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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

January 30, 2013

वे भ्रष्टाचार से गणतंत्र बचाने निकले है.

छीजती यादों के दौर में कुछ भी सहेज कर रख पाना कितना मुश्किल होता है, ख़ासतौर पर तब जब ये यादें हर शाम टेलीविजन के पर्दों पर बनती-बिगड़ती छवियों से बावस्ता हों. पर फिर, दिमाग पर जरा सा जोर डालें तो याद आएगा कि पिछले बरस ठीक इसी बसंती मौसम में कुछ आम आदमी गणतंत्र बचाने की कोशिशों में दूसरा गांधी-तीसरे जेपी और चौथे न जाने क्या क्या की तलाश में थे और गर्मियों के आते न आते उन्होंने अन्ना हजारे नाम का स्वयंभू गांधीवादी मसीहा देश को दे मारा था. तब भी ऐसे ही उन्मादित नारे थे, हवाओं में लहराते तिरंगे थे, वन्दे मातरम के जयघोष थे. ये सब थे क्योंकि गणतंत्र खतरे में था और इन आम आदमियों ने कसम खाई थी कि वे गणतंत्र को बचा के ही मानेंगे.

एक बरस बाद भारतीय गणतंत्र फिर से खतरे में है, मानो गणतंत्र न हुआ मजहब हो गया. 

हाँ एक बात है, इस बीते एक बरस में खतरे में पड़े इस गणतंत्र में बहुत कुछ बदल गया है. जैसे यह, कि पिछले बरस गणतंत्र को भ्रष्टाचार से खतरा था जबकि इस बरस भ्रष्टाचार ही गणतंत्र का पहरुआ बन के उभरा है. चौंके नहीं, मोटा मोटा यही बयान है जो महान समाजवैज्ञानिक और गांधीवादी(वैसे सवाल यह भी है कि जाति के सवाल पर यह गांधीवादी लोग ही क्यों गड़बड़ा जाते हैं) आशीष नंदी साहब ने दिया है. बात आगे बढ़ाने के पहले आइये हुजूर सरकार के बयान पर नजर डाल लेते हैं पर पूरा बयान जरा लम्बा है (यहाँ पढ़ सकते हैं) सो यहाँ केवल वह हिस्सा जो तूफ़ान का सबब बना है. 
यह बहुत अमर्यादित और लगभग अश्लील बयान होगा. पर तथ्य यह है कि ज्यादातर भ्रष्ट ओबीसी, दलित समाज और अब जनजातीय समुदायों से आते हैं. और जब तक यह होगा, भारतीय गणतंत्र बचा रहेगा. और मैं आपको एक उदाहरण भी दूंगा, सबसे कम भ्रष्टाचार वाले राज्यों में सीपीएम के रहने तक पश्चिम बंगाल एक था. और मैं प्रस्तावित करना चाहता हूँ, आपका ध्यान इस बात की तरफ खींचना चाहता हूँ कि बीते 100 सालों में ओबीसी, पिछड़े और दलित समाज के लोग वहां सत्ता के आसपास फटक तक नहीं पाए हैं.
(अगर आपको फटक पाने पर ऐतराज हो तो यह भाषा नंदी साहब की है, मेरी नहीं—मूल अंग्रेजी देखें “ nobody... have come anywhere near power in West Bengal.)बेशक इन बेहद दिक्कततलब पंक्तियों के पहले उन्होंने कुछ और भी कहा है जिसको अगर उन्ही की एक लाइन उधार लेकर कहें तो
“हमारा भ्रष्टाचार उतना भ्रष्ट नहीं दीखता, उनका दिखता है.
Our corruption doesn't look that corrupt, their corruption does.
अगर नजर हो तो आपको साफ़ साफ़ दिखेगा कि नंदी किस ‘लोकेशन’ से बोल रहे हैं, और क्यों बोल रहे हैं. यह ‘हमारा’ वह लोकेशन है , वह अवस्थिति है एक तटस्थ समाजवैज्ञानिक की हो ही नहीं सकती. यह अवस्थिति साफ़ करती है कि न केवल नंदी एक खेमे में खड़े हैं बल्कि उनका उस खेमे में खड़ा होना अनजाने में नहीं बल्कि सचेत चुनाव है. और फिर जब नंदी साहब के लिए एक तरफ का भ्रष्टाचार उनका अपना है तो वह फिर अपने बचाव में एक बुद्धिजीवी को मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मांग सकते. यह हम और उन का फासला वही फासला है जो इस मुल्क की अर्थ-राजनैतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि अध्ययन के क्षेत्र में भी दाखिल और खारिज लोगों का फासला है. 

पर बात सिर्फ इतनी भर नहीं है. इस हमारे और उनके भ्रष्टाचार के बीच दिखने का सवाल भी एक बड़ा सवाल है. आशीष नंदी साहब ने यह तो बताया कि ‘उनका’ वाला भ्रष्टाचार कम दिखता और और दलित बहुजन वर्ग का ज्यादा पर यह बताना भूल गए (या यह भूलना भी सचेतन की गयी कार्यवाही है) कि ऐसा क्यों है. मामला इतना सीधा और मासूम है नहीं जितना उन्होंने यह कह कर बनाने की कोशिश की मेरे द्वारा आप की मदद के बदले में आप मेरे बच्चों को स्कालरशिप दे सकते हैं. नंदी साहब का यह कारनामा वस्तुतः एक गंभीर मसले को ‘ट्रिवीअलाइज़’ करना, उसे हास्यास्पद बना देना भर है. 

हकीकत में नंदी साहब की तरफ वाला भ्रष्टाचार इसलिए नहीं दिखता क्योंकि तंत्र (गण से उन्मुक्त) अपनी सारी ताकत उसे छिपाने में, और फिर भी न छिपा पाने पर उसे न्यायोचित ठहराने में लगा देता है. यह भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार जैसा नहीं दिखता क्योंकि यह कभी ‘पेड न्यूज’ मार्का खबर बन कर हम तक पंहुचता है तो कभी राडियागेट छाप लाबीइंग बनके जिसकी रिपोर्टिंग के खिलाफ रतन टाटा जैसे (पद्मविभूषण प्राप्त तो होंगे ही) महान भारतीय अदालत चले जाते हैं, और फिर अदालतें तो बनी ही उन्हें राहत देने के लिए हैं. 

नंदी साहब की तरफ वाला भ्रष्टाचार इसलिए भी नहीं दिखता कि उसे दिखा सकने में सक्षम मीडिया में भी वही लोग बैठे हैं जिनका ‘हम’ नंदी साहब का हम है, मधु कोड़ाओं और मायावतियों का ‘उन’ नहीं. सो उन्हें बहन मायावती की सैंडल लाने हवाईजहाज (या हेलीकाप्टर?) भेजना उनके ‘जातीय चरित्र का हिस्सा लगता है जबकि जयललिता जी की सैंडिलें एक व्यक्ति के भ्रष्टाचार का. वह इसलिए भी नहीं दिखता कि लालू यादव का मजाक बनाने में, उन्हें भ्रष्ट और मसखरा साबित करने की कोशिश में लगे रहने वाले मीडिया को याद ही नहीं आता कि जब राजीव गांधी के भेजे 1 रूपये में से आम आदमी तक केवल 14 पैसे आम जनता तक पंहुचते थे तब सामाजिक न्याय वाली यह पीढ़ी राजनैतिक परिदृश्य पर ठीक से पैदा तक नहीं हुई थी. 

दिखता तो खैर नंदी साहब, और उनके ‘अपनों’ को यह भी नहीं है कि टाटा, बिड़ला और अम्बानियों से लिए ‘चंदे’ की बदौलत एक एक चुनाव क्षेत्र में 100-100 करोड़ रुपये खर्च कर देने वाली कांग्रेस और भाजपा के सामने सामजिक न्याय की ताकतें अगर भ्रष्ट न हों, तो टिक ही नहीं पाएंगी. कौन से टाटा चंदा देंगे मायावती को? मधु कोड़ा को? सो फिर तय चुनाव सीमा को सीधे सीधे धता बता कर चुनावों को इतना मंहगा बना के सांस्थानिक भ्रष्टाचार को जन्म देने वाले लोग कौन हैं? आशीष नंदी यह सवाल नहीं पूछेंगे. उन्हें पता है कि उनका भ्रष्टाचार नहीं दिखता, बाकियों का दिखता है. 

यही इस बात में सबसे बड़ा पेंच है. मैं पहले भी लगातार यह कहता रहा हूँ, कहता रहूँगा कि जिस देश की 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 30 रुपये प्रति दिन से कम में जीने को मजबूर हो वहां आम जन का मसला भूख होगी भ्रष्टाचार नही. ऐसे समाज में भ्रष्टाचार तो सिर्फ उस आभिजात्य वर्ग का सवाल हो सकता है जो अब अपने ‘काम करवाने के लिए’ कोई पैसा खर्च नहीं करना चाहता, न टैक्स में न घूस में. कहने की जरूरत नहीं है कि सामाजिक न्याय की ताकतें ही उसकी इस चाहत में सबसे बड़ी बाधा हैं और उनको रोकने का जो तरीका उसे समझ आता है वह है उनके संघर्षों को ट्रिवीअलाइज़’ करना, उसे हास्यास्पद बना देना. और इसीलिए वह कभी अन्ना हजारे जैसे घोषित वर्णाश्रम समर्थकों और अरविन्द केजरीवाल जैसे आरक्षण विरोधियों को मसीहा बनाकर पेश करता है तो कभी उसकी मदद को आशीष नंदी जैसे गांधीवादी बुद्धिजीवी दौड़ पड़ते हैं. 

इस देश के गणतंत्र को असली खतरा जाति व्यवस्था और ऐसे अन्य प्रतिगामी मूल्यों से हैं और उन्हें हराने का इकलौता उपाय सामाजिक विविधता बढ़ा कर अब तक शोषित-वंचित रहे तबकों को शक्ति और सत्ता में उनकी जायज हकदारी सुनिश्चित करना. पर यह हुआ तो अब तक सत्ता में काबिज लोगों की कीमत पर ही होगा और इसीलिए वे भ्रष्टाचार से गणतंत्र बचाने जैसे कारनामे अंजाम देंगे. 

Audacity of Hope: And the people who have slipped through the net






[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in the UTS Voice, 16-31 January] 


Richell’s smile was mesmerizingly infectious, her hope in a better future almost audacious. We had been chatting in a yellowy darkness that reminded me of my village some 7000 kilometers and two oceans away. Everything here was so similar, so reminiscent of those 200 watt yellow bulbs that hanged precariously in decaying holders and gave a twinkling yellow light that sickened more than illuminating. They hanged on, nonetheless.

So did Richell, a bright and beautiful young girl in Cavite. We sitting in the verandah in front of her room that she shared with seven others, yes seven others. All she had of her own was a bunker bed with no privacy other than a big and coarse curtain that could lock her 6 into 6 feet space out of others’ eyesight but could not stop noise, or even light from seeping in. Yet she laughed, and laughed a lot. She dragged me inside to have a ‘feel’ of her life and once inside, proudly showed me the teddy bear she had bought, no got as she corrected herself, a few days back. Her eyes twinkled when she talked of her dreams. She had no qualms against sharing them with me, a rank stranger until just half an hour ago.

Richell’s dreams seemed so out of place in the verandah where we were sitting. The point, however, is that she had the courage to chase her dreams unlike the girls of my village who would be sacrificed on the altar of patriarchy for the ‘crime’. She could dream sitting in that sickening light in the verandah, which unlike my village was not located some 800 kilometers away from the national capital but was right at the perimeter of it. It was not in a nondescript village either but inside the biggest Export Processing Zone, as the Philippines government prefers to call the obnoxiously mushrooming Special Economic Zones, in the country. She was in the very heart of the Philippines on the rise.

My ride to Cavite had been tough and uneventful. Having decided to dump a cab ride, I had to take a bus followed by a signature Filipino Jeepney and then a ride in that claustrophobic tricycle that cages you on small shaded compartment attached to a motorcycle or a cycle. The route ran, almost along the seashore that defines the boundaries of Metro Manila, as the national capital region is known there. It passed by Freedom Islands, ironically named so, that are home to the boathouses and the skyscrapers coming next to it, which would gulp the boathouses soon. Notices are already out and served on them.

Richell’s journey to Cavite had been much tougher. Masabate, the city she calls home, is not merely geographically distant from Manila, it is almost a different country, poorer and lacking of opportunities. But then, her old and ailing parents lived there, they still do, and it was there where she was pursuing her college degree in Information Technology. Ask her what brought her, then, here and what you get is another burst of laughter that could hardly conceal the pain seeping through her eyes. No work there, why else, she replies. Ask her about the IT course that she left midway and she points towards a roommate, she has an IT degree as well, no use. The roommate nods, giggles and then all of them burst into a collective laughter.

Not that coming here has done anything much to Richell and thousands of other workers who swarm the streets of Cavite with every change in the shift. They all work like machines and get paid in what can be dubbed as peanuts. They work in glassy buildings that claim to offer world class work environment and retire to these dingy dungeons for rest. I do not go to movies they are very costly, Richell tells, and laughs. We borrow dvds from friends and watch them on cheap dvd players that is there only source of entertainment, she adds.

Laughter, I realize, is not born merely out of the sheer audacity of their hopes. It is there weapon to reassure them that they have not lost everything, that hope is what keeps them afloat in a country that alienates them from their own labour, from their own bodies. It is intoxicating. It gives them the delusion they need the most.

As Irene certainly does. A single mother who came to Cavite from Tacloban a few years back cannot go home to visit her children. A single return trip to her city that is 14 hours away will cost her almost a month’s salary in a country that had privatized its public transport system long ago in its quest of becoming a tiger economy. She would better save that money and go only once a year, on Christmas perhaps. Darkness can neither conceal the wetness the thought has brought to her eyes nor the glint born out of the idea of a family gathering. Richell is saving money for her marriage; Irene informs me, perhaps for getting the attention off her and gets joined in by her in giggling.

Even in the middle of all the mayhem crony capitalism has brought to their lives, the idea of both the girl and the boy saving for marriage seems so liberating. Forget the impossibility of choosing one’s life partner on her own part in a country known for ‘dishonour killings’, it makes me think of the blessed country where marriages are more like extortion for the bride’s family and inflict a terrible, and often irrecoverable, economic loss on them. You have a boyfriend; I ask Richell and see her blushing for the first time. The reply, hastily put together with an invitation to have dinner with the group, is a coy ‘not yet’.

They are all on Facebook, my colleague informs. Yes we are, is the collective reply, almost an imitation of the collective laughter. They are all on Facebook, and they are all very different there. Facebook offers them all that this world does not and they would not let the opportunity go waste. It is the only place where their wants have a tangential meeting with their realities. It gives them an escape route. It offers them the luxury of acting like the one they want to be instead of what they really are.

Pretension, sometimes, is the only thing available to save the sanity of someone condemned to stand on the same assembly line for years on one end. And then, there are rare but legendary tales like someone getting into a very happy and prosperous marriage with a ‘fb’ friend, someone getting an offshore job and so on. They need a hinge on which their lives can turn, and they would not let go of even the weakest one. Why should they?

The hinge is what is not available to the dwellers of floating Boathouses in Freedom Islands in Paranaque City. Forget Facebook, they do not have even electricity and water supply in their houses. They do not live on the periphery of Metro Manila, they live right in the middle of it. They are trying to relocate us to mountains, Maribel tells me. Relocating a community of fisher folks to mountains, can anything get more absurd than this, she adds with a blank face. She would definitely want to have electricity, and water and all the other amenities the government is promising them but she knows that the government had promised them the same thing six years ago when they had persuaded them to relocate to this place.

I was missing Richell’s laugh. Despite all assaults, she had the hope for a future intact in some corner of her heart, Maribel did not. She had no hinge to turn her life.

Neither do the vendors of Rizal National Park. Recently fenced from the main park, they are trying to survive the assault of ‘Fever’ as they refer to the current director who is hell bent on throwing them out after having leased the right to vend inside the park to a Korean chain. I have been living here since 1972, Freddie tells me. My wife died here, he adds. He had slept in the makeshift bed inside his stall ever since. They want to throw me out of this place, but where to is what he asks.

There are all real people caught in a flux. They are the ones who produce almost everything that makes our lives easier. They are the hinges on which our lives turn for better. They, though, are caught in a flux. They are the ones getting slowly dehumanized into mere statistics. They are the ones who have fallen off the nets fishing for development. They are the future imperfect that awaits us following the path Philippines have taken till now.

All I got back on my return flight was Richell’s laugh, uncontrolled and unabashed. And her belief in future. The audacity of that belief make me believe in humanity. Can we save the smile for our children is the question haunting me. I do not want to hit a wall for an answer.

January 27, 2013

यह आशीष नंदी मार्का जातीय कुंठाओं के विस्फोट का समय है.


यह कुंठाओं के विस्फोट का समय है. न, उनके पैदा होने का नहीं क्योंकि जातीय और धार्मिक ऊंचनीच (नंदी साहब के समाजवैज्ञानिक होने के सम्मान में चाहें तो उसे सामाजिक श्रेणीबद्धता भी कह ही सकते हैं) की नींव पर खड़े समाज में अपने मूल चरित्र में लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था स्थापित कर दिये जाने पर दो ही चीजें पैदा होतीं है- शोषित वंचित तबकों में स्वतंत्रता और बराबरी की चेतना और उसके लिए लड़ने का अदम्य साहस और अब तक सत्तासीन रहे तबकों में अपनी शक्ति के छीजते जाने से उपजती कुंठा. हाँ यह जरूर है कि एक व्यक्ति एक वोट आधारित समाज में अब तक पिछड़े रहे तबकों के लगातार बढते प्रभाव के साथ साथ राजनैतिक रूप से सही बने रहने की जरूरत इस कुंठा को छिपाये रखना इन पूर्व-शक्तिमानों की मजबूरी बना देती है.

पर फिर आप कुंठाओं को आखिर कैद भी कब तक रख सकते हैं? सो एक दिन आशीष नंदियों, आसाराम बापुओं, अभिजीत मुखार्जियों, अबू आज़मियों के अंदर पलती ये कुंठायें फट ही पड़ती हैं और अपने भीतर की तमाम गंदगी, दलित/स्त्री/पिछड़े/जनजाति/अल्पसंख्यक आदि तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के खिलाफ तमाम नफ़रत ले कर फट पड़ती हैं. यह फट पड़ना भी अकारण नहीं होता. इस विस्फोट के पीछे उन तमाम और प्रयासों की असफलता भी छिपी होती है जो इन कुंठाओं को राजनीतिक/सामजिक रूप से स्वीकार्य बनाने के लिए किये जाते रहे हैं.

यूँ देखें कि समकालीन भारतीय इतिहास के बीते कुछ दशक उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षों के साथ साथ उन संघर्षों को झूठी समन्यवादी विचारधाराओं में समेट लेने की कोशिशों का भी इतिहास रहा है. ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के लोहियावादी नारे के साथ शुरू हुए सामाजिक न्याय के संघर्ष को ‘सामाजिक समरसता’ के भावनात्मक नारे में लपेट खत्म कर देने की कोशिशें और इन कोशिशों के पराजित होने के बाद मंडल के खिलाफ कमंडल खड़ा करने के प्रयास अभी खत्म नहीं हुए हैं.

इन प्रयासों की एक और किस्म रही है. इन समुदायों से विभीषण (ब्राह्मण जाति से उदाहरण लेना जानबूझकर किया गया काम है) पैदा कर उन्हें समुदाय के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति वाली किस्म. सो जब तब आपको अन्ना हजारे नाम के ऐसे ओबीसी(और यह बात आपको अन्ना कम अन्ना के ‘हैंडलर’ ज्यादा बतायेंगे) दिखाई देंगे जो सारी जिंदगी अपने गाँव में वर्णाश्रम लागू करवाने के लिये जाने जाते रहे हैं और योगेन्द्र यादव जैसे भी जो उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण लागू होने की बात होते ही अपना वैकल्पिक, ज्यादा बराबर, ज्यादा मेरिटोरीयस बिल पेश कर देंगे भले ही उसके पहले न उन्हें कभी बराबरी की याद आयी हो, न मेरिट की. हाँ, तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं ने ऐसे प्रयासों के पीछे की राजनीति साफ़ साफ़ पहचानते हुए उन्हें लगातार धूल चटाई है. फिर पराजय तो कुंठा बढ़ाती ही है न.

नंदी आज फटे हैं, पर यह कुंठा तो इसके पहले भी बहुत साफ़ साफ़ दिखती रही है. याद करिये कि तमाम अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया बहन मायावती को कैसे संबोधित करते रहे हैं, कैसे उन्होंने लालू यादव को मसखरे में तब्दील कर देने की लगातार कोशिशें की हैं. याद करिये कि एनडीए के जमाने के पेट्रोल पम्प घोटाले की तुलना में बहुत बहुत छोटे भ्रष्टाचार की ख़बरें उन्हें सिर्फ इसलिए बड़ी लगती थीं कि वह मायावती के शासन से आ रही थीं. और अब यह सोचिये कि जन मत (पब्लिक ओपिनियन) बनाने वाले इस खबर उद्योग का अपना ‘जातीय चरित्र’ क्या है, कितने दलित, कितने पिछड़े इस उद्योग में निर्णय लेने वाली जगहों पर बैठे हैं और तमाम चीजें अपने आप साफ़ हो जायेंगी.

पर एक बात फिर भी साफ़ नहीं होगी. वह यह, कि आशीष नंदी जैसे ‘समाजवैज्ञानिक’ क्या कुछ भी कह सकते हैं? बिना किसी तार्किक आधार के? समाजविज्ञान भी विज्ञान होने का दावा करता है, अनुभवों के मापन पर चलता है. सो आशीष नंदी ने भी कुछ तो मापा होगा यह कहने के पहले कि ‘ज्यादातर भ्रष्ट ओबीसी और दलित समुदाय, और अब जनजातियों से भी आते हैं’. सिर्फ यही नहीं, इस बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने सबसे ‘साफ़ सुथरे’ राज्य बंगाल का उदाहरण भी दिया और कारण बताया कि आज तक वहाँ ‘कोई दलित, ओबीसी सत्ता के आस पास भटक नहीं पाया है’.
अब आइये जरा इस बयान को तर्क की कसौटी पर कसें. स्वतंत्रता के बाद से भ्रष्टाचार के सिद्ध/असिद्ध सबसे बड़े आरोपियों में से कौन कौन रहे हैं? कृष्ण मेनन, राजीव गांधी, नरसिम्हाराव, सुखराम, जार्ज फर्नांडीज, राम नाईक, सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, जे जयललिता, मनमोहन सिंह (चौंके मत कोल-गेट), नितिन गडकरी. आप चाहें तो इसमें बंगारू लक्ष्मण को भी जोड़ लें. अब बतायें नंदी साहब कि ज्यादातर भ्रष्टाचारी कहाँ से आ रहे हैं? और फिर, तथ्यतः गलत पाये जाने पर यह बतायें कि यह बयान भड़काऊ-बयान/हेट स्पीच क्यों नहीं है और इसके लिये आशीष नंदी पर कार्यवाही क्यों नहीं होनी चाहिये.

इस सवाल का जवाब बहुत कुछ साफ़ कर देता है. उन लोगों के चेहरे और असली पहचानें भी जिनको मायावती के तमाम बयान (सबसे निर्मम याद करें तो गाँधी को जूते से मारना चाहिये) असहनीय और घृणास्पद तो लगते ही थे पर साथ ही जिन्हें ऐसे बयानों के लिये मायावती को जेल भेजने से कम कुछ भी मंजूर नहीं था. आज उन तमाम लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता याद आ रही है, एक बुद्धिजीवी/समाजवैज्ञानिक के विशेषाधिकार नजर आ रहे हैं. वे तमाम लोग जो अकबरुदीन ओवैसी पर ‘हेट स्पीच’ के लिये मुकदमा चलाने के लिये मरे जा रहे थे वे सब अचानक असली लोकतंत्रवादी होनिर्बाध स्वतंत्रता के भाषण देने लगेंगे.

ऐसे लोगों से सवाल बहुत साफ़ है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नहीं, वह तर्क दीजिए जो या तो यह साबित कर दे कि दलित/पिछड़े समुदाय ही नहीं हैं इसलिए यह बयान किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, और अगर वे समुदाय हैं (जो कि हैं) तो यह कि आशीष नंदी का यह बयान हेट स्पीच न होकर एक तार्किक तथ्यात्मक प्रस्थापना(निष्कर्ष तो यह हो ही नहीं सकता) है अन्यथा नंदी साहब के ऊपर कानूनी कार्यवाही होने पर हाय तौबा न मचायें. मचायेंगे, तो भ्रष्टाचार से ज्यादा आपका जातीय चरित्र साफ़ दिखेगा. 

January 19, 2013

हम शर्मिंदा हैं मदीहा गौहर.

हम बहुत शर्मिंदा हैं मदीहा आपा पर यकीन करिये कि गलती आप की ही है. आप हिन्दुस्तान को जम्हूरियत वाला मुल्क मानती थीं तो इसमें बेचारे मुल्क की क्या गलती है? आपको क्या लगा था कि आप कलाकारों की इज्जत कर पाने का माद्दा है इस मुल्क में. क्या सोच के चली आयीं थी आप नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के थियेटर फेस्टिवल में? पिछली बार की तरह इस्तेकबाल होगा आपका? लोग हाथों हाथ लेंगे आपको? गलत सोचती हैं आप आपा.

पिछली बार की बात और थी. तब आप बुर्कावैगेंजा नाम का वहनाटक ले के आयीं थी जिसे पाकिस्तानी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था, बैन कर दिया था. अब पाकिस्तान के हुक्मरानों की जेहनी जहालत पर ऐसा तंज तो हमें गुदगुदायेगा ही ना. कितना अच्छा नाटक था वाह. कितने गंदे मौलाना थे. वाह वाह.

पर आपको ये किसने कह दिया कि हम पाकिस्तान से पीछे हैं? जिसने भी कहा, गलत कहा. हम पाकिस्तान से हर मामले में आगे थे, हैं और रहेंगे. जहालत में. तानाशाही में भी. फहमीदा रियाज याद ना आयीं आपको?
वही, तुम बिलकुल हम जैसे निकले भाई/अब तक कहाँ छुपे थे भाई/वोह मूर्खता वो घामड़पन जिसमे हमने सदी गंवाई /आखिर पंहुची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत बधाई  लिखने वाली फहमीदा आप. उन्होंने तो कब का पहचान लिया था हम लोगों को, आप कैसे चूक गयीं?

ओह, अब समझा. आप आपके ग्रुप की जेनयू में जिस लाहौर नहीं वेखिया वाली परफार्मेंस के बाद बहुत देर तक बजती रही तालियों और भीगी आँखों से धोखा खा गयी होंगी. गोली मारिये उन बेहूदों को. वहाँ के बाशिंदे ऐसे ही हैं सारे. गद्दार हैं सब के सब उस मदरसे वाले. प्रवीण तोगड़िया की चलती तो ताला लगवा देते वहाँ. उनकी तो सोच ही देश से उल्टी चलती है.पाकिस्तान परस्त हैं सब के सब. माओवादी.

पर उस परफार्मेंस में कुछ तो था आपा. मेरे जैसा बुद्धिजीवी भी भूल गया था कि वह सिर्फ एक नाटक देख रहा था, सच नहीं. कितनी बार तो हाथ गया था बगल में रखे गमले पर कि उस मौलाना को दे मारूं. नफरत हो रही थी उससे. क्या जबरदस्त अभिनय किया था भाई ने. ऐसे की अशोक सिंघल और अकबरुद्दीन ओवैसी की आत्मा एक ही शरीर में घुस गयी हो. फिर दो मिनट आपसे बात हुई थी (आपको याद भी न होगी) और तारीफ़ को लफ्ज़ न मिल रहे थे. हाँ आपको आपा कहने की हिम्मत जुटा ली थी कहीं से.

पर वो और वक़्त था आपा. अमन अमन, मुहब्बत मुहब्बत खेलने का वक़्त. और फिर बताया ही, जेनयू. उस नाटक के बाद बहुत गन्दा पानी गुजर गया है जमुना पे बने पुल के नीचे से. और पानी तो खैर पहले से भी गुजर  ही रहा था. आपको आमिर खान के बारे में तो पता ही होगा न आपा?  बहुत सरोकार वाले अभिनेता हैं. बड़े हीरो हैं हमारे मुल्क के. सरफ़रोश नाम की एक बहुत सुपरहिट फिल्म दी थी उन्होंने. अरसा पहले. देखिएगा, कभी वक़्त मिले तो. देखिएगा कि कैसे उस पार के मशहूर शायर को धीरे से जेहादी/दहशतगर्द/आतंकवादी में तब्दील कर देती है वह फिल्म. ये हिंदुत्व की राजनीति है आपा, फिल्म, टेलीविजन, पापुलर कल्चर, अर्नब गोस्वामी टाइप ऐंकर्स जैसे हज़ार रास्तों से आती है. बिलकुल वैसे जैसे आपके मुल्क में इस्लाम वाले आते हैं. खैर, जिक्र आ ही गया है तो एक और फिल्म आयी थी अभी अभी. दो हिस्से में. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर नाम था. उसे भी देखिएगा कि कैसे एक पूरी कौम को गुंडा बना देते हैं ये लोग.

खैर, सरफ़रोश के बाद भी बहुत कुछ हुआ था आपा. इतना कि आप यकीन न कर पाएंगी. उस फिल्म के ठीक बाद इस मुल्क में 'सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं पर सारे आतंकवादी मुसलमान क्यों होते हैं" जैसे सवालों का सिलसिला शुरू हो गया था आपा. फिर इस मुल्क ने एक "गलत पार्टी में सही आदमी अटल बिहारी बाजपेयी" को भी देखा था आपा. वो आदमी जो बाबरी ढहा दिए जाने को लेकर शर्मिंदा होने के पहले जमीन को समतल करना पड़ेगा जैसे बयान दे कर भी उदार बना रह सकता था. वह आदमी जो नरेन्द्र मोदी जैसे हत्यारे को गुजरात दंगों के समय 'राजधर्म निभाने" की सीख दे सकने के बाद गोआ में बड़े आराम से पूछ सकता कि मुसलमान दुनिया में कहीं भी शान्ति से क्यों नहीं रह सकते?

फिर ना आपा, इस देश की राजनीति में अन्ना हजारे जैसे भूलतः गांधीवादी भी आ धमके थे. ऐसे गांधीवादी जो हर दूसरी बात के जवाब में अपनी टोपी उतार के जख्म दिखाने लगते थे कि ये लीजिए साहिबान ये जख्म हमको पाकिस्तान ने दिये हैं. ऐसे गांधीवादी जो अजमल कसाब को चौराहे पर फांसी देने की मांग करते थे. इतना ही नहीं आपा, ये तो बिग बॉस जैसे बेहूदे, और बेवजह रियालिटी शो के खिलाफ सिर्फ इस बात पर प्रदर्शन पर उतर आते थे कि उनमे वीना मलिक जैसे पाकिस्तानी कलाकार भी मौजूद हैं. आपा, वन्देमातरम के नारों और भारत माता की तस्वीर वाले दूसरे गाँधी-तीसरे जेपी-और चौथे न जाने क्या वाले 'राष्ट्रनायकों' के दौर में आपने इस मुल्क में मंटोनामा जैसा नाटक लाने का सोचा भी कैसे?

आपा, हम जहालत में भी पाकिस्तान से बहुत आगे जा चुके हैं. आप तो न, बस वापस चली जाइये. और अब भी दिल में कुछ बचा हो तो भारत-पाकिस्तान के बयानात के बीच मनमोहन सिंह के "ठीक है" टाइप बयानात को याद कर लीजियेगा बस. और हाँ, हो सके तो जिन लाहौर नहीं वेख्या टाइप नाटक बनाना बंद कर दीजियेगा. वतनपरस्ती, राष्ट्रभक्ति, और देशभक्ति के दौर में असली परेशानियों से जूझने वाले ऐसे नाटक अच्छे नहीं लगते आपा.

अल्लाह हाफ़िज़, कि खुदा हाफ़िज़ तो आपके देश के फसादियों को भी  पसंद न आयेगा.





January 09, 2013

Manila Meanderings: Delhi’s Future Imperfect in fast forward


[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in the UTS Voice, December 16-31.]



It was 1 am in Manila and pitch dark out- side. Not the pitch dark as it used to mean in the stories of our grandmas, but the pitch dark that has come to define nights in modern metropolitan cities. Rather, it was not even of that sort. It was that kind of darkness that slowly descends upon the so-obviously-artificial and so pathetically impersonal buildings that house international airports across the world and then engulfs them in a yellowish light that sickens one more than soothing him or her.


Tired and sleepy, I had just come out of the Ninoy Aquino International Airport, Paliparang Pandaigdig ng Ninoy Aquino in Filipino, that serves travelers flying to Manila, the capital city of Philippines and was looking around for the placard that would have my name, most probably terribly misspelt as I had found more often than not. There was none, neither the placard, nor the person who was supposed to be there for taking me to my hotel. I looked around and around to find him and failed. There was I, stranded in a city I knew nothing of and forced to fend for myself in the dead of the night.


Quite obviously, the visit had not started quite on the note a regular traveler would want it to, but then, I was not a regular tourist either, I did not belong either to those from leisure class out on enjoying a break or the backpack- ing tribe out to explore a city, or even a country, on a shoestring visit. I was in Manila to participate in a workshop discussing food security in Philippines and a little ironically, even chairing a session as an ‘expert’. Ironically, because I am no expert on Philippines and knew nothing more than the basic history and political economy of the country but then such are the vagaries of international nongovernmental activism that makes experts out of rank outsiders.


The ironies did not stop there. I was stranded at the airport of the capital city of the country once referred to as the ‘pearl of the orient’ for the central location it held in the pacific ocean and was now reduced to not a very flattering position of being the main supplier of manual labour, domestic help to be precise, to places like Hong Kong. Being a member of the human rights community, I was destined to meet many of them regularly and had learnt, to my horror, that several of them were trained professionals like software engineers unable to find a job in their country. Needless is to say now that it is not going to be a regular travelogue. It just cannot be.


It was 2 am now and I, having finally managed to hire a cab to my hotel, was on my way to a much required sleep. Outside the windows of the cab were dimly lit to washed out in white floodlight buildings not inferior to even the best, worst in fact, jungles of concrete that dominate the skyline of any major urban centers of the contemporary world and this was unsettling me to the core. Whom did these skyscrapers belong to? Did the Filipinos working in Hong Kong as housemaids came from the same country which had the money, and technology, to erect such ugly but functional buildings?


Similar was the maze of the roads my cab- bie was taking me through. They seemed to come straight out of posters that dominated the election campaign of the person allegedly responsible for the worst organized pogrom of Muslims in India since partition and who was now trying to have an image makeover of being a ‘Vikas Purush’; Development Man for those who need a translation. Many thousands nautical miles and a few oceans away, quite evidently, he was doing the same which the ruling classes had achieved here more than a decade ago. Philippines was one of the very first countries that had succumbed to the dik- tats of the Bretton Woods Institutions, International Monetary Fund and the World Bank to be precise and embarked upon a path of economic destruction sold out to them as the panacea for all their economic woes.


They had lapped the opportunity up and soon turned into ‘Tiger Economies’ and equally sooner crashed like a house of cards. The irony hidden in all this was unmistakable, what else could happen to economies referring them- selves as tigers, an endangered species that dominated the wildlife once, and is now at the verge of getting extinct because of the greed of the humans. Well, as this article is neither about economies nor tigers, I would not bore you anymore and would get back to Manila.


Next morning, I found myself waking up to a bright sunny day, such a welcome break from the biting chilly winds that starts piercing Hong Kong since early November, and came out of the hotel to soak in some sun. I was not to find any. It was a jungle of concrete denser than I had ever been in, and I have been in quite a few. There were malls, malls and more malls everywhere. Yes, Philippines, the world suppli- er of housemaids is also the country that has a man with a vision. The vision of opening malls, named SM Malls in fact in every neighbour- hood of the city. Never mind whatever this vision would do to the small grocery stores that operated on the principle of faith and saved food security of the poorer families by selling to them on credit.


I was thinking about the debate on foreign direct investment in retail that was taking place in my country. No, I had not come across a single Walmart superstore in any of the Filipino cities I roamed around, stayed in or simply passed by over my two week stay in Philippines. There were none, not in Cavite, in Paranaque, in Quezon, in Makati. That did not mean a thing though. There were SM malls. They sold everything, from stationary to steel utensils and from fridges to frozen food. They sold ‘fresh’ vegetables as well. Those cauliflowers packed in transparent plastic looked fresh, very fresh indeed.


Vying with SM Malls was the omnipresent golden arches of McDonalds. The Spaniards that colonized the country were long gone. Long gone were, also, the Americans that came after the Spaniards. Imperialism did not go back with them though, it was here to stay. It was to stay in the form of the charm offen- sive of these arches that sold rice, of all things, along with their burgers. Vying with McDonalds, in turn, were Jollibee’s, Shakey’s, and whatnot’s. All of them were big chains and not stand alone shops that sell their stuff based on the reputation built over years.


Of course, there were stand alone shops in poor neighbourhoods. They are bound to be there for the region is also a home for people compelled to live in Boathouses, however romantic that may sound, with no electricity and water. It is home to melancholically named Freedom Islands going to be demol- ished soon. It is home to workers toiling hard in Cavite, the biggest Special Economic Zone in Philippines. The government, though, calls them Export Processing Zones and ensures a continuous supply of labour to the factories in them even if that comes at a cost of forcing the workers to live in dungeons.


These workers need to eat, even if merely for ensuring that they are fit enough to work and reproduce a future generation of cheap and expendable labour force and because they need to eat, and dress, there would be shops catering to them as well. However much you listen to Corporate Social Responsibility crap, rest assured that those shops would not be run by any McDonalds or Jolibee’s or even a watered down version of them. They would be shops of the underclass. I did manage to explore that side of the fence, but more about them in the next part.