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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

February 02, 2013

दिल्ली गैंग रेप: ये सरकार नहीं राष्ट्रीय शर्म का एक और नाम है.

हांग कांग में लोकल दोस्त बहुत कम हैं। लगभग नहीं। पर एक वाइन शॉप के मालिक से प्यारी सी दोस्ती हो गयी है। प्यारा इंसान है, हर शाम अपनी दुकान में दो तीन दोस्तों के साथ मिलता है, चल रही पार्टी के बीच। पर हमारे (मैं और बीजो, दोस्त ज्यादा बॉस कम) पँहुचने पर बहुत प्यार से मिलता है, हाल चाल पूँछता है। बहुत दिन बाद मिलने पर पूछता है कि कहीं दौरे पर था क्या, ह्यूमन राइट्स के बारे में बात करता है, समझने की कोशिश करता है।

पिछली मुलाक़ात में उसने कुछ नहीं पूछा। बस इतना कहा कि दिल्ली में गैंगरेप के बारे में पढ़ा। आपलोगों को देख के लगता नहीं कि आपका मुल्क ऐसा है। पर यह कहते हुए भी उसके चेहरे पर उदासी थी। ऐसी उदासी जो किसी दोस्त के चेहरे पर ही हो सकती है. साझे गम की साझीदारी की उदासी. एक अपरिचित, अजनबी मुल्क की उस लड़की के लिए उदासी जिससे उसका इस जिंदगी में शायद कोई साबका नहीं पड़ना था. और फिर उस लड़की के लिए ही क्यों, उसकी उदास आँखों में हमारे मुल्क की, या फिर सच कहें तो दुनिया की सारी लड़कियों के लिए उदासी थी.

उसकी आँखों की उलट हमारी आँखों में गुस्सा था. अपने आपे को जलाता, परेशान करता गुस्सा. वो गुस्सा जो आपके पासपोर्ट के रंग से स्त्रीद्वेश के रंग, यौन हिंसा के रंग, साम्प्रदायिकता के रंग और तमाम ऐसे रंगों के जुड़ जाने से पैदा होता है जो इंसानियत को शर्मिंदा करने का बायस बनते हैं. ना, हमें कोई भ्रम नहीं था. हम किसी चमकते भारत के, दुनिया की अगली महाशक्ति बनने जा रहे भारत के, या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के फर्जी दावों को सीने पे तमगे सा पहन घूमने वाले हिन्दुस्तानी नहीं थे. हम हो भी नहीं सकते थे क्योंकि एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन में काम कर रहे हम दोनों दोस्तों के दिन ऐसी ही कहानियों से मुठभेड़ करते गुजरते हैं. हमें पता था कि हमारा हिन्दुस्तान इनक्रेडिबल इंडिया के पर्चों वाला हिन्दुस्तान नहीं भुखमरी वाला, ऐफ्सपा वाला, कर्जे में डूबे किसानों की आत्महत्या वाला हिन्दुस्तान था.

हमें राष्ट्रभक्ति के दौरे भी नहीं पड़ते थे. हम दो महीने में एक बार किसी पाकिस्तान को नेस्तोनाबूद कर देने नहीं निकल पड़ते थे. और फिर भी हम दोनों को यह सुनना अच्छा नहीं लगा था. हमारे दिलों के भीतर किसी बहुत गहरे कोने में शायद एक आस थी कि एक दिन हमारे बहुत छोटे, और मुल्क के अंदर लड़ रहे दोस्तों के बहुत बड़े संघर्ष हमारे देश को वैसा ही बना देंगे जैसा हम उसे देखना चाहते हैं. और यह चाहत वह जगह थी जहाँ हमारी ख्वाहिशें हांगकांग के उस दोस्त की ख्वाहिशों से यकसा हो जाती थीं.

आखिर को उसका मुल्क भी कुल जमा 40 साल पहले तक बिलकुल हमारे मुल्क जैसा था. तब यहाँ भी लडकियां सुरक्षित नहीं थी, यहाँ भी उतना ही भ्रष्टाचार था और यहाँ भी मदद के लिए पुलिस के पास जाने में खतरे ही ज्यादा होते थे और उससे बेहतर था कि यहाँ के किसी माफिया ट्रायड के पस चले जायें. और उस दोस्त ने, उसके पहले की पीढ़ियों ने इस मुल्क को बिलकुल बदल डाला था. चार दशक के भीतर ही यह मुल्क एक ऐसी जगह में तब्दील हो गया था जहाँ लड़कियाँ रात के दो बजे जो भी चाहें पहन के घूम सकती थीं, बिना यह सोचे कि उनके साथ कोई हादसा हो जायेगा. यह मुल्क एक ऐसी जगह में तब्दील हो गया था जहाँ आप किसी भी राष्ट्रीयता के होने के बावजूद नशे में डूबे हुए अपने घर लौट सकने की हिम्मत जुटा सकते हैं, बिना यह सोचे कि आपके ऊपर कोई नस्ली हमला हो सकता है, या कोई पुलिसिया आपको परेशान कर सकता है.

और एक हमारा मुल्क है जहाँ हमारे ही हमवतन पूर्वोत्तर भारत के दोस्तों को चिंकी कह के गाली दे सकने को अपना अधिकार समझते हैं और वहाँ से आयी लड़कियों को जो हमारी दोस्त, बहन, प्रेमिका, या कुछ भी नहीं हो सकती थीं, को सदैव उपलब्ध समझ उनके ऊपर यौन हिंसा करते रहते हैं.

हाँ, इस बार हम लोगों की आँखों में गुस्से के साथ साथ एक उम्मीद भी थी. इस सामूहिक बलात्कार के बाद सड़कों पर उबल पड़े आम लोगों के गुस्से से पैदा हुई उम्मीद. उस नफ़रत से पैदा हुई उम्मीद जिसने सौम्या विश्वनाथन के बाद लड़कियों को बेवक्त घर से न निकलने की सलाह देने वाली शीला दीक्षित को बेइज्जत कर जंतर मंतर से भगा देने वाले युवाओं को देख पैदा हुई उम्मीद. हड्डियाँ कंपा देने वाली ठण्ड में यौन अपराधियों को न रोक पाने वाले पुलिसियों की बरसती लाठियों के बीच घायल होते हुए युवाओं के प्रतिरोध गीतों से पैदा हुई उम्मीद.

लगा था कि हम बदलाव के बहुत करीब पंहुच गए हैं. मैंने हांग कांग के उस दोस्त को यह कहना भी चाहा था. पर फिर ठहर गया. यह सोच के कि जंग जीत के बतायेंगे. जे एस वर्मा कमेटी के बाद यह उम्मीद और बड़ी हुई थी. शायद इसलिए भी कि वर्मा कमेटी ने अपनी ‘ब्रीफ’ के बहुत आगे जा के पितृसत्ता के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया था. वह तो वहाँ तक चली गयी थी जहाँ इस बलात्कार के खिलाफ, लेकिन अपनी फौजों को बलात्कार का अधिकार देते राष्ट्रवादियों को धता बताते हुए इस कमेटी ने यौनहिंसा/बलात्कार के अपराधी सैनिकों को सशस्त्र बल विशेष सुरक्षा क़ानून (AFSPA) के बचाव से मरहूम करने की सिफारिश कर दी थी. लगा था कि इरोम शर्मिला का संघर्ष किसी मुकाम तक तो पंहुच रहा है.

सोचा था कि हांगकांग के अपने इस दोस्त को कहूँगा उस दिन, जब हम ये लड़ाई जीत लेंगे कि हमारा मुल्क हमारे जैसे लोगों का ही है, इन यौन अपराधियों का नहीं. आज जे एस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पर हिन्दुस्तानी हुकूमत का फैसला देखा. देखा कि कैसे उन्होंने हर महत्वपूर्ण सिफारिश खारिज कर दी. कैसे उन्होंने सांस्थानिक बलात्कार को बचने की कोशिश की. कैसे इस बहुत चिंतित सरकार ने फिर से अपनी बेटियाँ बेच दीं.

आज शनिवार था. आज फिर वाइन खरीदनी थी. मैं अपने उस दोस्त की दुकान पर नहीं गया. जाता तो क्या बताता? यह कि हमारे मुल्क की सरकार बलात्कार के आरोपियों को माननीय सांसद, माननीय विधायक बनते देखना चाहती है. और यह भी कि मेरे दोस्त.. हम फिर से हार गए हैं. हमारी सरकार बलात्कारियों को सम्मान देने वाली, उन्हें वीरता पुरस्कार देने वाली सरकार है. नजर कैसे मिलाता उससे? सो कहीं और चला गया.

2 comments :

  1. ताकि आपकी मुस्कान बनी रहे - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वुमन एनाटोमी से वुमन ऑटोनोमी तक का सफ़र

    आज तक ब्लॉग पर जब भी बाते हुई हैं नारी की एनाटोमी को लेकर होती आयी हैं .
    ज्योति सिंह पाण्डेय की हिम्मत , जी हाँ अगर ज्योति हिम्मत छोड़ देती और तुरंत मर जाती तो फिर एक युवती की मौत की खबर आ जाती लेकिन ऐसा नहीं हुआ . अब तक के सबसे भयंकर गैंग रेप से लड़ कर वो 15 दिन तक अपनी जीवन शक्ति को बनाए रही और उसने मजबूर किया की हम सब "एनाटोमी" से ऊपर उठ कर "ऑटोनोमी " की बात करे . ये उसकी लड़ाई थी जिसने मजबूर किया आम जनता के उस तबके को जो औरत को "शरीर " समझ कर केवल और केवल " एनाटोमी " की बात करता रहा हैं सोचने पर की वो नारी के " ऑटोनोमस " होने को भूल चुका हैं

    आप कहेगे ये ऑटोनोमी क्या हैं
    ऑटोनोमी को समझना हैं तो इन लिंक को पढ़े

    लिंक 1
    लिंक 2
    लिंक 3

    अब कमेन्ट में लिखे अपने विचार .

    ऑटोनोमी का सीधा और सरल मतलब हैं की हम कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं . स्वतंत्रता मौलिक अधिकार हैं . जिस प्रकार से एक लड़की शादी करने को स्वतंत्र हैं उसी प्रकार से दूसरी अविवाहित रहने को .
    जिस प्रकार से एक लड़की साड़ी पहने को स्वतंत्र हैं उसी प्रकार से दूसरी बिकनी पहने को स्वतंत्र हैं .
    जिस प्रकार से एक केवल एक पुरुष से सम्बन्ध बनाने को स्वतंत्र हैं दूसरी कई पुरुषो से सम्बन्ध बनाने के लिये स्वतंत्र हैं .
    जिस प्रकार से एक नारी बच्चा पैदा करने के लिये स्वतंत्र हैं उसी प्रकार से दूसरी अबोर्शन करवाने के लिये स्वतंत्र हैं

    बस ध्यान ये देना चाहिये की जो भी किया जाये वो कानून और संविधान को मान्य हो .

    समाज को ये अधिकार है ही नहीं की वो किसी भी नारी को कुछ भी करने के मजबूर करे या कुछ भी करने से रोके .

    स्वतंत्रता का सही अर्थ अब शुरू हुआ हैं . जब हम शरीर की संरचना से ऊपर उठ कर लिंग विबेध से हट कर
    ऑटोनोमी
    { स्वराज्य स्वायत्तता (f) स्वत्व अधिकार स्वयं शासन }
    की बात कर रहे हैं

    नारी ब्लॉग पर ये सब कई बार लिखा जा चुका हैं एक बार फिर सही

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