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May 30, 2013

खेतों में नहीं उगते माओवादी.

क्यों कोई बनता है माओवादी शीर्षक से दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण में
30 मई २०१३ को प्रकाशित लेख का विस्तारित रूप.
दैनिक समवेत शिखर में 15 जून 2014 को पुनर्प्रकाशित]

हत्यायें हमेशा घृणित होती हैं. बर्बर तरीके से की गयी हत्यायें और भी ज्यादा क्योंकि हर हत्या इंसानियत कम करते हुए सबको थोड़ा कम इंसान और थोड़ा ज्यादा पाशविक बनाती है, हत्यारे को भी, शिकार को भी और देख रहे लोगों को भी. इसीलिये सुकमा में परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर बर्बर और अमानवीय हमला कर 22 लोगों को मौत के घाट उतार देने वाला माओवादी हमला एक कायराना और घृणास्पद हरकत है जिसकी तीखी भर्त्सना नहीं होनी चाहिए बल्कि ‘निर्दोषों की हत्या के लिए खेद जताने वाले उनके माफीनामे के बावजूद जिसके जिम्मेदार लोगों को सजा भी मिलनी ही चाहिए. (माओवादियों ही नहीं बल्कि फर्जी मुठभेड़ों में बार बार निर्दोष आदिवासियों को मार आने वाले सैनिकों के साथ भी यही होना चाहिए.)

वजह यह कि ऐसे बर्बर हमलों को किसी आधार पर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता फिर वह आधार चाहे  राज्य और माओवादियों के बीच चल रहे इस लगभग गृहयुद्ध में फंस गए निर्दोष और निरीह आदिवासियों के ऊपर वहशियाना हमलों, हत्यायों और बलात्कारों के जिम्मेदार महेंद्र करमा की उपस्थिति ही क्यों न हो. महेंद्र करमा भले ही दोष सिद्ध अपराधी न हो पर इन अपराधों में उसकी संलिप्तता इतनी असंदिग्ध रही है कि उसके बनाए सलवा जुडूम को माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने गैरकानूनी क़त्ल करने वाला मिलिशिया बता के भंग कर दिया था. पर यह भी माओवादियों ही नहीं किसी को भी उनकी जान लेने का अधिकार नहीं देता. इस बात को और साफ़ करें तो भले ही देश का क़ानून दुर्लभतम मामलों में ‘विधि द्वारा स्थापित सम्यक प्रक्रिया के अनुसार’ अपराधियों के जीवन का अधिकार छीन लेने की अनुमति देता है परन्तु मानवाधिकार विमर्श तो उसके भी खिलाफ ही खड़ा है. अब ऐसे में किसी की भी हत्या को कोई उचित कैसे ठहरा सकता है? करमा राज्य का अपराधी था और उसे राज्य से ही सजा मिलनी चाहिए थी बशर्ते राज्य खुद ही अपराधियों का आना हो गया हो. 

पर यह कह चुके होने के बाद भी यह हमला तमाम बड़े सवाल खड़े करता है और उन सवालों से सीधी मुठभेड़
किये बिना राज्य और माओवादियों दोनों की तरफ से आम नागरिकों की जान की कीमत पर लड़े जा रहे इस युद्ध को ख़त्म करने की कोई संभावना नहीं बनेगी. उनमे से पहला सवाल यह है कि सैकड़ों की तादाद में आकर अपनी भी जान की कीमत पर हमला करने वाले यह माओवादी कौन हैं? बेशक राज्य अपने भोथरे तर्क में अकसर उन्हें ‘बाहरी’ बताने की कोशिश करता है पर फिर ‘बाहरी’ होने का यह तर्क भी बस आंध्र प्रदेश तक पंहुचता है और आंध्र भी किसी और देश का नहीं भारत का ही हिस्सा है. मतलब साफ़ है कि यह माओवादी भी भारत के ही नागरिक हैं और उनकी जंग अपने ही राष्ट्र के खिलाफ जंग है.

दूसरा सवाल यह कि अपने ही राष्ट्र के खिलाफ लड़ रहे यह लोग कहाँ से आते हैं? यह तो तय है कि माओवादी उन्हें खेतों में नहीं उगाते, न ही उनके पास माओवादी लड़ाके तैयार करने वाली कोई असेम्बली लाइन वाली फैक्ट्री है सो वह भी अपने ही समाज से आते होंगे. फिर ऐसा क्या है जो उन्हें ऐसे नैराश्य से भर रहा है, उनको अपना जीवन देने और दूसरों का लेने वाली अतिवादी और अंतहीन हिंसा की तरफ धकेल रहा है? ऐसा क्या है जो उनकी नजर को इस हद तक बाँध के रख रहा है कि वह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि उनके इस ‘वर्ग संघर्ष’ में उनके ठीक सामने खड़ा दुश्मन उनके ही वर्ग के किसी पुरबिया किसान का बेटा होता है या किसी तरह से जीवन चला लेने के लिए बेहद कम तनख्वाह देने वाली नौकरी की वर्दी पहने उत्तर पूर्व का कोई गरीब आदिवासी नौजवान होता है. बेशक सुकमा हमले में माओवादियों के मुताबिक शासक वर्ग से आने वाले कुछ लोग भी मारे गए हैं पर अक्सर तो वह जंग से बहुत दूर सुरक्षित स्थानों में बैठ पैदल सिपाहियों की ही आहुति दे रहे होते हैं.

इस हमले पर आयी प्रतिक्रियायों पर ही गौर करें तो यह नुक्ता और साफ़ हो जाएगा. सोचिये कि अगर दंतेवाड़ा के चिंतलनार में 76 जवानों को मारा जाना लोकतंत्र पर हमला नहीं था तो यह वाला क्यों है? इसलिए क्योंकि वह जो मारे गए थे देश का राजनैतिक नेतृत्व नहीं बल्कि पैदल सिपाही थे? क्या इसलिए कि इस देश का लोकतंत्र नेताओं के अपने शरीरों में सिमट गया है? मतलब यह कि निशाने पर नेता हों तो निशाने पर लोकतन्त्र है (संसद हमला- करमा काण्ड) और वर्दी पहने सिपाही तो बस एक छोटा मोटा हादसा?

तीसरा सवाल यह कि अपने घरों के भीतर सुरक्षित बैठे खबरिया चैनलों द्वारा पैदा किये गए उन्माद के सहारे बदला लेने पर उतारू शहरी मध्यवर्गीय को क्या इस मुद्दे पर बोलने का नैतिक अधिकार भी है या नहीं? दूसरों की जान की कीमत पर बदला लेना बहुत आसान होता है, दूसरों की जान की इज्जत कर समस्या को ऐसे सुलझाना कि जानें जाने की नौबत ही न आये बहुत मुश्किल. और ऐसे सुलझाने के रास्ते में बिजली पानी जैसी शहरी मध्यवर्ग की वह सहूलियतें आ जाती हैं जो आदिवासी इलाकों से आदिवासियों को ही बेदखल किये बिना पूरी नहीं होतीं. और आसान शब्दों में कहें तो यह विकास बनाम आदिवासियों के विस्थापन का सवाल है जो ऐसे हिंसक मोहभंग का सबब बनता है.

इस मोहभंग का मूल कारण यही है कि देश की सत्ता ने, फिर वह किसी भी राजनैतिक दल की क्यों न हो, शांतिपूर्ण और अहिंसक आन्दोलनों की आवाजों को सुनना बंद कर दिया है. शहरी मध्यवर्ग भले न देख पा रहा हो, बस्तर के आदिवासी साफ़ देख पा रहे हैं कि कैसे राज्य सत्ता ने नर्मदा घाटी के लाखों आदिवासियों के शांतिपूर्ण आन्दोलन को ही नहीं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के जमीन के बदले जमीन का मुआवजा देने तक उन्हें विस्थापित न करने के फैसले तक को दरकिनार कर उन्हें डुबो दिया। वह देख रहे हैं कि कैसे ओडिशा के नियमगिरि से पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम तक कारपोरेट हितों के लिए समुदायों की बलि चढ़ाई जा रही है. फिर वह इस बलि के पीछे राडियागेट से कोल-गेट तक जाने वाला राजनैतिक नेतृत्व का भ्रष्टाचार भी देख रहे हैं. वह देख रहे हैं कि कैसे विचारधारा और दलीय राजनीति के खेमों के पार जाकर राज्य प्रशासन शांतिपूर्ण प्रतिरोधों का पुलिसिया दमन कर रहे हैं. उन्हें समझ आ रहा है कि हीराकुंड और भाखड़ानांगल से लेकर नर्मदा घाटी तक इस देश में हुए हर विकास की कीमत आदिवासियों से बिना उनको न्यायोचित मुआवजा दिए वसूली गयी है और अब तो यह कीमत उनके अस्तित्व तक ही आ पंहुची है.

उन्हें इस व्यवस्था से न्याय की उम्मीद नहीं बची है और यही वह मोहभंग है जिसका फायदा माओवादी उठा रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यह भ्रष्ट नेतृत्व के दौर में आदिवासियों का इन्साफ से उठ गया यकीन है जो उनके हाथों में माओवादी बंदूकें पकड़ा रहा है. सलवा जुडूम को नागरिकों द्वारा नागरिकों का क़त्ल करने वाली निजी सेना बताने के बावजूद किसी अपराधी को दंड न देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से उनके अत्याचारों का शिकार गैरमाओवादी आदिवासियों को क्या सन्देश गया होगा? या फिर उन तमाम मुठभेड़ों से जिनमे अर्धसैनिक बल निर्दोष नागरिकों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या कर आते हैं और सजा तो दूर उनके खिलाफ जांच तक नहीं होती? याद रखें कि ऐसी अंतिम घटना सुकमा हादसे के सिर्फ हफ्ते भर  पहले हुई थी जिसमे सीआरपीएफ ने किशोरों समेत निर्दोषों को गलती से मार देने की बात स्वीकारी भी थी.

इसीलिए यह लड़ाई दमन के खिलाफ न्याय मांग रहे इसी देश के नागरिकों की लड़ाई है और सत्ता और दमन से इसे हार ही सकती है जीत नहीं. आदिवासियों को उनकी जमीन पर रहने का हक दीजिये, उनके जंगलों पर उनका संविधानसम्मत अधिकार सुरक्षित करिए और फिर देखिये कि कोई माओवादी उन्हें कैसे बरगला( आपके अनुसार) पाता है. जंगें फौजों से नहीं यकीन से जीती जाती हैं और जिस दिन राज्य ने अपने ही नागरिकों का वह यकीन वापस जीत लिया उस दिन माओवाद अपने आप ध्वस्त हो जाएगा. इस मसले का और कोई दूसरा, सैनिक समाधान नहीं है और जो लोग ‘श्रीलंका समाधान’ याद दिला रहे हैं वह यह समझ लें तो बेहतर कि श्रीलंका में लड़ाई सिंहल बहुमत और तमिल अल्पमत नाम के दो समुदायों में थी. अब वह भी आदिवासियों को ‘अन्य’ मानते हों तो बेशक सैन्य समाधान करने की सोचें. 

पर फिर वह यह भी याद रखें कि माओवादी भी यही चाहते हैं क्योंकि राज्य निर्दोषों का जितना दमन करता है उन्हें उतने कैडर मिलते हैं और जंगल में दोषी-निर्दोष पहचानना लगभग असम्भव है, इतना असंभव की चिंतलनार में मारे गए 76 जवानों की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किये गए सभी दस आरोपियों को इसी जनवरी में अदालत ने बेक़सूर बता कर बाइज्जत बरी कर दिया था. सोचिये कि बेवजह गिरफ्तार होने और पुलिसिया यातना सहने के बाद अब उनकी सहानुभूति कहाँ होगी?

May 27, 2013

When A Celebrity Gandhian Mourns A Mass Murderer!


[Published in the Counter Currents]
Himanshu Kumar in Jal Satyagrah in Harda, MP

Who can have a problem with someone remembering a dear friend, brutally killed by enemies who could come in any form from that of armed to teeth state to much less armed insurgents? No one can, one must think. Killings, more so the brutal and mindless ones should always be despised as they dehumanise everyone, the killer, the victims and the witnesses.


But what if the one killed was a mass murderer, the founder of an armed militia illegalised and disbanded by nothing less than the Supreme Court of the country? And, lo and behold, the one remembering him so fondly is a self-designated Gandhian, a champion of non-violence? That’s exactly what I woke up to this morning, to Himanshu Kumar, a self-appointed Gandhian having monopolised the rights of being the voice of hapless adivasis of Bastar, paying his heartfelt condolences to Mahendra Karma, the architect of Salwa Judum. What if this armed militia is responsible for killing, maiming and raping countless adivasis in the ongoing war that Indian state has been waging on its own citizens?

Let me concede here, though, that the obituary, published in a reputed magazine Tehelka, came across as a brutally honest one. That is till one reread it and got real meaning hidden, craftly, between the lines. The Gandhian has recounted his association with the murderer way too well, down to the detail of acknowledging the perks that came with this ‘friendship’. Himanshu Kumar minced no words in accepting that “[t]he administration would nominate” him “to every committee in the district.” Himanshu Kumar would also note down the disgrace that would come his way because of this association. He would not deny that the ‘friendship’ has led to a scenario where “BJP leaders” had started calling him “a Congress man.”

Despite the apparent honesty, something sinister was reeking out of this acknowledgement. Something, that was haunting me. Then it came in a flash. Did not Mahednra Karma, such a dear friend of Himanshu Kumar, was the one who had started Jan Jagran Abhiyan comprising of traders and businessmen way back in 1991? That is, almost a year before his first meeting with Himanshu Kumar, the Gandhian, ‘serving’ hapless adivasis in the area? He must have known about the terror Karma “ji’ wielded in the area. He must have known whom would an organisation of traders and businessmen serve in an area inhabited mostly by adivasis.

No, the Gandhian would not know any of that. He would discuss the sincerity of his friend, Karma ‘ji’. He would gift him books, remembering one of them very clearly. That one was “Hindu Hone Ka Dharma” (The Dharma of being a Hindu). The question, however, is if the Gandhian really did not know of the armed militia that his friend was leading. Himanshu Kumar would not explain that. He would, rather, discuss ‘Karmaji’s rise in the politics. He would, in his brutally honest way, even refer to the mining project of Mittals and Jindals his friend ‘Karmaji’ wanted to bring in the Bailadila for ‘development’. He would inform the readers about the township project his friend was thinking about, of course for ‘development’ in Bijapur.

He would stop on that, why won’t he, it was getting uncomfortable after all. Himanshu Kumar would discuss of Salwa Judum only in passing. It could, after all, be a ‘coincidence’ for him that Salwa Judum was starting in in the “same Bijapur where licenses were given out for mining.” Friends and coincidences are bound to go hand in hand, don’t they? He would even agree to join in a Salwa Judum rally provided “it was free of weapons.” Himanshu Kumar was standing by his principled location of being a Gandhian. How could he participate in a movement that had “weapons in it?’

He could, of course, choose to keep quiet about that. He did exactly that from 2005 to 2007 when Salwa Judum rolled out as an illegitimate arm of the state in its war against citizens. He would serve tea to his dear friend ‘Karmaji’ and his bodyguards instead of questioning him on his role in the mayhem the militia had unleashed. The Gandhian Himanshu Kumar would, however, refuse to participate in the Salwa Judum rally at the last moment in protest to (?) his dear friend ‘Karmaji’ bringing in his bodyguards in the same.

That was all about his protest to the violence Salwa Judum was indulging in. He had, by his own admission, “kept quiet’ to the ‘news of violence’ trickling in. He would not condemn Salwa Judum’s violence even when “human rights activists and national and international journalists” begun visiting his ashram “to investigate the role of the Salwa Judum. That those activists included Binayak Sen, Balagopal, Nandini Sundar, Ramchandra Guha, Harivanshji and many others is beside the point.

He would open his mouth only when workers of his own “Vanvasi Chetna Ashram” (notice he calls his Ashram Vanvasi in RSS/BJP language and not Adivasi) start getting attacked. This would, if you must know, be almost two years after Salwa Judum had rolled out. Loyalty demands a price, doesn’t it? That is after his friend ‘Karmaji’ would start attacking him publicly and would, as per the Gandhian’s unverified claims, plot his murder.
No wonders in that as plotting murders came naturally to ‘Karmaji’, Gandhian’s friend. It is just that the target, this time, was self-designated Gandhian himself. That was something to worry about, wasn’t it? So the Gandhian fled Bastar and took refuge in Delhi, the national capital. He would, then, usurp the voices coming from Bastar. Why won’t he as it is much more easier for the state to host a Gandhian , and nonviolent, voice of ‘resistance’ than the Maoists who were waging a popular war against it.

The Gandhian would become a celebrity, a spokesperson of the dispossessed and disentitled masses. He would now start ‘participating’ in protests across India. He would hold press conferences. He would sermon others on the ‘conditions’ in India.

Unfortunately for him, though, Maoists would finally succeed in their ambush and kill his friend ‘Karmaji’. Unfortunately for him, this killing would not evoke the same disdain other killings evoke. Unfortunately for him, the adivasis of Bastar would almost celebrate this killing. This would, of course, puncture the balloon this self-designated Gandhian had blown. He would give himself away by condoling the ‘killing’ of the mass murderer in most personal, and loyal terms.

No, he is not being subversive. Subversion, after all, is a weapon of the revolutionaries. He would rather attempt to be the most loyal servant, not friend, of the mass murderer. He would try to make a human being out of this beast. He would even try to masquerade the murderer as a poor and hapless victim of Raman Singh, chief minister of Chhattisgarh.

He would try to portray his friend as a victim of his circumstances, someone trapped into assuming leadership of Salwa Judum, illegalised and ordered to be disbanded by none less than the honourable Supreme Court of India. And he would give himself away in that for, shrewdly, choosing to not mention the past of the murderer. A past that did not begin in 2009 when the Gandhian, Himanshu Kumar first spoke against the murderer’s militia, Salwa Judum. A past that did not begin, even, in 2005 when he started his militia. It was a past that started in 1991 when the mass murderer had started Jan Jagran Abhiyan. It was a past which the Gandhian Himanshu Kumar has decided to look away from for being dearest friend of the murderer till 2009 until his own friends and employees started paying the price.

Should I say shame on such pretentious Gandhians?

May 24, 2013

Terai in turmoil: Negotiating national aspirations and NGOs in Nepalese’ quest for a new nation


[From my column Obviously Opaque in the UTS Voice 16-31 May, 2013. Read the first one in this Nepal series here]

The SUV whizzing past our vehicle had caught my imagination. Painted bright sky blue, the one seemingly copyrighted by the United Nations, this one, I later noticed, did actually belong to the comity of nations. But then, what exactly was a vehicle carrying a UN flag in the front and a blue, again UN, number plate on the back doing on the dilapidated and dusty roads of Nepalgunj? And why did it have a huge jammer along with the UN insignia?

‘The war is over, is not it?’ I asked the friend accompanying me. ‘No, wars never end in Nepal,’ she replied looking out of the window. Her gaze was fixed in vacuum. The abandon in her voice had disconcerted me enough not to probe any further. The only sound that remained was that of the vehicle. The monotony of the sound had doomed it to fade and an eerie silence was slowly settling inside. Even Dhrub, our driver, who had pleasantly surprised me with his strange, but melodious, habit of humming something all the time he drove, had gone silent.

‘Nepalis do not believe in a closure,’ said my friend breaking the gloom. ‘We are a country where dynasties have been trying to claim and reclaim the throne for more than 200 years now, and no victory is ever complete till it’s finally upstaged by a rival. And I so wish that your country had not always had played a role into those power games.’ Her eyes, this time, were fixed at me, unsettling me even more. I could not decide what exactly that stare meant. From a probing gaze to a sweeping statement that did not carry any emotions, it could be anything.

‘Don’t you worry’, sensing my unease she told me. ‘Nepalis have yet not lost the capacity of differentiating between friendly citizens and the big brotherly rulers that inhabit the lands on the other side of Rupaidiha border.’ She had broken into a giggle. Dhrub looked back and started humming again.

‘What about the war though, the janyuddh (people’s war),’ I had gathered myself back to be able to give words to what was bothering me ever since I had seen the UN vehicle with the jammer. The war, in any case, was centered in the western and mid-western Himalaya I had just returned from. It was, like any other war, fierce and brutal but had not affected the Terai in the same way it had devastated the mountains.

The Maoists, of course, have launched some daring attacks in the districts that formed the plains that gave Nepal almost all its homegrown food and had won some glorious victories. The royalist army, on its part, has been as ruthless in its efforts of suppressing them as it was in mountains. No, I am not suggesting that it was a war between the good and the bad and Maoists were the ‘good’ in the same. The war, like any other one, had seen both sides indulging in grave violations of human rights and dignity. Yet, all the evidences suggest that the army has much more to account for than the Maoists. And then, it was fighting for a despotic and hated king unlike the Maoists, who as I was told again and again in Mugu, had placed themselves as the only hope of the most vulnerable sections of Nepalese population.

‘The people’s war has turned into many people’s war now’, she quipped in her signature style of delayed response. Even the Maoist party led by Matrika Yadav, the biggest Madheshi leader the united Maoists who led the civil war culminating into the decisive defeat of monarchy, has split recently,’ she continued while consciously warding off my quizzical look. ‘Throwing away the yoke of slavery was never going to be an easy task but none of us expected it to reach until here and then getting stranded into an almost impossible to break deadlock.’ The disappointment writ large on her face did not require any expertise to be read correctly. It was intelligible even to most untrained eyes.

The conversation was broken by the vehicle coming to a screeching halt. We had reached Balapur a village some 45 kilometers away from Nepalgunj. It was a sight to die for, one I had never seen before and believe me that I have seen quite a lot. The village, surrounded by lush green foresty hills from three sides was organized in a neat circle of houses forming the outer periphery with all the agricultural lands inside. The feat, achieved a few years ago, had marked a victory of communitarian interests trumping the individual greed in ways remarkable in more than one.

It had, at the very outset, saved both the livestock and humans residing here from the attacks of wild animals, something that was way too common a few years back. Second, it had brought all the lands belonging to one family together and thereby obliterating the losses incurred by small patches of land. Why was I, a human rights activist, brought in this relatively prosperous oasis in the midst of abject poverty was the question ringing in my head.

‘Because none of this will survive,’ my friend answered as if reading my mind. ‘The village comes in the buffer zone of the Banke National Park, Nikunj as they call them here, and will lose all communitarian rights to minor forest produce’ she went on explaining. ‘As if that was not enough, the authorities are hell bent on inundating this village into oblivion’. The tone of disappointment that has been defining this part of my Nepal visit was back.

“You see that canal coming up on the south face of the village’ she asked. I could see the upcoming ugly structure fairly clearly. ‘That canal under the Sikta irrigation project would seal the fate of the village by blocking only possible way of drainage. Come rains, and we would be issuing national and international alerts to save the villagers, believe me.’

‘Why did they not construct it on the north face, that would had save the villagers from attacks of wild animals by cutting them off from the village,’ I asked. ‘You think that we did not do that?’ the reply had come from Khanal, the disarmingly young leader of the struggle to save the village. ‘We have fought against it right from the local village development committee level to Kathmandu, won many assurances as well. But then, this is Nepal, governments change here much before they can deliver on their promise. The country is in transition you see.’

The comment had brought a smile on every single face present there. Sarcasm, as it is, is any day better than gloom. ‘We are asking for relocation’, Khanal had snatched the thread of conversation back, and we would not let anyone inundate us before that. No one wants to leave his motherland but even if we are forced to, we would not go before getting lands for land. The resolve was screaming through the sentences. ‘And you better help our struggle through raising the issue at various international forums,’ he asserted. ‘Our struggle and not mine, I made a mental note while promising him that we would. ‘We will fight, the days of the king are over’ was the parting shot. They are over and happily so, said the spark that illuminated our eyes.  

‘Khanal talked about international forums and so on with such remarkable self-assurance’ did not he, I asked my friend. ‘So you basically are asking about the language of development discourse he used, don’t you,’ she asked back mischievously. ‘You know, NGOs fill the space emptied by a retreating government and Nepal has been oscillating between phases of no government and retreating government since long. The vacuum has been filled by NGOs who bring in their language together with their depoliticisation drive. No wonders that now almost everyone speaks their language here, Nepal is one of the most NGOised place on the face of mother earth after all.’ You must have met quite many of them in Mugu, didn’t you? The question was back on me. ‘I did’ was the feeble reply.

‘Don’t worry though, even the NGOs here are highly politicized. Many of them are actually aligned with parties, she added reassuringly. The UN vehicle was making sense now, the jammer was not.

We were back in Nepalgunj, our base for the travels in Terai when I saw that empty pedestal on a busy roundabout. Despite looking quite old, it, surprisingly, had no statue adorning it. ‘Oh, that. That one used to have a statue of King Gyanendra. People broke it during the janyuddh, he informed me. ‘Why did they not replace it with another statue, then, I asked? ‘Because they wanted to keep it as a reminder of what we may face if we let this opportunity slip’ he replied in a mock-worried tone. ‘The days of the king are over and it should remain the same way,’ added my friend.

It’s not all that gloomy you know, we have a lot to cheer about this ‘nawan mulk’ (new nation) we are yet to make’. What else could I do other than concurring with glee? ‘And ya, be ready very early in the morning. We got to go to Bardia,’ she almost ordered while wishing me a goodnight. 

May 19, 2013

पवित्र प्रश्नवीरों की पुण्य स्मृति में

स्वयं-प्रमाणित प्रश्नवीरों के छापामार शिविर में अफरातफरी का आलम है. असली प्रश्नवीरों के माथे पर छलक छलक पड़ रहा पसीना उनकी फर्जी और ज्यादातर स्त्रीवेशी फेसबुक प्रोफाइलों के पोंछे नहीं पूछ रहा. पवित्र प्रश्नवीर हनुमान संशय की रात में घिरे हुए थोड़ा कम पवित्र प्रश्नवीर अंगद से पूछ रहे हैं कि प्रश्नागार में विश्राम कर रही अन्य फर्जी प्रश्नात्माओं का क्या हुआ अंगद.. उन्हें मोर्चे पर क्यों नहीं भेज रहे?

छोटे और कम पवित्र प्रश्नवीर अंगद परेशान.. कैसे बताएं कि तात.. वे सब जाके लड़ के और धूलधूसरित होकर आये हैं और अब आपका फर्जी एजेंडा लागू करने को बिलकुल तैयार नहीं हैं. यहाँ तो लोगों को बुला बुला कर थक गए. कितना भी टैग करो हनुमानों के सिवा कोई आता ही नहीं अपने समर्थन को. सब शम्बूक असली लड़ाइयों में लगे हुए हैं, आपकी तरह फेसबुक पर गंध नहीं फैला रहे यह अंगद ने कहा नहीं पर हनुमान ने सुन जरुर लिया था. प्रश्नवीर अंगद के चेहरे पर घिरते शंका के बादल प्रश्नवीर हनुमान के चेहरे पर बरसने को हैं कि अब बरसे कि तब बरसे.

पर हमारे प्रश्नागार में यह सेंध लगी कैसे छोटे हनुमान? अब दलाली के हमारे सपनों का क्या होगा? सड़क किनारे हनुमान मूर्ति लगा कर मंदिर बना उसका महंथ बनने के हमारे सपनों का क्या होगा छोटे हनुमान? भारतीय मार्क्सवादियों को अमेरिका में नस्लभेद का जिम्मेदार बताने के लिए सबूत ढूँढने के लिए आरएसएस से मिले चवन्नी भर के ठेके का क्या होगा? मार्क्सवादियों पर हमले कर करके वाया नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यादव ब्रांड सामाजिक न्याय भाजपा को बहुजन बेचने की रणनीति का क्या होगा?

नीतीश कुमार तो खैर कब से नरेन्द्र फेकू मोदी को गरिया गरिया के हत्यारी राम जन्मभूमि रथयात्रा वाले लालकृष्ण आडवाणी को सेकुलर बनाने में लगे हुए थे पर अभी तो मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी समाजवादी टोपी आडवाणी के चरणों में फेंक दी थी, उन्हें सबसे ईमानदार नेता बता के. कहाँ तो आँखों में 2014 के बाद नए गठबंधन के सपने खिल रहे थे और कहाँ ऐसी पराजय? कैसी मुश्किल से तो हमने सांप्रदायिक दंगों तक को सवर्ण हिंदुओं और अशराफ मुसलमानों की जाति विमर्श को बहस से बाहर रखने की साजिश साबित करने की कोशिशें शुरू की थीं और अभी ऐसा हाहाकार? ये बेहूदे तो दंगों में मारे गए अशराफ मुसलमानों की लिस्ट हम पर दाग रहे हैं? बड़े हनुमान जी की आँखों में मेघ भर आये थे.

सब आपकी वजह से हुआ है तात. अंगद गरजे हैं. कहा था कि पढ़िए लिखिए, जनता के बीच उतरिये. सिर्फ एक हथियार से इन मार्क्सवादियों को परास्त न कर पायेंगे आप पर आप थे कि बस कोख में घुसे हुए थे. सिर्फ लोकेशन पर हमले किये जा रहे थे वह भी अपने चुनाव से बाहर पैदा होने की लोकेशन पर. आपने अपनी कोख नहीं चुनी थी तो उन्होंने भी नहीं चुनी थी न. और आपसे अलग वे जमीन पर लड़ रहे लोग थे आपकी तरह दिन रात फेसबुक पर जुगाली नहीं करते थे.

कहा था आपसे कि हथियार बढ़ाइये, कब तक एक ही शस्त्र चलाते रहेंगे पर आप थे कि न. और सेनापति भी कैसे कैसे चुने बैठे थे आप? फर्जी प्रोफ़ाइलें.. सब की सब. और उनमे से एकाध तो कल तक खुद को मार्क्सवादी कहती फिरती थीं. कहा था आपसे कि असली लोगों को मार्क्सवाद से बाहर निकालने के दावे करिये पर आप थे कि.. अब झेलिये. एक दाँव में चित्त. वह भी आपही वाला दाँव. आप तो उनकी जाति ढूढ़ रहे थे उन्होंने आपका होना ही संदिग्ध कर दिया. 

तुम भी अंगद? तुम भी? बड़े हनुमान बिलख ही पड़े थे. अब क्या करें छोटे? ठेकों का क्या होगा? छोटी दलाली के बड़े सपनों का क्या होगा? प्रश्न बढ़ाइये तात, प्रश्न बढ़ाइये. और यह हर बात में केवल जाति पूछने की बेवकूफी बंद करिये, अपनी तरफ भी हनुमान होते हैं.. अंगद कहते कहते रुक गए थे. +

पर अब क्या करें अंगद, यह तो बोलो. अभी तो नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यादव के खिलाफ लिखना भी शुरू कर दिया. उनसे भी सवाल पूछने शुरू कर दिए फिर भी कोई ‘लोड’ नहीं ले रहा. हनुमान बिचारे शून्य में देख रहे थे. वही तो तात.. केवल प्रश्नवीर बनने से काम नहीं चलेगा. वह भी फर्जी प्रोफाइलों के दम पर. फेसबुक से बाहर भी एक दुनिया है तात, वहां लोग असली पहचानों की ही इज्जत करते हैं. वह मैं कैसे कर पाऊंगा छोटे हनुमान? मैं तो खुद ही फर्जी हूँ. प्रश्नवीरों के शिविर में खामोशी छा गयी थी.

May 13, 2013

Hope in the Himalayas: And the mountains that became Maoist


[From my column Obviously Opaque in the UTS Voice 01-15 May, 2013]

Tears had started rolling down her wrinkled cheeks. And then, she broke down sobbing inconsolably.  I sat in silence, words had failed me. Language has this uncanny habit of leaving one in lurch when it is needed the most. Which language, after all, has words for grief that is betrayed by tears of a mother wailing for her daughter? The structures of language, as Harold Pinter once observed, have already moved far away from the structures of reality and has lost the capability of giving words to a thousand atrocities committed on hapless victims. I held her in a friendly, endearing embrace and let her sob.

We were sitting in Duma village of Mugu district in mid-Western Nepal. The bright sunny afternoon was taken over by the clouds and chilly winds were nipping at my exposed face. 2200 meters up from the sea level, they had to. The dilapidated houses of the village were telling the tales of poverty and hardships that plagued the lives of their inhabitants. The only way out of this poverty was escaping, as she had told me minutes before, and that was not easy either.

The village was 2 hours away from district headquarters at Gamgadhi and eight from Talcha, the nearest airport that gave villagers the only access to opportunities that were there in the world. But then, flying being very expensive was not really an option for most of them and no motorable  roads came to Mugu so the only way out was  through three days long arduous trek through the snowy mountains to Jumla, the nearest district connected by roads. Forget going outside, falling sick here means almost a certain death for lack of both, roads and doctors, she had added without even a pinch of bitterness in her voice.

I did not expect her to break down, no one in the village, in fact, did. Ladi Sunar has been a fighter all her life. District convener of a national Dalit-Feminist network, she has taken on the system relentlessly. This was why everyone egged her on to reply to my questions irrespective of whom it was directed at. She has become the voice of her village. Be it the struggle for dhara (tapped water) in her village by pursuing a local nongovernmental organization to buy a ‘mool’ or source of water to fight against corruption in Nepal Food Corporation resulting in siphoning off of the subsidized food they are entitled to, she has been in the forefront of it all.

The Army labeled my daughter as a Maoist and killed her. Right here, in my house. They came in broad daylight and killed her, she said almost unemotionally. The tears had dried out. A steely resolve to fight for justice was all that was left on her stiff face. I will bring the uniformed cowards to books she added. I could see that she was not telling it to me but to herself. She needed the reiteration, perhaps, for her attempts have gone all in vain. She has been to Kathmandu and lodged her complaint with all authorities, National Human Rights Commission included.

She knows that the changed political scenario of the country does not give her much to hope. She knows that the Maoists, the official ones in the government as there are several strong Maoist parties in Nepal now, too have abandoned their former foot soldiers who have laid their lives for the cause. The ‘cause’ has given way to the personal wants, and feuds, of the leadership and their quest of ‘integrating’ former Maoists in the regular Army. Now you do not rake up issues like extrajudicial killing of Dhandevi Sunar, Ladi’s daughter, with an army you want your cadres to join, do you?

That does not weaken Ladi Sunar’s resolve, nothing does in fact. I would fight, she assured me over a cup of tea with her eyes fixed on the yellowing picture of her daughter hanging from the decaying wooden wall. My daughter was very sharp; she said with her eyes twinkling and broke into an unexpected smile.

Unexpected. That is the definitive word for this trip of a lifetime to Mugu. With first remaining seated in the cramped economy class seat on an Air India flight for an hour and then getting diverted to Varanasi because of bad weather in Kathmandu, it had started on a precarious note. Just to add to the woes, the delay had made me loose touch with our local partners in Kathmandu, that too with a flight to Nepalgunj, the base for Mugu, scheduled the same afternoon. There I was, after a two-hour flight covered into a nightmarish 11 hours and another rescheduled one. Nothing beats, though, the flight to Rara from Nepalgunj.

My heart had skipped a beat, or two, aboard that 10-seater Cessna Caravan. The flight has defied all that flights have come to be known for. Forget airhostesses, there was not even a ritualized safety demonstration. No one asked us to fasten the seat belts or even to switch off our mobile phones. Don’t worry; this is just a truck that flies, said Ashok Singh a friend from FIAN Nepal, the local organization we work with and who was accompanying me, together with Yubraj Koirala, on this visit. He would know, I was sure, as he had taken the flight many times over.

The plains of fertile Terai were behind us, we had entered the snowcapped mountains. Karnali, the river that becomes Ghaghra in India, before and after Ayodhya where it is called Saryu, was flowing majestically below in the valley. It was a scene to die for, just that I was too scared to be able to appreciate the abundant beauty. No one aboard a small aircraft flying dangerously close to the mountains will, I think. Any sudden gush of wind destabilized the plane and sent shivers down my spine. I could, it seemed, touch the mountains if windows of the aircraft could open like those in the non air-conditioned  coaches. I looked back at Yubraj and Ashok, just to reassure myself.

And then came the descent, a steep descent seemingly into nowhere. The plane was losing height, dangerously, and I could see no runway. Had it not been for other passengers being very cool, I would have been panicking. The plane, suddenly, took an almost impossible 90 degree turn and there it was, Talcha Airport. The runway strewn with small pebbles and the pilots checking the tyres, that certainly was a scene.

My eyes had settled on the wreckage of two similar aircrafts, neatly packed on each side of the ‘runway’. Aaah, no one died in that crash, Ashok Bhai, sensing my unease, informed me. I did not ask about the other one. He did not tell me either. The trip of a lifetime had begun. It is just that I was to take the same flight back a week later. Climbing up, I realized that the runway had no electricity.

Having left our luggage to be taken to Gamgadhi, the district headquarters of Mugu that was a 6 hours trek away, we had started for Rara lake, the biggest in Nepal. Lying at an altitude of 2900 meters and surrounded by snowy mountains, it was the most beautiful one as well, I was to learn later. The 6 hours (three for locals) had begun. You are okay with it, this time it was Yubraj Bhai asking me. Yeah, have had trekked a lot was my reply. It was to be proven wrong, as the trek that was as beautiful as the destination itself, would tell me.

A kilometer into the trek and I had found a river of snow, the first of my life. Was there a way other than jumping into it and playing to heart’s content? Soon there was a war, with snow missiles being thrown at one-another. We, in the human rights movement, don’t often get to make merry, do we? For us, whose days begin with stories of extra-judicial killings and end at starvation with everything else thrown in between, the snow was a welcome break, a very welcome one.

We were back on the trek and had just encountered the first human beings other than us. A few Nepali workers were looking at us, intently. I asked for a photograph, and the answer, from a woman, was a stubborn no. She must be a Maoist, Yubraj speculated a little later. They are the only ones who have the guts to say no to such requests coming from apparently affluent Nepalis, he replied when I asked for a why. That fact that I was in the heart of the region that gave birth to Maoist insurgency was slowly dawning upon me. Soon we were crossing an army post as well.

Rara was there, in its unabashed glory, right in front of me. Speechless is not the word that can define the sheer beauty of it all. We stayed in Dafe Guest House proudly displaying ‘clean Rara Green Rara’ signboard. Not that we had any choice, this was the only place to rest. The food was simple and bland, boiled potatoes with salt and chilli with rice, some strange daal and a local spinach. Hardly did I know that this was going to be the menu three times a day for next week. There was no dearth of alcohol, though.

We sat the night, okay a part of it, out chatting with western backpackers and local guards listening to the stories of daring raids that the Maoists conducted, of the sellout thereafter and the ‘transition’ the country was going through. It was a long night. And a very chilly one too as the temperature goes sub zero in the night. I had never woken up to such melodic chirping of the birds as I did the next day.

We, then, had to leave for another trek to Gamgadhi. It was supposed to be a 4 hour one though I could cover it only in 8. The scenic beauty was the same with rivers of snow crisscrossing the trek. Tall pine trees stood their guard, lovingly watching over everything that passed under them.  There were mules too, no ordinary mules though. They were in the service of the World Food Project and transporting rice to this chronically food short region. And then, we found the trek washed out, completely. Negotiating that anyhow was the only choice available and that’s what we did.

Many such small tragedies and breaks later, we were finally in Gamgadhi, a place more politically charged than any I have ever seen. The first thing that greeted us was red flag hoisted over the district office of Unified Communist Party of Nepal (Maoist) Kiran Baidya group. After that were the offices of Nepali Congress, CPN(UML), and countless others. There was the district office of All Nepal Federation of NGOs as well.

Everyone here is a member of some party or the other, said Gopal Bam, a comrade from CPN (UML). We had a lot of hopes from Prachanda and the Maoists but they too betrayed us, added another. They had not lost hopes in Maoism though and Kiran Baidya’s open revolt against Prachanda-Baburam led party had given them a new hope.

Why Maoism though, I ask Muskan, a local participant in our workshop. Because no one thought that we Dalits are human beings before them, he said nonchalantly. They used to treat us worse than animals you know, and now they are scared and we speak up, he added. The small town, home to around hundred NGOs catering to 45000 people living in the whole district, was abuzz with election talks. The walls were painted red with slogans against neo-revisionism, against India’s expansionism, against imperialism and everything else.

Do you understand all this, I asked a young participant while we were taking a post-session stroll. Of course I do, expansionism is what your country does in ours and we want this meddling to stop. He went on to give me a short tutorial on rest of them all. Now I knew why Marxism is a living discourse here. I was going to get pleasantly surprised many times over such small discoveries for the next three days. I should, in fact have guessed, as Maoists have swept the district not letting their opponents win a single seat.

Maoists squandered their own chance they could have really done it, opined a senior forest officer. He has recently married a former colleague of mine and that’s how we were invited over for a dinner. Do you support him, I asked. I support none of them, just that they seem to be raising real issues that concern common people. They are the ones articulating the voice of the masses. Matrika Yadav too, added a subordinate of him. He came from Tarai. The conversations went on to discuss tigers and musk deers that are native to the area and much else, but politics kept returning to it.

Will you give Maoists another chance; I asked some of the participants later over a lunch. Not only we but the whole country is giving them a chance. Who else shall we? Rest of them all are Sarkari, asserts one with bitterness. These ones in the government, they too have become Sarkari, quips another. It is the groups that have broken ranks with Prachanda and his path that has emerged as the new hope, does not that tell you something? .

It does. It gives me hope as well. 

May 10, 2013

कर्नाटक में भ्रष्टाचार जीता नहीं, मोदी ब्रांड फासीवादी दक्षिणपंथ हारा है.


['कर्नाटक चुनाव नतीजों के निहितार्थ शीर्षक से दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण में 10-05-2013
को प्रकाशित.]

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की भारी जीत एक बड़ी परिघटना है. ऐसी परिघटना जो सिर्फ भारत जैसे त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र में ही हो सकती थी. वरना सोचिये कि भारतीय सीमा के अन्दर चीनी घुसपैठ और कांग्रेसनीत संप्रग गठबंधन सरकार की निगहबानी में हुए तमाम घोटालों में मामागेट के जुड़ने के बीच हुए इन चुनावों में कोई सजग नागरिक कांग्रेस को विकल्प मानने के बारे में सोच भी कैसे सकता है? बीते साल के भ्रष्टाचार विरोधी मध्यवर्गीय उभार को याद करें तो यह जीत और स्तब्धकारी लग सकती है, पर वस्तुतः है नहीं. मूल रूप में यह जीत भारतीय समाज में चल रहे अंतर्मंथन को , खारिज नहीं प्रतिध्वनित ही कर रही है.

बेशक कुछ लोग इसे बी एस येदुरप्पा के विद्रोह कर भाजपा को नुक्सान पंहुचाने से जोड़कर देख सकते हैं पर आंकड़ों पर सरसरी नजर भी इस तर्क को ध्वस्त कर देती है. भाजपा को मिले मतों में येदुरप्पा की कर्नाटक जन पक्ष को मिले मतों को जोड़ भी दें तो भी वह बुरी तरह से हारती क्योंकि पिछले चुनावों की तुलना में भाजपा को करीब 13 प्रतिशत का नुकसान है. फिर अगर यह सिर्फ भाजपा की हार होती तो जनता दल सेकुलर का प्रदर्शन और अच्छा होता और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की जगह यह त्रिशंकु विधानसभा होती.  

भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की जगह उसमें सक्रिय हिस्सेदारी में लगे एक राजनीतिक दल को यह समर्थन कहाँ से आता है? सीमा की सुरक्षा से लेकर सीमापार की जेलों में बंद अपने नागरिकों की सुरक्षा कर पाने तक के हर मोर्चे पर असफल रहे दल को क्या सोच कर कर्नाटक की जनता ऐसी भारी जीत दे देती है? और जवाब यह है कि बाकी भारत की ही तरह कर्नाटक में भी जनता समरूप जनता नहीं बल्कि अपने अपने हितों के अनुसार सामुदायिक और वर्गीय विभाजनों में बँटी हुई जनता है. इस जनता का मूल अंतर्विरोध वर्गीय और अस्मितागत संघर्षों के बीच वर्चस्व की लड़ाई है.  और फिर इस अंतर्विरोध में फंसे सामाजिक-आर्थिक रूप से निम्नवर्गीय शोषित बहुमत की असली समस्या भ्रष्टाचार नहीं, अपना अस्तित्व बचाए रहने की जद्दोजहद है.

इस जनता को भी, बेशक, भ्रष्टाचार से फर्क पड़ता है. पर फिर, इस जनता को प्रभावित करने वाला भ्रष्टाचार रेलवे बोर्ड में बड़ी कमाई के लिए बड़े पदों पर होने वाली नियुक्ति वाला भ्रष्टाचार नहीं, टू-जी, कॉमनवेल्थ खेलों और कोलगेट वाला भ्रष्टाचार नहीं बल्कि पुलिस थानों से लेकर अदालतों तक छोटी घूसों वाला ‘छोटा’ भ्रष्टाचार है. अब कहने की जरूरत नहीं है कि उस ‘बड़े’ स्तर वाले भ्रष्टाचार के बारे में भाजपा और कांग्रेस के बिलकुल एक सा होने के बारे में जनता को कोई शक नहीं रह गया है. उसे पता है कि हर पवन बंसल के बरक्स भाजपा में भी एक (पूर्व) बी एस येदुरप्पा हैं और संप्रग सरकार वाले शरद पवार के सामने एक नितिन गडकरी खड़े हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार के सवाल पर कांग्रेस की यह जीत न केवल विकल्पहीनता की जीत है बल्कि एक ईमानदार राजनैतिक विकल्प की अनुपस्थिति का स्वीकार भी है.

पर इस जीत का एक और मतलब भी है. यह कि अस्मितागत पहचानों के बहुलवादी संघर्ष अब धीरे धीरे साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा किये जाने वाले ध्रुवीकरण पर भारी पड़ने लगे हैं. भाजपा को कायदे से यह सन्देश उसको प्राणवायु देने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों में अपने सिमटते जाने से ही समझ लेना चाहिए था. कभी राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों पर भारी जन उभार खड़ा कर पाने वाला यह दल की अपने इन पूर्व गढ़ों की जमीन कांग्रेस ने नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के विमर्श के साथ लड़ रहे अस्मितावादी (और एक हद तक जातीय बुनियाद वाले भी) दलों ने छीनी थी. और साफ़ शब्दों में कहें तो धर्म नाम के बड़े महा-आख्यानी विमर्श को उससे छोटी पर वैयक्तिक स्तर पर ज्यादा करीबी पहचानों ने मात दे दी है. कर्नाटक में भी छोटे ही स्तर पर सही यह हुआ है.

वहां भी चुनाव में धर्म की जगह लिंगायत और वोक्कालिंगा जैसी जातीय पहचानें बड़ी भूमिका निभाती हैं और यही वह जगह है जहाँ नितिन गडकरी को बचाने की हर संभव करने वाली भाजपा का येदुरप्पा के साथ व्यवहार एक भ्रष्ट मुख्यमंत्री को सजा की तरह नहीं बल्कि एक समुदाय के साथ अपमान की तरह देखा जाता है. अब ऐसे में वोक्कालिंगा जैसे अन्य समुदाय सशक्त तरीके से किसी और दल के साथ खड़े हों तो परिणाम लगभग तय ही हो जाते हैं.

भाजपा ने वहां से यह सबक भले न सीखा हो उसे यह तो देखना ही चाहिए था कि इस देश में घृणा और नफरत पर आधारित राजनीति को वह जनता नकार रही है जो उस राजनीति से सबसे ज्यादा प्रभावित होती है. उसके लिए चुनाव साफ़ भी है, आखिर दंगों से लेकर साम्प्रदायिक हिंसा के तमाम और प्रतिफलन उसकी ही दिहाड़ी मारते हैं उसकी ही जिंदगी को मुश्किल में डालते हैं. उसे यह भी दीखता है कि ‘लुटियन’ दिल्ली की कोठियों में रहने वाले उच्च वर्ग से लेकर गुडगांव जैसे शहरों में ‘गेटेड कम्युनिटीज’ में रहने वाला मध्यवर्ग अक्सर उस हिंसा से बचा रहता है.

ऐसे में नरेन्द्र मोदी को मुख्य प्रचारक बना कर, उनके समर्थन में सोशल मीडिया से लेकर अपने राष्ट्रीय सम्मेलनों तक में उन्माद खड़ा कर भाजपा आम जनता को डरा ही रही थी उसे अपने करीब नहीं ला रही थी. दीवाल पर लिखी इबारत साफ़ थी कि 2002 के बाद हुए चुनावों में भाजपा ने गुजरात चाहे तीन बार जीता हो देश दो बार हारा है. इसमें यह दंश और जोड़ दें कि 2004 तक सत्तासीन रही भाजपा को यह हार एक वंशवादी नेतृत्व वाली सिर से पाँव तक भ्रष्ट राजनैतिक दल से मिली है तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है.

वह तस्वीर जो भाजपा के ही सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार को साफ़ दिखती है. उन्हें पता है कि बिहार में वह तभी तक जीत सकते हैं जब तक एक ऐसी विभाजनकारी शख्सियत को दूर रखें और वह उन्होंने किया भी. लोकसभा चुनाव के करीब आते जाने के इस दौर में नीतीश कुमार के मोदी पर बढ़ते हमलों में भी यह सन्देश स्पष्ट है, इस हद तक कि रथयात्रा के जिम्मेदार रहे लालकृष्ण आडवाणी को स्वीकार कर सकने वाला दल भी मोदी के खिलाफ किसी हद तक जा सकता है. ठीक यही सन्देश भाजपा को 2006 में उदीषा में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद बीजू जनता दल के उसका साथ छोड़ देने से भी लेना चाहिए था.

और यह सब तब हो रहा है जब वैश्विक भू-राजनीति के चलते लाटिन अमेरिका को छोड़ दुनिया दक्षिणपंथ उभार पर है. फिर भाजपा के साथ ऐसा क्यों हो रहा है? इसलिए क्योंकि दुनिया भर में दक्षिणपंथ नहीं, विनम्र दक्षिणपंथ जीत रहा है, वह दक्षिणपंथ जो सामुदायिक हमलावर छवि को तोड़ते हुए आर्थिक रूप में दक्षिणपंथी हुआ है. कमाल यह है कि भारत में मनमोहन सिंह के लाये आर्थिक दक्षिणपंथ की विचारधारा पर कांग्रेस का ही कब्ज़ा है और स्वदेशी छोड़ विनिवेश मंत्रालय तक बना देने के बावजूद भाजपा उससे यह जगह छीन नहीं पायी है.

ऐसे में उग्र दक्षिणपंथ के समर्थक एक ऐसे व्यक्ति को जिसको भाजपा के सहयोगी ही न स्वीकार पा रहे हों अपना राजनैतिक चेहरा बनाना नुकसानदायक ही हो सकता है. अन्य अर्थों में यह भाजपा के लिए फिर से एक सबक है कि इस देश में घृणा पर टिकी उग्र दक्षिणपंथी राजनीति के लिए ज्यादा जगह नहीं है और अगर उसे प्रभावी बने रहना है तो उसे गहरी आत्मालोचना करनी होगी, खुद को आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति से मुक्त करना होगा. बस उदाहरण के लिए देखें कि संयुक्त राज्य अमेरिका की रिपब्लिकन  पार्टी भी गर्भपात से लेकर समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर धर्म की राजनीति करती है पर किसी और धर्म पर फासीवादी हमले नहीं करती और तिस पर भी वह हार ही रही है. यहाँ से देखें तो साफ़ दिखेगा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विकल्पहीन जनता साम्प्रदायिकता के सवाल पर सजग चुनाव कर रही है, विकल्प चुन रही है.