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November 24, 2013

यहाँ तारे नहीं दिखते.... (हांगकांग 6)

मैंने कभी तारे नहीं देखे, समंदर में तिरती हजारों रोशनियों को देखती हुई ऐमी ने 
अचानक कहा था. सारे तारे रात में हमारे शहर में उतर आते हैं, मेरी निगाहों में सवाल उठें उसके पहले ही जवाब भी हाजिर था. हम पर्यटन मानचित्र पर हांगकांग का हस्ताक्षर समझे जाने वाले विक्टोरिया हारबर पर बैठे थे और दुनिया का शायद सबसे ज्यादा देखा जाने वाला लेजर लाइट शो ‘सिम्फनी ऑफ़ लाइट्स’ बस शुरू होने को था. दुनिया भर के पर्यटकों से भरे हार्बर का ऊपरी व्यूइंग डेक रौशनी का नृत्य शुरू होने के पहले ही दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों और खनकती हंसी से भर गया था. आधे घंटे में शहर का इतिहास समेटे इस प्रदर्शन को लगभग चमत्कृत भाव में देखते हुए हमारे ठीक पीछे खड़े एक रूसी जोड़े ने एक दूसरे को बाहों में भर लिया था.


जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों से सपनों की दुनिया में उड़ा ले जाने वाला यही भाव हांगकांग का स्थाई भाव है. एक शहर जो हकीकत कम सपनों में ज्यादा जीता है. लोग जो आसमान चूमती इमारतों के क्यूबिकल्स में फंसे बोझिल दिनों में शाम का इन्तेजार करते हुए जीते हैं. रात उतरने के साथ साथ कन्धों से टकराते कन्धों से भर जाने वाली सड़कें जिनपर चलना मुश्किल हो जाता है. मोंगकाक, जॉर्डन और तमाम जगहों में गुलजार हो जा वाले ओपन एयर रेस्टोरेंट्स जिनमे बत्तख से लेकर सांप तक सब मिलता है पर शाकाहारी भोजन की तलाश कस्तूरी मृग के सुगंध तलाशने से भी बड़ी कवायद साबित होती है. सात सौ वर्ग फीट की जगह को महल समझने वाले शहर में खुलेपन की यह तलाश ही है जो मुझे अपनी सहकर्मी के साथ अगला दिन काम का होने के बावजूद विक्टोरिया हारबर खींच लाई थी.

रात गहराने के साथ साथ और रौशन हो रहे हांगकांग में हम हारबर से ‘एवेन्यु ऑफ़ स्टार्स’ होते हुए एमटीआर (मेट्रो) स्टेशन की तरफ बढ़ रहे थे. तुम्हे पता है, दुनिया में हमारे ब्रूस ली से बड़ा कोई अभिनेता नहीं हुआ, ऐमी फिर बोल पड़ी थी. अभिनेता का पता नहीं, हाँ मार्शल आर्ट्स का वैसा इस्तेमाल करने वाला कोई जरुर नहीं हुआ मैंने जोड़ा था. खंडित मूर्तियाँ में सदी के महानायकों की तलाश करने को अभिशापित देश से आने वाले मुझ जैसे शख्श को ब्रूस ली के चले जाने के इतने बरसों बाद भी मिलने वाला शहर का प्यार अचंभित करता रहा है. अक्सर लगता है कि हारबर पर मौजूद उस मूर्ति की मुद्रा में तस्वीरें खिंचवाते तमाम लोगों की आँखों में मैंने पानी उतर आया देखा है.

एमटीआर पर ऐमी से विदा लेते हुए अपने जेहन में हिन्दुस्तान के तमाम शहरों में की गयी आवारगी दोहराने का खयाल तारी हो आया था और कदम ‘गोल्डन माइल’ कहे जाने वाली नाथन रोड पर बढ़ चले थे. रात के ११ बजे भी रोज तरह गुलजार सड़क पर एक दूसरे में खोये हुए जोड़े थे, अगली सुबह के काम के बोझ के ख्यालों में डूबे बहुत तेजी से बस स्टैंड्स की तरफ बढ़ते कदम थे, बंद हो गए स्टोर्स के बाहर खड़े सिक्योरिटी गार्ड्स थे, सालों पैसे बचा दुनिया घूमने निकल पड़े यूरोपियन और अमेरिकी बैकपैकर्स थे. और हाँ, प्रवासी पक्षी, यानी कि तंग जींस और टीशर्ट में घूमती सेक्स वर्कर्स थीं और उनपर आतुरता से पड़ती पर्यटक निगाहें थीं. ज्यादातर फिलीपीना यह लड़कियां बिना शक हांगकांग के सबसे बदनाम, या मशहूर, रेड लाइट जिले वानचाई में आज ग्राहक न मिल पाने की वजह से इधर निकल आयी होंगी, मैंने सोचा था. अरसे से सोच रहा हूँ कि उनसे बात करूँ, समझूँ कि क्या है जो उन्हें अपने वतनों से इतनी दूर दुनिया का सबसे पुराना कहे जाने वाले इस धंधे में ले आता है. पर फिर एकाध बार अचानक टकरा गयी निगाहों में उनकी आँखों में दिखा खालीपन हमेशा हिम्मत तोड़ गया.

न जाने क्यों मेरी निगाहें आसमान की तरफ़ उठ गयी थीं. सच में ऊपर तारे नहीं थे, बस नियोन रोशनी की आकाशगंगा थी. रात की स्याही को इस अजब रौशनी से भर देना, यह भी हांगकांग का एक स्थाई भाव है, वह भाव जो रात से जुड़े सारे डर रोमांच भरी उत्सुकता में बदल देता है. तन्द्रा टूटी तो दिखा कि अपनी आवारगी का सफ़र एक टिन हाऊ मंदिर के इर्द गिर्द बसे ‘या मा तेई’ के ‘टेम्पल स्ट्रीट’ तक पंहुच आया था. यह वह जगह है जहाँ पर्यटकों का हांगकांग स्थानीय निवासियों के हांगकांग से टकराता है. वह जगह जहाँ मंदिर में पूजा कर रहे लोग बाहर की बाजार में ठेलों पर लगे सेक्स टॉयज खरीदते हुए नहीं हिचकते. वह जगह भी जो जैकी चान और ब्रूस ली की फिल्मों से निकल दुनिया भर के लोगों की जिंदगियों का हिस्सा बन आया है.

खुद से फिर किसी रात यहाँ से आगे की आवारगी पर निकल पड़ने के वादे के साथ वक़्त घर लौटने का हो आया था.

3 comments :

  1. राजनैतिक विचारधारा कुछ भी हो, लेकिन आपके शब्दों में जबर्दस्त जादू है, खास तौर पर दैनिक जागरण वाले 'परदेस से' के स्तंम्भों में. मज़ा आ जाता है, अंगेरजी पढ़ने में वो मजा नहीं है. :) लिखते रहिये, आगे बढ़िए, शुभकामनाएं।

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  2. भइया मै आदित्य की बात को थोड़ा और तानना चाहूंगा..। आपने शब्दों से हांगकांग के जादूई दृश्यों को रचा है..। एकदम जिंदा दृश्य हिन्दुस्तानी लहजे में..। मजा आ गया पढ़कर..अब तक मालूम नहीं था, वजह जागरण कभी-कभार पढ़ना होता है..लेकिन ये कॉलम अब जरूर नजरों से गुजरेगा.. बेहतर होगा कि ये हम जैसे शब्द भुक्खड़ों को फेसबुक पर ही मिल जाया करे, नहीं तो वेब पर मिलेगा ही..। बधाई...।

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  3. भइया मै आदित्य की बात को थोड़ा और तानना चाहूंगा..। आपने शब्दों से हांगकांग के जादूई दृश्यों को रचा है..। एकदम जिंदा दृश्य हिन्दुस्तानी लहजे में..। मजा आ गया पढ़कर..अब तक मालूम नहीं था, वजह जागरण कभी-कभार पढ़ना होता है..लेकिन ये कॉलम अब जरूर नजरों से गुजरेगा.. बेहतर होगा कि ये हम जैसे शब्द भुक्खड़ों को फेसबुक पर ही मिल जाया करे, नहीं तो वेब पर मिलेगा ही..। बधाई...।

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