जल्दी भी ऐसी कि पूछिए मत. इसमें सुबह लिफ्ट तक के सामने बिना कुछ कहे पंक्तिबद्ध खड़े हो जाने वाले हांगकांगर्स का कतारों के लिए प्यार जोड़ लीजिये और बस, हिन्दुस्तानी होना अद्भुत खिलंदड़ाना त्रासदी सा हो जाता है. यूं कि अपने दफ्तरों को पंहुचने को अपनी बस या मेट्रो या ज्यादातर के लिए दोनों की तरफ अनुशासित सेना का भ्रम देती सी बढ़ती भीड़ है और दिल्ली में लोगों को कुहनिया के आगे बढ़ जाने की यादों में डूबे हुए आप हैं. पर जिस्म, वह तो बिलकुल सीधी रेखा में सभ्य शहरी सा फुटपाथ पर आपसे आगे चल रहे चचा के पीछे चल रहा है. 
पर फिर ये दिल माने भी तो कब तक? सो यह पंक्ति पेट्रो स्टेशन के ‘आक्टोपस’ कार्ड या टोकन से खुलने वाले स्वचालित दरवाजों के बाहर पसरे अनंत विस्तार में पंहुची नहीं कि बदन जहाज हो जाता है. बाकी अनंत विस्तार पर चौंकिएगा मत, ४० स्क्वायर फीट के वर्क स्टेशन उर्फ़ क्यूबिकल्स से ७०० स्क्वायर फीट के घर के बीच भटकती उन रूहों को जो समंदर भी बसों की खिडकियों भर से देख पाती हैं, इन स्टेशनों की खाली जगह अनंत विस्तार सी ही लग सकती है. खैर, वापस स्टेशन आयें तो इस जगह शहाना अंदाज में दौड़ ख़त्म हुई और एस्केलेटर पर पंहुचे नहीं कि फिर बदन अपनी रफ़्तार में वापस. 
पर अब भी याद आता है कि इबादत सी बन गयी इस रस्म को निबाहते हुए ट्रेन सामने से निकल जाय तो दिल धक से हो जाता था कि मियाँ छूट गयी. अरसा लगा समझने में कि हिन्दुस्तान थोड़े है यह कि अगली कब आएगी पता नहीं, यहाँ तो बस हो कि ट्रेन, अपने निर्धारित समय में आ ही जायेगी. सब बदला पर यह नहीं बदला कि ट्रेन छूट जाय तो दिल आज भी धक से होता है. वह भी तब जब इस शहर से अपनी आशनाई की मियाद बहुत लम्बी है. इतनी कि चीन के शहर शेनजेन से हांगकांग के आर्थिक ह्रदय को जोड़ने वाली मेट्रो लाइन को केसीआर से एमटीआर में बदलते हुए देखा है. अफ़सोस, सार्वजनिक परिवहन में आर्थिक भेदभाव दर्शाने वाली इकलौती चीज केसीआर का दुगने किराए वाला ‘फर्स्ट क्लास’ अब भी बाकी है, मगर कब तक यह देखना है. 
बदलते तो खैर हमने और भी बहुत कुछ देखा है पर बस और मेट्रो का अपना अपना मिजाज एक चीज है जो बिलकुल नहीं बदली. वह भी तब जब इस्तेमाल करने वाले एक ही लोग हैं. बसों का अंदाज है अपनी सीट पकड़, या न मिले तो खड़े हो अपने में खो जाना. उनमे कोई ज्यादा विज्ञापन और जरा से समाचार दिखाने वाला टीवी नहीं देखता. सब अपने आइपैड, फोन, अखबार या मेकअप में गुम होने से फुर्सत पाते हैं तो बगल के यात्री को पार कर बस शून्य में देखने लगते हैं. 
मेट्रो जरा अलग है. उसमे आपको फ़ुटबाल मैचों या हांगकांग रेसिंग क्लब की घुड़दौड़ों के परिणाम देखने को उठती आँखें दिखेंगी, आपस में डूबे हुए किसी जोड़े पर किसी बुजुर्ग की असहज पर उचटती सी नजर दिखेगी. अकसरहा एक पूरे कोच में इकलौते दक्षिण एशियाई होने की वजह से आपको कौतूहल से निहारते किसी ऐसे बच्चे की ऑंखें दिखेंगी जो आपसे नजर मिलते ही शर्मा के झुक जायेंगी. और कभी कभी डिब्बे के दूसरे कोने पर खड़ा हुआ कोई और दक्षिण एशियाई जिससे नजरें मिलते ही आप दोनों की नजरें चमक जाती हैं, बिना यह पूछे कि वह हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी या क्या है. सीमायें कितनी छोटी होती हैं न, आप जितना आगे निकल आयें वे उतनी छोटी पड़ती जाती हैं. 
उनमे लोनली प्लेनेट से लेकर एमटीआर मानचित्र तक को बहुत ध्यान से पढ़ते पश्चिमी बैकपैकर्स दिखेंगे. वैसे आजतक समझ नहीं पाया कि इस छोटे मगर विश्व इतिहास और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण शहर का इतिहास और संस्कृति पढना तो ठीक मगर कौन लोग हैं जिन्हें यहाँ भी घूमने के लिए मानचित्र की जरूरत पड़ती है? कितनी बार तो कोशिश की अनजाने रास्तों पर निकल खो जाने की, पर यहाँ तो लगातार सीधे ही चल लें तो कोई न कोई परिचित जगह आ ही जाती है. 

खैर, हांगकांग का सार्वजनिक परिवहन मुझे चमत्कृत करता है. यही इस शहर की जीवन रेखा है. वजह भी कि यहाँ ट्रैफिक जाम नहीं लगते, या कम से कम लगभग नहीं लगते. काश हम भी कभी ऐसा कर पायें.