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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

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July 22, 2013

प्रायोजित मजमे आंदोलन नहीं होते.

[कल के लिए में प्रकाशित]

यह  फतवों का समय है. त्वरित फतवों का जिनमे टीवी स्क्रीन्स पर चीखते एंकर राष्ट्र की आवाज बन किसी को कुछ भी घोषित कर सकते हैं. ठीक वैसे जैसे उन्होंने अन्ना हजारे को नया मसीहा और जिन्दलों और बजाजों के पैसे से शुरू हुए उनके नाटक को आजादी की दूसरी लड़ाई से लेकर सम्पूर्ण क्रान्ति का दूसरा चरण और न जाने क्या क्या घोषित कर दिया था. घोषित करने को तो उन्होंने इस मजमे को हिन्दुस्तान का तहरीर चौक भी घोषित कर दिया था पर फिर, टीवी के पर्दों पर तिरती इन चमकीली छवियों की घोषणाओं से कुछ होता तो इंडिया शाइनिंग वाले बाजपेयी विस्मृत और लालकृष्ण आडवाणी आज भी परमानेंट प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग क्यों होते?

मसला साफ़ है. राष्ट्र राज्य की अपार ताकत वाले हमारे समयों में भौगोलिक सच अक्सर भू-राजनैतिक सच भी होते हैं और इन ‘सचों’ की हिफाजत करने वो फौजें होती जिनसे पार पाना असंभव न सही पर बेहद मुश्किल जरूर होता है. फिर भी, कभी कभी ये बंधन टूटते हैं और ये टूटना तब होता है तब, जब ऐतिहासिक प्रक्रियायों और कारणों के चलते ये जगहें सिर्फ जगहें न रहकर आम इंसान के गुस्से, विक्षोभ और सपनों का प्रतिबिम्ब बन जाती हैं. ऐसे कि जैसे तहरीर चौक.

पर तहरीर चौक ऐसे ही नहीं बन जाते. सत्ता उन्हें कितना भी कुछ और बनाना चाहे, फेसबुक क्रान्ति घोषित कर खारिज करना चाहे, हकीकत में वे लंबे दौर से उत्पीड़ित जनता के अंदर चल रहे मुक्तिकामी, क्रांतिकारी प्रक्रियायों की परिणिति भर होते हैं. इन क्रांतिकारी प्रक्रियायों के सन्देश को आत्मसात कर उठ खड़ी होने वाली जनता फिर किसी से नहीं डरती, न हुक्मरानों से न उनकी फौजों से और न उनकी हेजेमनी या बौद्धिक-सामाजिक वर्चस्व से. फिर इस जनता के नारे सिर्फ अपनी मुक्ति के नारे नहीं होते, उनकी आवाज का जवाब हर जगह की जनता देती है. ठीक वैसे ही जैसे काहिरा से उठते अय्येहुन्नास ('कोई है' के नारे के लिए अरबी लफ्ज़) का जवाब जब मनामा ने, बेनगाजी ने, ट्यूनिसिया ने लब्बैक (हम एक हैं) कह के दिया तो यह भूल कर दिया कि उनके सामने हथियारबंद फौजें खड़ीं हैं और यह भी कि दुनिया के किसी मुल्क में फौजें अवाम की हिफाज़त करने को नहीं होतीं. बस , कुछ ही दिनों के भीतर पूरे अरब-विश्व में लब्बैक और अय्येहुन्नास की गूंजती हुई आवाजें थीं , दशकों से सत्ता पे काबिज तानाशाहों की फौजें थीं और उनके सामने सीना तान कर खड़े लोगों के निडर चेहरे थे.

जान हथेली पर लेकर निकली इस अरब अवाम के गुस्से में दशकों से स्थगित सवालों के सारे जवाब हों न हों, उन रास्तों को ढूँढने की मुकम्मल ख्वाहिश थी जो उनके देशों को आजादी, बराबरी और लोकतंत्र के रास्ते पर ले जायेंगे. अरब लोगों ने ये रास्ते ढूंढ भी लिए. खबर भी नहीं हुई कि अवामी गुस्से की इस तपिश में मिस्र और ट्यूनिसिया की तानाशाहियाँ कब जल के खाक हो गयीं .

सत्तायें जानती हैं कि ढहती हुई हर तानाशाही गैर मुल्कों के मजलूम गुलाम लोगों को उम्मीद देती है, उनके आजादी के सपनों को लड़ने का हौसला देती है. यह भी कि फौजों के सामने बिना डरे खड़े हो जाने वाला हर एक शख्स हुकूमतों की ताबूत में एक और कील होता है. यूँ कि उसके चेहरे से गायब हो गया डर हुक्मरानों के चेहरों पर उतरने लगता है. और यहाँ तो तहरीर चौक से शुरू कर फौजों के सामने खड़े हो गए लोगों की कतारें थी. फिर इन मुल्कों में पहली बार , हुक्मरानों के चेहरे पर वह डर उतरने लगा जो उन्होंने अपने जाने लोगों की किस्मत में लिख दिया था.

इन तमाम देशों के संघर्षों में साझा बस एक चीज थी, तहरीर चौक पर देखा गया एक साझा सपना. सो इन तमाम मुल्कों ने, उनकी अवामों ने, तहरीर चौक का शुक्रिया भी अदा किया, ऐसे कि उन्होंने अपने मुल्कों में विरोध की सबसे बड़ी जगहों को तहरीर चौक बना दिया. अब तहरीर चौक संज्ञा नहीं एक विशेषण था, आजादी, अमन और बराबरी के सपने देखती जनताओं की ख्वाहिशों का सर्वनाम था.

पर फिर अचानक काहिरा का तहरीर चौक बरास्ते टीवी चैनल्स दिल्ली के जंतर मंतर से होता हुआ हमारे बेडरूमों में उतर आया. चाहे काहिरा में उमड़ती लाखों की भीड़ के सामने जंतर मंतर के चंद हजार लोग किसी गिनती में न हों, बावजूद इस सच के कि काहिरा में कम से कम तानाशाही के अंत की ख्वाहिश लिए अपनी जान दांव पर लगा कर सड़कों पर उतर आई भीड़ के सामने एसएमएसों से कोई खतरा ना होने की आश्वस्ति पाकर ही घर से निकले इन लोगों का तहरीर चौक के संघर्षों से दूर दूर तक कोई साझा न हो. अपने को तहरीर चौक कहने वाला, और इलेक्ट्रानिक मीडिया के अन्दर अपने कारिंदों से कहलवाने पर आमादा यह कुछ अजब सा तहरीर चौक था.

अरब देशों में इकठ्ठा होती भीड़ों पर गोलियां चलाती फौजों के बरअक्स इस भीड़ में बिसलेरी और बिस्कुट बाँटते लोग थे, वहां शहीद हो रहे लोगों के सामने यहाँ सिर्फ स्वास्थ्य के इजाजत देने तक अनशन की घोषणा करते लोग थे.

उस तहरीर और इस तहरीर में फर्क सिर्फ इतना भर नहीं था. यहाँ तो फर्क बुनियादी मूल्यों का, मान्यताओं का भी था. उन तहरीर चौकों में तानाशाहों के खिलाफ सारे अवाम की गुलाम इच्छाओं के कैद से बाहर आने की छटपटाहटें थीं और यहाँ एक दलित मुख्यमंत्री की दलितों वंचितों को कोर कमेटी में शामिल करने की मांग का भी उद्घोष जैसा नकार था. वहां दिलों में उबल रहा गुस्सा न केवल सरकारों बल्कि सरकारी शह पर जमाने से जनता को लूट रही कंपनियों को भी मार भगाने पर आमादा था और ठीक उलट यहाँ के तहरीर चौक के तो प्रायोजक ही कार्पोरेशंस थे.

अकारण नहीं है कि यहाँ के तहरीर चौक के नेताओं के हाथों में थामे कागज़ के पुलिंदों में कार्पोरेशंस के खिलाफ एक लफ्ज़ नहीं है, बावजूद इस सच के कि सरकारी भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा लाभ उन्हें ही होते हैं. वहां मांगें शासन में सबकी भागीदारी की थीं और यहाँ कल तक सामाजिक न्याय के खिलाफ, पिछड़े वर्गों को मिलने वाले आरक्षण के खिलाफ खड़े लोग रातों रात 'देश ' की आवाज बन गए थे देश के नेता बन गए थे. वहां सपने सबके साझे सुख के थे और यहाँ भ्रष्टाचार को उस मुल्क में भूख से बड़ा बताते लोग थे जिसकी 80 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम में एक पूरे दिन की जिन्दगी जीती है. उस देश में जहाँ नरेगा को सरकारी धन का अपव्यय बताने वाला फिक्की 'इस' तहरीर चौक पर सबसे आगे खड़ा होता है. उस देश में जिसमे हर बरस अम्बानियों और टाटाओं को 80000 करोड़ रुपये से ज्यादा की कर्जमाफी देश के विकास के नाम पर मिलती है.

वहां की लड़ाई सबके हक और हुकूक की थी और यहाँ संविधानिक प्राविधानों की वजह से कुछ शोषित लोगों के आगे बढ़ आने से सदियों से सत्ता पर काबिज लोगों के माथे पर बन रही चिंता की लकीरें थीं. वहाँ तानाशाहों के मिजाज से चलते शासन के खिलाफ एक लोकतांत्रिक संविधान बनाने के सपने थे और यहाँ बाबासाहेब के बनाए संविधान को खारिज करने की जिद थी.

वहां एक तानाशाह को भगा कर सामूहिक प्रतिनिधित्व वाला स्वतंत्र समाज हासिल कर पाने की जद्दोजहद थी और यहाँ एक व्यक्ति को संसद और संविधान से भी ऊपर खड़ा कर देने की हुंकारें थीं. या यूँ कह लें, कि वहां लड़ाई जम्हूरियत हासिल करने की थी और यहाँ उसे जमींदोज करने की.

बात साफ़ है, कि इस तहरीर चौक पर लिखी जा रही तहरीरें उस तहरीर चौक की इबारतों से न केवल अलहदा हैं बल्कि उनसे मुख्तलिफ भी हैं. इस मजमे के मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राम माधव की जगह थी शरद यादव की नहीं. इस मजमे में भारत माँ की संघी छवि थी, वन्देमातरम के साथ बिलकुल भाजपाई अंदाज में लहराते तिरंगे थे. 

यह मजमा जनता के गुस्से प्रतिबिम्बन तो छोड़िये ही विरेचन तक नहीं था. इस मजमे के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की अब न पलती जा सकने वाली धारा के विरोध में, ओबीसी आरक्षण के विरोध में खड़े मेरिटवादी अरविन्द केजरीवाल थे, मध्यवर्गीय नैतिकता की झंडाबरदार किरण बेदी थीं, और राज ठाकरे और उसके गुंडों के उत्तर भारतीयों पर बर्बर और वहशियाना हमलों का समर्थन करते अन्ना हजारे थे. चौंकें मत, अन्ना हजारे ने तब साफ़ साफ़ कहा था कि “राज ठाकरे के कुछ विचार सही थे लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पंहुचाना ठीक नहीं था. अन्ना हजारे इतने भर पर नहीं रुके थे, उन्होंने आगे बढ़ कर उत्तर भारतीयों को औकात (लिमिट्स का अर्थ यही हो सकता है) में रहने की सलाह देते हुए कहा था कि ‘बाहरी लोगों का उनके राज्य में वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश ठीक नहीं है’. (हिन्दुस्तान टाइम्स, वाराणसी संस्करण, १९ जनवरी, २००९).

पर इस सबके आगे उनको पता नहीं था कि उनके बड़ी सावधानी से बुने समांगी नेतृत्व का भ्रम इस देश की जनता को हजार आधारों पर विभाजित करने वाले जाति, धर्म, नृजातीयता, क्षेत्र जैसे ढांचों से टकरा कर भरभरा के गिर जाएगा. उन्हें पता नहीं था कि चांडाल चौकड़ी जैसे मुहावरे जातिवाद का दंश झेल रही, उससे जूझ रही आबादी के जेहन में उनकी असलियत साफ़ कर देगी. उन्हें पता नहीं था कि विश्व हिन्दू परिषद की धर्म संसद में भागीदारी करने वाले “संतों’ की उनके मजमे में मौजूदगी गुजरात देख चुके देश के अल्पसंख्यकों की रीढ़ में वह डर उतार देगी जिसके बाद इस मजमे का कोई समर्थन नहीं बचेगा.

एक और फर्क था तहरीर चौक और इस मजमे के जंतर मंतर में. इतिहास गवाह है कि नेता आंदोलन नहीं पैदा करते, आंदोलन अपने अंदर की गति से नेता पैदा करते हैं. ट्यूनीसिया से शुरू हुई जनक्रांति का सूत्रधार कोई नेता नहीं, एक गरीब रेहड़ी वाला था जिसके खुद को आग लगा लेने ने जनता के भीतर जल रही आग को सड़कों पर उतार दिया था. काहिरा के तहरीर चौक पर कोई मसीहा नहीं आया था, वहाँ जनता आई तो और फिर धीरे धीरे उस जनता ने अपने अंदर से छोटे छोटे नेता पैदा कर लिये थे. लीबिया में भी यही हुआ था.

और यहाँ, जनता पर एक मसीहा थोप दिया गया था, ऐसा मसीहा जो इस मजमे के लिये संविधान से भी, संसद से भी ऊपर था. काश इस मजमे को पता होता कि वंचित-शोषित तबकों को इस देश में जो भी जगह मिल पायी है वह संविधान के ही चलते मिल पायी है और इसीलिए वह संविधान के ऊपर होने के किसी दावे को खारिज कर देगी. काश उन्हें पता होता कि इस देश में आजादी के बाद से सिर्फ एक नेता है जिसका प्रभाव घटा नहीं बढ़ा है, जिनका जन्मदिवस और पुण्यतिथि दोनों सरकारी नहीं, जन-उत्सव बन गये हैं और वह नेता गाँधी नहीं (जिसकी फर्जी प्रतिलिपि होने का दावा इस मसीहा का था) बाबासाहेब अम्बेडकर हैं.  

इस ‘आंदोलन’ की जमीनी पँहुच का अंदाजा बहुत पहले ही लग जाना चाहिये था, तब जब इस महात्मा के अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को नगर निकाय चुनावों में हराने की अपील का जवाब जनता ने उस गठबंधन को दो तिहाई से ज्यादा सीटें जिता कर दिया था. जनता जानती थी कि महाराष्ट्र में इस गठबंधन के हारने पर शिवसेना-भाजपा गठबंधन ही जीतता और जनता ने दो हासिल विकल्पों में कम घटिया विकल्प चुन लिया था. यह सहूलियत, मगर, इस मसीहा और उसके मजमे को हासिल नहीं थी. सिर्फ कांग्रेस का विरोध कर उन्होंने अपने पत्ते खोल दिए थे और इन खुले पत्तों के साथ उनकी राजनीति भी खुल के सामने आ गयी थी. फिर इस मजमे ने एक और दाँव खेला था, उत्तराखण्ड में कांग्रेस को हराने की सीधी अपील का दाँव, क्योंकि वहाँ का भाजपाई मुख्यमंत्री बहुत ‘ईमानदार’ था. जनता ने फिर जवाब दिया था, अबकी बार मुख्यमंत्री साहब अपनी खुद की सीट हार आये थे.

सन्देश बहुत साफ़ था. यह वस्तुओं के ही नहीं, महात्माओं के भी ‘यूज बाई’ और ‘बेस्ट बिफोर’ की तारीखों के साथ आने का दौर है और यह महात्मा और उसका मजमा उस तारीख के बहुत आगे चला गया है. इस बेचारे को पता ही नहीं था कि पटकथा फिल्मों की, नाटकों के लिये लिखी जाती है आंदोलनों के लिये नहीं. यह भी कि जो लोग सिनेमाघरों के अंधेरों में राजनीतिज्ञों को विलेन बनाने वाली फिल्मों पर सीटियाँ बजाते हैं, पैसे उछालते हैं वह भी दिन के उजाले में उन्ही को वोट देकर आते हैं. उनको पता है कि समस्याए जो भी हों, राजनीतिक लामबंदी ही उन्हें ठीक कर सकती है कोई रामबाण दवा टाइप का मजमा नहीं. फिर जब मसाला फ़िल्में भी फ्लॉप हो जाती हैं तो तिरंगे से लेकर टोपी तक के छौंके बघारे इस मसाला आंदोलन का असफल होना लाजमी था.

आंदोलनों की दिशा और उनकी जीत हार दोनों ही उनकी अन्तर्निहित राजनीति से तय होते हैं. बेशक इस राजनीति का सही होना ही जरुरी नहीं है, इतिहास गवाह है कि तमाम बार फासीवाद जैसे गलत राजनीति वाले आंदोलन भी जीत आते हैं पर फिर वहाँ भी राजनीति का होना अनिवार्य होता है. अंतर्वस्तु से हट कर प्रदर्शन की तरफ खिसकती जा रही राजनीति के इस दौर मी भी अभी राजनीति इतनी खारिज नहीं हुई कि आप इवेंट-मैनेजमेंट कंपनियों के दम पर एक तमाशे को आंदोलन बना सकें.

इस मौके पर एक पाकिस्तानी दोस्त की बात याद आ रही है. उनके मुताबिक सिर्फ एक चीज का फर्क है जिसने हिन्दुस्तान के मुस्तकबिल में जम्हूरियत पाकिस्तान में फौजी बूट लिख दिए और वह चीज है एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसमे संसद सर्वोच्च थी. यही संसद है जिसने देश भर में उच्च जातीय गुस्से को नजरअंदाज कर ओबीसी आरक्षण लागू किया था, यही संसद है जिसने दलित जातियों के अंदर अपना एक नेतृत्व पैदा किया था. और यही संसदीय राजनीति है जिसने बिना किसी क़ानून के, सिर्फ संख्या की राजनीति के जरिये इस देश में पिछडों को अपनी राजनैतिक हैसियत पहचानने और फिर उसे लेकर संसद में आने की जगह दी. अब कोई भी आंदोलन जो इस संसदीय राजनीति को खारिज करने पर आमादा हो आंदोलन नहीं, प्रतिक्रांतिकारी षडयंत्र भर हो सकता है.


खैर, अन्त में बस इतना ही कि इंडिया टुडे ने अन्ना हजारे को २०१२ का सबसे शक्तिशाली भारतीय घोषित किया था और अब उसी इंडिया टुडे की २०१३ की १०० सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में अन्ना हजारे अंतिम स्थान पर भी नहीं हैं. यही प्रायोजित आंदोलनों की नियति है. 

July 20, 2013

Democracy’s Dishonour: An ode to all those killed for the ‘crime’ of love.

[From my column Obviously Opaque in UTS Voice, 16-31 July, 2013]


Long before his dead body was to be found near a railway track in Dharmapuri, E. Ilavarasan had pleaded guilty. No, not to any court of law. He could not, in fact, because he had not committed any crime punishable under the law of the land. All he had done was falling in love with a girl, albeit of a different and so called upper caste. He had not pleaded guilty even for that as falling in love is no crime.

He had pleaded guilty to his conscience that held him responsible for all the violence inflicted on his community. He held himself responsible for all the Dalit houses, more than 250 in number, which were torched by Vanniyars, the community to which Divya, his girlfriend and later wife, belonged to. He held himself responsible for the alleged suicide of his father in law. The couple was shattered enough even to contemplate suicide. They did not. Ilavarasan chose to keep fighting. This is what he told to Kavin Malar in an interview that was published in India Today’s Tamil edition.

The resolve was there despite Divya having walked out on him, allegedly under tremendous pressure of the Vanniyar elders led by the Pattali Makkal Katchi (PMK), a political party that swears by the Indian constitution. The fact that the same constitution has illegalized caste discrimination is besides the point. Ilavarasan had known PMK’s role in this sordid saga of sacrificing the lives of a young couple, Indian citizens protected by the constitution, at the altar of petty electoral gains. He had blamed PMK unambiguously while asserting that, by then executed, plan to separate him and his wife was hatched in PMK’s office.

Ilavarasan had still had his hopes intact. He believed in his love and knew that his wife would weather all the pressures and return to him. He believed in the democracy and hoped that it would stand by his struggles. If only he had gone for a reality check. He would have known, then, that his was not the first case of individuals pawned by the vested casteist and communal interests deeply entrenched in the system. He would have known how such interests tweak the system for their petty power games.

He would, then, have known that one day his body could be found beside a rail track like that of Rizwanur Rahman of Kolkata. He would have known, then, that like him the only crime of Rizwanur was of daring to love a girl of his own choice and marrying her. He would have known, then, that with waning interest of the media and the civil society, his case would be soon forgotten as that of Rizwanur. Rizwanur Rahman, for the uninitiated and/or forgetful, was a bright middle class Muslim professional who had fallen in love with Priyanka Todi, daughter of industrialist Ashok Todi who owns Lux Cozy group of companies worth more than 400 Crores.

Fearful of the influential family of Priyanka, the couple got married secretly under the Special Marriage Act. Hardly did they know that it was the beginning of the end not merely of their relationship but even of the life of Rizwanur. Todi family together with senior police officers left no stones unturned to harass Rizwanur and his family. Senior police officers, allegedly including the Police Commissioner, would summon the couple to the police headquarters and threaten Rizwanur with dire consequences in case he did not separate with his legally wedded wife. Rizwanur would be threatened of getting arrested under fabricated charges like stealing a phone from Todi Mansions.

Had Ilavarasan known Rizwanur, he would have a fair idea of what would happen after him sending Divya back to her family for a few days. The only difference between the cases is that while in his own case it was a political party named PMK that was coercing him, poor Rizwanur was harranued by nothing less than the police that are duty bound to protect law and order. Had he known Rizwanur, he would also have had a fair idea of the fate awaiting him. He would have known that his wife, like Priyanka, would not be able to survive emotional torture unleashed on her and would be compelled into disowning her marriage and love for him.

Make no mistakes here. It is neither Divyas nor Priyankas who are at fault. However much one would want to blame them for ditching their husbands and ‘driving’ them into committing suicide, they are equal, or in fact worse, victims. It is not easy for a young girl to live with the threats ranging from parents and relatives committing suicide to harming her husband/lover, is it? More so with the stigma of compromising their families’ honour by falling for and marrying lesser mortals.

Forget Rizwanur, Ilavarasan would have had found his faith in the system entirely misplaced had he known about the infamous dishonour killing of Manoj Banwala and Babli in June 2007 despite Court  having given them protection and a five member strong police team first accompanying and later deserting them to be hacked to death. If only he had known that this was not the first, or the last, murder of someone having protection ordered by courts. Similar was the fate of Raja Ram who was allegedly killed by the relatives of his wife Manjit Kaur despite protection ordered by the Punjab and Haryana High Court.

If only Ilavarasan had known that he is living in a self-designated democracy that had gone delinquent. If only he knew that it is not merely small political flies like PMK that could run away with launching hate campaigns and term a Dalit boy falling in love with a so called upper caste girl as a part of grand conspiracy to ‘insult’ and humiliate the concerned community. He should had known that he and his people have been long abandoned even by those swear on social justice and are self-appointed champions of Dalit-OBC-Minority cause.

He should had paid heed to the fact that identity politics based on caste consolidations had veered from the path of emancipation of all and had entered the murky waters of petty caste interests. He should had paid heed to the fact that be it in Haryana, Western Uttar Pradesh or Tamil Nadu not a single self-appointed custodian of social justice has opened his/her mouth against dishonour killings of victims belonging to Dalit community.

Ilavarasan should have kept his eyes open to Haryana politicians of all ilk rallying behind illegal and extra-constitutional Khap Panchayats that seem to derive sadistic pleasure out of murdering love birds. Forget, again, those derided by elitists and upper caste middle classes as casteist politicians, he should had seen a certain suave and urbane Naveen Jindal of Indian National Congress praising Khap Panchayats for their ‘yeoman services’ to the society.

He would have known, then, that the democracy he believed in is in essence a farce superimposed on a society divided by a thousand pre modern fault lines of caste and kinship. He would have known that people like him are mere expendables for the system. He would have known, then, that his murderers would soon be referred to as honourable Member of Parliament or Legislative Assembly and the same police which looked the other way when Dalit hamlets were being torched would bend backwards to open the doors of their red beacon cars.


Had he known all this, he would not have turned into a dead body found near a railway track in Dharmapuri. Had Rizwanur known all this, he would not have turned into another dead body found near rail tracks some 3000 kms away from Dharmapuri. But then, his sentence was decided the day he had pleaded guilty of falling in love with a girl belonging to a different, and so called upper, caste.