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October 26, 2013

गुलाम आँखों में आजादी के सपने देखने वाली लड़कियों के नाम (हांगकांग 4)

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 'गुलाम लडकियाँ' शीर्षक से 26-1-2013 को प्रकाशित]
उस खो गई लड़की की तलाश के लिए लगाये गए पोस्टर को देख कभी मेरी सहकर्मी रही दयान मारिआनो की आँखों में गहरी उदासी उतर आई थी. हांगकांग में भी ऐसे पोस्टर बहुत लगते हैं समर, बस वहाँ उनपर इन्सानों की नहीं बल्कि पालतू जानवरों की तस्वीरें होती हैं, फिर थोड़ा रुक कर उसने कहा था. 
अब याद नहीं कि कैविटे शहर में स्थापित फिलीपींस के सबसे बड़े एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (विशेष आर्थिक क्षेत्र उर्फ़ एसईजेड का स्थानीय नाम) में ट्रेड यूनियन के साथियों के साथ गुजारी उस शाम में अचानक उमस क्यों बढ़ गयी थी.  हाँ, यह जरुर पता है कि वह 70 लाख की कुल आबादी वाले हांगकांग में 3.5 लाख से ज्यादा की संख्या के बावजूद लगभग अदृश्य रहने वाली ‘विदेशी घरेलू नौकरानियों’ की जिंदगी से मेरी पहली सीधी मुठभेड़ थी. 
न, ऐसा नहीं कि पहले उन्हें देखा नहीं था. उलटे वीजा बढ़वाने के लिए इम्मीग्रेशन कार्यालयों में बिताई दोपहरियों से लेकर सुपरस्टोर में खरीददारी करते वक़्त तक तमाम बार स्थानीय आबादी से साफ़ साफ़ अलग दिखने वाले इस समुदाय से लगभग रोज ही साबका पड़ता रहा था. और फिर सफ्ताहांतों में तो सेन्ट्रल और काजवे, यानी शहर के सबसे पोश इलाकों में हर सार्वजनिक जगह पर अपने जनपथ जैसी लेडीज़ मार्केट से खरीदी सस्ती मगर बेहद खूबसूरत पोशाकों में सजी इन लड़कियों का ही कब्ज़ा होता है. और फिर चैटर पार्क से लेकर हार्बर तक की जारी जगहें चीनी आईफोन पर चहकती इन लड़कियों के सपनों से भर जाती हैं. 
पैसे कमा के घर भेजने से शुरू हो अपने स्थानीय बॉयफ्रेंड से शादी करके हांगकांग का स्थायी निवास हासिल कर लेने के चरम तक जाने वाले ये सपने भी कमाल होते हैं. पर उससे भी कमाल है इन लड़कियों का अपने सपनों का पीछा करने का वह हौसला जो उन्हें मलेशिया और इंडोनेशिया के इस्लामी और फिलीपींस के रोमन कैथोलिक रुढ़िवादी समाजों से हांगकांग जैसे बेहद खुले समाज में ले आता है और फिर बिना किसी छुट्टी के दो साल तक कैद रखता है. अनुबंध पत्र के मुताबिक़ दो साल में सिर्फ एक बार घर जाने की छुट्टी पाने वाली इन लड़कियों को रविवार की उन दोपहरों में उन्मुक्त हंसी हंसती लड़कियों को देखें और आप यकीन नहीं कर पायेंगे कि ये अपना घर परिवार और रिश्ते नाते ही नहीं बल्कि अपनी जिंदगी भी पीछे छोड़ आयीं हैं. शायद रविवार इनके लिए सिर्फ एक दिन नहीं बल्कि स्थाई अवसाद को जीवन के उत्सव में बदल देने की जिद होता है. फिर उस उत्सव में चाहे माइकल जैक्सन के गानों में थिरकना रोक नमाज पढ़ना और फिर थिरकने लगना शामिल हो. यह युग अतियों का हो न हो, विरोधाभासों को जीने का तो है ही.  
पर फिर उतरती शाम के साथ इनके चेहरों पर उतरती उदासी देखें और समझ आएगा कि इनके साथ जीवन कितना क्रूर है. दिन को और लम्बा कर सकने की असफल कोशिश के बाद मेट्रो में लौट किसी और के घर में वापस जाकर हफ्ते भर नीरस घरेलू काम करने को अभिशापित इन लड़कियों का चेहरा देखें, और आपके कानों में दुनिया का सबसे दुखभरा शोकगीत बज उठेगा. 
फिलीपीनी लडकियाँ घरेलू नौकरानी बनने हांगकांग जाती ही क्यों हैं, मैंने दयान से पूछा था. और विकल्प क्या हैं? यहाँ नौकरियां ही कहाँ हैं? हमेशा खिलखिलाती रहने वाली दयान की आवाज अब भी भारी थी. यहाँ स्नातक लड़कियों को भी पहले तो काम ही नहीं मिलता और मिल भी जाय तो 10000 (२००० हांगकांग डॉलर) पेसो से ज्यादा का नहीं. और उसमे शहर में एक कमरे में 8 से 10 लड़कियों के साथ रहना, खाने से लेकर आने जाने तक का खर्चा और फिर घर भेजने के लिए कुछ बचता ही कहाँ है? फिर यह गायब हो जाने का डर. हांगकांग में न्यूनतम वेतन 4200 डॉलर है और फिर रहना और खाना दोनों नियोक्ता की जिम्मेदारी. वह भी उसके ही घर में, उसके जैसा ही खाना. ऐसे में डिग्रियां बेमानी हो जाती हैं. मेरी प्रश्नातुर आँखों ने और जवाबों के रास्ते खोल दिए थे. 
पर इन जवाबों ने बस सवाल ही बढ़ाये थे. 1970 के बाद अचानक बहुत तेजी से विकास की राह में दौड़ पड़ने वाले हांगकांग के क़ानून के शासन पर यकीन को डगमगा देने वाले सवाल. हांगकांग की एक बात शुरुआत से ही बहुत अच्छी लगती थी, यह शहर आप्रवासी निवासियों और नागरिको में ज्यादा फर्क नहीं करता. और फिर लगातार 7 साल रह लें तो नागरिक ही मान लेता है, वोट देने का ही नहीं बल्कि चुनाव तक लड़ने का अधिकार दे देता है. हाँ, सिर्फ उन्हें जिन्हें वह इस काबिल मानता है और यह काबिलियत आमदनी से तय होती है, नौकरियों से तय होती है. ऐसे में ‘नौकरानियों’ के अनुबंधों में उनको स्थाई निवास न देने की शर्त होनी तो लाजमी ही है. हाँ, इस एक शर्त से क़ानून के सामने सबकी बराबरी के दावे ताश के महल से ढह जाते हैं. यह ढह जाना ही पूँजीवाद के दिखाये बराबरी के, मुक्त प्रतिस्पर्धा के सपनों की नियति भी है और नीति भी।
बचती है तो बस इस सबके बाद भी उन लड़कियों की आँखों में चमक और उनके होठों में खिलती मुस्कराहट. और यह यकीन की जिन्दा सपने कभी हार नहीं मानते. 

1 comment :

  1. अगर ये लड़कियाँ बूढ़ी हो जाती होगी तब
    शायद अपने वतन ही लौट जाती होगी, जिसने
    वहां शादी न की हो…!

    सरकार इन मुआमले में केस-टू-केस बेस पर कुछ
    लड़कियों को तो अच्छे करियर का अवसर दे ही सके…!
    पता नहीं हमारी सोच व्यवहार्य न भी हो !

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