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November 09, 2013

खो गयी जुबानों वाले शहर में (हांगकांग 5)


[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 'इशारों की जुबां' शीर्षक से 09-11-2013 को प्रकाशित]

कैसा लगेगा आपको अगर आप के पास शब्द हों पर अर्थ खो जाएँ? अगर आपको अचानक पता चले कि आपकी अपने समाज से हासिल हिंदी और मेहनत से कमाई अंग्रेजी, दोनों जुबानें खुद के घर का पता तक नहीं बता सकतीं? भाषा के अर्थ खो देने की कीमत अजनबी शहरों के घर हो जाने के हादसे से जूझते हम प्रवासियों से पूछिए. किसी नयी जगह से गयी रात तक पार्टी करके लौटते हुए बसों के रास्ते सिर्फ कैंटोनीज में लिखे देख रीढ़ की हड्डियों में कैसी सिहरन उतरती है हमसे बेहतर कोई नहीं बता सकता.

हांगकांग नाम का यह शहर हमारी जिंदगियों से ऐसे हसीन खेल रोज खेलता रहता है. तब जब यह विश्व नगर अचानक से अंग्रेजी छोड़ सिर्फ कैंटोनीज बोलने पर उतर आता है. ऐसे बहुत प्यारा शहर है यह. खूबसूरत ही नहीं, खूबसीरत भी. भले लोगों का शहर जिनकी नजर में आपकी भूरी त्वचा को देख हिकारत भरी अजनबियत नहीं उपजती. ऐसा शहर जिसमे आपको किसी पार्टी के बाद थोड़ा लड़खड़ाते हुए घर लौटने को बस के इन्तेजार में खड़े हुए नस्ली हमलों का डर नहीं लगता.  ऐसा शहर जिसमे किसी से टकरा जाने पर आप मुस्करा के उम्मगाई (शुक्रिया और माफ़ करें दोनों के लिए कैंटोनीज शब्द) बोलते हैं और अपनी राह चल पड़ते हैं.

महानगरों से विश्व नगरों तक का सफ़र कर आई दुनिया में एशिया का विश्व नगर होने का दावा करने वाले शहर में होना भी तो यही चाहिए. फिर किसी के कुछ भी दावा कर देने वाले इन समयों में हांगकांग का यह दावा ‘ग्लोबलाइजेशन एंड वर्ड सिटीज’ सर्वेक्षण में अल्फ़ा प्लस, यानी कि बस न्यूयॉर्क और लन्दन से पीछे होने, से प्रमाणित भी है. (ससंदर्भ समझना हो तो ऐसे देखें कि इस सर्वेक्षण में मुंबई हांगकांग से एक पायदान पीछे यानी कि सिर्फ अल्फ़ा और दिल्ली दो, यानी अल्फ़ा माइनस है.) फिर चाहे सुरक्षा का अहसास हो या भेदभाव की अनुपस्थिति, यह शहर सच में विश्व नगर होने के हर मानक पर खरा उतरता है.

पर फिर, हम प्रवासियों से बात करिए और आपको पता चलेगा कि आसमान छूती इमारतों और जमीन छूती कीमतों के बीच तिरते रहने वाला हांगकांग तो बस सेन्ट्रल और मोंगकाक नाम के ‘टूरिस्टी’ इलाकों में ही ख़त्म होने लगता है. शहर के साथ ही छीजने लगती है अंग्रेजी भी, और फिर सिर्फ सुपरस्टोर्स में जरा सी बचती है. उसके बाद ‘न्यू टेरिटोरीज’ नाम का जो हांगकांग है वह डर, रोमांच और उत्सुकता के बीच की कोई जगह है. वह हांगकांग जिसमे अंग्रेजी उतनी  गायब होती है जितनी हिंदी. ऐसे कि जिस गांव में मैं रहता हूँ उसमे हैम तीन-चार परदेशी लोगों को छोड़ बमुश्किल कोई अंग्रेजी बोलता हुआ मिलता है. यह हांगकांग वह शहर है जहाँ आपको अचानक ज्ञान और भाषा का अंतर समझ आने लगता है.

वैसे सच कहूँ तो जुबान खो जाना सिर्फ बुरा भी नहीं है. भाषा संवाद के रास्ते खोलती है यह तो हमेशा ही पता था, पर बंद भी करती है यह इसी शहर ने सिखाया. टैक्सी वाले की ख़राब अंगरेजी को मीलों पीछे छोड़ती अपनी कैंटोनीज में घर का रास्ता समझाते जितना भी गैरभाषाई संवाद सीखा, इसी खूबसूरत शहर में सीखा. ‘वेट मार्केट्स’ में सब्जी खरीद ‘सप मन’ (शायद 10 डॉलर) जैसे अनजान शब्दों से जूझने की जगह पैसे बढ़ा देना यूँ  यहाँ आम रवायत है पर एक एक पैसे का मोलभाव करने की आदत वाले अपने हिंदुस्तानी मन ने मुश्किल से ही सही यहीं अपनाया. फिर सब्जी वाली का पूरी ईमानदारी से पैसे लेकर बचे वापस करने पर आदतन संदेही मन ने एकाध बार उनकी सब्जियों के दामों को सुपरस्टोर्स से परखा भी, पर फिर शर्मिंदा ही हुआ.

पर सबसे खूबसूरत यह कि, इस बार स्थाई निवासी हो जाने से पहले इस शहर से हुई तमाम मुठभेड़ों में बेहतर अंग्रेजी की वजह से गर्व से लैस सहकर्मियों को इन स्थितियों में फंसते देख ‘अंग्रेजीदां आभिजात्य’ की सीमाएं समझने के मजों से भरपूर मौके भी बहुतायत से दिए हैं. और ऐसे हर मौके पर समझ आया कि साझा शब्दों की अनुपस्थिति में हम गँवई, जाहिल कहे जाने वाले लोग आभिजात्य वर्ग वालों से बहुत बेहतर संवाद स्थापित कर पाते हैं. अपनी तमाम क्रांतिकारिता के बावजूद अचेतन में कहीं बची रही कुलीन हो जाने की ख्वाहिश को थोड़ा थोड़ा कर निपटते देखने का सबब भी शब्दों को अर्थहीन बना देने वाले यही हादसे हैं.

ऐसा नहीं है कि ये हादसे खटकते नहीं. बहुत खलता है जब आप अपनी समझ से लौकी खरीद कर लायें और वह करेला निकल जाए. या तब जब कोई आम सी चीज खरीदने के लिए इशारों से -वह वाला, नहीं नहीं उसके बगल वाला पैकेट- बताते हुए पीछे लग आई पंक्ति खुद को असहज करने लगे. पर सबसे ज्यादा तब जब अंग्रेजी को लेकर लगभग कुंठित अपना समाज याद आ जाता है. कभी नहीं देखा कि दो चीनी मिले हों और अंग्रेजी में बात करने लगे हों. बसों और मेट्रो में लोगों के हाथ में ज्यादातर अंग्रेजी नहीं, चीनी पत्रिकाएं और किताबें ही दिखती हैं, यहाँ तक कि मोबाइल फोन से लेकर लैपटॉप तक कुछ भी खरीदें, उसका मूल सेटअप चाइनीज में ही होता है. अक्सर लगता है कि तकनीक अगर चाइनीज में हो सकती है तो हिंदी/तमिल/बांगला में भी हो ही सकती है.

पर अंततः संवाद का साधन भर होने वाली भाषा को आभिजात्य का प्रतीक बनाये बैठे लोग वह क्यों कर होने देंगे. 

2 comments :

  1. वह डर, रोमांच और उत्सुकता के बीच की कोई जगह है
    आदतन संदेही मन ने एकाध बार उनकी सब्जियों के दामों को सुपरस्टोर्स से परखा भी,
    क्रांतिकारिता के बावजूद अचेतन में कहीं बची रही कुलीन हो जाने की ख्वाहिश
    कोई आम सी चीज खरीदने के लिए इशारों से -वह वाला, नहीं नहीं उसके बगल वाला पैकेट- बताते हुए पीछे लग आई पंक्ति खुद को असहज करने लगे. //
    dimaag mein chal rahI baton ko itani khoobasoorati se shabdon mein rakh denaa bhi ek kalaa hai . Kudos !

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  2. हांगकांग नाम का यह शहर हमारी जिंदगियों से ऐसे हसीन खेल रोज खेलता रहता है. तब जब यह विश्व नगर अचानक से अंग्रेजी छोड़ सिर्फ कैंटोनीज बोलने पर उतर आता है. ऐसे बहुत प्यारा शहर है यह. खूबसूरत ही नहीं, खूबसीरत भी. भले लोगों का शहर जिनकी नजर में आपकी भूरी त्वचा को देख हिकारत भरी अजनबियत नहीं उपजती. ऐसा शहर जिसमे आपको किसी पार्टी के बाद थोड़ा लड़खड़ाते हुए घर लौटने को बस के इन्तेजार में खड़े हुए नस्ली हमलों का डर नहीं लगता. ऐसा शहर जिसमे किसी से टकरा जाने पर आप मुस्करा के उम्मगाई (शुक्रिया और माफ़ करें दोनों के लिए कैंटोनीज शब्द) बोलते हैं और अपनी राह चल पड़ते हैं.
    bahut hi prabhaavi likhte hain aap...

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