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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

June 21, 2013

यह अंतर्कलह नहीं दक्षिणपंथ का अस्तित्ववादी संकट है.

राजनैतिक संकटों की एक लगभग सार्वभौमिक विशेषता होती है कि वह सुलझा जाने के लिए ही आते हैं. इसलिए क्योंकि जनता की जिंदगी से जुड़े असली मुद्दे नहीं बल्कि राजनेताओं की अपनी महत्वाकन्क्षाओं के टकराव से पैदा हुए संकट ही गंभीर राजनैतिक संकटों में तब्दील होते हैं और इसी लिए सुलझा लिए जाने को अभिशापित होते हैं.

पर फिर भारतीय जनता पार्टी गोवा संकट ऐसे संकटों में एक नहीं है. सतही तौर पर देखें तो गोवा संकट को चार नजरियों से देखा गया है. पहला भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नरेन्द्र मोदी समर्थक खेमे का जिसने इस संकट को नेतृत्व से खारिज होते एक नेता की अदम्य महत्वाकांक्षाओं के मत्थे मढ़ने की कोशिश की. दूसरा पार्टी में आडवाणी समर्थकों का जिन्होंने इसे परिवार के ‘बुजुर्ग’ के गुस्से के सरलीकृत सन्दर्भों में समझा. तीसरा संघ परिवार से बाहर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के हिस्से जनता दल यूनाइटेड जैसे दलों का जिनके लिए यह एक गैर सांप्रदायिक नेता की तलाश का संकट था. और चौथा, संघपरिवार विरोधियों का जिनके लिए यह संकट सांप्रदायिक राजनीति करने वाली कैडर आधारित पार्टी में एक एकाधिकारवादी तानाशाह के करिश्माई उदय से पैदा हुआ प्रहसनात्मक संकट था.

पर हकीकत में यह संकट इससे कहीं जटिल है. इस संकट के सूत्र भाजपा में ही नहीं, भारतीय राजनीति तक में सिमटे हुए नहीं हैं. भाजपा का यह संकट इतिहास के इस विशिष्ट छण में वैश्विक दक्षिणपंथ का वह अस्तित्ववादी संकट है जिससे निपट पाने में दक्षिणपंथ के एक विचारधारा के बतौर बचे रहने का सवाल जुड़ा हुआ है.

आइये, पहले दक्षिणपंथ के इस वैश्विक संकट पर एक नजर डालते हैं. लातिन अमेरिकी देशों में समाजवादी दलों के कब्जे को छोड़ ही दें, संयुक्त राज्य अमेरिका में आर्थिक संकट से निपटने में बराक ओबामा की साफ़ असफलताओं के बावजूद दक्षिणपंथी रिपब्लिकन पार्टी बुरी तरह से पराजित हुई है. फ्रांस में फ्रांस्‍वा ओलांद के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी की बहुमत के साथ जीत के साथ साथ जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी का लगातार उभार साफ़ करता है कि यूरोप में भी यही स्थिति है और दशकों से हावी आक्रामक और उग्र दक्षिणपंथी नवरूढ़िवाद अपनी हार की तरफ बढ़ रहा है.

पर क्या इसे दक्षिणपंथ के पराभव की शुरुआत माना जा सकता है? उत्तर है कि नहीं. इस पराभव के साथ ही इन सभी देशों में एक अल्पमत पर बेहद मुखर और लगभग नाजीवादी दक्षिणपंथ का उभार भी हुआ है. इन दक्षिणपंथी समूहों की सामाजिक पहचान भी स्पष्ट है, यह ज्यादातर कट्टर कैथोलिक श्वेत परिवारों से आते हैं और सामान्य तौर पर दक्षिणपंथी ईसाई रुझान वाली पार्टियों से ज्यादा असहिष्णु और धर्मांध हैं. वे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य से जुड़े हुए सभी अधिकारों जैसे गर्भपात, स्त्री पुरुष बराबरी और समलिंगी विवाह के अधिकार के खिलाफ खड़े हैं.
लेकिन इन्ही समाजों में इनसे कहीं बड़ी संख्या में व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाले लोग मौजूद हैं और 
उन्हें पता है कि दक्षिणपंथ की हर जीत उनके निजी हक छीनने की दिशा में एक और कदम होगी. इसीलिए अमेरिकी हिस्पैनिक और अश्वेत हों या फ़्रांसिसी अरब, दुनिया भर के धार्मिक, भाषाई, नृजातीय या अन्य अल्पसंख्यक समूह उग्र दक्षिणपंथ की उपस्थिति में मौजूद सशक्त विपक्ष के साथ गोलबंद होने लगते हैं. ऐसे में इन समूहों को डराए बिना अपने मूल आधार को सुरक्षित रखना दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन जाता है. इसी सवाल को हल कर पाने की असफलता उनकी हार का सबब बनती है. 

भाजपा का संकट भी बहुलवादी समाजों में अस्तित्व के संघर्ष में फंसे वैश्विक दक्षिणपंथ के इसी संकट का प्रतिफलन है. यहाँ मानना पड़ेगा कि बेहद आक्रामक और सांप्रदायिक राजनीति से शुरुआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी इस संकट को संघ परिवार के किसी भी नेता से बेहतर समझ पा रहे हैं. जीवन भर संघ की सामुदायिक वैमनस्य की राजनीति के झंडाबरदार रहे आडवाणी के लिए यह लाजमी भी है. आखिर आजादी के ठीक बाद से ही नेहरू के रूमानी समाजवाद के सपने वाले इस देश में वे संघ की राजनीति की नींव का पत्थर भी हैं और राजमिस्त्री भी. उन्होंने जनसंघ और फिर भाजपा के राजनीति की परिधि पर खड़े होने का दौर भी देखा है और बाद में खुद के नेतृत्व में इसे मुख्यधारा में लाने की कवायद भी की है.

उन्होंने अपने सबक सीखे हैं. यह कि जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में शामिल होने ने जनसंघ की उग्र हिन्दू राजनीति वाली छवि को थोड़ा स्वीकार्य बनाया था. यह भी कि यह रथयात्रा के ठीक बाद भाजपा की संसद में 2 से 89 हो गयी सीटें नहीं बल्कि वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को समर्थन देने से मिली स्वीकार्यता थी जिसने अंततः 1998 में भाजपा के सत्ता में आने की नींव रखी थी. उस वक़्त आडवाणी को एक और सबक मिला था. यह कि भाजपा के उत्थान के नेता होने के बावजूद उग्र हिंदूवादी राजनीति का चेहरा उनको गठबंधन सरकार के नेता बनने के लिए जरुरी स्वीकार्यता से खारिज करता था. यही वजह थी कि उन्होंने खुद ही ‘गलत पार्टी में सही आदमी’ की छवि वाले अटल बिहारी बाजपेयी को आगे कर दिया था. भाजपा को आक्रामक दक्षिणपंथ से विनम्र दक्षिणपंथ बनाने की दिशा में यह उनका पहला प्रयास था.

इसके बाद का दौर आडवाणी और दक्षिणपंथ दोनों के लिए आत्मविश्लेषण का दौर था. शुरुआती उभार के बाद हिंदूवादी राजनीति की जमीन पर जाति या अस्मिता आधारित राजनीति ने कब्ज़ा कर लिया था और भाजपा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अपने गढ़ों में ही बुरी तरह परास्त हो रही थी. यही दौर युवाओं में संघ के प्रभाव और उसकी शाखाओं दोनों के सिकुड़ते जाने का दौर भी था. गुजरात 2002 होते होते यह साफ़ हो गया था कि भाजपा-संघपरिवार के आधारभूत ‘कैडर” की जगह आक्रामक हिंदुत्व के समर्थक स्वच्छंद शहरी युवाओं ने ले ली थी. मोदी का मुखौटा लगाने वाले इस युवावर्ग के लिए दलीय अनुशासन और राजनैतिक प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं था. उन्हें एक करिश्माई नेता चाहिए था फिर चाहे वह नरेन्द्र मोदी के रूप में मिले या अन्ना हजारे के. इस वर्ग को आडवाणी के भाजपा की सामान्य स्वीकार्यता बढ़ाने की कवायदें नागवार लगनी ही थीं.
यह वही दौर था जब कड़े अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर चलने वाले संघ को भी नरेन्द्र मोदी की छवि में अपने छीजते जनाधार को वापस पाने की संभावनाएं दिखने लगी थीं. बात साफ़ थी कि आडवाणी के पास संघ से सीधे टकराव के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कह कर उन्होंने यह विकल्प अपनाया भी और फिर संघ द्वारा लगभग अपमानित कर पदच्युत किये जाने का दंश भी झेला.

बावजूद इसके कि आडवाणी को हवा में लिखी इबारतें तभी पढ़ लेनी चाहिए थीं, उन्होंने न तो दूसरा बाजपेयी बनने की कोशिशें बंद कीं न ही भाजपा को और स्वीकार्य बनाने की. गुजरात छोड़ कर उत्तर भारत में सिकुड़ते जाने और दक्षिण और पूर्व भारत में कोई बड़ा आधार न खड़ा कर पाने की वजह समझ रहे आडवाणी के लिए साफ था कि भारत जैसे बहुध्रुवीय समाज में अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि दलित, आदिवासी, पिछड़ी, स्त्री और अन्य तमाम अस्मिताओं को डराने वाली राजनीति 13 प्रतिशत मुस्लिमों के सामने 80 प्रतिशत हिन्दुओं के जनसांख्यिकी वाले गुजरात में भले जीतती रहे, राष्ट्रीय स्तर पर हारने को अभिशप्त ही रहेगी.

मतलब यह, कि गोवा संकट भारतीय दक्षिणपंथ के अन्दर की विनम्र और आक्रामक धाराओं के टकराव का संकट था और साफ़ है कि फिलवक्त उग्र खेमे ने पार्टी जीतने पर देश हारने का बंदोबस्त कर लिया है.

2 comments :

  1. मित्र समर, आपके लेख हमेशा ही मुझे और मेरे साथियों को सिखाते रहे हैं. इस लेख के विश्लेषण ने एक बार फिर मेरी दृष्टि स्पष्ट करने में सहायता की है. आभार - गिरिजेश

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  2. सुन्दर लेख...लेकिन गलत विश्लेषण.

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