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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

July 22, 2013

प्रायोजित मजमे आंदोलन नहीं होते.

[कल के लिए में प्रकाशित]

यह  फतवों का समय है. त्वरित फतवों का जिनमे टीवी स्क्रीन्स पर चीखते एंकर राष्ट्र की आवाज बन किसी को कुछ भी घोषित कर सकते हैं. ठीक वैसे जैसे उन्होंने अन्ना हजारे को नया मसीहा और जिन्दलों और बजाजों के पैसे से शुरू हुए उनके नाटक को आजादी की दूसरी लड़ाई से लेकर सम्पूर्ण क्रान्ति का दूसरा चरण और न जाने क्या क्या घोषित कर दिया था. घोषित करने को तो उन्होंने इस मजमे को हिन्दुस्तान का तहरीर चौक भी घोषित कर दिया था पर फिर, टीवी के पर्दों पर तिरती इन चमकीली छवियों की घोषणाओं से कुछ होता तो इंडिया शाइनिंग वाले बाजपेयी विस्मृत और लालकृष्ण आडवाणी आज भी परमानेंट प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग क्यों होते?

मसला साफ़ है. राष्ट्र राज्य की अपार ताकत वाले हमारे समयों में भौगोलिक सच अक्सर भू-राजनैतिक सच भी होते हैं और इन ‘सचों’ की हिफाजत करने वो फौजें होती जिनसे पार पाना असंभव न सही पर बेहद मुश्किल जरूर होता है. फिर भी, कभी कभी ये बंधन टूटते हैं और ये टूटना तब होता है तब, जब ऐतिहासिक प्रक्रियायों और कारणों के चलते ये जगहें सिर्फ जगहें न रहकर आम इंसान के गुस्से, विक्षोभ और सपनों का प्रतिबिम्ब बन जाती हैं. ऐसे कि जैसे तहरीर चौक.

पर तहरीर चौक ऐसे ही नहीं बन जाते. सत्ता उन्हें कितना भी कुछ और बनाना चाहे, फेसबुक क्रान्ति घोषित कर खारिज करना चाहे, हकीकत में वे लंबे दौर से उत्पीड़ित जनता के अंदर चल रहे मुक्तिकामी, क्रांतिकारी प्रक्रियायों की परिणिति भर होते हैं. इन क्रांतिकारी प्रक्रियायों के सन्देश को आत्मसात कर उठ खड़ी होने वाली जनता फिर किसी से नहीं डरती, न हुक्मरानों से न उनकी फौजों से और न उनकी हेजेमनी या बौद्धिक-सामाजिक वर्चस्व से. फिर इस जनता के नारे सिर्फ अपनी मुक्ति के नारे नहीं होते, उनकी आवाज का जवाब हर जगह की जनता देती है. ठीक वैसे ही जैसे काहिरा से उठते अय्येहुन्नास ('कोई है' के नारे के लिए अरबी लफ्ज़) का जवाब जब मनामा ने, बेनगाजी ने, ट्यूनिसिया ने लब्बैक (हम एक हैं) कह के दिया तो यह भूल कर दिया कि उनके सामने हथियारबंद फौजें खड़ीं हैं और यह भी कि दुनिया के किसी मुल्क में फौजें अवाम की हिफाज़त करने को नहीं होतीं. बस , कुछ ही दिनों के भीतर पूरे अरब-विश्व में लब्बैक और अय्येहुन्नास की गूंजती हुई आवाजें थीं , दशकों से सत्ता पे काबिज तानाशाहों की फौजें थीं और उनके सामने सीना तान कर खड़े लोगों के निडर चेहरे थे.

जान हथेली पर लेकर निकली इस अरब अवाम के गुस्से में दशकों से स्थगित सवालों के सारे जवाब हों न हों, उन रास्तों को ढूँढने की मुकम्मल ख्वाहिश थी जो उनके देशों को आजादी, बराबरी और लोकतंत्र के रास्ते पर ले जायेंगे. अरब लोगों ने ये रास्ते ढूंढ भी लिए. खबर भी नहीं हुई कि अवामी गुस्से की इस तपिश में मिस्र और ट्यूनिसिया की तानाशाहियाँ कब जल के खाक हो गयीं .

सत्तायें जानती हैं कि ढहती हुई हर तानाशाही गैर मुल्कों के मजलूम गुलाम लोगों को उम्मीद देती है, उनके आजादी के सपनों को लड़ने का हौसला देती है. यह भी कि फौजों के सामने बिना डरे खड़े हो जाने वाला हर एक शख्स हुकूमतों की ताबूत में एक और कील होता है. यूँ कि उसके चेहरे से गायब हो गया डर हुक्मरानों के चेहरों पर उतरने लगता है. और यहाँ तो तहरीर चौक से शुरू कर फौजों के सामने खड़े हो गए लोगों की कतारें थी. फिर इन मुल्कों में पहली बार , हुक्मरानों के चेहरे पर वह डर उतरने लगा जो उन्होंने अपने जाने लोगों की किस्मत में लिख दिया था.

इन तमाम देशों के संघर्षों में साझा बस एक चीज थी, तहरीर चौक पर देखा गया एक साझा सपना. सो इन तमाम मुल्कों ने, उनकी अवामों ने, तहरीर चौक का शुक्रिया भी अदा किया, ऐसे कि उन्होंने अपने मुल्कों में विरोध की सबसे बड़ी जगहों को तहरीर चौक बना दिया. अब तहरीर चौक संज्ञा नहीं एक विशेषण था, आजादी, अमन और बराबरी के सपने देखती जनताओं की ख्वाहिशों का सर्वनाम था.

पर फिर अचानक काहिरा का तहरीर चौक बरास्ते टीवी चैनल्स दिल्ली के जंतर मंतर से होता हुआ हमारे बेडरूमों में उतर आया. चाहे काहिरा में उमड़ती लाखों की भीड़ के सामने जंतर मंतर के चंद हजार लोग किसी गिनती में न हों, बावजूद इस सच के कि काहिरा में कम से कम तानाशाही के अंत की ख्वाहिश लिए अपनी जान दांव पर लगा कर सड़कों पर उतर आई भीड़ के सामने एसएमएसों से कोई खतरा ना होने की आश्वस्ति पाकर ही घर से निकले इन लोगों का तहरीर चौक के संघर्षों से दूर दूर तक कोई साझा न हो. अपने को तहरीर चौक कहने वाला, और इलेक्ट्रानिक मीडिया के अन्दर अपने कारिंदों से कहलवाने पर आमादा यह कुछ अजब सा तहरीर चौक था.

अरब देशों में इकठ्ठा होती भीड़ों पर गोलियां चलाती फौजों के बरअक्स इस भीड़ में बिसलेरी और बिस्कुट बाँटते लोग थे, वहां शहीद हो रहे लोगों के सामने यहाँ सिर्फ स्वास्थ्य के इजाजत देने तक अनशन की घोषणा करते लोग थे.

उस तहरीर और इस तहरीर में फर्क सिर्फ इतना भर नहीं था. यहाँ तो फर्क बुनियादी मूल्यों का, मान्यताओं का भी था. उन तहरीर चौकों में तानाशाहों के खिलाफ सारे अवाम की गुलाम इच्छाओं के कैद से बाहर आने की छटपटाहटें थीं और यहाँ एक दलित मुख्यमंत्री की दलितों वंचितों को कोर कमेटी में शामिल करने की मांग का भी उद्घोष जैसा नकार था. वहां दिलों में उबल रहा गुस्सा न केवल सरकारों बल्कि सरकारी शह पर जमाने से जनता को लूट रही कंपनियों को भी मार भगाने पर आमादा था और ठीक उलट यहाँ के तहरीर चौक के तो प्रायोजक ही कार्पोरेशंस थे.

अकारण नहीं है कि यहाँ के तहरीर चौक के नेताओं के हाथों में थामे कागज़ के पुलिंदों में कार्पोरेशंस के खिलाफ एक लफ्ज़ नहीं है, बावजूद इस सच के कि सरकारी भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा लाभ उन्हें ही होते हैं. वहां मांगें शासन में सबकी भागीदारी की थीं और यहाँ कल तक सामाजिक न्याय के खिलाफ, पिछड़े वर्गों को मिलने वाले आरक्षण के खिलाफ खड़े लोग रातों रात 'देश ' की आवाज बन गए थे देश के नेता बन गए थे. वहां सपने सबके साझे सुख के थे और यहाँ भ्रष्टाचार को उस मुल्क में भूख से बड़ा बताते लोग थे जिसकी 80 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम में एक पूरे दिन की जिन्दगी जीती है. उस देश में जहाँ नरेगा को सरकारी धन का अपव्यय बताने वाला फिक्की 'इस' तहरीर चौक पर सबसे आगे खड़ा होता है. उस देश में जिसमे हर बरस अम्बानियों और टाटाओं को 80000 करोड़ रुपये से ज्यादा की कर्जमाफी देश के विकास के नाम पर मिलती है.

वहां की लड़ाई सबके हक और हुकूक की थी और यहाँ संविधानिक प्राविधानों की वजह से कुछ शोषित लोगों के आगे बढ़ आने से सदियों से सत्ता पर काबिज लोगों के माथे पर बन रही चिंता की लकीरें थीं. वहाँ तानाशाहों के मिजाज से चलते शासन के खिलाफ एक लोकतांत्रिक संविधान बनाने के सपने थे और यहाँ बाबासाहेब के बनाए संविधान को खारिज करने की जिद थी.

वहां एक तानाशाह को भगा कर सामूहिक प्रतिनिधित्व वाला स्वतंत्र समाज हासिल कर पाने की जद्दोजहद थी और यहाँ एक व्यक्ति को संसद और संविधान से भी ऊपर खड़ा कर देने की हुंकारें थीं. या यूँ कह लें, कि वहां लड़ाई जम्हूरियत हासिल करने की थी और यहाँ उसे जमींदोज करने की.

बात साफ़ है, कि इस तहरीर चौक पर लिखी जा रही तहरीरें उस तहरीर चौक की इबारतों से न केवल अलहदा हैं बल्कि उनसे मुख्तलिफ भी हैं. इस मजमे के मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राम माधव की जगह थी शरद यादव की नहीं. इस मजमे में भारत माँ की संघी छवि थी, वन्देमातरम के साथ बिलकुल भाजपाई अंदाज में लहराते तिरंगे थे. 

यह मजमा जनता के गुस्से प्रतिबिम्बन तो छोड़िये ही विरेचन तक नहीं था. इस मजमे के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की अब न पलती जा सकने वाली धारा के विरोध में, ओबीसी आरक्षण के विरोध में खड़े मेरिटवादी अरविन्द केजरीवाल थे, मध्यवर्गीय नैतिकता की झंडाबरदार किरण बेदी थीं, और राज ठाकरे और उसके गुंडों के उत्तर भारतीयों पर बर्बर और वहशियाना हमलों का समर्थन करते अन्ना हजारे थे. चौंकें मत, अन्ना हजारे ने तब साफ़ साफ़ कहा था कि “राज ठाकरे के कुछ विचार सही थे लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पंहुचाना ठीक नहीं था. अन्ना हजारे इतने भर पर नहीं रुके थे, उन्होंने आगे बढ़ कर उत्तर भारतीयों को औकात (लिमिट्स का अर्थ यही हो सकता है) में रहने की सलाह देते हुए कहा था कि ‘बाहरी लोगों का उनके राज्य में वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश ठीक नहीं है’. (हिन्दुस्तान टाइम्स, वाराणसी संस्करण, १९ जनवरी, २००९).

पर इस सबके आगे उनको पता नहीं था कि उनके बड़ी सावधानी से बुने समांगी नेतृत्व का भ्रम इस देश की जनता को हजार आधारों पर विभाजित करने वाले जाति, धर्म, नृजातीयता, क्षेत्र जैसे ढांचों से टकरा कर भरभरा के गिर जाएगा. उन्हें पता नहीं था कि चांडाल चौकड़ी जैसे मुहावरे जातिवाद का दंश झेल रही, उससे जूझ रही आबादी के जेहन में उनकी असलियत साफ़ कर देगी. उन्हें पता नहीं था कि विश्व हिन्दू परिषद की धर्म संसद में भागीदारी करने वाले “संतों’ की उनके मजमे में मौजूदगी गुजरात देख चुके देश के अल्पसंख्यकों की रीढ़ में वह डर उतार देगी जिसके बाद इस मजमे का कोई समर्थन नहीं बचेगा.

एक और फर्क था तहरीर चौक और इस मजमे के जंतर मंतर में. इतिहास गवाह है कि नेता आंदोलन नहीं पैदा करते, आंदोलन अपने अंदर की गति से नेता पैदा करते हैं. ट्यूनीसिया से शुरू हुई जनक्रांति का सूत्रधार कोई नेता नहीं, एक गरीब रेहड़ी वाला था जिसके खुद को आग लगा लेने ने जनता के भीतर जल रही आग को सड़कों पर उतार दिया था. काहिरा के तहरीर चौक पर कोई मसीहा नहीं आया था, वहाँ जनता आई तो और फिर धीरे धीरे उस जनता ने अपने अंदर से छोटे छोटे नेता पैदा कर लिये थे. लीबिया में भी यही हुआ था.

और यहाँ, जनता पर एक मसीहा थोप दिया गया था, ऐसा मसीहा जो इस मजमे के लिये संविधान से भी, संसद से भी ऊपर था. काश इस मजमे को पता होता कि वंचित-शोषित तबकों को इस देश में जो भी जगह मिल पायी है वह संविधान के ही चलते मिल पायी है और इसीलिए वह संविधान के ऊपर होने के किसी दावे को खारिज कर देगी. काश उन्हें पता होता कि इस देश में आजादी के बाद से सिर्फ एक नेता है जिसका प्रभाव घटा नहीं बढ़ा है, जिनका जन्मदिवस और पुण्यतिथि दोनों सरकारी नहीं, जन-उत्सव बन गये हैं और वह नेता गाँधी नहीं (जिसकी फर्जी प्रतिलिपि होने का दावा इस मसीहा का था) बाबासाहेब अम्बेडकर हैं.  

इस ‘आंदोलन’ की जमीनी पँहुच का अंदाजा बहुत पहले ही लग जाना चाहिये था, तब जब इस महात्मा के अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को नगर निकाय चुनावों में हराने की अपील का जवाब जनता ने उस गठबंधन को दो तिहाई से ज्यादा सीटें जिता कर दिया था. जनता जानती थी कि महाराष्ट्र में इस गठबंधन के हारने पर शिवसेना-भाजपा गठबंधन ही जीतता और जनता ने दो हासिल विकल्पों में कम घटिया विकल्प चुन लिया था. यह सहूलियत, मगर, इस मसीहा और उसके मजमे को हासिल नहीं थी. सिर्फ कांग्रेस का विरोध कर उन्होंने अपने पत्ते खोल दिए थे और इन खुले पत्तों के साथ उनकी राजनीति भी खुल के सामने आ गयी थी. फिर इस मजमे ने एक और दाँव खेला था, उत्तराखण्ड में कांग्रेस को हराने की सीधी अपील का दाँव, क्योंकि वहाँ का भाजपाई मुख्यमंत्री बहुत ‘ईमानदार’ था. जनता ने फिर जवाब दिया था, अबकी बार मुख्यमंत्री साहब अपनी खुद की सीट हार आये थे.

सन्देश बहुत साफ़ था. यह वस्तुओं के ही नहीं, महात्माओं के भी ‘यूज बाई’ और ‘बेस्ट बिफोर’ की तारीखों के साथ आने का दौर है और यह महात्मा और उसका मजमा उस तारीख के बहुत आगे चला गया है. इस बेचारे को पता ही नहीं था कि पटकथा फिल्मों की, नाटकों के लिये लिखी जाती है आंदोलनों के लिये नहीं. यह भी कि जो लोग सिनेमाघरों के अंधेरों में राजनीतिज्ञों को विलेन बनाने वाली फिल्मों पर सीटियाँ बजाते हैं, पैसे उछालते हैं वह भी दिन के उजाले में उन्ही को वोट देकर आते हैं. उनको पता है कि समस्याए जो भी हों, राजनीतिक लामबंदी ही उन्हें ठीक कर सकती है कोई रामबाण दवा टाइप का मजमा नहीं. फिर जब मसाला फ़िल्में भी फ्लॉप हो जाती हैं तो तिरंगे से लेकर टोपी तक के छौंके बघारे इस मसाला आंदोलन का असफल होना लाजमी था.

आंदोलनों की दिशा और उनकी जीत हार दोनों ही उनकी अन्तर्निहित राजनीति से तय होते हैं. बेशक इस राजनीति का सही होना ही जरुरी नहीं है, इतिहास गवाह है कि तमाम बार फासीवाद जैसे गलत राजनीति वाले आंदोलन भी जीत आते हैं पर फिर वहाँ भी राजनीति का होना अनिवार्य होता है. अंतर्वस्तु से हट कर प्रदर्शन की तरफ खिसकती जा रही राजनीति के इस दौर मी भी अभी राजनीति इतनी खारिज नहीं हुई कि आप इवेंट-मैनेजमेंट कंपनियों के दम पर एक तमाशे को आंदोलन बना सकें.

इस मौके पर एक पाकिस्तानी दोस्त की बात याद आ रही है. उनके मुताबिक सिर्फ एक चीज का फर्क है जिसने हिन्दुस्तान के मुस्तकबिल में जम्हूरियत पाकिस्तान में फौजी बूट लिख दिए और वह चीज है एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसमे संसद सर्वोच्च थी. यही संसद है जिसने देश भर में उच्च जातीय गुस्से को नजरअंदाज कर ओबीसी आरक्षण लागू किया था, यही संसद है जिसने दलित जातियों के अंदर अपना एक नेतृत्व पैदा किया था. और यही संसदीय राजनीति है जिसने बिना किसी क़ानून के, सिर्फ संख्या की राजनीति के जरिये इस देश में पिछडों को अपनी राजनैतिक हैसियत पहचानने और फिर उसे लेकर संसद में आने की जगह दी. अब कोई भी आंदोलन जो इस संसदीय राजनीति को खारिज करने पर आमादा हो आंदोलन नहीं, प्रतिक्रांतिकारी षडयंत्र भर हो सकता है.


खैर, अन्त में बस इतना ही कि इंडिया टुडे ने अन्ना हजारे को २०१२ का सबसे शक्तिशाली भारतीय घोषित किया था और अब उसी इंडिया टुडे की २०१३ की १०० सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में अन्ना हजारे अंतिम स्थान पर भी नहीं हैं. यही प्रायोजित आंदोलनों की नियति है. 

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