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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

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March 03, 2013

वह पुलिस अधिकारी शहीद नहीं, निज़ाम के हाथों क़त्ल हुआ है.


अभी चंद घंटे पहले तक मैं जिया उल हक़ को नहीं जानता था. मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते अक्सर पुलिस की उल्टी तरफ खड़े पाए जाने वाले मेरे जैसे शख्स के लिए 34 साल के इस नौजवान पुलिसिये को जानने की कोई खास वजह भी नहीं थी. अब जानता हूँ. बहुत कुछ. जैसे कि यह कि वह मेरे ही विश्वविद्यालय का छात्र था. उस मुस्लिम बोर्डिंग हास्टल का जिसे हम एमबी कहते थे और जिसमे मेरे तमाम बहुत प्यारे दोस्त रहते थे. यह भी कि सालों मेहनत के बाद कुल जमा दो साल पहले उसे डीएसपी, यानी सरकारी जुबान में पुलिस उपाधीक्षक की नौकरी मिली थी. यह भी कि उसकी पत्नी (नहीं, मैं बेवा नहीं कहूँगा, ठीक वैसे जैसे पत्नी के गुजर जाने के बाद की खबरों में बच गए पुरुष को कोई विधुर नहीं कहता) बीडीएस के आखिरी साल की पढ़ाई में मुब्तिला है.

और यह सब मैं इसलिए जानता हूँ क्योंकि कल उस नौजवान को बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. वह भी कहीं और नहीं बल्कि मुसलमानों के रहनुमा मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव की सरकार में काबीना मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के इलाके में. यूँ राजा भैया के इलाके में न ये क़त्ल की पहली वारदात है ना किसी पुलिस अधिकारी के क़त्ल की. बसपा छोड़ किसी भी सरकार में मंत्री रहने वाले इन राजा भैया को मगरमच्छ पालने और अपने विरोधियों को उनके सामने फेंक देने के आरोपों के लिए जाना जाता रहा है.

पर फिर भी कुछ था जो नया था. जैसे यह कि यह पुलिस अधिकारी अपनी ईमानदारी और किसी के दबाव में ना आने के लिए जाना जाता था. जैसे यह कि इस अधिकारी ने अभी कुछ वक्त पहले इसी इलाके में अस्थान नाम की जगह पर हुए साम्प्रादायिक दंगों में मुसलमानों के गाँव के गाँव जला दिए जाने के बाद के हालत को सख्ती से काबू में रखा था और फिर कोई वारदात नहीं होने दी थी. यह भी कि वह किसी दरवाजे पर हाजिरी बजाने नहीं जाता था बल्कि कोई शिकायत मिलने पर खुद ही निकल पड़ता था.

उसे फिर तमाम आँखों में चुभना ही था, वह भी बेतरह. सो वह चुभ भी रहा था. और फिर जब कल राजा भैया के ड्राइवर बताये जा रहे व्यक्ति से विवाद में एक ग्राम प्रधान की हत्या के बाद स्थिति बिगड़ने पर यह अधिकारी वहाँ पँहुचा तो शायद उसे खबर भी नहीं थी कि वह एक जाल में पँहुच गया है. वरना सोचिये जरा कि डीएसपी रैंक के एक अधिकारी को उसके गनर इमरान और एक अकेले इंस्पेक्टर सर्वेश मिश्र को छोड़ उसके मातहत क्यों भाग जाते. सोचिये कि कौन लोग हैं जिनके हौसलों को वो पँख लगे हैं कि अमर उजाला की खबर के मुताबिक़ वह उस अधिकारी को दौड़ा दौड़ा कर मार सकें. और यह भी कि घटना के घंटों बाद मौके पर पंहुची पुलिस को उस अधिकारी की लाश ढूँढने में घंटों लग जायें.

वह लाश जिसके पैरों पर दो गोलियाँ लगे होने का मतलब साफ़ हो कि उसे टुकड़े टुकड़े में जिबह किया गया है, धीरे धीरे क़त्ल किया गया है. यह भी कि इरादा सिर्फ उसे मार देने का नहीं बल्कि तड़पा तड़पा के मारने का था, ऐसे कि उसे एक सन्देश बनाया जा सके. कद्दावरों के सामने चुप रहने का सन्देश.

इस क़त्ल के बाद बहुत कुछ याद आ रहा है. जैसे यह कि मुझे रहनुमाओं से हमेशा नफ़रत रही है. कुनबे के, जाति के, मजहब के इन रहनुमाओं को मैंने कौम की दलाली करते, उसे बेचते ही देखा है. पर फिर भी एक बार आज़म खान की बात अच्छी लगी थी. तब, जब गुजरात दंगों के बाद उन्होंने राज्यसभा में बहुत साफ़ साफ़ कहा था कि हालात ऐसे ही रहे तो इस मुल्क में अकिलियत (अल्पसंख्यकों) को सोचना होगा कि उनका मुस्तकबिल (भविष्य) क्या है. 

आज यही जनाब मोहतरम आज़म खान सूबे के काबीना मंत्री ही नहीं सरकार में नंबर दो की हैसियत में भी हैं. उस सरकार में जिसके एक साल पूरा होते ना होते प्रदेश में 9 दंगे हो चुके और हर दंगे में शिकार मुसलमान ही हुए, शिकारी  जरूर बदलते रहे, कभी सपाईयों की शक्ल में (फैजाबाद दंगे) तो कभी भाजपाईयों के अवतार में. (गोरखपुर).

हाँ तब शिकार आम मुसलमान होता रहा था. अब हाथ पुलिस अधिकारियों के गरेबान तक आ पँहुचे हैं. तय आपको करना है कि आप खामोश रहेंगे या आवाज उठायेंगे फिर कीमत जो भी देनी पड़े. याद रखें कि गुंडाराज में चुप रहने की गुंजाइश नहीं होती कि पुलिस के आला अधिकारियों तक पँहुच सकने वाले हाथ आपके, आपके अपनों के गिरेबान से बहुत देर तक दूर नहीं रहने वाले.   

8 comments :

  1. समर भैया आप का लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा शुरुआत बहुत ही मार्मिक और सही किया पर अंत आप आखिर राजनेताओ की भाषा ले आये जाति धर्म वगैरा वईसे एक बात और बता दूँ भैया मै कुंडा क्षेत्र का हूँ मैंने राजा भैया के चाटुकारिता के आतंक के दर्द को झेला है पर जिया उल के साथ सर्वेश मिश्र भी शहीद हुए कृपया नेताओं की भाषा ना बोलकर इन शहीदों के निडर जज्बे को देखते और उनके जाति धर्म के ऊपर उठकर लगाव को देखते तो कितना अच्छा होता

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  2. @ब्रह्मानाथ त्रिपाठी जी-- लेख में बहुत साफ़ साफ़ जिक्र किया है सर्वेश मिश्र की शहादत का. यह पंक्तियाँ देखें..
    "वरना सोचिये जरा कि डीएसपी रैंक के एक अधिकारी को उसके गनर इमरान और एक अकेले इंस्पेक्टर सर्वेश मिश्र को छोड़ उसके मातहत क्यों भाग जाते."
    बेशक अब तक आ रही खबरों के मुताबिक़ गनर इमरान और इंस्पेक्टर सर्वेश मिश्र डीएसपी साहब को बचाने के लिए जान पर खेल गए पर यह भी साफ़ दिख रहा है कि निशाने पर जिया उल हक़ ही थे. बेशक मेरी अपनी राजनीति है ब्रह्मा भाई, पर मैं लाश पर सियासत नहीं करता मेरे भाई. जो सच समझ आता है वही बोलता हूँ. बोल रहा हूँ. इस लड़ाई में आप सब को, हम सबको साथ लड़ना है, अकेले नहीं.

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  3. बिलकुल मैने उनके आतंक को जिया है मैंने उस बाइक वाले की मौत भी सुनी है जिसने इस गुंडे राजा भैया की गाडी को ओवेरटेक किया था तो इस गुंडे के अहम् को चोट लगी और इसने पकड़ के उसे मगरमच्छो के सामने फिंकवा दिया था वहां जो भी इसके खिलाफ होता है या तो उसका परिवार खोता है या वो खुद खो जाता है ऐसा ही एक पागल एस ओ आये थे परमानन्द मिश्र जो इस राजा को इसके महल से घसीटकर जेल तक लाये थे पर जब मुलायम की सरकार आई तो परमानन्द जी सड़क दुर्घटना(क़त्ल) में मारे गये जानते सभी है किसने मारा पर हिम्मत किसी की नही बोलने की इसके खिलाफ

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  4. जिया-उल-हक ये आपका दुर्भाग्य है की आप दामिनी नहीं है,जिसकी शहादत मिसाल बन पाए..ये आपका दुर्भाग्य है की आप मुसलमान थे. ये आपका दुर्भाग्य है की आपको ऐसे पिता मिले जो आपकी हत्या पर बोल रहे की "मुझे अपने बेटे की शहादत पर गर्व है", ये आपका दुर्भाग्य है की आपने भारत की पुलिसिया व्यवस्था को आदर्श मान कर उसमे शामिल होने की सोची लेकिन इतने दुर्भाग्यों के बावजूद ये आपका सौभाग्य है की आपको माननीय मंत्री जी और उनके गुंडों द्वारा मार दिया गया।
    शर्म और लानत है देश के कथित लोकतंत्र और ऐसी घटिया उत्तर प्रदेश सरकार पर !!

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  5. Sarvesh Mishra ji pe koi lekh nahi, Sarvesh Mishra ji ke Parivaar ka vyora nahi, Sarvesh Mishra ki hatya se badi hatya hai Jia Ul Haq sahab ki hatya aakhir wo bade adhikaari jo hai haa shayad Musalmaan. chalo yunhi sahi Jia Ul Haq sahab ke hatyaron ko saza mile to Sarvesh Mishra ji ke parivaar ko bhi sukoon milenga akhir Hatyare to dono ke ek hilog hai. Waise is mudde pe Rajneeti bhi honi hi hai, honi chahiye bhi, shaya ho bhi rahi hai. "Muslimo ke rehnuma Mulayam aur Aazam ki Sarkar me Muslim Adhikaary ki hatya woh bhi Raja Bhaiya ( Read Rajputon) ne ki" Akhir Mulayam singh ke political kad pe hamla hai ye. Muslimo ke beech unki sehat aur voto ka ganit bigadne ki kabayad bhi hai ye. warna utni Immandaari se Sarvesh Misra ka bhi Jikra hua hota. khair aisi umeed karna bekaar hai. hum to bas yeh chahate hai ki doshiyon ko jinhone Jia Ul Haq sahab, Sarvesh Mishra ji, Imran ji ki hatya ki hai unhe kadi se kadi saza mile. Capital Punishment mile.

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  6. Vineet बाबू--
    सर्वेश मिश्र का भी जिक्र है इस लेख में, इमरान अंसारी का भी. बाकी अब काफी संशय में हूँ कि सर्वेश जी शहीद हुए या बच गए (पूरे दिल से चाहता हूँ कि बच गए हों) क्योंकि किसी मीडिया रिपोर्ट में कहीं उनका नाम मारे जाने वालों की लिस्ट में नहीं है.
    बाकी राजा भैया को राजपूतों से जोड़ आप पूर्वांचल की ब्राह्मण-राजपूत प्रतिस्पर्धा का ही काम कर रहे हैं सो कोई बात नहीं. बाकी ये राजा भैया आपके कल्याण सिंह वाली भाजपा सरकार में भी मंत्री थे यह तो याद ही होगा आपको. आपके ऊपर आरोप लगाऊं की आप क्यों बचना चाहते हैं इस सत्य से?
    खैर, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए, फांसी नहीं, क्योंकि फांसी तो खैर किसी को नहीं मिलनी चाहिए.

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  7. समर भैया हमारी लड़ाई जारी है इस गुंडे के खिलाफ आप खुद देख सकते है
    https://www.facebook.com/photo.php?fbid=167568500059305&set=a.105959326220223.15271.105256222957200&type=1&ref=nf

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  8. और अब तक समझ आ गया है कि इंस्पेक्टर सर्वेश मिश्र के भी मारे जाने की खबर झूठी है. गनर को छोड़ के बाकी सारे लोग भाग गये थे.

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