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December 14, 2013

प्रतिगामी है यौनिक स्वातन्त्र्य के खिलाफ फैसला

[दैनिक जागरण में  यौन स्वतंत्रता का सवाल शीर्षक से 14-12-2013 को प्रकाशित] 

प्रतिगामी, दुराग्रहपूर्ण, मध्ययुगीन, पूर्वाग्रही- दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के फैसले को उलट समलैंगिकता और अन्य यौनिकताओं को फिर से गैरकानूनी बना देने के अपने फैसले पर समाज के साथ साथ राष्ट्रीय मीडिया से ऐसी कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद शायद सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं की होगी. पर फिर लगभग पूरी तरह से भ्रष्ट कार्यपालिका और नौकरशाही की आपराधिक अयोग्यता से त्रस्त भारत में न्यायिक सक्रियता के रास्ते आम जनता के लिए इन्साफ की नयी आस बन कर उभरी न्यायपालिका रोज ऐसे प्रतिगामी फैसले देती भी नहीं. विक्टोरियन नैतिकता के प्रतिमानों पर 1861 में बने एक क़ानून को वापस ला लाखों समलैंगिक और क्विर नागरिकों को सहमति के संबंधों की वजह से अपराधी बना देने वाला यह फैसला बेशक अलोकतांत्रिक और असहनीय है. ख़ास बात यह भी कि इस फैसले में यौनिक स्वातंत्र्य का सवाल पूरी तरह गायब दिख रहा है.  आखिर को दो बालिग़ व्यक्तिओं का अपने निजी दायरे में रह कर सहमति के सम्बन्ध बनाने के मुद्दे पर पर निर्णय का अधिकार सिर्फ उनका हो सकता है. 
ख़ास बात यह कि अगर क़ानून बदलना और बनाना विधायिका का काम है और हम सिर्फ कानूनों की व्याख्या कर रहे हैं कहते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कर दिया है कि वह खुद अपने फैसले से असहज है. पर क्या सच में कानून बनाना सिर्फ विधायिका का काम है?  ७० के दशक में संपत्ति के अधिकार की सार्वभौमिकता को लेकर उठे सवाल से उपजे संविधान के बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत से साफ़ है कि नहीं. 20वीं सदी के अंत में भाजपानीत राजग सरकार के संविधान समीक्षा के प्रयास से फिर जिन्दा हुई इस बहस में सर्वोच्च न्यायालय ने बारहा साफ़ किया है कि क़ानून बनाने का विधायिका का अधिकार अंतिम नहीं है और वह किसी भी हाल में संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ नहीं जा सकती. फिर नुक्ते का अतिक्रमण करने वाले कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय संसद के अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) बता कर निरस्त भी कर सकता है. इस अधिकार के दायरे में औपनिवेशिक काल के क़ानून भी आते हैं.  इसके उदाहरण ढूँढने हों तो दूर नहीं जाना पड़ेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में ही अपने ऐतिहासिक आदेश में जनप्रतिनिधित्व क़ानून (आरपीए) के संसद के ही बनाए उस प्रावधान को रद्द कर दिया था जिसके तहत दोषी सांसदों और विधायकों को निचली अदालतों में दोषसिद्ध और सजायाफ्ता हो जाने के बाद भी ऊंची अदालत में अपील करने तक अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता था. 
अफसोसनाक है कि न्यायिक सक्रियता को लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के राजनैतिक नेतृत्व की आलोचना झेलने वाली न्यायपालिका ने वहीँ सक्रियता नहीं दिखाई जहाँ उसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी. इस क़ानून की न्यायिक समीक्षा की अपनी जिम्मेदारी को संसद के पाले में डालने की जगह वह कमसेकम इसे एक बड़ी संवैधानिक पीठ के हवाले तो कर ही सकती थी. फिर सवाल यह है कि उसने ऐसा किया क्यों नहीं? दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस क़ानून को संविधान संरक्षित कम से कम दो मौलिक अधिकारों, विधि के समक्ष समानता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 14 और अन्य प्रतिमानों के साथ साथ लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध करने वाले अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करने वाला पाया था. कहना न होगा कि उच्च न्यायालय ने ठीक ही माना था कि लैंगिक भेदभाव में यौनिकता के आधार पर भेदभाव स्वतः शामिल हैं. फिर यह क़ानून मौलिक अधिकारों का उत्स कहे जा सकने वाले अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है जो सभी भारतीय नागरिकों को खुद सहित किसी अन्य को नुकसान न पंहुचाने वाले निजी जीवन के निर्णयों में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का अधिकार देता है. 
इन सब कानूनी नुक्तों को छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय मानवीय अंतर्संबंधों की देशकाल आधारित अंतर्संबंधों की गतिकी के भी खिलाफ खड़ा है. सर्वोच्च न्यायालय को याद रखना चाहिए था कि वर्तमान विधि व्यवस्था को जन्म देने वाले राष्ट्रराज्यों की शुरुआत के दौर में लगभग पूरे यूरोप में गैरकानूनी मानी जाने वाली समलैंगिकता को नीदरलैंड  ने 1811 में ही विधिसम्मत मान लिया था. यह भी कि आईपीसी 377 के जन्मदाता ब्रिटेन में भी इसे 1967 में ही गैरआपराधिक करार दिया था. फिर यौनिकता के अधिकार को वर्तमान परिदृश्य में समझने के लिए यह याद कर लेना भी काफी होना चाहिए था कि खुद दक्षिण एशिया में नेपाल जैसे परम्परावादी देश ने 2007 में ही समलैंगिकता को कानूनी मान लिया था. धार्मिक मान्यताओं के अन्दर भी यौनिकताओं के सवाल पर लगातार बहुलवादी हो रही है. याद करें कि अभी हाल में ही दुनिया के सबसे बड़े धर्म ईसाइयत के नेता पोप फ्रांसिस ने यह पूछकर धमाका कर दिया था कि अगर कोई समलैंगिक कैथोलिक आस्तिक है तो वह उसकी यौनिकता पर सवाल उठाने वाले कौन होते हैं? दुखद है सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिगामी फैसला तब लिया है जब धार्मिक समूह भी उनकी मूल मान्यताओं के बिलकुल खिलाफ जाती यौनिकताओं को स्वीकार करना शुरू कर चुके हैं. माननीय न्यायालय को समझना चाहिए कि विविधताओं के साथ बराबरी को मानने वाली आधुनिक चेतना को मध्ययुगीन भेदभाव के दौर में वापस नहीं भेजा जा सकता. 
पर यह सब कह चुके होने के बाद हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि लोकतान्त्रिक और बहुलवादी मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों को समलैंगिकता  को  (और अन्य सभी यौनिकतायें) जेनेटिक और इसीलिए ‘प्राकृतिक’ होने की वजह से ही नागरिक अधिकार मानने का तर्क देने से बचना चाहिए. वस्तुतः प्राकृतिकता का यह सिजोफ्रेनिया से लेकर सब कुछ को 'जेनेटिक' बनाने में लगी बाजारी ताकतों की साजिश के साथ जा खड़ा होता है. साथ ही बहुलवादी यौनिकताओं को अपनी सभ्यता के गौरवशाली अतीत का हिस्सा, शास्त्रसम्मत और पारंपरिक बताने जैसे तर्क भले ही वक्ती तौर पर फिलहाल समलैंगिकता को धर्मविरोधी अनैतिकता से लेकर बीमारी तक बताने वाले सभी धर्मों के कट्टरपंथियों को जवाब देना आसान करें, लम्बे दौर में यह तर्क भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ खड़े होंगे. समलैंगिकता अगर किसी एक धर्म की परम्परा या किताबों में हो भी तो वह अन्य धर्मों को कैसे मान्य हो जायेगी? या परम्परा का हिस्सा न होने की स्थिति में भी अगर कोई धर्म आगे बढ़कर यौनिकता की स्वतंत्रता स्वीकार कर ले जैसे अभी हाल में कैथोलिक चर्च ने किया तो उससे इसकी कानूनी स्थिति पर क्यों फर्क पड़ना चाहिए? धार्मिक मान्यता न होने की कसौटी से ही नागरिकों के निजी अधिकारों का हनन किया जा सकता है? 
भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ का क़ानून धार्मिक आधारों पर नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित विधि के शासन के अनुरूप होना चाहिए. और विधि के शासन में सभी बालिग़ नागरिकों को किसी को नुकसान पंहुचाने वाली आपराधिक गतिविधियों में लिप्त न होने पर दैहिक और जीवन की अनुल्लंघनीय स्वतन्त्रता प्राप्त होती है, होनी चाहिए. 

विधि के शासन पर आधारित यही क़ानून व्यवस्था बनाये रखना और उसे तोड़ने वालों को सजा दिलवाना राज्यसत्ता का काम होना चाहिए, दो व्यक्तियों के बीच सहमति से बने संबंधों की पहरेदारी करना नहीं. यही वजह है कि अदालत का यह फैसला नैतिक और विधिक आधारों पर गलत ही नहीं है बल्कि इसकी संदिग्ध संवैधानिकता वाला भी है. धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर नैतिकता के दावे से लैस बहुमत की की तानाशाही का खतरा लोकतान्त्रिक समाजों को भीतर से मिलने वाली सबसे बड़ी चुनौती होता है. बहुमत को खुश रखने को मजबूर विधायिका वाले इन समाजों में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा कीजिम्मेदारी न्यायपालिका की ही बनती है. फिर हमले चाहे कितने ही पूर्वाग्रहपूर्ण क्यों न हों, न्यायपालिका उन्हें सांवैधानिकता की कसौटी पर कस निर्णय लेने को वचनबद्ध है. अफ़सोस है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यौन अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने से चूक गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वह और सरकार दोनों इस गलती को जल्द से जल्द सुधार लेंगे. 

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