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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 21, 2013

दुःख की भाषा

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 07-12-2013 को प्रकाशित] 
ऑफिस की सामान्य मीटिंग्स में बैठे हुए फोन पर आये सन्देश ने अन्दर तक दहला दिया था. हम लोगों का बड़े भाई जैसा दोस्त खुर्शीद अनवर नहीं रहा. उसने आत्महत्या कर ली थी. यह खबर सच नहीं लगी थी, बिलकुल भी नहीं. तीन महीनों से उसकी जान बचाने के लिए लड़ रहे थे हम सब, नहीं वह ऐसा नहीं कर सकता. पर फिर सच को आपके लगने से क्या मतलब? 
और फिर खाली आँखों में उतर आये आंसुओं के साथ समझ आया था कि परदेस में सबसे बड़ा दुःख होता है अकेले रहना और फिर उनमें भी निजी त्रासदी के ऐसे पल निकालना. दुःख के पल निकालना. वे पल जब आप अन्दर से टूट रहे होते हैं और कोई कन्धा नहीं होता आपके पास. आपकी मेट्रो में भर भर आ रही आँखें आपके लिए सहानुभूति नहीं कौतूहल का बायस बनती हैं. 
बेशक आंसुओं की कोई भाषा नहीं होती, उन्हें सब समझते हैं. पर फिर आंसू पोंछने के लिए बढे हाथों को तो भाषा की जरुरत पड़ती है न, वरना कैसे बाँट पाएंगे आप उनसे अपना दुःख. इससे भी ज्यादा त्रासद है फिर यह देखने को मजबूर होना कि दिसंबर माने वर्षांत में आपके पास रोने के लिए भी छुट्टियाँ बची हैं या नहीं. क्या करेंगे फिर आप?
पर फिर घर रह कर और अकेला ही हो सकते हैं आप सो बाहर निकल पड़ा. निरुद्देश्य भटकते हुए भीग भीग जाती आँखें लगातार बस एक ही चीज ढूंढ रही हैं, किसी दोस्त का कंधे पर हाथ. डबलडेकर बस की ऊपरी डेक पर बैठे हुए साथ चलता जो समन्दर हमेशा बहुत प्यारा लगता रहा था आज अपना सारा नमक ले मेरी आँखों में उतर आया था. 
सोचा कि और लोग कैसे झेलते होंगे ऐसे बड़े आघात पर फिर पूछता भी तो किससे? पर दुखी तो यहाँ भी होते होंगे लोग? जीवन का नियम है अपनों का एक दिन चला जाना. इनकी तो संस्कृति भी हमारे जैसी नहीं है कि नाते रिश्तेदारों से लेकर मोहल्ले वाले तक सुख दुःख दोनों में लगभग अवैध अतिक्रमण की हद तक घुसे रहते हों. यहाँ तो ज्यादातर लोग बड़ी दुनिया के भीतर अपनी बहुत छोटे सी निजी दुनिया बना लेते हैं जिसमे बहुत कम लोग होते हैं? परिवार और बहुत करीबी कुछ मित्र. अपने गाँव में ही मुश्किल से किसी को किसी से बात करते देखता हूँ. वह भी बावजूद इस सच के कि अपना गाँव पूरा ‘मिस्टर और मिसेज चैन’ लोगों का गाँव है, माने यहाँ सब किसी जमाने में एक ही रहे कुनबे के वंशज हैं.  
बेशक कुछ सामाजिक उत्सव हैं जब वह एक साथ बारबेक्यू करते हैं, नाचते गाते हैं पर ऐसे अवसर बहुत कम होते हैं. फिर हांगकांग की पागलों की तरह भागती जिंदगी इतना मौक़ा भी कहाँ देती है. सुबह ऑफिस के लिए भागने से शुरू हो गयी शाम घर पंहुचने वाली इन जिंदगियों में परिवार के लिए ही वक़्त निकालना मुश्किल होता है फिर लोग समाज के लिए कैसे निकालें. 
हाँ, कुछ आप्रवासी समुदाय इस मामले में बहुत बेहतर हैं. उनके यहाँ दुःख की किसी घडी में पूरा का पूरा समुदाय साथ आ खड़ा होता है. इस मामले में सबसे बेहतर फिलीपीनी हैं पर नेपाली, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी भी कुछ कम नहीं है. हाँ सबसे बुरे में बेशक हम भारतीय जो वस्तुतः एक समुदाय हैं ही नहीं पहले पायदान पर खड़े होंगे. यहाँ मैंने बंगाली एसोशियन देखा है, पंजाबी देखा है, गुजराती देखा है पर भारतीय नहीं देखा. वैसे देखा तो उत्तर प्रदेश और बिहार का भी नहीं है पर उसका जिक्र फिर कभी. 
किसी गुजर गयी साथी घरेलू नौकरानी साथी के शरीर को फिलिपीन्स भेजने के लिए अपने बहुत नाकाफी से वेतन से भी पैसे इकठ्ठा करते हुए देखा है और नशे में किसी से टकरा गए दक्षिण भारतीय के साथ थाने में बैठे उसके दोस्तों को भी. एक बात जो हमेशा चौंकाती है वह यह भी कि त्रासदी के इन पलों में कैसे वही लोग चट्टानी एकता के साथ खड़े हो जाते हैं जो बहुत छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे से लड़ते रहते थे, जलते रहते थे. 
अनजाने में ही मैं फिर चुंगकिंग मेंशन पंहुच आया था. शायद मन में कहीं यह विचार छिपा रहा हो कि अपने निजी दुःख की इन घड़ियों में अपने समुदाय को कम से कम देख पाना भी दुःख थोड़ा तो कम करेगा, थोड़ा तो संभालेगा. जिस दुकान से ज्यादातर घरेलु सामान खरीदता हूँ उसके मालिक के यह पूछने पर कि सब खैरियत, ठीक नहीं लग रहे आप शायद थोडा संभला भी. पर उनको क्या बताता कि गलत किया खुर्शीद भाई ने, उन्हें लड़ना था आरोपों के खिलाफ. लड़ाई अधूरी नहीं छोडनी चाहिए थी कामरेड को. 

लौटते हुए मन में खुर्शीद भाई की यादों के साथ वही खयाल भी था कि चीनी लोग दुःख कैसे सहते हैं.   

December 14, 2013

प्रतिगामी है यौनिक स्वातन्त्र्य के खिलाफ फैसला

[दैनिक जागरण में  यौन स्वतंत्रता का सवाल शीर्षक से 14-12-2013 को प्रकाशित] 

प्रतिगामी, दुराग्रहपूर्ण, मध्ययुगीन, पूर्वाग्रही- दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के फैसले को उलट समलैंगिकता और अन्य यौनिकताओं को फिर से गैरकानूनी बना देने के अपने फैसले पर समाज के साथ साथ राष्ट्रीय मीडिया से ऐसी कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद शायद सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं की होगी. पर फिर लगभग पूरी तरह से भ्रष्ट कार्यपालिका और नौकरशाही की आपराधिक अयोग्यता से त्रस्त भारत में न्यायिक सक्रियता के रास्ते आम जनता के लिए इन्साफ की नयी आस बन कर उभरी न्यायपालिका रोज ऐसे प्रतिगामी फैसले देती भी नहीं. विक्टोरियन नैतिकता के प्रतिमानों पर 1861 में बने एक क़ानून को वापस ला लाखों समलैंगिक और क्विर नागरिकों को सहमति के संबंधों की वजह से अपराधी बना देने वाला यह फैसला बेशक अलोकतांत्रिक और असहनीय है. ख़ास बात यह भी कि इस फैसले में यौनिक स्वातंत्र्य का सवाल पूरी तरह गायब दिख रहा है.  आखिर को दो बालिग़ व्यक्तिओं का अपने निजी दायरे में रह कर सहमति के सम्बन्ध बनाने के मुद्दे पर पर निर्णय का अधिकार सिर्फ उनका हो सकता है. 
ख़ास बात यह कि अगर क़ानून बदलना और बनाना विधायिका का काम है और हम सिर्फ कानूनों की व्याख्या कर रहे हैं कहते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कर दिया है कि वह खुद अपने फैसले से असहज है. पर क्या सच में कानून बनाना सिर्फ विधायिका का काम है?  ७० के दशक में संपत्ति के अधिकार की सार्वभौमिकता को लेकर उठे सवाल से उपजे संविधान के बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत से साफ़ है कि नहीं. 20वीं सदी के अंत में भाजपानीत राजग सरकार के संविधान समीक्षा के प्रयास से फिर जिन्दा हुई इस बहस में सर्वोच्च न्यायालय ने बारहा साफ़ किया है कि क़ानून बनाने का विधायिका का अधिकार अंतिम नहीं है और वह किसी भी हाल में संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ नहीं जा सकती. फिर नुक्ते का अतिक्रमण करने वाले कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय संसद के अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) बता कर निरस्त भी कर सकता है. इस अधिकार के दायरे में औपनिवेशिक काल के क़ानून भी आते हैं.  इसके उदाहरण ढूँढने हों तो दूर नहीं जाना पड़ेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में ही अपने ऐतिहासिक आदेश में जनप्रतिनिधित्व क़ानून (आरपीए) के संसद के ही बनाए उस प्रावधान को रद्द कर दिया था जिसके तहत दोषी सांसदों और विधायकों को निचली अदालतों में दोषसिद्ध और सजायाफ्ता हो जाने के बाद भी ऊंची अदालत में अपील करने तक अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता था. 
अफसोसनाक है कि न्यायिक सक्रियता को लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के राजनैतिक नेतृत्व की आलोचना झेलने वाली न्यायपालिका ने वहीँ सक्रियता नहीं दिखाई जहाँ उसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी. इस क़ानून की न्यायिक समीक्षा की अपनी जिम्मेदारी को संसद के पाले में डालने की जगह वह कमसेकम इसे एक बड़ी संवैधानिक पीठ के हवाले तो कर ही सकती थी. फिर सवाल यह है कि उसने ऐसा किया क्यों नहीं? दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस क़ानून को संविधान संरक्षित कम से कम दो मौलिक अधिकारों, विधि के समक्ष समानता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 14 और अन्य प्रतिमानों के साथ साथ लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध करने वाले अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करने वाला पाया था. कहना न होगा कि उच्च न्यायालय ने ठीक ही माना था कि लैंगिक भेदभाव में यौनिकता के आधार पर भेदभाव स्वतः शामिल हैं. फिर यह क़ानून मौलिक अधिकारों का उत्स कहे जा सकने वाले अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है जो सभी भारतीय नागरिकों को खुद सहित किसी अन्य को नुकसान न पंहुचाने वाले निजी जीवन के निर्णयों में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का अधिकार देता है. 
इन सब कानूनी नुक्तों को छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय मानवीय अंतर्संबंधों की देशकाल आधारित अंतर्संबंधों की गतिकी के भी खिलाफ खड़ा है. सर्वोच्च न्यायालय को याद रखना चाहिए था कि वर्तमान विधि व्यवस्था को जन्म देने वाले राष्ट्रराज्यों की शुरुआत के दौर में लगभग पूरे यूरोप में गैरकानूनी मानी जाने वाली समलैंगिकता को नीदरलैंड  ने 1811 में ही विधिसम्मत मान लिया था. यह भी कि आईपीसी 377 के जन्मदाता ब्रिटेन में भी इसे 1967 में ही गैरआपराधिक करार दिया था. फिर यौनिकता के अधिकार को वर्तमान परिदृश्य में समझने के लिए यह याद कर लेना भी काफी होना चाहिए था कि खुद दक्षिण एशिया में नेपाल जैसे परम्परावादी देश ने 2007 में ही समलैंगिकता को कानूनी मान लिया था. धार्मिक मान्यताओं के अन्दर भी यौनिकताओं के सवाल पर लगातार बहुलवादी हो रही है. याद करें कि अभी हाल में ही दुनिया के सबसे बड़े धर्म ईसाइयत के नेता पोप फ्रांसिस ने यह पूछकर धमाका कर दिया था कि अगर कोई समलैंगिक कैथोलिक आस्तिक है तो वह उसकी यौनिकता पर सवाल उठाने वाले कौन होते हैं? दुखद है सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिगामी फैसला तब लिया है जब धार्मिक समूह भी उनकी मूल मान्यताओं के बिलकुल खिलाफ जाती यौनिकताओं को स्वीकार करना शुरू कर चुके हैं. माननीय न्यायालय को समझना चाहिए कि विविधताओं के साथ बराबरी को मानने वाली आधुनिक चेतना को मध्ययुगीन भेदभाव के दौर में वापस नहीं भेजा जा सकता. 
पर यह सब कह चुके होने के बाद हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि लोकतान्त्रिक और बहुलवादी मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों को समलैंगिकता  को  (और अन्य सभी यौनिकतायें) जेनेटिक और इसीलिए ‘प्राकृतिक’ होने की वजह से ही नागरिक अधिकार मानने का तर्क देने से बचना चाहिए. वस्तुतः प्राकृतिकता का यह सिजोफ्रेनिया से लेकर सब कुछ को 'जेनेटिक' बनाने में लगी बाजारी ताकतों की साजिश के साथ जा खड़ा होता है. साथ ही बहुलवादी यौनिकताओं को अपनी सभ्यता के गौरवशाली अतीत का हिस्सा, शास्त्रसम्मत और पारंपरिक बताने जैसे तर्क भले ही वक्ती तौर पर फिलहाल समलैंगिकता को धर्मविरोधी अनैतिकता से लेकर बीमारी तक बताने वाले सभी धर्मों के कट्टरपंथियों को जवाब देना आसान करें, लम्बे दौर में यह तर्क भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ खड़े होंगे. समलैंगिकता अगर किसी एक धर्म की परम्परा या किताबों में हो भी तो वह अन्य धर्मों को कैसे मान्य हो जायेगी? या परम्परा का हिस्सा न होने की स्थिति में भी अगर कोई धर्म आगे बढ़कर यौनिकता की स्वतंत्रता स्वीकार कर ले जैसे अभी हाल में कैथोलिक चर्च ने किया तो उससे इसकी कानूनी स्थिति पर क्यों फर्क पड़ना चाहिए? धार्मिक मान्यता न होने की कसौटी से ही नागरिकों के निजी अधिकारों का हनन किया जा सकता है? 
भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ का क़ानून धार्मिक आधारों पर नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित विधि के शासन के अनुरूप होना चाहिए. और विधि के शासन में सभी बालिग़ नागरिकों को किसी को नुकसान पंहुचाने वाली आपराधिक गतिविधियों में लिप्त न होने पर दैहिक और जीवन की अनुल्लंघनीय स्वतन्त्रता प्राप्त होती है, होनी चाहिए. 

विधि के शासन पर आधारित यही क़ानून व्यवस्था बनाये रखना और उसे तोड़ने वालों को सजा दिलवाना राज्यसत्ता का काम होना चाहिए, दो व्यक्तियों के बीच सहमति से बने संबंधों की पहरेदारी करना नहीं. यही वजह है कि अदालत का यह फैसला नैतिक और विधिक आधारों पर गलत ही नहीं है बल्कि इसकी संदिग्ध संवैधानिकता वाला भी है. धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर नैतिकता के दावे से लैस बहुमत की की तानाशाही का खतरा लोकतान्त्रिक समाजों को भीतर से मिलने वाली सबसे बड़ी चुनौती होता है. बहुमत को खुश रखने को मजबूर विधायिका वाले इन समाजों में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा कीजिम्मेदारी न्यायपालिका की ही बनती है. फिर हमले चाहे कितने ही पूर्वाग्रहपूर्ण क्यों न हों, न्यायपालिका उन्हें सांवैधानिकता की कसौटी पर कस निर्णय लेने को वचनबद्ध है. अफ़सोस है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यौन अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने से चूक गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वह और सरकार दोनों इस गलती को जल्द से जल्द सुधार लेंगे. 

December 10, 2013

Asia: Economic Powerhouse that is Home to Hunger.

[This is an AHRC Statement on The State of Hunger in Asia, 2013]

The tale of hunger in Asia is a troubling one. It tells of people who have slipped through the cracks. Such people, citizens, supposed to enjoy the universal human rights promised to all human beings, have become invisible. While their states celebrate extraordinary tales of economic growth, the victims are left behind; a cursory glance at the recent stories of growth and development in these countries shows how inequitable it has been for those at the margins of society. Many hardships are faced to access what should be theirs as a matter of right.
In 2013, the AHRC has worked to support the right to food for all, through its Right to Food desk. These efforts include active engagement in varying degrees with six Asian countries throughout the year. These countries are India, Nepal, Pakistan, Bangladesh, the Philippines and Indonesia. The idea central to the right to food programme is to alter the dominant discourse in these countries, one that sees right to food as a non-justiciable right, so it may instead be considered an inalienable part of the right to life with dignity.
To this end, AHRC's Right to Food desk has documented, researched, and analyzed data from these countries, and other sources, in an effort to create comprehensive understanding of the challenge that hunger presents. Today, on Human Rights Day, the Asian Human Rights Commission releases its first State of Hunger in Asia Report, 2013. The report collates and sifts the most critical learning from the year. The report may be accessed online here.
In many countries a substantial section of the population stands at the threshold of poverty and food insecurity due to skewed development policies adopted by their governments. The Philippines are one such example. Another case is India, where there is neglect of communities, which are socially and economically exploited and discriminated against on the basis of caste. Apart from these socio economic factors which influence food security, the geographical terrain and lack of access to remote regions plays an important role in regarding poverty and hunger in countries like Nepal where the plains are better off than the mountains because of greater accessibility. Social stratification plays itself out even in these regions and the dominant groups and communities are found to be much better-off compared to the vulnerable and excluded ones.
In the case of Bangladesh, overall improvement in human development indicators do not necessarily mean a reduction in extreme levels of poverty; on the contrary, reports suggest an increasing number of the people are likely to slide into poverty in the coming years due to the faulty policies and programmes pursued by the state. While the nature of the problem of hunger and food insecurity manifests itself differently in various countries, it would not be too far-fetched to generalize that hunger, malnutrition, and poverty continue to remain a constant challenge for Asian countries to reach their goals of development and equitable growth.
Ironically, hunger and extreme poverty do not persist because of the states' failure to recognize them as real issues. Rather, what is clear from the policies and plans of these countries is the complete neglect and insensitivity of the states towards the conditions of a majority of their population. This is seen when the governments choose to pay heed to the concerns of a small but influential minority when deciding their development plans. Thus, the collaboration with private partners, export of agricultural products, and undertaking of "development projects" takes place to cater to this influential minority and to attract tourism, while often harming the interests of local populations.
Left with no other alternative, they are forced into multiple types of migration ranging from distress to wandering in a quest of survival and employment. Stories of these distress migrations play themselves across Asia, be it exodus to Metro Manila in Philippines, people flocking to sweatshops in Dhaka, or those who simply go missing from government records in India. Aggravating these forced movements are unemployment, poverty, lack of education and health facilities, and a general poor standard of living and working conditions in the places they reach. Often, the places where they migrate have no need of them, and they are forced to try to adapt without assistance. This makes the hardship even more difficult as it has a direct impact on their capacity to access health, education, housing, and other basic needs.
The problems are often compounded by the neoliberal model of development, shoved down the throats of some of the governments while happily adopted by others, that has led large sections of national populations to become impoverished by forcing the states into withdrawing programs from welfare schemes to services delivery systems. Suspension of hard earned labour rights in what is referred to as "special economic zones" in India or "export processing zones" in Philippines has also played a crucial role in disenfranchizing much of the labour force, stripping their rights away.
Among the factors perpetuating food insecurity in the region, faulty prioritization of concerns by national elites requires special analysis. Nepal is a key illustration of the quest of political democracy pushing everything else, the question of hunger included, into the background. The country has been in the "transition" for too long with the political leadership letting large sections of its population starve. The problem here, though similar to other countries, is aggravated by transnational migration of large segments of the male population into neighbouring India leaving the womenfolk behind to fend for themselves.
At the ground level, the issue is exacerbated by delivery mechanisms which are weak and not transparent. The fact that corruption is prevalent across Asia is internationally accepted; most of the funds meant for the impoverished does not reach them intact. Embezzlement and malfeasance throughout the system are part of life in many of these countries and allow only a small amount of funds to actually reach the intended beneficiary. This is further complicated by lack of transparency in the system wherein no proper checks and balances are maintained.
Most of these countries have ratified or are a signatory to many international covenants which make it mandatory for them to ensure that their citizens are provided with basic rights. In addition, the constitutions of these countries also provide for a right to life and livelihood, though the exact nature of this may vary. Yet, despite being bound by these covenants, the governments choose to ignore the real challenges facing its citizens. In order to address these issues, many organizations and campaigns in various countries have been fighting for food security. They have been pressuring the governments to make food security possible for its citizens. In the case of India, this resulted in the passing of the food security act in 2013. Though it has many limitations, such an act is definitely a positive step given the widespread hunger, malnutrition, and death in the country.
Addressing the problems of transparency, corruption, policy planning, grievance redressal mechanisms, and feedback remains central to making food security a reality. In short, the basic objective is to radically restructure the discourse on right to food and make it a right of the people. This can only be achieved through a relentless focus on building an honest delivery mechanism with corresponding mechanisms for addressing failures. Only in the presence of a strong initiative by the governments of these countries to build a strong, comprehensive, mechanism can food security be achieved. In the absence of this, the contradictions of growth and inequity, development and poverty will only continue to deepen the crisis already threatening these countries.

December 07, 2013

मेट्रो में मंडेला (हांगकांग 7)

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 07-12-2013 को प्रकाशित]


सुबह-ए-हांगकांग भी कमाल शय है. बेतरह, लगभग बेसबब भागते हुए भी कहीं न पंहुचने वाली सुबहें. रोजबरोज मिनी बसों से लेकर डबल डेकर बसों से होकर मेट्रो जिसे यहाँ एमटीआर कहते हैं से टकराने की सुबहें. अपने साथ भागते कुछ अजनबी चेहरों के पहले आशना होने और फिर उनसे मुस्कुराहटों का रिश्ता बन जाने की सुबहें. और अचानक उनका दिखना बंद कर देने पर इस भारी अहसास की सुबह कि हमने तो उनका नाम तक नहीं पूछा था. सोमवार से शनिवार तक भागते हुए ऑफिस पंहुचने की वह सुबहें जो बेपनाह भीड़ का समन्दर पार करने की यातना और अपने घर की तन्हाई से निकल जिन्दा इंसान देखने के सुकून के बीच डोलती रहती हैं. हफ्ते भर भागना और फिर इतवार को नींद पूरी करना, यही तीन तरफ समंदर और चौथी तरफ चीन से घिर फ़ैल न पाने को मजबूर इस शहर की ऊँची होती जा रही इमारतों में कैद बाशिंदों की नियति है. इसीलिए बाकी विश्व नगरों का पता नहीं पर हांगकांग की सुबहों में सूरज नहीं बस सफ्ताहांत का इन्तेजार होता है.

इन सुबहों में अक्सर उनींदी आँखों में भरे सपनों वाली उन लड़कियों से मुठभेड़ हो जाती है जो तिल रखने की जगह न होने की हद तक भरी मेट्रो में भी मेकअप पूरा करने की जगह ढूंढ लेती हैं. उन अधेड़ होते जोड़ों से भी जो साथ साथ अलग ऑफिसों की तरफ भागते हुए घरेलू काम बाँट लेते हैं. इन सुबहों में कोई कोना पकड़ अपने प्लेस्टेशन में इस कदर डूबे लड़के भी होते हैं जो हर रोज अपना स्टेशन छूट जाने से ठीक पहले हडबडाहट में उठते हैं और लगभग कूदते हुए बाहर जा रही भीड़ में खो जाते हैं. पर फिर इन सुबहों का सबसे खूबसूरत बिम्ब होते हैं प्यार में डूबे हुए वे जोड़े जिनके लिए अपने सिवा और कुछ नहीं होता.

इतने सारे दृश्यों में अक्सर एक दृश्य साझा होता है, मेट्रो में चल रही टेलीविजन स्क्रीनों को देख रही उचकी हुई गर्दनों का दृश्य. वह स्क्रीन जिसपर सिर्फ कैंटोनीज भाषा में आ रहे विज्ञापनों, फ़ुटबाल मैचों और घुड़दौड़ों के बीच कभी कभी  वह खबरें भी आ जाती हैं जो न आतीं तो वह डब्बा हमें बस लोरी सुनाने वाली मशीन भर लगता. कमाल यह कि इन खबरों के आने का पता हमें स्थानीय निवासियों के सर घुमा लेने से चलता है. उनकी निगाहें स्क्रीन से हटीं तो समझ जाइए कि खबरों का वक़्त है और फिर सिर्फ दृश्यों के आधार पर खबर क्या है का अंदाज़ लगाइए. इतने सालों की समझ का हासिल है कि कोई टाइफून या बड़ा सेलेब्रिटी न आ रहा हो तो इस शहर को सच में खबरों की ज्यादा परवाह नहीं होती. शायद इसलिए भी कि यहाँ या तो अखबार बहुत मंहगे बिकते हैं या फिर विज्ञापनों के बीच शहर की एकाध खबरें देने वाले मुफ्त बांटते हैं.

आज मगर और दिन था. उचकी गर्दनों को नीचे न आते देख चौंक स्क्रीन पर देखा तो पहले जैकब जुमा और फिर नेल्सन मंडेला नजर आये और फिर भाषा की जरुरत ही नहीं रही. यही खबर थी मन जिससे महीनो से बचना चाह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर को न देख सके हम जैसे लोगों के लिए मंडेला इस युग के अंतिम महानायक थे. वह 37 साल लम्बी कैद जैसी यातनाएं झेल भी रंगभेदी सरकार से जीवन भर लड़ उसे परास्त करने वाले ऐसे योद्धा थे जिनमे जीत के बाद दुश्मन को माफ़ कर एक नयी शुरुआत कर सकने का नैतिक साहस था.

पर फिर ख्याल आया कि खबर बड़ी है सो टीवी पर है पर ये हांगकांग को क्या हो गया? अपनी भौतिक सुविधाओं में डूबे रहने वाले इस शहर की आँखों में मंडेला के लिए ऐसी मुहब्बत किन राहों से और क्यों कर पैदा हो गयी होगी? हांगकांग तो आखिर क्रिकेट भी नहीं खेलता, आईसीसी खेलने वाली यहाँ की टीम में तो बस दक्षिण एशियाईयों से ही बनती है. नजर फिर घुमाई और गर्दनें अब भी उचकी हुईं थीं. यह मंडेला की ताकत थी. एक ईमानदार लड़ाई लड़ जीत हासिल कर मिसाल बन जाने की वह ताकत जिसका असर तीन समंदर पार हांगकांग पर भी था.


या यह हांगकांग की भी ताकत थी. आखिर को सतह पर पूरी तरह गैरराजनीतिक इस शहर में कुछ तो है जो इसे राजनैतिक अधिकारों के प्रति उन्माद की हद तक संवेदनशील बनाये रखता है. कुछ तो है जो निजता के अधिकार की रक्षा के लिए अमेरिकी सरकार से लड़ जाने वाले एडवर्ड स्नोडेन को उसके यहाँ सुरक्षित होने का यकीन दिलाता है. कुछ तो है जो फिर हांगकांग प्रशासन पर बढ़ते अमेरिकी दबाव को देख तूफानी बारिश वाले दिन हजारों हजार निवासियों को स्नोडेन के समर्थन में सड़कों पर उतार लाता है. काश, यह चेतना सारी दुनिया में फ़ैल जाए सोचते हुए अपना स्टेशन आ गया था. और आज बाहर निकल ऑफिस की तरफ बढ़ते हुए हांगकांग थोड़ा और अपना, थोड़ा और प्यारा लगने लगा था.