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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

January 19, 2013

हम शर्मिंदा हैं मदीहा गौहर.

हम बहुत शर्मिंदा हैं मदीहा आपा पर यकीन करिये कि गलती आप की ही है. आप हिन्दुस्तान को जम्हूरियत वाला मुल्क मानती थीं तो इसमें बेचारे मुल्क की क्या गलती है? आपको क्या लगा था कि आप कलाकारों की इज्जत कर पाने का माद्दा है इस मुल्क में. क्या सोच के चली आयीं थी आप नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के थियेटर फेस्टिवल में? पिछली बार की तरह इस्तेकबाल होगा आपका? लोग हाथों हाथ लेंगे आपको? गलत सोचती हैं आप आपा.

पिछली बार की बात और थी. तब आप बुर्कावैगेंजा नाम का वहनाटक ले के आयीं थी जिसे पाकिस्तानी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था, बैन कर दिया था. अब पाकिस्तान के हुक्मरानों की जेहनी जहालत पर ऐसा तंज तो हमें गुदगुदायेगा ही ना. कितना अच्छा नाटक था वाह. कितने गंदे मौलाना थे. वाह वाह.

पर आपको ये किसने कह दिया कि हम पाकिस्तान से पीछे हैं? जिसने भी कहा, गलत कहा. हम पाकिस्तान से हर मामले में आगे थे, हैं और रहेंगे. जहालत में. तानाशाही में भी. फहमीदा रियाज याद ना आयीं आपको?
वही, तुम बिलकुल हम जैसे निकले भाई/अब तक कहाँ छुपे थे भाई/वोह मूर्खता वो घामड़पन जिसमे हमने सदी गंवाई /आखिर पंहुची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत बधाई  लिखने वाली फहमीदा आप. उन्होंने तो कब का पहचान लिया था हम लोगों को, आप कैसे चूक गयीं?

ओह, अब समझा. आप आपके ग्रुप की जेनयू में जिस लाहौर नहीं वेखिया वाली परफार्मेंस के बाद बहुत देर तक बजती रही तालियों और भीगी आँखों से धोखा खा गयी होंगी. गोली मारिये उन बेहूदों को. वहाँ के बाशिंदे ऐसे ही हैं सारे. गद्दार हैं सब के सब उस मदरसे वाले. प्रवीण तोगड़िया की चलती तो ताला लगवा देते वहाँ. उनकी तो सोच ही देश से उल्टी चलती है.पाकिस्तान परस्त हैं सब के सब. माओवादी.

पर उस परफार्मेंस में कुछ तो था आपा. मेरे जैसा बुद्धिजीवी भी भूल गया था कि वह सिर्फ एक नाटक देख रहा था, सच नहीं. कितनी बार तो हाथ गया था बगल में रखे गमले पर कि उस मौलाना को दे मारूं. नफरत हो रही थी उससे. क्या जबरदस्त अभिनय किया था भाई ने. ऐसे की अशोक सिंघल और अकबरुद्दीन ओवैसी की आत्मा एक ही शरीर में घुस गयी हो. फिर दो मिनट आपसे बात हुई थी (आपको याद भी न होगी) और तारीफ़ को लफ्ज़ न मिल रहे थे. हाँ आपको आपा कहने की हिम्मत जुटा ली थी कहीं से.

पर वो और वक़्त था आपा. अमन अमन, मुहब्बत मुहब्बत खेलने का वक़्त. और फिर बताया ही, जेनयू. उस नाटक के बाद बहुत गन्दा पानी गुजर गया है जमुना पे बने पुल के नीचे से. और पानी तो खैर पहले से भी गुजर  ही रहा था. आपको आमिर खान के बारे में तो पता ही होगा न आपा?  बहुत सरोकार वाले अभिनेता हैं. बड़े हीरो हैं हमारे मुल्क के. सरफ़रोश नाम की एक बहुत सुपरहिट फिल्म दी थी उन्होंने. अरसा पहले. देखिएगा, कभी वक़्त मिले तो. देखिएगा कि कैसे उस पार के मशहूर शायर को धीरे से जेहादी/दहशतगर्द/आतंकवादी में तब्दील कर देती है वह फिल्म. ये हिंदुत्व की राजनीति है आपा, फिल्म, टेलीविजन, पापुलर कल्चर, अर्नब गोस्वामी टाइप ऐंकर्स जैसे हज़ार रास्तों से आती है. बिलकुल वैसे जैसे आपके मुल्क में इस्लाम वाले आते हैं. खैर, जिक्र आ ही गया है तो एक और फिल्म आयी थी अभी अभी. दो हिस्से में. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर नाम था. उसे भी देखिएगा कि कैसे एक पूरी कौम को गुंडा बना देते हैं ये लोग.

खैर, सरफ़रोश के बाद भी बहुत कुछ हुआ था आपा. इतना कि आप यकीन न कर पाएंगी. उस फिल्म के ठीक बाद इस मुल्क में 'सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं पर सारे आतंकवादी मुसलमान क्यों होते हैं" जैसे सवालों का सिलसिला शुरू हो गया था आपा. फिर इस मुल्क ने एक "गलत पार्टी में सही आदमी अटल बिहारी बाजपेयी" को भी देखा था आपा. वो आदमी जो बाबरी ढहा दिए जाने को लेकर शर्मिंदा होने के पहले जमीन को समतल करना पड़ेगा जैसे बयान दे कर भी उदार बना रह सकता था. वह आदमी जो नरेन्द्र मोदी जैसे हत्यारे को गुजरात दंगों के समय 'राजधर्म निभाने" की सीख दे सकने के बाद गोआ में बड़े आराम से पूछ सकता कि मुसलमान दुनिया में कहीं भी शान्ति से क्यों नहीं रह सकते?

फिर ना आपा, इस देश की राजनीति में अन्ना हजारे जैसे भूलतः गांधीवादी भी आ धमके थे. ऐसे गांधीवादी जो हर दूसरी बात के जवाब में अपनी टोपी उतार के जख्म दिखाने लगते थे कि ये लीजिए साहिबान ये जख्म हमको पाकिस्तान ने दिये हैं. ऐसे गांधीवादी जो अजमल कसाब को चौराहे पर फांसी देने की मांग करते थे. इतना ही नहीं आपा, ये तो बिग बॉस जैसे बेहूदे, और बेवजह रियालिटी शो के खिलाफ सिर्फ इस बात पर प्रदर्शन पर उतर आते थे कि उनमे वीना मलिक जैसे पाकिस्तानी कलाकार भी मौजूद हैं. आपा, वन्देमातरम के नारों और भारत माता की तस्वीर वाले दूसरे गाँधी-तीसरे जेपी-और चौथे न जाने क्या वाले 'राष्ट्रनायकों' के दौर में आपने इस मुल्क में मंटोनामा जैसा नाटक लाने का सोचा भी कैसे?

आपा, हम जहालत में भी पाकिस्तान से बहुत आगे जा चुके हैं. आप तो न, बस वापस चली जाइये. और अब भी दिल में कुछ बचा हो तो भारत-पाकिस्तान के बयानात के बीच मनमोहन सिंह के "ठीक है" टाइप बयानात को याद कर लीजियेगा बस. और हाँ, हो सके तो जिन लाहौर नहीं वेख्या टाइप नाटक बनाना बंद कर दीजियेगा. वतनपरस्ती, राष्ट्रभक्ति, और देशभक्ति के दौर में असली परेशानियों से जूझने वाले ऐसे नाटक अच्छे नहीं लगते आपा.

अल्लाह हाफ़िज़, कि खुदा हाफ़िज़ तो आपके देश के फसादियों को भी  पसंद न आयेगा.





13 comments :

  1. बेहतरीन समर भैय्या

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  2. कोन्फ़ुजिया दिया है आपने..... पर लिखते गजब हैं

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  3. aap बेहरतीन राइटर हैं, और यकीनन ये इत्तेफाकन नहीं है, आपने टैलेंट है.....लेकिन

    "सरफ़रोश नाम की एक बहुत सुपरहिट फिल्म दी थी उन्होंने. अरसा पहले. देखिएगा, कभी वक़्त मिले तो. देखिएगा कि कैसे उस पार के मशहूर शायर को धीरे से जेहादी/दहशतगर्द/आतंकवादी में तब्दील कर देती है वह फिल्म. ये हिंदुत्व की राजनीति है आपा, फिल्म, टेलीविजन, पापुलर कल्चर, अर्नब गोस्वामी टाइप ऐंकर्स जैसे हज़ार रास्तों से आती है. बिलकुल वैसे जैसे आपके मुल्क में इस्लाम वाले आते हैं. खैर, जिक्र आ ही गया है तो एक और फिल्म आयी थी अभी अभी. दो हिस्से में. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर नाम था. उसे भी देखिएगा कि कैसे एक पूरी कौम को गुंडा बना देते हैं ये लोग."

    शायर की तब्दिलियत या कौम को गुंडा बनाने की कोशिश.....इस तरह से सोचकर तो फिल्मकारों ने भी फिल्म नहीं बनायी होगी....इस तरह की सोच सिर्फ आपकी है, उनकी नहीं!

    ' ऐसे गांधीवादी जो अजमल कसाब को चौराहे पर फांसी देने की मांग करते थे. '.... एना हजारे या कोई और, फिर से मुंबई हमला हो, कभी नहीं चाहेगा....चाहे गाँधीवाड़ी हो या नहीं....और आप इस मुल्क का हिस्सा हैं तो आप भी नहीं. और ये कहना की कसाब को सरे बाज़ार लटकाया जाये, अनुचित नहीं है.

    हाँ, यकीनन आपका ये कहना-
    "आपा, हम जहालत में भी पाकिस्तान से बहुत आगे जा चुके हैं. आप तो न, बस वापस चली जाइये. और अब भी दिल में कुछ बचा हो तो भारत-पाकिस्तान के बयानात के बीच मनमोहन सिंह के "ठीक है" टाइप बयानात को याद कर लीजियेगा बस. और हाँ, हो सके तो जिन लाहौर नहीं वेख्या टाइप नाटक बनाना बंद कर दीजियेगा. "

    बहुत बड़ा सच है, और इस मुल्क का हिस्सा होने के नाते हमें ज़रूर आत्म-अनुभूति करनी होगी....की हम कहा जा रहे हैं......बाकि ये ज़रूर है की पाकिस्तान से आये कलाकारों को देश से निकालना, न तो कला के साथ हमारी लड़ाई का नतीजा है, न कोई व्यक्तिगत द्वेष. ये बस जो हुआ, उसके बाद गुस्सा है....और एसा होना स्वाभाविक है. में व्यक्तिगत रूप से इसके खिलाफ हु लेकिन, शहीद हेमंत के पञ्च वर्ष के बेटे की फोटो जब भी देखता हूँ...बरबस एक गुस्सा और आग सीने में जलने लगती है.

    जो मुल्क हमारे गले काटना चाहता है, उस मुल्क के कलाकारों को हम सीने में नहीं बिठा सकते....आप बिठा सकते हैं?

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  4. इत्तेफाक देखिये, आज सुबह ही जम्हूरियत के जश्न में शामिल हुए थे, और शाम को बहस में शामिल हैं....ये जानते हुए भी की जम्हूरियत कौम में बंट के नहीं आई है....और इससे तो आप भी इत्तेफाक रखते होंगे, क्यूंकि हक तो उनके पास भी नहीं पहुंचा, जो कल भी फाके किया करते थे, और आज भी कर रहे हैं.

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  5. आपने अच्छा लिखा हुआ है, और पुराणी कई पोस्ट पढ़े के बाद मानता हूँ कि ये इत्तेफकान नहीं है....लेकिन आपका मेरा पिछला कमेंट डिलीट करना भी जायज़ नहीं है. फिर से दुहराता हूँ, कि आपकी बहुत सी बैटन से इत्तेफाक रखता हूँ लेकिन---

    'सरफ़रोश नाम की एक बहुत सुपरहिट फिल्म दी थी उन्होंने. अरसा पहले. देखिएगा, कभी वक़्त मिले तो. देखिएगा कि कैसे उस पार के मशहूर शायर को धीरे से जेहादी/दहशतगर्द/आतंकवादी में तब्दील कर देती है वह फिल्म. ये हिंदुत्व की राजनीति है आपा, फिल्म, टेलीविजन, पापुलर कल्चर, अर्नब गोस्वामी टाइप ऐंकर्स जैसे हज़ार रास्तों से आती है. बिलकुल वैसे जैसे आपके मुल्क में इस्लाम वाले आते हैं. खैर, जिक्र आ ही गया है तो एक और फिल्म आयी थी अभी अभी. दो हिस्से में. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर नाम था. उसे भी देखिएगा कि कैसे एक पूरी कौम को गुंडा बना देते हैं ये लोग.'

    शायर को धीरे से जेहादी बनाना, या कौम को गुंडा बनाने की बात....इस तरह से तो खुद फिल्मकारों ने नहीं सोचा होगा.....ये तो बस आपकी सोच है, और में इसे अछि तो कदापि नहीं कहूँगा.

    'ऐसे गांधीवादी जो अजमल कसाब को चौराहे पर फांसी देने की मांग करते थे.'
    इस मांग में क्या बुरे है?? क्या फिर से आपकी चाहत है कि कसाब जैसों को जेलों में शाही आराम में रखा जाये और खा जाये कि आपने बड़ा अच्छा कम किया है? कसाब को फंसी देने न देने को कौम से तो मत जोड़िये.

    और...

    अंत में, मानता हूँ कि पाकिस्तान के कलाकारों को वापिस भेजना कोई तरीका नहीं है, और व्यक्तिगत रूप से में इसके खिलाफ ही हूँ....लेकिन जो लोग हमारे सर काट के ले गये और काटने पे आमदा हैं, उनको सीने में भी नहीं बिठाया जा सकता. एसे मुल्क के लोगो को तो बिलकुल नहीं. शहीद हेमंत क पांच बरस के बेटे कि आँखों में झांकिए शायद आप भी मेरी बैटन से इत्तेफाक रखने लगे.

    ..........और अगर आप बात कौम कि करते हैं तो, ये प्रश्न पुछा ही जाना चाहिए कि 'में 'सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं पर सारे आतंकवादी मुसलमान क्यों होते हैं?' क्यूंकि सिर्फ एक कौम के लोगो कि सोच इस तरह की कैसे हो सकती है.

    बाबरी मस्जिद गलत था लेकिन ये किसी कौम का नहीं सियासी दांव का असर था......शायद आप समझेंगे...

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  6. समर भाई! बहुत अच्छा लिखते हैं आप। बधाई क़ुबूल कीजिये।
    पर आपकी नाराजगी वास्तव में क्या है बस ये समझ में नहीं आया।
    एक सलाह : बोलीवुड की फिल्मो में कोशिश करिए, हिंदी फिल्मो में पटकथा लेखन में अच्छा भविष्य है आजकल। और हाँ ये काम आप हाँग काँग से भी कर सकते हैं जैसे आतिफ असलम दुबई में रहकर गाते हैं हिंदी फिल्मो के लिए।
    एक तथ्य : पाकिस्तान के बहुत से कलाकारों जैसे नुसरत फ़तेह अली खान साहब, गुलाम अली साहब, मेहंदी हसन साहब, राहत फ़तेह अली खान, शकील सिद्दीकी, अली हसन, जैसे तमाम कलाकारों की लाइव परफार्मेंस अनगिनत बार मैंने भारत में देखी सुनी है। और इनमे से कुछ और इनके अलावा और तमाम छोटे बड़े कलाकार आज भी भारत में काम करते हैं (पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इज्ज़त अफजाई और ज्यादा उजरत के साथ).
    पर आप ने इस लेख में इस कदर हाल दुहाई दी है जैसे भारत में पाकिस्तान के कलाकारों पर ज़माने से प्रतिबन्ध लगा हो।
    हाँ! आप का लेख पढ़ कर तो ये लग रहा है की कसाब को तो गलत फांसी हुई, उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था।
    बहुत खूब कामरेड!

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  7. समर भाई! बहुत अच्छा लिखते हैं आप। बधाई क़ुबूल कीजिये।
    पर आपकी नाराजगी वास्तव में क्या है बस ये समझ में नहीं आया।
    एक सलाह : बोलीवुड की फिल्मो में कोशिश करिए, हिंदी फिल्मो में पटकथा लेखन में अच्छा भविष्य है आजकल। और हाँ ये काम आप हाँग काँग से भी कर सकते हैं जैसे आतिफ असलम दुबई में रहकर गाते हैं हिंदी फिल्मो के लिए।
    एक तथ्य : पाकिस्तान के बहुत से कलाकारों जैसे नुसरत फ़तेह अली खान साहब, गुलाम अली साहब, मेहंदी हसन साहब, राहत फ़तेह अली खान, शकील सिद्दीकी, अली हसन, जैसे तमाम कलाकारों की लाइव परफार्मेंस अनगिनत बार मैंने भारत में देखी सुनी है। और इनमे से कुछ और इनके अलावा और तमाम छोटे बड़े कलाकार आज भी भारत में काम करते हैं (पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इज्ज़त अफजाई और ज्यादा उजरत के साथ).
    पर आप ने इस लेख में इस कदर हाल दुहाई दी है जैसे भारत में पाकिस्तान के कलाकारों पर ज़माने से प्रतिबन्ध लगा हो।
    हाँ! आप का लेख पढ़ कर तो ये लग रहा है की कसाब को तो गलत फांसी हुई, उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था।
    बहुत खूब कामरेड!

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  8. @वी के जैन - भाई, साम्प्रदायिकता यूँ ही नहीं आती. गुजरात 2002 जैसे दंगे करने के लिए नरेंद्र मोदी,बजरंग दल,मुन्ना बजरंगी जैसे हत्यारों से बहुत ज्यादा जरूरत एक ऐसी भीड़ की होती है जो या तो आपका सक्रिय साथ दे, या कम से कम ताली बजाये. साम्प्रदायिक सहजबोध यही होता है, communal commonsense. याद करके बताइये अगर आपको सरफ़रोश के पहले पाकिस्तानी कलाकारों के विरोध की कोई घटना याद हो तो.
    दूसरी बात यह- कि अगर आपको सारे आतंकवादी मुसलमान लगते हैं तो आपको अपना सामान्य ज्ञान और सोच दोनों को दुरुस्त करने की जरूरत है. गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान पर ना भी जाएँ भाई तो इस देश में संघ कबीले से बड़ा आतंकवादी कौन है?
    अब रही बात अन्ना हजारे नाम के उस जातिवादी तानाशाह की, तो भाई बड़े लेख पड़े हुए हैं इसी ब्लॉग पर. देख लें साहब, कितनी बार वही वही बात लिखूं.

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  9. @S K Yadav साहब..
    आपको नाराजगी नहीं समझ आई, न सही, तमाम लोगों को नहीं आती भाई. अटल बिहारी बाजपेयी और प्रमोद महाजन का जमाना याद है न? देश की जनता नाराज थी और भाई लोग इंडिया शाइनिंग किये पड़े थे. फिर क्या हुआ यह तो याद ही होगा.
    अब आयें अजमल कसाब पर, तो साहब, जुर्म जो भी हो मैं फांसी की सजा के खिलाफ हूँ. वैसे भी ये फांसियां 'मरदाना कमजोरी का शर्तिया इलाज' वाले विज्ञापन ढूँढने वाले मर्दों को ही ज्यादा पसंद आती दिखी हैं आज तक. एक बात बताइये, कसाब तो आया ही आत्मघाती मिशन पर था तो उसे मार के कौन सा तीर मार लिया आपने? हाँ, उसके 'हैंडलर्स' आज भी जिन्दा हैं. हाफ़िज़ सईद टाईप नाम तो सुने ही होंगे आपने. उन्हें पकड़ के ही दिखाइये भाई साहब, मारना तो दूर रहा.
    रही बात पटकथा लेखन वाली सलाह की, तो साहब शुक्रिया सलाह देने का. कभी दिल हुआ तो लिख भी देंगे.

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  10. mtlb apka kahna h ki sarfarosh movie ke bad sara desh pak kalakaro k khilaf ho gya??

    ...aur anna hazare jativadi tanashah h???

    sir aapki soch pe apkp badhai.....

    Haan, mujhe har muslim atankwadi nhi lgta lekin sach yhi h ki duniya ki 99.9% atankwadi ghatnao k peeche inka hath hota h. rahi baat sangh ki shinde sahab ka siyasi byaan mujhe mayne nhi rakhta....

    ....aur sangh pe ap tark se ilzam lga sakte h bas.

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  11. sir sampradayikta yu hi nhi ati...lekin jis ek tarfa soch se apne ye lekh likha h usse zarur ati h....
    jisme bechari do film bina bajah hashiye pe a gyi...apke be sir pair k tark se.
    ....aur logo ko lgne lga ki ap kasaab ko bharat ratna dilaane k paksh me h.

    sir, secular hone k mayne alag hote h aur pseudo secular k alag....ap mujhe is lekh me dusri category me nazar ate h.

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  12. sir at last....
    Omkara movie ane k pahle tak hindu atankwad ka naam nhi tha...Omkara movie me poori hindu kaum ko gunda thahraya gya h... isiliye iske liye Omkaa movie jimmedar h...agar apke shabdo me kahe to... hai na???

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  13. @Madeeha Gauhar... hum sharminda h Madeeha ji ki ek kalakar ka uchit samman humare log is desh me nhi kar paye....lekin iske liye sirf hum nhi kahi na kahi apka mulk b jimmedar h. jaha se khooni holi khelne kuch kasab bheje jate h to kabhi hmare sir kaate jate h...hmara gussa jayaz h Madeeha ji....shayad.ap apne mulk ki satta tak paigam pahucha paye....ki hum shanti chahte h...Madeeha chahte h....Kasab ya 26/11 nhi.

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