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June 28, 2013

पूर्वांचल का शोक जापानी बुखार: जहाँ बच जाना मौत से भी बदतर सजा है

दैनिक जागरण में 'जहाँ मौत का नाम जापानी  बुखार है' शीर्षक से 28 जून 2013 को प्रकाशित लेख का  
विस्तारित रूप.
दैनिक जागरण में ही पिछले साल इसी मुद्दे पर लिखा लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.
इस विषय पर अंग्रेजी लेख यहाँ और यहाँ देखें.]

प्राकृतिक आपदाएं बता कर नहीं आतीं, न ही अक्सर उनका सटीक पूर्वानुमान कर पाना संभव होता  है. इसीलिए उनसे जानमाल का नुकसान होना लाजमी है, पर यह नुकसान कितना होगा यह आपदाओं से निपटने की प्रशासनिक क्षमता और तैयारी पर निर्भर करता है. इस नजरिये से देखें तो हजारों नागरिकों की बलि ले लेने वाली उत्तराखंड बाढ़ ने केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के दावों की पोल खोल कर रख दी है. सुनामी से हुए भारी नुकसान के बाद एक ऐसी ही आपदाओं से निपटने के लिए सीधे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन बनाई गए भारतीय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के बाद भी इस स्तर पर जानमाल का नुक्सान केवल अक्षम्य ही नहीं बल्कि आपराधिक भी है.

पर फिर, यह आपदा सरकार भारत के आम नागरिकों की ऐसे ही बड़े स्तर पर जान लेने वाली अक्षम्य और आपराधिक लापरवाहियों के लिए बड़ी ढाल भी बन गयी है. आखिर कितने लोग जान पाए होंगे कि उत्तराखंड में आई बाढ़ के पहले ही उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल में ऐसी ही एक आपदा 118 बच्चों की बलि ले चुकी थी और अंदेशा है कि मानसून के जाते जाते यह संख्या 1000 के पार होगी. यह भी कि दिमागी या जापानी बुखार (इन्सेफ़्लाइटिस) के नाम से जाने जानी वाली यह आपदा हर साल आती है. वह भी बिना बताये नहीं बल्कि ऐलानिया आये मेहमान की तरह मानसून के साथ आती है और हजारों बच्चों की जान ले जाती है. यह सब तब, जब इस बीमारी का इलाज भी है और टीका भी. और सबसे महत्वपूर्ण यह सब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की जानकारी में होता है जो न सिर्फ लगातार इस आपदा पर नजर रखे हुए है बल्कि 2011 में इलाके का दौरा भी कर चुकी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल इस बीमारी ने 1256 बच्चों की जान ली थी. गैरसरकारी आंकड़ों की मानें तो यह संख्या 1480 होती है. हकीकत में यह संख्या कहीं बड़ी हो सकती है क्योंकि यह आंकडे भले ही सिर्फ मरने के लिए अस्पताल पंहुचने में सफल रहे भाग्यशाली बच्चों पर आधारित होती है. भाग्यशाली इसलिए क्योंकि जीवन भले ही न बचे इन बच्चों का कष्ट जरुर थोड़ा कम हो जाता है. खैर, इन मौतों में 557 अकेले उत्तरप्रदेश में हुई थीं. उनमे भी 500 से ज्यादा सिर्फ एक अकेले नेहरु अस्पताल में जो बीआरडी मेडिकल  कालेज से सम्बद्ध है.

वजह यह कि पूरे पूर्वांचल में दिमागी बुखार का इलाज कर पाने की सुविधा वाला यह इकलौता अस्पताल है. न, वस्तुतः यह दिमागी बुखार का इलाज कर पाने की सुविधा वाला इकलौता अस्पताल है जिसमे डॉक्टर भी हैं. पिछले साल राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से तीखी डांट सुनने के बाद सरकार ने कुछ कदम उठाये थे. तब आयोग ने महामारी से हुई मौतों का संज्ञान लेते हुए सरकारी कदमों को ‘दावे से ज्यादा कुछ नहीं’ बताते हुए सरकार के ‘लापरवाह नजरिये’ को मौतों का इकलौता जिम्मेदार बताया था. सरकार की आपराधिक अभियोज्यता को इतने साफ़ शब्दों में इंगित करते आयोग के बयान के बाद सरकार ने कुशीनगर के जिला अस्पताल में चौबीस घंटे इलाज की सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया था. पर नवम्बर 2012 में मौके पर पंहुचे मीडिया को न तो वहां चिकत्सक मिले न आईसीयू. अब ऐसे में सरकारी उपायों की अगम्भीरता को लेकर कोई संशय बचता है? अब जिला अस्पताल के इस हाल में होने पर प्राथमिक और सामुदायिक चिकित्सा केन्द्रों से कोई उम्मीद कैसे पाली जा सकती है. और यह सब तब था जबकि पिछले वर्ष नंबर माह के पहले ही केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने प्रदेश में 501 बच्चों की मृत्यु की बात संसद में स्वीकार की थी.

यहाँ से देखें तो मानसून की शुरुआत से पहले ही जा चुकी 118 जानें स्थिति के और भयावह होने की ही तरफ इशारा कर रही हैं क्योंकि मस्तिष्क ज्वर से होने वाली मौतें मानसून के चरम के साथ उफान लेती हैं. ऐसा नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं की तरह सरकार को इस आपदा का पूर्वानुमान नहीं था. इसके ठीक विपरीत, 54 सेंटिनल और 12 अपेक्स रिफरल प्रयोगशालाओं के साथ सरकार के पास इस बीमारी की निगरानी और रोकथाम दोनों के पूरे उपाय हैं. अब हर साल होने वाली हजार से ज्यादा मौतों के साथ आप खुद ही समझ सकते हैं कि यह केंद्र करते क्या हैं.

विडम्बना यह है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2006 में ही स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को इसे ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति’ घोषित करने और इससे निपटने के लिए ठोस कार्य योजना बनाने का आदेश दिया था. कहने की जरुरत नहीं है कि निर्देशों का पालन करने की अनिवार्यता न होने के नुक्ते का फायदा उठाकर दोनों ने कुछ नहीं किया. खैर, साल दर साल तबाही मचाने वाली इस आपदा पर न्यायपालिका के निर्देश की उपेक्षा करना आसान है पर कम से कम चुनावों के समय कुछ करते हुए दिखने की मजबूरी में २०११ में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद को इस विभीषिका की तुलना महामारी से करनी पड़ी थी. उन्होंने यह भी माना था कि मच्छरों से फैलने वाली इस बीमारी से निपटने के लिए गन्दा पानी जमा होने वाली जगहों को भी देखना पड़ेगा और उसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ही ग्रामीण विकास और जल प्रबंधन मंत्रालयों को भी साथ लेते हुए ठोस कार्यवाही करनी होगी. पर फिर, कुछ नहीं हुआ.

वायदे तो खैर वर्तमान राज्य सरकार ने भी बहुत किये थे. पर वह जागी बस अप्रैल में जब मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने बैठक कर सम्बद्ध अधिकारियों को इन्सेफ्लाईटिस से निपटने के लिए बनाई गयी सभी योजनाओं को समय पर पूरा करने का निर्देश दिया. पर तब तक बहुत देर हो चुली थी. न तो बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी के लिए बनाया जा रहा १०० बिस्तरों वाला विशेष वार्ड बनकर तैयार हुआ था न ही बीमारी का शिकार हो सकने वाले ३० लाख संभावित लोगों को टीका लगाने की योजना कहीं पंहुची थी. वैसे टीके लग भी जाते तो कुछ ख़ास हासिल होने वाला नहीं था क्योंकि इस टीके को साल भर बाद दोहराना पड़ता है और खुद इलाके के डॉक्टर मानते हैं कि यह कभी नहीं हुआ.

अफ़सोस यह कि इस बीमारी के बारे में सबसे खतरनाक बात इसका शिकार होकर मर जाना नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि इससे बचकर जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक अपंगता के साथ जीने को अभिशापित हो जाना उससे भी बुरा होता है. सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज के आंकड़े देखें तो इस बीमारी ने ३५००० बच्चों की जान लेने के साथ करीब २०००० बच्चों को हमेशा के लिए विकलांग भी बना दिया है. पहले से ही गरीबी की मार झेल रहे परिवारों में इन विकलांग बच्चों की जिंदगी एक हादसा बन कर रह जाती है. आखिर खुद को जिन्दा रखने की बुनियादी जद्दोजहद में लगे यह परिवार इन बच्चों के लालन पालन और चिकित्सा का अतरिक्त ‘बोझ’ चाहें भी तो कैसे झेल सकते हैं?

इसीलिए गोरखपुर और आसपास के रेलवे स्टेशनों, बाजारों और भीड़भाड़ वाली अन्य जगहों में ऐसे बच्चों का लावारिस हाल में मिलना बहुत ही सामान्य घटना है. त्रासदी ही है कि अपने बच्चों को न छोड़ने वाले परिजनों के सगे सम्बन्धियों का उन्हें ऐसा करने की सलाह देना इससे भी सामान्य है.
कोई चाहे तो ऐसे ‘निर्मम’ परिजनों को कोस ही सकता है. पर सच यह है इसके लिए वे नहीं बल्कि पूरी तरह से वह व्यवस्था ही दोषी है जिसे बाल आयोग ने इन बच्चों की मौतों का ‘इकलौता जिम्मेदार’ बताया था. वित्तीय कमी की वजह से आज तक टीकाकरण न कर पाने का रोना रोने वाली यह सरकार ही है जो 1978 से आज तक मारे गए इन ५०००० से भी ज्यादा बच्चों की मौत जिम्मेदार है. सोचिये उस अक्षम्य प्रशासनिक लापरवाही के बारे में जो आजतक जिला स्तर तक पर इस बीमारी से निपटने में सक्षम अस्पताल तक नहीं बना सकी है. उस सरकार के बारे में जो मच्छरों की पैदाइश वाली जलभराव वाली जगहों को साफ़ तक नहीं कर पाती है. बस यह कि इसी सरकार के पास लैपटॉप बांटने और पार्क और मूर्तियाँ बनाने का पैसा जरुर होता है. इन मौतों के लिए १९७८ से आज तक केंद्र और राज्य में रही सभी सरकारें दोषी हैं क्योंकि उनमे से किसी के लिए सुदूर पूर्वांचल के यह बच्चे प्राथमिकता पर नहीं थे.



बावजूद इसके कि वह भारतीय संविधान के आदेशानुसार इन बच्चों को बचाने के लिए वचनवद्ध हैं. अपने बाकी बच्चों को बचाने के लिए एक को छोड़ने को मजबूर गरीब माँ का दर्द समझने की कोशिश करिए और आप समझ जायेंगे कि वंचितों को त्याज्य समझने वाली व्यवस्था दोषी है. दोषी तो खैर इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी है जो दिल्ली में जेसिका लाल के लिए तो लड़ लेती है पर जिसके लिए कैमरों की पंहुच से दूर गोरखपुर में मर रहे गरीबों के मुद्दे पर अभियान चलाना नहीं सूझता. दोषी वह सभ्य समाज (सिविल सोसायटी) भी है जिसे बच जाने को मरने से बदतर संभावना बना चुका यह इलाका नहीं दिखता. खैर, आइये, मानसून के खत्म होने तक लाशें गिनते हैं. 

June 24, 2013

Don’t these lives worth INR 17 a day shame you, Mr. Prime Minister?

[This is an AHRC article. ]
INR 17, or approximately 30 cents in USD, is what an average poor spends a day in rural India. Their urban friends are no better off either; they have to content with spending INR 27 for seeing a day off. Adjust that amount for the cost of living in urban centres and they are just as worse off as the poor in villages. All one can buy for 17 Rupees, to make sense of the amount, is not even a kilogram of wheat flour, forget everything else one would need to turn it into a meal. That is the extent of the crisis looming large over Indian poor. Unfortunately for the government, this data cannot be rubbished as it comes from National Sample Survey Organisation (NSSO), a governmental body itself.
Not that it was not known before. In fact both the civil society and media were trying to wake the government out of its slumber and attend to the crisis. The government knew it as well, as was pointed out by the repeated admissions of the Prime Minister who has found the extent of child malnutrition a ‘National Shame’ and the President who has conceded that there was ‘no humiliation more abusive than hunger’ in nothing less than his acceptance speech. Both of them have promised to take concrete steps to arrest the poverty from deteriorating into a national crisis. Then, it seems, they forgot the promise.
NSSO’s findings for 2011-12 (July-June) show that INR 521.44 is all that the bottom 5% of the population has to survive a month in rural areas and INR 700.50 in urban ones. The findings, shockingly, bursts another bubble, the myth of Indian middle classes’ march into an era of prosperity. Pinching the balloon, it pegs average monthly expenditure of top 5 % of Indian population at a lowly INR 4481 in the countryside and only a marginally better INR 10,282 in the cities. Adjust it for the expenditures of the rich significantly lifting the average and we get a horrible scenario of widening gulf in incomes of the top 5 % of Indian population on one hand and rest of all Indians on the other. To understand the enormity of the message, the average monthly expenditure on a national level is a meagre INR 1430 for rural areas and just INR 2630, or about the cost of a family of five watching a single movie in a multiplex, in urban centers. That is all about the stories of growth and development being sold to the country.
The data also exposes the absolute failure of the self-designated ‘largest democracy of the world’ in saving its poor citizenry from falling into penury through the cracks that define a thousand welfare schemes it runs. Let’s look at the situation of hunger, for example. The poor are forced to shell out almost a half of their abysmally low daily expenditures on food. That is 42.6 % of the total expenditure in cities while a much higher 52.9 % in villages. How much the poor would be left with after spending this much just to ensure physical survival is anybody’s guess. Think of the amount they are left with for everything from education to leisure and the banality of this cruel joke tears one apart.
The situation merely worsens if one looks at where the worst affected come from. Worst hit are the villagers of Odisha and Jharkhand, closely followed by Bihar, Madhya Pradesh and Uttar Pradesh. These are the same states which are worst performers in urban sector as well. That is almost half of total Indian Population.
The data could shame any government into action, more so if they claim to be already aware of the situation. Indian government, it seems, would have none of this. It is sitting upon for four years now, incomprehensively, even on a lame duck Food Security Bill severely criticised by the Right to Food Campaign of India for its serious limitations in fighting hunger. That is when the Bill does not specify any time frame for the rolling out of the entitlements promised, continues with skewed idea of a Targeted PDS that inherently excludes 33 % of the population from accessing the PDS as a right and provides for a mere 5 kilograms of food grains per person as against ICMR norms of 14 kilograms for adults and 7 for children. That the bill does not take care of specific issues plaguing the food and nutritional security of the women, allows for private profiteers and thereby corruption and leakages and does not offer any agriculture and production related entitlements is beside the point.
Similar was the fate of the Prime Minister’s Council on India’s Nutrition Challenges that was formed in the wake of his admission of 42 % of Indian children being severally malnourished. The commission, set up with much fanfare in 2008, was last heard for holding a single meeting way back in 2010. The Council has made a few path-breaking decisions to overhaul the system and save the children from falling prey to stunting by suffering severe malnutrition in the early years of their lives. The decisions included making efforts for universalisation of the Integrated Child Development Services by providing for an an Anganwadi centre for 500 to 1,000 people taking a little burden off it by lowering existing upper limit of 1500.
It had also proposed a second Anganwadi for a population of 1,000 to 2,000, and another for every additional 1,000 people. Similar were its recommendations for an Anganwadi for every 150 to 500 people in tribal areas and a mini-Anganwadi centre for places with a population of less than 150. Other proposals included ensuring a compulsory monthly weighing of children under the age of three at Anganwadi centres for keeping a tab on their nutritional situation, universal registration of births, issuing mother and child protection card and upgradation of Anganwadi centres into Anganwadis-cum-créches.

Needless is to say that the Council had not met ever since as against its mandate of meeting once in three months. In absence of any clear-cut guidelines, several ministries have been found to be taking controversial decisions like on the involvement of private sector in child survival and nutrition. The move that will pave the way for private profiteers to enter the sector with packaged food for the marginalised is being staunchly opposed by the civil society.
All this when private companies in nexus with vested interests deeply entrenched in administrative and political hierarchies have been found to have stolen more than INR 1000 Crore, or USD 185 million in the state of Maharashtra alone as per the findings of a report of Biraj Patnaik, Principal Adviser, Commissioners to the Supreme Court and were submitted to the court with reference to SLP (Civil) No. 10654 of 2012 in the matter of Vyankateshwar Mahila Auyodhigik Sahakari Sanstha v. Purnima Upadhyay and Others listed along with Civil Writ Petition 196 of 2001 (PUCL v. UOI).
Independent studies into the status of other welfare schemes ranging from Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act to Mid-day meal scheme tell the same tales of unbridled corruption, leakages and stealing from the funds earmarked for these schemes for the poor who have nothing else to bank upon. As it is, no one in his senses would really expect a person to survive a day on a mere 17 Rupees in rural and 27 in urban areas, will one. Even if one does, can one really expect these citizens of India to be able to break free of the vicious cycle of poverty with no money left for anything for education or health, two basic requirements for even thinking of making such an attempt?
Do the Indian poor, faced with such governmental apathy and inaction coupled with the economic distress haunting them stand a chance of survival with dignity? Does the situation shame the government of India into action if for nothing else? That is the question the government of a country that claims to be the largest democracy of the world must answer immediately.

June 22, 2013

Gorakhpur - The Killing Fields Where Only Thing Worse Than Death Is Survival

[This is an AHRC Article.]
Image courtesy: The Sunday Indian
More English articles on the issue can be accessed here
Hindi ones can be found here and here.]

In India, death has a myriad ways to prey on hapless children and sniff the life out of them. Often, it has rather trustworthy accomplices: the union and state governments. Take but one way it strikes, killing more than a thousand each year. Since 1978, when it first struck, it has never failed to collect its annual toll of more than a thousand. That is just the reported ones. It has killed, in total, more than 50,000 children to date. Much death, and much culpability, given that the affliction responsible has not only been curable but also has an effective vaccine to combat it.

Encephalitis killed 1256 children in 2012, as per the government’s own admission. The most conservative independent estimates pegged the number at above 1480, gingerly warning that the actual numbers could be much higher as the estimates have only been culled from those children fortunate enough to make it to hospitals, even if only to die. Yes, the children are fortunate if they make to the hospitals for nothing more than dying as it lessens their pain a little. Though this is sickening enough, continue only if you can stomach more of this macabre tale of death and disease that plays itself out annually.

Of the reported fatalities, 557 are from a single state, Uttar Pradesh. More than 500 of these 557 died in one hospital. This statistic is one of the few in this grim tale that makes sense. The Nehru Hospital affiliated to Baba Raghav Das Medical College of Gorakhpur in Uttar Pradesh is the only one equipped with facilities to treat Acute Encephalitis Syndrome (AES) and the Japanese Encephalitis, commonly known as ‘brain fever’ that has, since 1978, been endemic to region.

Actually, no, allow this writer a correction. The Nehru Hospital is not the only one equipped with the facilities to fight the killer mosquito born disease in question; it is the only equipped one with doctors.

There is one more, established by the state government of Uttar Pradesh after getting sternly rebuked by the National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR). The NCPCR rubbished the steps claimed to have been taken by the state government as ‘nothing more than claims’ and held its ‘casual approach’ being ‘solely responsible for the death of the children’.

In response to such a clear proclamation of its criminal culpability, the government of Uttar Pradesh has designated the District Hospital of Kushinagar as another nodal one equipped with all facilities to deal with encephalitis. The state government had assured the Commission that the hospital would run twenty-four hours a day.

The facts behind the assurances were unmasked when local media found neither doctors to run emergency services nor any special intensive care unit, crucial to treatment of the disease, when it visited the facility in November 2012. ( http://aajtak.intoday.in/story/with-a-budget-of-billions-of-children-crematorium-1-714360.html). One may comprehend the level of blatant disregard displayed by the state, if one considers that 501 children had died in the region by 15 November, counting just 2012, as per the admission in the Rajya Sabha of the then Minister of State for Health and Family Welfare Mr. Sudeep Bandhopadhyay. If this is the fate of a district hospital, one designated to be a nodal facility to combat the affliction, need one talk of the primary health and community health centers attached to it?


The situation is not going to improve this year. Experts fear the worse, in fact. They have good reasons. Encephalitis has already killed at least 118 children so far this year as noted by the Associated Press (http://hosted.ap.org/dynamic/stories/A/AS_INDIA_ENCEP
HALITIS?SITE=AP&SECTION=HOME&TEMPLATE=DEFAULT), and this before the full onset of monsoon, when fatalities peak.

That 118 children are already dead again this year is a telling comment on both the preparedness and the sincerity of the government in tackling the problem. And it is not as if the authorities did not see it coming. The recurring deaths in this continuing catastrophe are nothing akin to the natural disasters that catch authorities and the citizen unaware and wreak havoc. Also, the government is fully armed to track and fight the disease, with 54 Sentinel and 12 Apex Referral Laboratories dedicated to maintaining surveillance and preventing such deaths. With the annual toll mounting once again, what these facilities do seems to be anybody’s guess.

The seriousness of the problem had forced the High Court of Uttar Pradesh to take suo moto cognizance way back in 2006. The Court had then directed the union and state governments to declare the encephalitis affliction as a national health emergency and draw “a concrete action plan” to tackle it. The directive, as expected, fell on deaf years.

Later, in 2011, the then Union health minister Ghulam Nabi Azad compared the disease to an epidemic and promised all measures to contain it. Noting correctly that the outbreak was caused mainly by water borne enterovirus, and not vector borne Japanese Encephalitis (JE), it would take a closely coordinated effort from the ministry of water management, rural development, health and the social welfare department, to arrest the spread of the disease.

Needless is to say, again, the concerned departments have slept on the proposal.

Even the incumbent provincial government took note of the disease last year and promised sustained action against the killer disease, with the help of a massive immunization drive. It too has slept on its promises until, through annual spike in the afflicted; the disease has knocked on the government’s doors again. The state government emerged from its slumber and hurriedly convened a meeting with the Chief Secretary Jawed Usmani, the top bureaucrat of the state, directing officials to ensure the construction of a fully-functional paediatric intensive care unit (ICU) in BRD Medical College by July 15. A drive, aiming at complete vaccination of 30 lakh people by June, and completion of a 100-bed encephalitis ward at the same medical college were the other measures announced. The wakening is a bit too late, again.

The fate of the proposed vaccination drive fared the worst, of all measures announced. The programme, which has not yet taken off in reality, has failed even those who got one dose of the vaccine, as the required dosages are two. Local health officials, for a change, are not to be blamed for this, as they are often short of the vaccines.

The worst thing about the disease, unfortunately, is not the deaths it causes but the survivors it leaves behind. It leaves victims physically and mentally challenged, for life. The records of BRD Medical College corroborate the fact. For the 35,000 children this facility has seen dead, the numbers of those permanently debilitated is estimated at anywhere between 10,000 and 20,000. The fate of these children often turns out to be worse than those dead and gone as they become a permanent ‘burden’ on their impoverished parents fighting for their own survival. There is no dearth of such children getting abandoned at railway stations and other crowded places. There is also no shortage of tales of parents who refuse to let go of their wasted children, with relatives urging them to abandon the same.

One can tend to blame some of the parents, victims of the system, for cruelty, but the reality is what the NCPCR has stated in no uncertain terms. It is the government that is ‘solely responsible’ for ‘death of the children’ caused by its extreme apathy and inaction. It is the government that finds no funds for vaccination, for building additional hospitals to take the disease head on, and to provide better sanitation to eradicate the very root of the problem. It is the misplaced priorities of the government that counts the hapless children that die, while wasting public money on building theme parks and distributing laptops. It is the government which has abandoned the children. The poor parents have to abandon their children to protect the lives of the surviving ones. It is the governments which fails them, and fails the constitution of India, which makes it the duty for the government to protect its citizens.

It is the government that treats the weakest section of the population as expendable. It is also the national media that lets them do so with impunity, for Gorakhpur is far away from the reach of cameras and sound bytes. And, it is the civil society that fails to see that these lives are being taken away without ‘due process established by law’, even while it protests against capital punishment.

The system has made survival costlier than death for these children. Let’s keep counting the deaths till it improves itself. 

June 21, 2013

यह अंतर्कलह नहीं दक्षिणपंथ का अस्तित्ववादी संकट है.

राजनैतिक संकटों की एक लगभग सार्वभौमिक विशेषता होती है कि वह सुलझा जाने के लिए ही आते हैं. इसलिए क्योंकि जनता की जिंदगी से जुड़े असली मुद्दे नहीं बल्कि राजनेताओं की अपनी महत्वाकन्क्षाओं के टकराव से पैदा हुए संकट ही गंभीर राजनैतिक संकटों में तब्दील होते हैं और इसी लिए सुलझा लिए जाने को अभिशापित होते हैं.

पर फिर भारतीय जनता पार्टी गोवा संकट ऐसे संकटों में एक नहीं है. सतही तौर पर देखें तो गोवा संकट को चार नजरियों से देखा गया है. पहला भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नरेन्द्र मोदी समर्थक खेमे का जिसने इस संकट को नेतृत्व से खारिज होते एक नेता की अदम्य महत्वाकांक्षाओं के मत्थे मढ़ने की कोशिश की. दूसरा पार्टी में आडवाणी समर्थकों का जिन्होंने इसे परिवार के ‘बुजुर्ग’ के गुस्से के सरलीकृत सन्दर्भों में समझा. तीसरा संघ परिवार से बाहर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के हिस्से जनता दल यूनाइटेड जैसे दलों का जिनके लिए यह एक गैर सांप्रदायिक नेता की तलाश का संकट था. और चौथा, संघपरिवार विरोधियों का जिनके लिए यह संकट सांप्रदायिक राजनीति करने वाली कैडर आधारित पार्टी में एक एकाधिकारवादी तानाशाह के करिश्माई उदय से पैदा हुआ प्रहसनात्मक संकट था.

पर हकीकत में यह संकट इससे कहीं जटिल है. इस संकट के सूत्र भाजपा में ही नहीं, भारतीय राजनीति तक में सिमटे हुए नहीं हैं. भाजपा का यह संकट इतिहास के इस विशिष्ट छण में वैश्विक दक्षिणपंथ का वह अस्तित्ववादी संकट है जिससे निपट पाने में दक्षिणपंथ के एक विचारधारा के बतौर बचे रहने का सवाल जुड़ा हुआ है.

आइये, पहले दक्षिणपंथ के इस वैश्विक संकट पर एक नजर डालते हैं. लातिन अमेरिकी देशों में समाजवादी दलों के कब्जे को छोड़ ही दें, संयुक्त राज्य अमेरिका में आर्थिक संकट से निपटने में बराक ओबामा की साफ़ असफलताओं के बावजूद दक्षिणपंथी रिपब्लिकन पार्टी बुरी तरह से पराजित हुई है. फ्रांस में फ्रांस्‍वा ओलांद के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी की बहुमत के साथ जीत के साथ साथ जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी का लगातार उभार साफ़ करता है कि यूरोप में भी यही स्थिति है और दशकों से हावी आक्रामक और उग्र दक्षिणपंथी नवरूढ़िवाद अपनी हार की तरफ बढ़ रहा है.

पर क्या इसे दक्षिणपंथ के पराभव की शुरुआत माना जा सकता है? उत्तर है कि नहीं. इस पराभव के साथ ही इन सभी देशों में एक अल्पमत पर बेहद मुखर और लगभग नाजीवादी दक्षिणपंथ का उभार भी हुआ है. इन दक्षिणपंथी समूहों की सामाजिक पहचान भी स्पष्ट है, यह ज्यादातर कट्टर कैथोलिक श्वेत परिवारों से आते हैं और सामान्य तौर पर दक्षिणपंथी ईसाई रुझान वाली पार्टियों से ज्यादा असहिष्णु और धर्मांध हैं. वे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य से जुड़े हुए सभी अधिकारों जैसे गर्भपात, स्त्री पुरुष बराबरी और समलिंगी विवाह के अधिकार के खिलाफ खड़े हैं.
लेकिन इन्ही समाजों में इनसे कहीं बड़ी संख्या में व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाले लोग मौजूद हैं और 
उन्हें पता है कि दक्षिणपंथ की हर जीत उनके निजी हक छीनने की दिशा में एक और कदम होगी. इसीलिए अमेरिकी हिस्पैनिक और अश्वेत हों या फ़्रांसिसी अरब, दुनिया भर के धार्मिक, भाषाई, नृजातीय या अन्य अल्पसंख्यक समूह उग्र दक्षिणपंथ की उपस्थिति में मौजूद सशक्त विपक्ष के साथ गोलबंद होने लगते हैं. ऐसे में इन समूहों को डराए बिना अपने मूल आधार को सुरक्षित रखना दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन जाता है. इसी सवाल को हल कर पाने की असफलता उनकी हार का सबब बनती है. 

भाजपा का संकट भी बहुलवादी समाजों में अस्तित्व के संघर्ष में फंसे वैश्विक दक्षिणपंथ के इसी संकट का प्रतिफलन है. यहाँ मानना पड़ेगा कि बेहद आक्रामक और सांप्रदायिक राजनीति से शुरुआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी इस संकट को संघ परिवार के किसी भी नेता से बेहतर समझ पा रहे हैं. जीवन भर संघ की सामुदायिक वैमनस्य की राजनीति के झंडाबरदार रहे आडवाणी के लिए यह लाजमी भी है. आखिर आजादी के ठीक बाद से ही नेहरू के रूमानी समाजवाद के सपने वाले इस देश में वे संघ की राजनीति की नींव का पत्थर भी हैं और राजमिस्त्री भी. उन्होंने जनसंघ और फिर भाजपा के राजनीति की परिधि पर खड़े होने का दौर भी देखा है और बाद में खुद के नेतृत्व में इसे मुख्यधारा में लाने की कवायद भी की है.

उन्होंने अपने सबक सीखे हैं. यह कि जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में शामिल होने ने जनसंघ की उग्र हिन्दू राजनीति वाली छवि को थोड़ा स्वीकार्य बनाया था. यह भी कि यह रथयात्रा के ठीक बाद भाजपा की संसद में 2 से 89 हो गयी सीटें नहीं बल्कि वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को समर्थन देने से मिली स्वीकार्यता थी जिसने अंततः 1998 में भाजपा के सत्ता में आने की नींव रखी थी. उस वक़्त आडवाणी को एक और सबक मिला था. यह कि भाजपा के उत्थान के नेता होने के बावजूद उग्र हिंदूवादी राजनीति का चेहरा उनको गठबंधन सरकार के नेता बनने के लिए जरुरी स्वीकार्यता से खारिज करता था. यही वजह थी कि उन्होंने खुद ही ‘गलत पार्टी में सही आदमी’ की छवि वाले अटल बिहारी बाजपेयी को आगे कर दिया था. भाजपा को आक्रामक दक्षिणपंथ से विनम्र दक्षिणपंथ बनाने की दिशा में यह उनका पहला प्रयास था.

इसके बाद का दौर आडवाणी और दक्षिणपंथ दोनों के लिए आत्मविश्लेषण का दौर था. शुरुआती उभार के बाद हिंदूवादी राजनीति की जमीन पर जाति या अस्मिता आधारित राजनीति ने कब्ज़ा कर लिया था और भाजपा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अपने गढ़ों में ही बुरी तरह परास्त हो रही थी. यही दौर युवाओं में संघ के प्रभाव और उसकी शाखाओं दोनों के सिकुड़ते जाने का दौर भी था. गुजरात 2002 होते होते यह साफ़ हो गया था कि भाजपा-संघपरिवार के आधारभूत ‘कैडर” की जगह आक्रामक हिंदुत्व के समर्थक स्वच्छंद शहरी युवाओं ने ले ली थी. मोदी का मुखौटा लगाने वाले इस युवावर्ग के लिए दलीय अनुशासन और राजनैतिक प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं था. उन्हें एक करिश्माई नेता चाहिए था फिर चाहे वह नरेन्द्र मोदी के रूप में मिले या अन्ना हजारे के. इस वर्ग को आडवाणी के भाजपा की सामान्य स्वीकार्यता बढ़ाने की कवायदें नागवार लगनी ही थीं.
यह वही दौर था जब कड़े अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर चलने वाले संघ को भी नरेन्द्र मोदी की छवि में अपने छीजते जनाधार को वापस पाने की संभावनाएं दिखने लगी थीं. बात साफ़ थी कि आडवाणी के पास संघ से सीधे टकराव के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कह कर उन्होंने यह विकल्प अपनाया भी और फिर संघ द्वारा लगभग अपमानित कर पदच्युत किये जाने का दंश भी झेला.

बावजूद इसके कि आडवाणी को हवा में लिखी इबारतें तभी पढ़ लेनी चाहिए थीं, उन्होंने न तो दूसरा बाजपेयी बनने की कोशिशें बंद कीं न ही भाजपा को और स्वीकार्य बनाने की. गुजरात छोड़ कर उत्तर भारत में सिकुड़ते जाने और दक्षिण और पूर्व भारत में कोई बड़ा आधार न खड़ा कर पाने की वजह समझ रहे आडवाणी के लिए साफ था कि भारत जैसे बहुध्रुवीय समाज में अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि दलित, आदिवासी, पिछड़ी, स्त्री और अन्य तमाम अस्मिताओं को डराने वाली राजनीति 13 प्रतिशत मुस्लिमों के सामने 80 प्रतिशत हिन्दुओं के जनसांख्यिकी वाले गुजरात में भले जीतती रहे, राष्ट्रीय स्तर पर हारने को अभिशप्त ही रहेगी.

मतलब यह, कि गोवा संकट भारतीय दक्षिणपंथ के अन्दर की विनम्र और आक्रामक धाराओं के टकराव का संकट था और साफ़ है कि फिलवक्त उग्र खेमे ने पार्टी जीतने पर देश हारने का बंदोबस्त कर लिया है.

June 17, 2013

Identifying Maoists from the Adivasis: Only justice and not more repression can resolve the war within

[From my column Obviously Opaque in the UTS Voice, 16-30 June, 2013.]

Kawasi Lakhma is an Adivasi just like tens of thousands of other Adivasis caught in the war raging in central India. Yet, he is not just like them. He is an MLA as well, albeit of the Indian National Congress, the party in opposition in Chhattisgarh. He was a part of the Congress caravan that got brutally attacked by the Maoists and lost many of the participants, state and national level leaders included, to the rebel bullets. Not merely a part of it, he was in fact among those who formed the front lines of Parivartan Yatra that came under fire.

He was travelling, as per chaotic and often contradictory reports masquerading as media reports, in the third car of the caravan with none less than Nand Kishore Patel, president of the state unit of the Congress and his son. He was abducted together with them and taken to the jungle where the father son duo was brutally killed. He was let off like many others who were accompanying Mahendra Karma. It is just that unlike all others who were let off, he became a target of conspiracy theories being planted in media. No one asked why Sattar Ali, a prominent leader of Salwa Judum and lieutenant of Karma, was let off. Lakhma does not enjoy the luxury.


He cannot. He is an adivasi and therefore a perennial suspect after all. His loyalties would never be unquestionable despite him having chosen to side with the state in this war being waged for the corporations. That is where this war is poised, unfortunately. That is what has pushed the war into a standoff that seems much easier to be sustained than resolved.

No, the suspicions do not justify this dastardly attack and killings. Killings are, and will always be, despicable as they dehumanize everyone. They dehumanize the killer, the killed and the onlooker including the distant ones watching the horror on the television screens in the relative safety of their drawing rooms alike. Killings are despicable as they take away a bit of all that the humanity has achieved against all odds.  And this is why the Maoist ambush of Congress’ Parivartan Rally returning from Sukma is an appalling act and should be condemned unequivocally.

Nothing justifies the ambush that killed 22 people including many innocents.  Nothing absolves the Maoists of the crime, not even the presence of a certain Mr. Mahendra Karma whose private militia was declared a killing machine by the honourable Supreme Court which has then illegalized and disbanded the militia. This is not because Mahendra Karma  is not a convicted, judging by that criteria hardly any criminals are found behind bars in our country. Karma's involvement in killings and rapes carried out by the now illegal Salwa Judum is undeniable. Yet, that does not give anyone the right to kill him, definitely not the maoists. As it is, not only the law of the land but the very philosophy of justice prohibits anyone from taking life of someone else.

Having said that, let's concede that the ambush posits many uncomfortable questions in front of us. These are the questions that open the road to reconciliation and we are not going to reach anywhere without encountering them head on.

The very first of the question is who these Maoists who risk their own lives while launching such audacious attacks really are. The state can, of course  write them off as 'outsiders' but then this lame argument reaches no far than Andhra Pradesh. Now, even Andhra Pradesh is part of India, isn't it? Andhrites are as much Indian citizen as anyone else, ain't they? Cannot we, then, safely assume that these maoists fighting against their own country are sons and daughters of its own soil?

Where do they come from would, then, become the second question. One thing's for sure that maoists don't grow them in fields, do they? Neither are they produced on assembly lines in some hidden factory Maoist might be running. The science has yet not reached there after all. That makes one thing certain that these people, the biggest internal threat to India, are our own people. Why have they picked up guns then? What is it that is pushing them into a war that is as pointless as it is endless?

What is it that blinds them to the reality that the enemy soldiers in uniform they are fighting in their class struggle comes from their own class? Why do not they see that these soldiers come from poor peasant families of Uttar Pradesh and Bihar, that donning that uniform is often a very poor young man from the North East. Why do not they see that all these young people are doing is trying to run away from abject poverty? They can, at least, see as much as that those from the ruling classes, handlers of these young men in Maoist terms, rarely come under their direct fire like they did in this case. They run the war, more often than not, from the safe confines of their well protected office, don't they.

Therein lays the catch, the cacophonous catch that blinds untrained eyes to reality. Think of the reactions to this ambush and one would know what I am referring to. Think of the Chintalnar massacre of 76 CRPF soldiers in Dantewada that took place in April 2010. Nothing can be sadder than comparing tragedies but then count the dead in both of these attacks. Think, now, why that attack was not dubbed as an attack on the democracy like this one? Is it just because the young soldiers killed were foot soldiers and not the political leadership? Is it because the ‘democracy’ has come to reside in the person, and personal security, of politicians?  

Now, think of the urbane middle class seething in rage on the anger manufactured by jingoistic anchors. Look at their faces and you would find that their (cat)calls of avenging the ‘attack on the democracy’ are almost absolutely similar to their anger against the politicians that has been inflicted on television screens across the country in those now forgotten Anna Hazare days. Do they have a moral right even to speak on the issue, forget the high talk of revenge; they might not know even the meaning of revenge after all.

They are the ones, unfortunately, who would set the tone of the revenge the state strives for. It is just that the ambush will be avenged on the cost of the lives of poor, hapless young citizens coming from the countryside and not on that of their own kith and kin. It is very easy to fight a war where the blood would be shed by others and not your own, isn't it? Cheering such wars gives more thrill than a ‘bloody’ IPL match which might be ‘fixed’ in any case, no? And then, a peaceful resolution of the war within would affect none more than this middle class and the luxuries it cannot live without.  Forget luxuries, they would not get even water and electricity without sacrificing the adivasis at the altar of development and they know it way too well. This is why displacement of adivasis, forced evictions from their own lands does never bother them. It does bother the adivasis, though. This is what has disillusioned them completely from the state.

The  disillusionment has been born out of the sad realisation that Indian state has stopped listening to the peaceful and non violent voices of resistance. Unlike urban middle classes’ obliviousness to the developments, the advasis have noticed how the governments have drowned the people of Narmada valley despite not only of their decades long peaceful protests. They have silently seen how the governments have rubbished the Supreme Court’s decision of not displacing them until compensating them with land for land in the process.

They are seeing how their people are being sacrificed to corporate interests from Niyamgiri to Nandigram. They are also seeing the corruption from Radiagate to Coalgate that mobilises the system pitted against them. They are seeing how the political leadership of the country transgresses the politico-ideological differences when it comes down to brutal crackdowns on their peaceful protests. They are the ones who have sacrificed for the ‘nation’ from Hirakund to Bhakra Nangal and they are seeing that this time the struggle has come down to saving their existence, nothing less. 

They have lost faith in the system and its capacity to give them justice. This is the disillusionment that the Maoists are taking advantage of. In other  words, this is the disillusionment and not the almost anarchic ideology of violence that is pushing guns in their hands. They are hardly fighting for an ideology, their fight is for survival.

Remember that the Supreme Court had not punished anyone despite illegalising and disbanding Salwa Judum as a killing machine created y the state. What message would this have delivered to the adivasis? Think of all those fake encounters that the paramilitary forces have been found guilty of and the fact that none of them resulted in any punishments. The best, in fact, one could get in those atrocious cases was a mere ‘very sorry’ statement by P Chidambaram, the Home Minister of India. The adivasis do not want sorry, they want justice. They get none. Think of the fact that last incident of such fake enconters had taken place less than a week before the Darba Ghati valley ambush. Remember that the CRPF had admitted to killing innocents including a few children in that encounter.

This is what is making these citizens of India standing against their own country. This is why, with more repression state can merely loose, and not win, this war. The adivasis have an inalienable right to inhabit their lands, ensure that right and then see how anyone, Maoists or others can lure them into violence. No one chooses a gun until pushed to wall and adivasis are no exception to the rule.  It is not for nothing that the middle classes don't take up arms despite all their pretended anger. Wars are won by making people believe in the state and the day Indian state wins the confidence of its own people back, all that would remain of Maoists is their tales.

There is no other solution to this, definitely not a military one. Those talking of a Sri Lankan Model would better remind them that the war in Sri Lanka was between an imperialist Sinhalese majority and a secessionist Tamil minority. The war there against ‘other’ and adivasis are not India’s ‘others’; are they? Also, this is exactly what the Maoists want as more repression means more support for them.

The logic behind this is very simple. It is almost impossible to identify the enemy from the citizens in those deep distant jungles. So difficult that all the ten persons arrested and prosecuted by the police for Chitalnar massacre were exonerated earlier this year. Think of all they must have suffered under the hands of police for being accused of killing 76 soldiers. Think of their pain of suffering all this despite not being guilty. Now think of where would their sympathies lay after the ordeal.

They were adivasis and not Maoists. They were suspected and arrested. They must have been tortured, we know Indian policing way too well to think otherwise. Kawasi Lakhma is an adivasi. He is an MLA and not a Maoist. He is a suspect now, at least for the champions of conspiracy theories. Think of identifying Maoists from innocents now.  

June 16, 2013

Defying Downpour Hong Kong Blows Whistles For The Whistleblower Snowden


[Published by Counter Currents]

None of us saw it coming, I am sure, not even the organisers.  Despite the calls to join the rally in support of Edward Snowden having taken the social media by a storm, the mood among the organisers was sombre to say the least. It was bound to be; relentless rains had dampened their spirits and made them uncertain of what to expect. Gingerly-written tweets coming with hashtag #SnowdenHK were proof enough of the ambivalence. ‘Lets hope we are not alone!! #liberty for all’ (sic) was what Steve Miller had just tweeted from Chater Garden, the venue where the protest march was scheduled to begin..


And then, it all changed. People started to pour in. The organisers had erred in judging the popular mood in support of Snowden, which had just asserted itself through the huge turnout. Not that they were complaining. This was an error all activists want to make, after all. By making Chater Garden burst at the seams, Hong Kong spoke its heart out for Snowden. Thousands  of them had sacrificed a weekend. That’s some sacrifice folks, for it’s only these well deserved breaks on weekends that restore some sanity in our lives bound to run at a maddening pace here in Hong Kong.

Despite not being in the same league, the turnout was quite reminiscent of protests against the ‘brainwashing’ national education curriculum proposed by the pro-China system, when more than a hundred thousand Hong Kongers took to streets in September 2012. The support for Snowden was in the same league this time around. A survey by the South China Morning Post, the leading English daily, has found more than half of residents firmly with Snowden, blowing away any claims to the contrary. 


We have no clue where this support comes from. It might have emanated solely from Hong Kong’s firm belief in the rule of law and freedom of expression. It could, equally, have come from the guilt associated with the failure to stop the illegal extradition of Libyan rebel leader Sami al-Saadi to be tortured by now deposed and dead dictator Muammar Gaddafi’s regime. One thing was clear though, the people are not going to fail themselves this time around. Neither are they going to let the government fail them..

Back in Chater Garden, the protest had begun. Albert Ho, the Chairman of HK Alliance and former leader of Democratic Party, took the mike. He reiterated that he joined the protest as the case marks a very important moment in history of Hong Kong, a moment which will put HK’s ‘legal system to the test’.  He was joined by Claudia Mo, Legco member (Legco is the abbreviation used for Legislative Council, equivalent of parliament), speaking about the need of protecting whistleblowers and free speech.. 

Rains had given way. The mood was electrifying. People had listened to the organisers’ earlier calls of bringing ‘their own free speech umbrellas to fight the downpour’ and ‘whistles to blow’ for the whistleblower. They were doing exactly the same. Hong Kong was blowing whistles, literally, for the whistleblower. It was time for the rally to take off. The American Consulate, the home of champions of democracy and free speech in China, was the destination.

The one thing I love most about HK Protests is their colourfulness. One can hardly see a more colourful and multicultural protest anywhere in the world. There were native Hong Kongers shouting slogans in Cantonese and Mainlanders replying (that is if I could make out the language difference correctly).   There were Americans (citizens) carrying placards, urging their government to stop hounding dissidents, followed by the South Asian students studying at Hong Kong University as their t-shirts told us. There were Filipinas and Indonesians marching with Europeans. Another South Asian face waved at me with a smile and moved past.

The rally was inching ahead. We had just crossed the IFC tower and were climbing our way up Cheung Kong Park. Apparently, people had ignored American Consulate’s ‘advisory’ to avoid areas near Chater Garden and the American Consulate. Interestingly, Hong Kong police were keeping a watch on peaceful protesters even more peacefully. That is another thing I love about Hong Kong and its protests. I don’t know how many of the expat protesters noticed the empty holsters adorning the uniform of police personnel deployed for the rally. As a standard operational procedure, HK authorities take the firearms away from the police officers deployed for managing such events.  Think, now, of the armed to teeth police contingents that descend on such protests from India to US.

We had reached the American Consulate, the next venue for meetings. The rain was back. Umbrellas of a thousand colours were out again. So were the whistles. Legco member Charles Mak’s speech drew a lot of applause, all in whistles. It was bound to be as he was speaking on the right to communicate safely online and freedom of expression.  A letter drafted jointly by the 27 civil society organisations was handed over to Ambassador Steve Young. Not that anyone expected him, and his government, to act upon it, but he was curtly told to uphold the human right to a private life guaranteed by the Article 8 of the UN Declaration.   

The rally then convened at Tamar Buildings, the headquarters of the HKSAR government in Admiralty, and demanded that the Chief Executive C Y Leung break his silence and protect Snowden and free speech. Speaker after speaker said what hurts the pro-China lobby in the Legco the most; CY Leung was urged to uphold the rule of law without interference from Beijing.

The protest had drawn first blood by the evening. Leung has finally spoken up and pledged that the government would “follow up on any incidents related to the privacy or other rights of the institutions or people in Hong Kong being violated.” He also asserted that the case of Mr. Snowden, as and when it comes, will be handled “in accordance with the laws and established procedures of Hong Kong.” That’s some victory, isn’t it? 

June 10, 2013

एक था आडवाणी उर्फ़ प्रधानमंत्री न हुए सपनों का शोकगीत


जी हाँ. एक था आडवाणी. बिलकुल एक था टाइगर वाले अंदाज में. अब कहने को तो मैं भी ‘मुख्यधारा’ की मीडिया की तरह उसे आडवाणीजी भी कह ही सकता था पर फिर उसकी याद आती है तो उसके रथ के पहियों से खुदी खून की नहरें याद आती हैं और मैं किसी पोलिटिकल करेक्टनेस के लिए हत्यारों को जी नहीं कह सकता. वैसे भी सभ्यता के विमर्श दूसरों के खून से इतिहास लिखने वालों पर लागू नहीं होते.  

सो साहिबान, बात हो रही थी आडवाणी की. लौहपुरुष की. महाशक्तिशाली की. उस आदमी की जिसने जिन्दगी भर दूसरों को त्याग का उपदेश देते हुए भी अपनी नजरें एक कुर्सी पर गड़ाये रखीं. एक बार तो खैर बिचारा बहुत करीब भी पंहुच गया था पर फिर उसके और उसकी कुर्सी के बीच एक ब्राह्मण खड़ा था. बेचारे लौहपुरुष को कुर्सी नहीं‘उप’ का ठेंगा जरुर मिला था.  

वैसे साहिबान ये लौहपुरुष बड़े अजीब किस्म का लौहपुरुष है. ऐसा कि इसका मजाक वह आदमी भी उड़ा के चला जाता है जिसका मजाक बनाते इस देश के सवा अरब लोग नहीं थकते. समझे कौन? अरे वही अपने मनमोहन साइलेंसर सिंह. ईमानदार प्रधानमंत्री साहब. अब यह मजाक न लगा हो तो असली मजाक सुनिए. साइलेंसर भैया ने एक बार भरी संसद में आडवाणी को परमानेंट प्राइममिनिस्टर इन वेटिंग का तमगा पकड़ा दिया था और तब से विद्वान् यह मानते हैं कि साइलेंसर सिंह का भारतीय राजनीति में इकलौता योगदान यही है.  

अब आप ज्यादा दिमाग लगा के यह न पूछने लगिएगा कि नयी आर्थिक नीतियाँ उनका भारतीय राजनीति को योगदान है या नहीं. मशीन और उसमे लगे नटबोल्ट मिस्त्री से आजाद होकर योगदान नहीं करते साहब और आप अपने साइलेंसर भैया विश्वबैंक और आईएमएफ की मशीन के नटबोल्ट से ज्यादा कुछ समझेंगे तो सवाल मुझ पर नहीं आपकी बुद्धि पर उठेगा. याद करिए कि साइलेंसर सिंह की नीतियों को लौहपुरुष वाली भाजपा ने और उत्साह से आगे बढ़ाया था. इतना कि रामभक्तों ने विनिवेश मंत्रालय नाम से देश बेचने का मंत्रालय ही बना दिया था. बाकी खबर यह है कि बनाना तो वह ‘देश बेचो मंत्रालय’ चाहते थे लेकिन नाम सुनने में थोड़ा कम स्वदेशी लगता.

देखिये. फिर भटक गया. सो साहिबान मसला यह कि सारा देश जिन साइलेंसर भैया का मजाक उड़ाता है वही साइलेंसर भैया भरी संसद में लौहपुरुष की पगड़ी उछाल के चले गए और उनके सारे गण इधर उधर देखते रहे. क्या सुषमा दीदी क्या यशवंत से लेकर जसवंत तक, बचाने तक न आया कोई मुआ.

फिर तो भैया पूछो ही मत. प्रधानमंत्री की कौन कहे हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा लगा आडवाणी की टोपी उछालने. ऐसा कि किसी का खेलने का मन हो गया तो उसने उछाल दी लौहपुरुष की पगड़ी. किसी का मसखरी का मन हुआ तो उसने निकाल लिया जिन्ना का जिन्न बोतल से और दीवाली के राकेट टाइप दाग दिया आडवाणी के ऊपर. लौहपुरुष के साथ वही हुआ था जो बाहर रखे लोहे के साथ होता है. लौहपुरुष जंगी हो गए थे. न न, युद्ध वीर मार्का जंगी नहीं, लोहे पर जो लगती है न, भूरी भूरी वह वाले जंगी.

अब जंग ऐसी लगी की उनके चेले तक उनसे मसखरी पर उतर आये. हाय दुर्दिन! शुरुआत भी की तो किसने? उस मोदी ने जिसके फेकू होने की पहचान तब तक सार्वजनिक न हुई थी.  जिसको ठीक दस बरस पहले इसी गोवा में बचाने के लिए गलत पार्टी में बहुत गलत आदमी आडवाणी, गलत पार्टी में सिर्फ गलत बाजपेयी से भिड़ गए थे. वह भी ऐसे कि बाजपेयी बिचारे मार फेंचकुर फेक के राजधर्म चिल्लाएं चाहे रोम वाले नीरो की बांसुरी अहमदाबाद में बजाएं, आडवाणी न सुनें तो न सुनें. बस.

चेला बच गया साहब. और फिर चुकाया चेले ने अहसान. ऐसे की धीरे से इशारा किया गुरु को कि दद्दा, बहुत हो गया अब. प्रधानमंत्री बनने के गए दिन तुम्हारे सो रिंग में फेंकी अपनी टोपी उठा लो. दद्दा सुनें क्यों? चेले ने दिया फिर जोर का झटका धीरे से. नहीं आया दिल्ली में 2011 में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में. कह दिया कि नवरात्रि मनाने में व्यस्त हैं. अब रामभक्त आडवाणी इस देवीभक्त का करते भी क्या.

करते तो बिचारे लौहपुरुष उनका भी क्या जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उनको सेकुलर होने का सर्टिफिकेट दे आने के जुर्म में उनको धकिया के, बेइज्जत करके कुर्सी से उतार दिया था. कैसे समझाते उन्हें कि जिन्ना मरहूम को सेकुलर सर्टिफिकेट की जरूरत हो न हो, आडवाणी बिचारे का कम से कम सेकुलर दिखना जरूरी था. उप था ठेंगा हटा प्रधानमंत्री पद को जाने वाली गली इसी रास्ते से गुजरती थी आखिर. पर संघियों ने माफ़ न किया अपने बुजुर्ग को. पहला गुनाह यह कि एक झटके में बुढ़ऊ ने उनकी बरसों की विचारधारा की मिट्टी पलीद कर दी थी. पर गुनाह-ए-अज़ीम ये कि सही इतिहास से नफरत करने वाले आरएसएस के इतिहास में पहली बार उनके किसी शोहदे ने सच को सच कहा था. ऐसे संगीन जुर्म की माफी होती है कहीं?

सो संघी टूट पड़े बेचारे पर. ऊपर से हवाओं में खून की महक भी तो थी. प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार को निपटा देने का मौका भी तो था. भले चुनाव पर चुनाव हारते रहें, भाजपाइयों से प्रधानमंत्री पद का सपना देखने का लोकतान्त्रिक अधिकार कैसे छीन सकता है कोई? सो साहिबान, भाईलोगों ने बुजुर्गवार को नेता विपक्ष पद से दफा किया फिर भाजपा अध्यक्ष से भी. मिशन कम्प्लीट वाली स्टाइल में.  

लेकिन आडवाणी न समझें तो न समझें. भाई ने फिर रथ निकाल लिया. अबकी बार भ्रष्टाचार के खिलाफ. बस बेचारा यह भूल गया कि इतिहास खुद को दोहराता है तो पहले त्रासदी फिर प्रहसन हो जाता है. 2011 का भारत 1992 का भारत नहीं था. यह टीवी पर रामायण-महाभारत देखने से बहुत आगे निकल आया समय था, तब जब जनता बिग बॉस में सन्नी लियोनी को देख भी अचंभित नहीं होती थी. यह मेटाडोर और असली रथ में फर्क समझने लगा भारत था. और फिर बेचारा भ्रष्टाचार पर बोलने निकला भी तब था जब बी एस येदुरप्पा माननीय मुख्यमंत्री थे.

खैर, प्रहसन तो यह भी था कि राम मंदिर के रास्ते कुर्सी तक पंहुचने के सपनों वाली यह यात्रा आडवाणी को अन्ना हजारे की नक़ल करने की हद तक उतार आयी थी. उस आडवाणी को जो हत्यारी भीड़ का ही सही, नेता तो था. उस आडवाणी को जिसके रथ के पीछे भीड़ दौड़ती तो थी ही भले ही इरादा सिर्फ मासूमों और बेगुनाहों के क़त्ल का हो. पर बेचारा आडवाणी करता भी क्या? हत्यारों का सबसे बेहतर नेता होने का तमगा भी उससे उसके चेले ने छीन लिया. अब चुनाव चाहे घटिया का ही हो, इंसानी फितरत सबसे बेहतर के साथ जाने की ही है.

सो भाईलोगों ने आडवाणी के रथ को काला झन्डा दिखाया, आडवाणी के भाषणों पर हँसे. कुछ ने तो रथ पर अंडे भी फेंके. भले लोग थे लेकिन, आडवाणी के शाकाहारी होने की खबर मिलने पर अण्डों को सड़े टमाटरों से बदल दिया. हद यह कि बेचारे लौहपुरुष को यह बेइज्जती उस पंजाब में भी झेलनी पड़ी जहाँ उसकी पार्टी अकालियों के साथ साझे की सत्ता में है. आलम यह कि आज टमाटर नहीं पड़े तो कल से बेहतर दिन. जयप्रकाश नारायण के शहर से खूनी रथयात्रा शुरू करने वाले के साथ यही होना भी चाहिए था.

मुझे बेचारे आडवाणी से कोई सहानुभूति नहीं है. मेरे मुल्क को जादूगरों, महाराजाओं और संपेरों का देश होने के अभिशाप से आगे बढ़ने के लिए आडवाणी जैसों का सार्वजनिक जीवन से बेइज्जत होकर जाना जरुरी भी है.