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October 20, 2013

हम तुम्हारे गुनहगार है शाहबानो. और आपके भी आरिफ़ भाई.

आज अचानक मोहम्मद अहमद खान साहब याद आ गए. ऐसे कि ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे थे. उन्हें
Courtesy: The Hindu
जानते हैं आपनहीं नकैसे जानेंगेअंशु मालवीय की एक शानदार कविता के हवाले से याद दिलाने की कोशिश करूँ तो शाहबानो का तलाक सब जानते हैंकौन जानता है उसके निकाह के बारे मेंकुछ समझ आया? नहीं? सो जनाब मोहम्मद अहमद खान साहब शाहबानो के तलाक का बायस माने उनके वो शौहर थे जिन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव में पहले उन्हें घर से निकाल बाद में तलाक दे दिया था. जब ये मामला हुआ था तब अपन बहुत छोटे थे, दिमाग में कुछ ठीकठीक दर्ज हो जाय उस उमर तक पंहुचने में कुछ साल बाकी होने की उमर में थे. पर जाने क्यों ये कहानी याद रही. शायद इसलिए कि इस कहानी के एक किरदार ने 1989, यानी यादों की गठरी बाँधने की शुरुआत के समयों में बगल के लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और तब के उस शख्स के किस्से अब भी दिमाग की डायरी में दर्ज हैं.

छोटे में किस्सा यह कि 1975 में अहमद साहब ने शाहबानो को घर से निकाल दिया. अब हर तरफ से बेसहारा शाहबानो के पास अपने बच्चों की परवरिश का कोई रास्ता न था सो 1978 में उन्होंने अदालत जाकर अहमद साहब से गुजारे भत्ते की दरकार दी. इंसाफ़ की हिन्दुस्तानी रवायत के मुताबिक अदालत दर अदालत रेंगते हुए पूरे बरस बाद मुद्दा जब सुप्रीम कोर्ट पँहुचा तो उसने वही किया जो कोई भी इंसाफ़पसंद अदालत करती,  क्रिमनल प्रोसिज्योर्स एक्ट का सेक्शन 125 लगाते हुए शाहबानो को गुजारा भत्ता देने का आदेश दे दिया.

पर फिर एक अकेली, बुजुर्ग और बेसहारा औरत को गुजारा भत्ता देने की गुस्ताखी मजहब वाले कैसे बरदाश्त कर लेते? सो उन्होंने वही किया जो ऐसे हालात में दुनिया के सारे मजहबों के ठेकेदार करते हैं.. खतरे में पड़ जाने का ऐलान. मुए मजहबों की की खतरे में पड़ जाने की ये बीमारी भी अजब है.. एक बेसहारा औरत को गुजारा भत्ता देने से इस्लाम खतरे में पड़ जाता है तो मीरा नायर की एक फिल्म में समलैंगिकता के जिक्र से हिंदुत्व. हाँ, ये दोनों तब खतरे में नहीं पड़ते जब उनके मानने वाले लाखों लोग भूख से लड़ाई हार कर मर रहे होते हैं. तब भी नहीं जब उनके झंडाबरदार अपनी बेटियों को इज्जत के नाम पर जिबह कर रहे होते हैं. पर यह कहानी मजहब वालों की तो है नहीं, सो वापस लौटते हैं.

सो कुल जमा हुआ यह कि मजहब पर ऐसे हमले से खफ़ा इस्लाम वालों ने तब की कांग्रेस सरकार को निशाने पर ले लिया. अब कांग्रेस ठहरी धर्मनिरपेक्ष सो ऐसे हमले से डर गयी. डरे भी क्यों न, कितना आसान होता है कौम के ठेकेदारों को साध उनको खुश रखना और फिर उनकी आबादी के बड़े हिस्से को भूख और गरीबी की तंग गली के बीच जीने को मजबूर कर भी उनका मसीहा बने रहना. और फिर पूरे बहुमत वाले 1986 के उन शानदार दिनों में तो ये और भी आसान था. सो कांग्रेस ने वही किया भी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तो बदल नहीं सकती थी तो उसने मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986) लाकर संविधान ही बदल दिया. इस नए क़ानून ने मुताबिक़ तलाक देने वाले शौहर पर अब तलाकशुदा बीबी को बस इद्दत (वह समय जिसमे महिला शादी नहीं कर सकती) भर ही गुजारा भत्ता देना था, उसके बाद यह जिम्मेदारी वक्फ़ बोर्ड की होनी थी.

पर कहानी तो मैं शाहबानो की भी नहीं कह रहा था. यह कहानी असल में आरिफ भाई की है. एक आदमी में कई आदमी होने की कहानी. आर फिर उनमे बस अच्छे वाले आदमी के हार जाने की कहानी. आसान अलफ़ाज़ में कहूँ तो यह कहानी उस आरिफ मुहम्मद खान की है जो शाहबानो मामले में इस्लामिक कठमुल्लों के खिलाफ खड़ा हो पाने का हौसला दिखाने वाला इकलौता मुसलमान था. उस आरिफ खान की कहानी जो अपनी ही पार्टी कांग्रेस के लाये बिल के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक लड़ा था. उस आरिफ भाई की कहानी जिसने इस मुद्दे पर पार्टी छोड़ दी थी.

उसके बाद जो हुआ वह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के दामन पर लगा हुआ सबसे बड़ा दाग है. आरिफ मोहम्मद खान के अकेले पड़ते जाने का दाग. जितना याद है वह यह कि वही दौर रिलायंस से लगायत तमाम औद्योगिक घरानों पर जंग छेड़ अकेले पड़ जाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह के कांग्रेस से बाहर आने का भी दौर था. वह दौर जिसमे वी पी सिंह ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देकर इलाहाबाद से फिर से चुनाव लड़ा था जिसमे कांग्रेस ने तब के ‘राम’ अरुण गोविल को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया था. (भारतीय राजनीति में राम की असली ‘इंट्री’ यहाँ से हुई थी, भारतीय जनता पार्टी उर्फ़ भाजपा के राम मंदिर आन्दोलन से नहीं पर वह किस्सा फिर कभी).

कमाल उपचुनाव था वह. मिस्टर क्लीन से मैले हो गए राजीव गांधी के खिलाफ एक जमीनी संघर्ष की शुरुआत का ऐलान करता हुआ चुनाव. वह चुनाव जिसे भारतीय राजनीति कि दशा और दिशा दोनों बदल देनी थी. वह चुनाव जिसे बाद में भारत में गठबंधन राजनीति की शुरुआत के बतौर जाना जाना था. अब चुनाव इतना बड़ा हो तो बेशक सबकी ख्वाहिश होगी उसकी हिस्सा बनने की सो आरिफ भाई की भी थी. पर होना कुछ और था. कहते हैं कि आरिफ भाई के इलाहाबाद आने की ख्वाहिश सुन वी पी सिंह के माथे पर पसीना छलक आया था. कहते हैं कि उन्होंने यह कहकर आरिफ भाई को प्रचार में न आने के लिए कहा था कि उनके आने से मुसलमान वोट कट जायेंगे.

आरिफ भाई ने इस पर क्या कहा यह पता नहीं. यह जरुर पता है कि फिर वह मुख्यधारा की राजनीति में अलग थलग पड़ते चले गए. यह भी कि उनके बाद फिर किसी मुसलमान नेता ने मुल्लों की, इस्लामिक कट्टरपंथियों की मुखालफ़त की हिम्मत नहीं की. यह भी कि फिर हिन्दुस्तानी सेकुलरिज्म का मतलब अकिलियत की, अल्पसंख्यकों की आबादी के बड़े हिस्से को किस्मत के हवाले छोड़ कौम के ठेकेदारों को खुश रखना हो गया.

खैर, वक्त के साथ आरिफ भाई अपनी भी यादों से खारिज होते चले गये थे. एक बार याद आये तब जब उनके भाजपा में शामिल हो जाने की खबर आई थी. तब पहले बेतरह चौंका था और फिर समझ गया था. हिन्दुस्तानी सेकुलर पार्टियों से खारिज होने को अभिशप्त एक सेकुलर मुसलमान की नियति और हो भी क्या सकती थी?


आज अहमद मोहम्मद खान को ट्रेंड करते देख आप याद आये आरिफ भाई. (या आप संघी रवायत में ‘जी’ हो गए हैं अब तक? मत होइएगा.. आरिफ जी बहुत चुभेगा..) हम सब आपके गुनहगार हैं आरिफ भाई... हम सब  शाहबानो के गुनहगार हैं. हम सबने धर्मनिरपेक्षता को छला है. पर यकीन करिये, हम सब ठीक कर देंगे एक दिन. तब कोई किसी शाहबानो पर जुल्म करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा. तब किसी आरिफ को इंसाफ के हक में खड़े होने की सजा नहीं मिलेगी. 

5 comments :

  1. Samar Bhaiya Mai aapko jaanta hu par aap mujhe nai jaante is liye bata raha hu ki isse achcha aur behtareen koi likh hi nai sakta ya kah lijiye ki bayan nai kar sakta in saaree cheezo ko padhne ke baad har insaan apni sooch badalne pe majboor hoo jaye aur jo na badal paye wo INSAAN nai :)

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    1. शुक्रिया के सिवा और क्या कहूं भाई? नवाजिश है.

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  2. There are many times I don't agree with your views but one thing that I always say that your writing style is marvelous, awesome and so much sophisticated. You don't know me but I can say you are one of those rare people whom we can love, hate but can never ignore. Keep it up boss.

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  3. शाज़िया इल्मी इन्ही आरिफ़ के खानदान की हैं?

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  4. बहुत मार्मिक, धर्मनिरपेक्षता के खोखले दावो को , नेताओ के दोहरे चरित्र को अउर सबसे उपर धर्म की बलिवेदी पे इंसानियत की कुर्बानी की दास्ताँ

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