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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 21, 2013

दुःख की भाषा

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 07-12-2013 को प्रकाशित] 
ऑफिस की सामान्य मीटिंग्स में बैठे हुए फोन पर आये सन्देश ने अन्दर तक दहला दिया था. हम लोगों का बड़े भाई जैसा दोस्त खुर्शीद अनवर नहीं रहा. उसने आत्महत्या कर ली थी. यह खबर सच नहीं लगी थी, बिलकुल भी नहीं. तीन महीनों से उसकी जान बचाने के लिए लड़ रहे थे हम सब, नहीं वह ऐसा नहीं कर सकता. पर फिर सच को आपके लगने से क्या मतलब? 
और फिर खाली आँखों में उतर आये आंसुओं के साथ समझ आया था कि परदेस में सबसे बड़ा दुःख होता है अकेले रहना और फिर उनमें भी निजी त्रासदी के ऐसे पल निकालना. दुःख के पल निकालना. वे पल जब आप अन्दर से टूट रहे होते हैं और कोई कन्धा नहीं होता आपके पास. आपकी मेट्रो में भर भर आ रही आँखें आपके लिए सहानुभूति नहीं कौतूहल का बायस बनती हैं. 
बेशक आंसुओं की कोई भाषा नहीं होती, उन्हें सब समझते हैं. पर फिर आंसू पोंछने के लिए बढे हाथों को तो भाषा की जरुरत पड़ती है न, वरना कैसे बाँट पाएंगे आप उनसे अपना दुःख. इससे भी ज्यादा त्रासद है फिर यह देखने को मजबूर होना कि दिसंबर माने वर्षांत में आपके पास रोने के लिए भी छुट्टियाँ बची हैं या नहीं. क्या करेंगे फिर आप?
पर फिर घर रह कर और अकेला ही हो सकते हैं आप सो बाहर निकल पड़ा. निरुद्देश्य भटकते हुए भीग भीग जाती आँखें लगातार बस एक ही चीज ढूंढ रही हैं, किसी दोस्त का कंधे पर हाथ. डबलडेकर बस की ऊपरी डेक पर बैठे हुए साथ चलता जो समन्दर हमेशा बहुत प्यारा लगता रहा था आज अपना सारा नमक ले मेरी आँखों में उतर आया था. 
सोचा कि और लोग कैसे झेलते होंगे ऐसे बड़े आघात पर फिर पूछता भी तो किससे? पर दुखी तो यहाँ भी होते होंगे लोग? जीवन का नियम है अपनों का एक दिन चला जाना. इनकी तो संस्कृति भी हमारे जैसी नहीं है कि नाते रिश्तेदारों से लेकर मोहल्ले वाले तक सुख दुःख दोनों में लगभग अवैध अतिक्रमण की हद तक घुसे रहते हों. यहाँ तो ज्यादातर लोग बड़ी दुनिया के भीतर अपनी बहुत छोटे सी निजी दुनिया बना लेते हैं जिसमे बहुत कम लोग होते हैं? परिवार और बहुत करीबी कुछ मित्र. अपने गाँव में ही मुश्किल से किसी को किसी से बात करते देखता हूँ. वह भी बावजूद इस सच के कि अपना गाँव पूरा ‘मिस्टर और मिसेज चैन’ लोगों का गाँव है, माने यहाँ सब किसी जमाने में एक ही रहे कुनबे के वंशज हैं.  
बेशक कुछ सामाजिक उत्सव हैं जब वह एक साथ बारबेक्यू करते हैं, नाचते गाते हैं पर ऐसे अवसर बहुत कम होते हैं. फिर हांगकांग की पागलों की तरह भागती जिंदगी इतना मौक़ा भी कहाँ देती है. सुबह ऑफिस के लिए भागने से शुरू हो गयी शाम घर पंहुचने वाली इन जिंदगियों में परिवार के लिए ही वक़्त निकालना मुश्किल होता है फिर लोग समाज के लिए कैसे निकालें. 
हाँ, कुछ आप्रवासी समुदाय इस मामले में बहुत बेहतर हैं. उनके यहाँ दुःख की किसी घडी में पूरा का पूरा समुदाय साथ आ खड़ा होता है. इस मामले में सबसे बेहतर फिलीपीनी हैं पर नेपाली, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी भी कुछ कम नहीं है. हाँ सबसे बुरे में बेशक हम भारतीय जो वस्तुतः एक समुदाय हैं ही नहीं पहले पायदान पर खड़े होंगे. यहाँ मैंने बंगाली एसोशियन देखा है, पंजाबी देखा है, गुजराती देखा है पर भारतीय नहीं देखा. वैसे देखा तो उत्तर प्रदेश और बिहार का भी नहीं है पर उसका जिक्र फिर कभी. 
किसी गुजर गयी साथी घरेलू नौकरानी साथी के शरीर को फिलिपीन्स भेजने के लिए अपने बहुत नाकाफी से वेतन से भी पैसे इकठ्ठा करते हुए देखा है और नशे में किसी से टकरा गए दक्षिण भारतीय के साथ थाने में बैठे उसके दोस्तों को भी. एक बात जो हमेशा चौंकाती है वह यह भी कि त्रासदी के इन पलों में कैसे वही लोग चट्टानी एकता के साथ खड़े हो जाते हैं जो बहुत छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे से लड़ते रहते थे, जलते रहते थे. 
अनजाने में ही मैं फिर चुंगकिंग मेंशन पंहुच आया था. शायद मन में कहीं यह विचार छिपा रहा हो कि अपने निजी दुःख की इन घड़ियों में अपने समुदाय को कम से कम देख पाना भी दुःख थोड़ा तो कम करेगा, थोड़ा तो संभालेगा. जिस दुकान से ज्यादातर घरेलु सामान खरीदता हूँ उसके मालिक के यह पूछने पर कि सब खैरियत, ठीक नहीं लग रहे आप शायद थोडा संभला भी. पर उनको क्या बताता कि गलत किया खुर्शीद भाई ने, उन्हें लड़ना था आरोपों के खिलाफ. लड़ाई अधूरी नहीं छोडनी चाहिए थी कामरेड को. 

लौटते हुए मन में खुर्शीद भाई की यादों के साथ वही खयाल भी था कि चीनी लोग दुःख कैसे सहते हैं.   

December 14, 2013

प्रतिगामी है यौनिक स्वातन्त्र्य के खिलाफ फैसला

[दैनिक जागरण में  यौन स्वतंत्रता का सवाल शीर्षक से 14-12-2013 को प्रकाशित] 

प्रतिगामी, दुराग्रहपूर्ण, मध्ययुगीन, पूर्वाग्रही- दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के फैसले को उलट समलैंगिकता और अन्य यौनिकताओं को फिर से गैरकानूनी बना देने के अपने फैसले पर समाज के साथ साथ राष्ट्रीय मीडिया से ऐसी कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद शायद सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं की होगी. पर फिर लगभग पूरी तरह से भ्रष्ट कार्यपालिका और नौकरशाही की आपराधिक अयोग्यता से त्रस्त भारत में न्यायिक सक्रियता के रास्ते आम जनता के लिए इन्साफ की नयी आस बन कर उभरी न्यायपालिका रोज ऐसे प्रतिगामी फैसले देती भी नहीं. विक्टोरियन नैतिकता के प्रतिमानों पर 1861 में बने एक क़ानून को वापस ला लाखों समलैंगिक और क्विर नागरिकों को सहमति के संबंधों की वजह से अपराधी बना देने वाला यह फैसला बेशक अलोकतांत्रिक और असहनीय है. ख़ास बात यह भी कि इस फैसले में यौनिक स्वातंत्र्य का सवाल पूरी तरह गायब दिख रहा है.  आखिर को दो बालिग़ व्यक्तिओं का अपने निजी दायरे में रह कर सहमति के सम्बन्ध बनाने के मुद्दे पर पर निर्णय का अधिकार सिर्फ उनका हो सकता है. 
ख़ास बात यह कि अगर क़ानून बदलना और बनाना विधायिका का काम है और हम सिर्फ कानूनों की व्याख्या कर रहे हैं कहते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कर दिया है कि वह खुद अपने फैसले से असहज है. पर क्या सच में कानून बनाना सिर्फ विधायिका का काम है?  ७० के दशक में संपत्ति के अधिकार की सार्वभौमिकता को लेकर उठे सवाल से उपजे संविधान के बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत से साफ़ है कि नहीं. 20वीं सदी के अंत में भाजपानीत राजग सरकार के संविधान समीक्षा के प्रयास से फिर जिन्दा हुई इस बहस में सर्वोच्च न्यायालय ने बारहा साफ़ किया है कि क़ानून बनाने का विधायिका का अधिकार अंतिम नहीं है और वह किसी भी हाल में संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ नहीं जा सकती. फिर नुक्ते का अतिक्रमण करने वाले कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय संसद के अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) बता कर निरस्त भी कर सकता है. इस अधिकार के दायरे में औपनिवेशिक काल के क़ानून भी आते हैं.  इसके उदाहरण ढूँढने हों तो दूर नहीं जाना पड़ेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में ही अपने ऐतिहासिक आदेश में जनप्रतिनिधित्व क़ानून (आरपीए) के संसद के ही बनाए उस प्रावधान को रद्द कर दिया था जिसके तहत दोषी सांसदों और विधायकों को निचली अदालतों में दोषसिद्ध और सजायाफ्ता हो जाने के बाद भी ऊंची अदालत में अपील करने तक अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता था. 
अफसोसनाक है कि न्यायिक सक्रियता को लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के राजनैतिक नेतृत्व की आलोचना झेलने वाली न्यायपालिका ने वहीँ सक्रियता नहीं दिखाई जहाँ उसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी. इस क़ानून की न्यायिक समीक्षा की अपनी जिम्मेदारी को संसद के पाले में डालने की जगह वह कमसेकम इसे एक बड़ी संवैधानिक पीठ के हवाले तो कर ही सकती थी. फिर सवाल यह है कि उसने ऐसा किया क्यों नहीं? दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस क़ानून को संविधान संरक्षित कम से कम दो मौलिक अधिकारों, विधि के समक्ष समानता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 14 और अन्य प्रतिमानों के साथ साथ लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध करने वाले अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करने वाला पाया था. कहना न होगा कि उच्च न्यायालय ने ठीक ही माना था कि लैंगिक भेदभाव में यौनिकता के आधार पर भेदभाव स्वतः शामिल हैं. फिर यह क़ानून मौलिक अधिकारों का उत्स कहे जा सकने वाले अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है जो सभी भारतीय नागरिकों को खुद सहित किसी अन्य को नुकसान न पंहुचाने वाले निजी जीवन के निर्णयों में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का अधिकार देता है. 
इन सब कानूनी नुक्तों को छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय मानवीय अंतर्संबंधों की देशकाल आधारित अंतर्संबंधों की गतिकी के भी खिलाफ खड़ा है. सर्वोच्च न्यायालय को याद रखना चाहिए था कि वर्तमान विधि व्यवस्था को जन्म देने वाले राष्ट्रराज्यों की शुरुआत के दौर में लगभग पूरे यूरोप में गैरकानूनी मानी जाने वाली समलैंगिकता को नीदरलैंड  ने 1811 में ही विधिसम्मत मान लिया था. यह भी कि आईपीसी 377 के जन्मदाता ब्रिटेन में भी इसे 1967 में ही गैरआपराधिक करार दिया था. फिर यौनिकता के अधिकार को वर्तमान परिदृश्य में समझने के लिए यह याद कर लेना भी काफी होना चाहिए था कि खुद दक्षिण एशिया में नेपाल जैसे परम्परावादी देश ने 2007 में ही समलैंगिकता को कानूनी मान लिया था. धार्मिक मान्यताओं के अन्दर भी यौनिकताओं के सवाल पर लगातार बहुलवादी हो रही है. याद करें कि अभी हाल में ही दुनिया के सबसे बड़े धर्म ईसाइयत के नेता पोप फ्रांसिस ने यह पूछकर धमाका कर दिया था कि अगर कोई समलैंगिक कैथोलिक आस्तिक है तो वह उसकी यौनिकता पर सवाल उठाने वाले कौन होते हैं? दुखद है सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिगामी फैसला तब लिया है जब धार्मिक समूह भी उनकी मूल मान्यताओं के बिलकुल खिलाफ जाती यौनिकताओं को स्वीकार करना शुरू कर चुके हैं. माननीय न्यायालय को समझना चाहिए कि विविधताओं के साथ बराबरी को मानने वाली आधुनिक चेतना को मध्ययुगीन भेदभाव के दौर में वापस नहीं भेजा जा सकता. 
पर यह सब कह चुके होने के बाद हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि लोकतान्त्रिक और बहुलवादी मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों को समलैंगिकता  को  (और अन्य सभी यौनिकतायें) जेनेटिक और इसीलिए ‘प्राकृतिक’ होने की वजह से ही नागरिक अधिकार मानने का तर्क देने से बचना चाहिए. वस्तुतः प्राकृतिकता का यह सिजोफ्रेनिया से लेकर सब कुछ को 'जेनेटिक' बनाने में लगी बाजारी ताकतों की साजिश के साथ जा खड़ा होता है. साथ ही बहुलवादी यौनिकताओं को अपनी सभ्यता के गौरवशाली अतीत का हिस्सा, शास्त्रसम्मत और पारंपरिक बताने जैसे तर्क भले ही वक्ती तौर पर फिलहाल समलैंगिकता को धर्मविरोधी अनैतिकता से लेकर बीमारी तक बताने वाले सभी धर्मों के कट्टरपंथियों को जवाब देना आसान करें, लम्बे दौर में यह तर्क भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ खड़े होंगे. समलैंगिकता अगर किसी एक धर्म की परम्परा या किताबों में हो भी तो वह अन्य धर्मों को कैसे मान्य हो जायेगी? या परम्परा का हिस्सा न होने की स्थिति में भी अगर कोई धर्म आगे बढ़कर यौनिकता की स्वतंत्रता स्वीकार कर ले जैसे अभी हाल में कैथोलिक चर्च ने किया तो उससे इसकी कानूनी स्थिति पर क्यों फर्क पड़ना चाहिए? धार्मिक मान्यता न होने की कसौटी से ही नागरिकों के निजी अधिकारों का हनन किया जा सकता है? 
भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ का क़ानून धार्मिक आधारों पर नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित विधि के शासन के अनुरूप होना चाहिए. और विधि के शासन में सभी बालिग़ नागरिकों को किसी को नुकसान पंहुचाने वाली आपराधिक गतिविधियों में लिप्त न होने पर दैहिक और जीवन की अनुल्लंघनीय स्वतन्त्रता प्राप्त होती है, होनी चाहिए. 

विधि के शासन पर आधारित यही क़ानून व्यवस्था बनाये रखना और उसे तोड़ने वालों को सजा दिलवाना राज्यसत्ता का काम होना चाहिए, दो व्यक्तियों के बीच सहमति से बने संबंधों की पहरेदारी करना नहीं. यही वजह है कि अदालत का यह फैसला नैतिक और विधिक आधारों पर गलत ही नहीं है बल्कि इसकी संदिग्ध संवैधानिकता वाला भी है. धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर नैतिकता के दावे से लैस बहुमत की की तानाशाही का खतरा लोकतान्त्रिक समाजों को भीतर से मिलने वाली सबसे बड़ी चुनौती होता है. बहुमत को खुश रखने को मजबूर विधायिका वाले इन समाजों में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा कीजिम्मेदारी न्यायपालिका की ही बनती है. फिर हमले चाहे कितने ही पूर्वाग्रहपूर्ण क्यों न हों, न्यायपालिका उन्हें सांवैधानिकता की कसौटी पर कस निर्णय लेने को वचनबद्ध है. अफ़सोस है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय यौन अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने से चूक गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वह और सरकार दोनों इस गलती को जल्द से जल्द सुधार लेंगे. 

December 10, 2013

Asia: Economic Powerhouse that is Home to Hunger.

[This is an AHRC Statement on The State of Hunger in Asia, 2013]

The tale of hunger in Asia is a troubling one. It tells of people who have slipped through the cracks. Such people, citizens, supposed to enjoy the universal human rights promised to all human beings, have become invisible. While their states celebrate extraordinary tales of economic growth, the victims are left behind; a cursory glance at the recent stories of growth and development in these countries shows how inequitable it has been for those at the margins of society. Many hardships are faced to access what should be theirs as a matter of right.
In 2013, the AHRC has worked to support the right to food for all, through its Right to Food desk. These efforts include active engagement in varying degrees with six Asian countries throughout the year. These countries are India, Nepal, Pakistan, Bangladesh, the Philippines and Indonesia. The idea central to the right to food programme is to alter the dominant discourse in these countries, one that sees right to food as a non-justiciable right, so it may instead be considered an inalienable part of the right to life with dignity.
To this end, AHRC's Right to Food desk has documented, researched, and analyzed data from these countries, and other sources, in an effort to create comprehensive understanding of the challenge that hunger presents. Today, on Human Rights Day, the Asian Human Rights Commission releases its first State of Hunger in Asia Report, 2013. The report collates and sifts the most critical learning from the year. The report may be accessed online here.
In many countries a substantial section of the population stands at the threshold of poverty and food insecurity due to skewed development policies adopted by their governments. The Philippines are one such example. Another case is India, where there is neglect of communities, which are socially and economically exploited and discriminated against on the basis of caste. Apart from these socio economic factors which influence food security, the geographical terrain and lack of access to remote regions plays an important role in regarding poverty and hunger in countries like Nepal where the plains are better off than the mountains because of greater accessibility. Social stratification plays itself out even in these regions and the dominant groups and communities are found to be much better-off compared to the vulnerable and excluded ones.
In the case of Bangladesh, overall improvement in human development indicators do not necessarily mean a reduction in extreme levels of poverty; on the contrary, reports suggest an increasing number of the people are likely to slide into poverty in the coming years due to the faulty policies and programmes pursued by the state. While the nature of the problem of hunger and food insecurity manifests itself differently in various countries, it would not be too far-fetched to generalize that hunger, malnutrition, and poverty continue to remain a constant challenge for Asian countries to reach their goals of development and equitable growth.
Ironically, hunger and extreme poverty do not persist because of the states' failure to recognize them as real issues. Rather, what is clear from the policies and plans of these countries is the complete neglect and insensitivity of the states towards the conditions of a majority of their population. This is seen when the governments choose to pay heed to the concerns of a small but influential minority when deciding their development plans. Thus, the collaboration with private partners, export of agricultural products, and undertaking of "development projects" takes place to cater to this influential minority and to attract tourism, while often harming the interests of local populations.
Left with no other alternative, they are forced into multiple types of migration ranging from distress to wandering in a quest of survival and employment. Stories of these distress migrations play themselves across Asia, be it exodus to Metro Manila in Philippines, people flocking to sweatshops in Dhaka, or those who simply go missing from government records in India. Aggravating these forced movements are unemployment, poverty, lack of education and health facilities, and a general poor standard of living and working conditions in the places they reach. Often, the places where they migrate have no need of them, and they are forced to try to adapt without assistance. This makes the hardship even more difficult as it has a direct impact on their capacity to access health, education, housing, and other basic needs.
The problems are often compounded by the neoliberal model of development, shoved down the throats of some of the governments while happily adopted by others, that has led large sections of national populations to become impoverished by forcing the states into withdrawing programs from welfare schemes to services delivery systems. Suspension of hard earned labour rights in what is referred to as "special economic zones" in India or "export processing zones" in Philippines has also played a crucial role in disenfranchizing much of the labour force, stripping their rights away.
Among the factors perpetuating food insecurity in the region, faulty prioritization of concerns by national elites requires special analysis. Nepal is a key illustration of the quest of political democracy pushing everything else, the question of hunger included, into the background. The country has been in the "transition" for too long with the political leadership letting large sections of its population starve. The problem here, though similar to other countries, is aggravated by transnational migration of large segments of the male population into neighbouring India leaving the womenfolk behind to fend for themselves.
At the ground level, the issue is exacerbated by delivery mechanisms which are weak and not transparent. The fact that corruption is prevalent across Asia is internationally accepted; most of the funds meant for the impoverished does not reach them intact. Embezzlement and malfeasance throughout the system are part of life in many of these countries and allow only a small amount of funds to actually reach the intended beneficiary. This is further complicated by lack of transparency in the system wherein no proper checks and balances are maintained.
Most of these countries have ratified or are a signatory to many international covenants which make it mandatory for them to ensure that their citizens are provided with basic rights. In addition, the constitutions of these countries also provide for a right to life and livelihood, though the exact nature of this may vary. Yet, despite being bound by these covenants, the governments choose to ignore the real challenges facing its citizens. In order to address these issues, many organizations and campaigns in various countries have been fighting for food security. They have been pressuring the governments to make food security possible for its citizens. In the case of India, this resulted in the passing of the food security act in 2013. Though it has many limitations, such an act is definitely a positive step given the widespread hunger, malnutrition, and death in the country.
Addressing the problems of transparency, corruption, policy planning, grievance redressal mechanisms, and feedback remains central to making food security a reality. In short, the basic objective is to radically restructure the discourse on right to food and make it a right of the people. This can only be achieved through a relentless focus on building an honest delivery mechanism with corresponding mechanisms for addressing failures. Only in the presence of a strong initiative by the governments of these countries to build a strong, comprehensive, mechanism can food security be achieved. In the absence of this, the contradictions of growth and inequity, development and poverty will only continue to deepen the crisis already threatening these countries.

December 07, 2013

मेट्रो में मंडेला (हांगकांग 7)

[दैनिक जागरण में अपने पाक्षिक कॉलम 'परदेस से' में 07-12-2013 को प्रकाशित]


सुबह-ए-हांगकांग भी कमाल शय है. बेतरह, लगभग बेसबब भागते हुए भी कहीं न पंहुचने वाली सुबहें. रोजबरोज मिनी बसों से लेकर डबल डेकर बसों से होकर मेट्रो जिसे यहाँ एमटीआर कहते हैं से टकराने की सुबहें. अपने साथ भागते कुछ अजनबी चेहरों के पहले आशना होने और फिर उनसे मुस्कुराहटों का रिश्ता बन जाने की सुबहें. और अचानक उनका दिखना बंद कर देने पर इस भारी अहसास की सुबह कि हमने तो उनका नाम तक नहीं पूछा था. सोमवार से शनिवार तक भागते हुए ऑफिस पंहुचने की वह सुबहें जो बेपनाह भीड़ का समन्दर पार करने की यातना और अपने घर की तन्हाई से निकल जिन्दा इंसान देखने के सुकून के बीच डोलती रहती हैं. हफ्ते भर भागना और फिर इतवार को नींद पूरी करना, यही तीन तरफ समंदर और चौथी तरफ चीन से घिर फ़ैल न पाने को मजबूर इस शहर की ऊँची होती जा रही इमारतों में कैद बाशिंदों की नियति है. इसीलिए बाकी विश्व नगरों का पता नहीं पर हांगकांग की सुबहों में सूरज नहीं बस सफ्ताहांत का इन्तेजार होता है.

इन सुबहों में अक्सर उनींदी आँखों में भरे सपनों वाली उन लड़कियों से मुठभेड़ हो जाती है जो तिल रखने की जगह न होने की हद तक भरी मेट्रो में भी मेकअप पूरा करने की जगह ढूंढ लेती हैं. उन अधेड़ होते जोड़ों से भी जो साथ साथ अलग ऑफिसों की तरफ भागते हुए घरेलू काम बाँट लेते हैं. इन सुबहों में कोई कोना पकड़ अपने प्लेस्टेशन में इस कदर डूबे लड़के भी होते हैं जो हर रोज अपना स्टेशन छूट जाने से ठीक पहले हडबडाहट में उठते हैं और लगभग कूदते हुए बाहर जा रही भीड़ में खो जाते हैं. पर फिर इन सुबहों का सबसे खूबसूरत बिम्ब होते हैं प्यार में डूबे हुए वे जोड़े जिनके लिए अपने सिवा और कुछ नहीं होता.

इतने सारे दृश्यों में अक्सर एक दृश्य साझा होता है, मेट्रो में चल रही टेलीविजन स्क्रीनों को देख रही उचकी हुई गर्दनों का दृश्य. वह स्क्रीन जिसपर सिर्फ कैंटोनीज भाषा में आ रहे विज्ञापनों, फ़ुटबाल मैचों और घुड़दौड़ों के बीच कभी कभी  वह खबरें भी आ जाती हैं जो न आतीं तो वह डब्बा हमें बस लोरी सुनाने वाली मशीन भर लगता. कमाल यह कि इन खबरों के आने का पता हमें स्थानीय निवासियों के सर घुमा लेने से चलता है. उनकी निगाहें स्क्रीन से हटीं तो समझ जाइए कि खबरों का वक़्त है और फिर सिर्फ दृश्यों के आधार पर खबर क्या है का अंदाज़ लगाइए. इतने सालों की समझ का हासिल है कि कोई टाइफून या बड़ा सेलेब्रिटी न आ रहा हो तो इस शहर को सच में खबरों की ज्यादा परवाह नहीं होती. शायद इसलिए भी कि यहाँ या तो अखबार बहुत मंहगे बिकते हैं या फिर विज्ञापनों के बीच शहर की एकाध खबरें देने वाले मुफ्त बांटते हैं.

आज मगर और दिन था. उचकी गर्दनों को नीचे न आते देख चौंक स्क्रीन पर देखा तो पहले जैकब जुमा और फिर नेल्सन मंडेला नजर आये और फिर भाषा की जरुरत ही नहीं रही. यही खबर थी मन जिससे महीनो से बचना चाह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर को न देख सके हम जैसे लोगों के लिए मंडेला इस युग के अंतिम महानायक थे. वह 37 साल लम्बी कैद जैसी यातनाएं झेल भी रंगभेदी सरकार से जीवन भर लड़ उसे परास्त करने वाले ऐसे योद्धा थे जिनमे जीत के बाद दुश्मन को माफ़ कर एक नयी शुरुआत कर सकने का नैतिक साहस था.

पर फिर ख्याल आया कि खबर बड़ी है सो टीवी पर है पर ये हांगकांग को क्या हो गया? अपनी भौतिक सुविधाओं में डूबे रहने वाले इस शहर की आँखों में मंडेला के लिए ऐसी मुहब्बत किन राहों से और क्यों कर पैदा हो गयी होगी? हांगकांग तो आखिर क्रिकेट भी नहीं खेलता, आईसीसी खेलने वाली यहाँ की टीम में तो बस दक्षिण एशियाईयों से ही बनती है. नजर फिर घुमाई और गर्दनें अब भी उचकी हुईं थीं. यह मंडेला की ताकत थी. एक ईमानदार लड़ाई लड़ जीत हासिल कर मिसाल बन जाने की वह ताकत जिसका असर तीन समंदर पार हांगकांग पर भी था.


या यह हांगकांग की भी ताकत थी. आखिर को सतह पर पूरी तरह गैरराजनीतिक इस शहर में कुछ तो है जो इसे राजनैतिक अधिकारों के प्रति उन्माद की हद तक संवेदनशील बनाये रखता है. कुछ तो है जो निजता के अधिकार की रक्षा के लिए अमेरिकी सरकार से लड़ जाने वाले एडवर्ड स्नोडेन को उसके यहाँ सुरक्षित होने का यकीन दिलाता है. कुछ तो है जो फिर हांगकांग प्रशासन पर बढ़ते अमेरिकी दबाव को देख तूफानी बारिश वाले दिन हजारों हजार निवासियों को स्नोडेन के समर्थन में सड़कों पर उतार लाता है. काश, यह चेतना सारी दुनिया में फ़ैल जाए सोचते हुए अपना स्टेशन आ गया था. और आज बाहर निकल ऑफिस की तरफ बढ़ते हुए हांगकांग थोड़ा और अपना, थोड़ा और प्यारा लगने लगा था. 

November 24, 2013

यहाँ तारे नहीं दिखते.... (हांगकांग 6)

मैंने कभी तारे नहीं देखे, समंदर में तिरती हजारों रोशनियों को देखती हुई ऐमी ने 
अचानक कहा था. सारे तारे रात में हमारे शहर में उतर आते हैं, मेरी निगाहों में सवाल उठें उसके पहले ही जवाब भी हाजिर था. हम पर्यटन मानचित्र पर हांगकांग का हस्ताक्षर समझे जाने वाले विक्टोरिया हारबर पर बैठे थे और दुनिया का शायद सबसे ज्यादा देखा जाने वाला लेजर लाइट शो ‘सिम्फनी ऑफ़ लाइट्स’ बस शुरू होने को था. दुनिया भर के पर्यटकों से भरे हार्बर का ऊपरी व्यूइंग डेक रौशनी का नृत्य शुरू होने के पहले ही दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों और खनकती हंसी से भर गया था. आधे घंटे में शहर का इतिहास समेटे इस प्रदर्शन को लगभग चमत्कृत भाव में देखते हुए हमारे ठीक पीछे खड़े एक रूसी जोड़े ने एक दूसरे को बाहों में भर लिया था.


जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों से सपनों की दुनिया में उड़ा ले जाने वाला यही भाव हांगकांग का स्थाई भाव है. एक शहर जो हकीकत कम सपनों में ज्यादा जीता है. लोग जो आसमान चूमती इमारतों के क्यूबिकल्स में फंसे बोझिल दिनों में शाम का इन्तेजार करते हुए जीते हैं. रात उतरने के साथ साथ कन्धों से टकराते कन्धों से भर जाने वाली सड़कें जिनपर चलना मुश्किल हो जाता है. मोंगकाक, जॉर्डन और तमाम जगहों में गुलजार हो जा वाले ओपन एयर रेस्टोरेंट्स जिनमे बत्तख से लेकर सांप तक सब मिलता है पर शाकाहारी भोजन की तलाश कस्तूरी मृग के सुगंध तलाशने से भी बड़ी कवायद साबित होती है. सात सौ वर्ग फीट की जगह को महल समझने वाले शहर में खुलेपन की यह तलाश ही है जो मुझे अपनी सहकर्मी के साथ अगला दिन काम का होने के बावजूद विक्टोरिया हारबर खींच लाई थी.

रात गहराने के साथ साथ और रौशन हो रहे हांगकांग में हम हारबर से ‘एवेन्यु ऑफ़ स्टार्स’ होते हुए एमटीआर (मेट्रो) स्टेशन की तरफ बढ़ रहे थे. तुम्हे पता है, दुनिया में हमारे ब्रूस ली से बड़ा कोई अभिनेता नहीं हुआ, ऐमी फिर बोल पड़ी थी. अभिनेता का पता नहीं, हाँ मार्शल आर्ट्स का वैसा इस्तेमाल करने वाला कोई जरुर नहीं हुआ मैंने जोड़ा था. खंडित मूर्तियाँ में सदी के महानायकों की तलाश करने को अभिशापित देश से आने वाले मुझ जैसे शख्श को ब्रूस ली के चले जाने के इतने बरसों बाद भी मिलने वाला शहर का प्यार अचंभित करता रहा है. अक्सर लगता है कि हारबर पर मौजूद उस मूर्ति की मुद्रा में तस्वीरें खिंचवाते तमाम लोगों की आँखों में मैंने पानी उतर आया देखा है.

एमटीआर पर ऐमी से विदा लेते हुए अपने जेहन में हिन्दुस्तान के तमाम शहरों में की गयी आवारगी दोहराने का खयाल तारी हो आया था और कदम ‘गोल्डन माइल’ कहे जाने वाली नाथन रोड पर बढ़ चले थे. रात के ११ बजे भी रोज तरह गुलजार सड़क पर एक दूसरे में खोये हुए जोड़े थे, अगली सुबह के काम के बोझ के ख्यालों में डूबे बहुत तेजी से बस स्टैंड्स की तरफ बढ़ते कदम थे, बंद हो गए स्टोर्स के बाहर खड़े सिक्योरिटी गार्ड्स थे, सालों पैसे बचा दुनिया घूमने निकल पड़े यूरोपियन और अमेरिकी बैकपैकर्स थे. और हाँ, प्रवासी पक्षी, यानी कि तंग जींस और टीशर्ट में घूमती सेक्स वर्कर्स थीं और उनपर आतुरता से पड़ती पर्यटक निगाहें थीं. ज्यादातर फिलीपीना यह लड़कियां बिना शक हांगकांग के सबसे बदनाम, या मशहूर, रेड लाइट जिले वानचाई में आज ग्राहक न मिल पाने की वजह से इधर निकल आयी होंगी, मैंने सोचा था. अरसे से सोच रहा हूँ कि उनसे बात करूँ, समझूँ कि क्या है जो उन्हें अपने वतनों से इतनी दूर दुनिया का सबसे पुराना कहे जाने वाले इस धंधे में ले आता है. पर फिर एकाध बार अचानक टकरा गयी निगाहों में उनकी आँखों में दिखा खालीपन हमेशा हिम्मत तोड़ गया.

न जाने क्यों मेरी निगाहें आसमान की तरफ़ उठ गयी थीं. सच में ऊपर तारे नहीं थे, बस नियोन रोशनी की आकाशगंगा थी. रात की स्याही को इस अजब रौशनी से भर देना, यह भी हांगकांग का एक स्थाई भाव है, वह भाव जो रात से जुड़े सारे डर रोमांच भरी उत्सुकता में बदल देता है. तन्द्रा टूटी तो दिखा कि अपनी आवारगी का सफ़र एक टिन हाऊ मंदिर के इर्द गिर्द बसे ‘या मा तेई’ के ‘टेम्पल स्ट्रीट’ तक पंहुच आया था. यह वह जगह है जहाँ पर्यटकों का हांगकांग स्थानीय निवासियों के हांगकांग से टकराता है. वह जगह जहाँ मंदिर में पूजा कर रहे लोग बाहर की बाजार में ठेलों पर लगे सेक्स टॉयज खरीदते हुए नहीं हिचकते. वह जगह भी जो जैकी चान और ब्रूस ली की फिल्मों से निकल दुनिया भर के लोगों की जिंदगियों का हिस्सा बन आया है.

खुद से फिर किसी रात यहाँ से आगे की आवारगी पर निकल पड़ने के वादे के साथ वक़्त घर लौटने का हो आया था.

November 09, 2013

खो गयी जुबानों वाले शहर में (हांगकांग 5)


[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 'इशारों की जुबां' शीर्षक से 09-11-2013 को प्रकाशित]

कैसा लगेगा आपको अगर आप के पास शब्द हों पर अर्थ खो जाएँ? अगर आपको अचानक पता चले कि आपकी अपने समाज से हासिल हिंदी और मेहनत से कमाई अंग्रेजी, दोनों जुबानें खुद के घर का पता तक नहीं बता सकतीं? भाषा के अर्थ खो देने की कीमत अजनबी शहरों के घर हो जाने के हादसे से जूझते हम प्रवासियों से पूछिए. किसी नयी जगह से गयी रात तक पार्टी करके लौटते हुए बसों के रास्ते सिर्फ कैंटोनीज में लिखे देख रीढ़ की हड्डियों में कैसी सिहरन उतरती है हमसे बेहतर कोई नहीं बता सकता.

हांगकांग नाम का यह शहर हमारी जिंदगियों से ऐसे हसीन खेल रोज खेलता रहता है. तब जब यह विश्व नगर अचानक से अंग्रेजी छोड़ सिर्फ कैंटोनीज बोलने पर उतर आता है. ऐसे बहुत प्यारा शहर है यह. खूबसूरत ही नहीं, खूबसीरत भी. भले लोगों का शहर जिनकी नजर में आपकी भूरी त्वचा को देख हिकारत भरी अजनबियत नहीं उपजती. ऐसा शहर जिसमे आपको किसी पार्टी के बाद थोड़ा लड़खड़ाते हुए घर लौटने को बस के इन्तेजार में खड़े हुए नस्ली हमलों का डर नहीं लगता.  ऐसा शहर जिसमे किसी से टकरा जाने पर आप मुस्करा के उम्मगाई (शुक्रिया और माफ़ करें दोनों के लिए कैंटोनीज शब्द) बोलते हैं और अपनी राह चल पड़ते हैं.

महानगरों से विश्व नगरों तक का सफ़र कर आई दुनिया में एशिया का विश्व नगर होने का दावा करने वाले शहर में होना भी तो यही चाहिए. फिर किसी के कुछ भी दावा कर देने वाले इन समयों में हांगकांग का यह दावा ‘ग्लोबलाइजेशन एंड वर्ड सिटीज’ सर्वेक्षण में अल्फ़ा प्लस, यानी कि बस न्यूयॉर्क और लन्दन से पीछे होने, से प्रमाणित भी है. (ससंदर्भ समझना हो तो ऐसे देखें कि इस सर्वेक्षण में मुंबई हांगकांग से एक पायदान पीछे यानी कि सिर्फ अल्फ़ा और दिल्ली दो, यानी अल्फ़ा माइनस है.) फिर चाहे सुरक्षा का अहसास हो या भेदभाव की अनुपस्थिति, यह शहर सच में विश्व नगर होने के हर मानक पर खरा उतरता है.

पर फिर, हम प्रवासियों से बात करिए और आपको पता चलेगा कि आसमान छूती इमारतों और जमीन छूती कीमतों के बीच तिरते रहने वाला हांगकांग तो बस सेन्ट्रल और मोंगकाक नाम के ‘टूरिस्टी’ इलाकों में ही ख़त्म होने लगता है. शहर के साथ ही छीजने लगती है अंग्रेजी भी, और फिर सिर्फ सुपरस्टोर्स में जरा सी बचती है. उसके बाद ‘न्यू टेरिटोरीज’ नाम का जो हांगकांग है वह डर, रोमांच और उत्सुकता के बीच की कोई जगह है. वह हांगकांग जिसमे अंग्रेजी उतनी  गायब होती है जितनी हिंदी. ऐसे कि जिस गांव में मैं रहता हूँ उसमे हैम तीन-चार परदेशी लोगों को छोड़ बमुश्किल कोई अंग्रेजी बोलता हुआ मिलता है. यह हांगकांग वह शहर है जहाँ आपको अचानक ज्ञान और भाषा का अंतर समझ आने लगता है.

वैसे सच कहूँ तो जुबान खो जाना सिर्फ बुरा भी नहीं है. भाषा संवाद के रास्ते खोलती है यह तो हमेशा ही पता था, पर बंद भी करती है यह इसी शहर ने सिखाया. टैक्सी वाले की ख़राब अंगरेजी को मीलों पीछे छोड़ती अपनी कैंटोनीज में घर का रास्ता समझाते जितना भी गैरभाषाई संवाद सीखा, इसी खूबसूरत शहर में सीखा. ‘वेट मार्केट्स’ में सब्जी खरीद ‘सप मन’ (शायद 10 डॉलर) जैसे अनजान शब्दों से जूझने की जगह पैसे बढ़ा देना यूँ  यहाँ आम रवायत है पर एक एक पैसे का मोलभाव करने की आदत वाले अपने हिंदुस्तानी मन ने मुश्किल से ही सही यहीं अपनाया. फिर सब्जी वाली का पूरी ईमानदारी से पैसे लेकर बचे वापस करने पर आदतन संदेही मन ने एकाध बार उनकी सब्जियों के दामों को सुपरस्टोर्स से परखा भी, पर फिर शर्मिंदा ही हुआ.

पर सबसे खूबसूरत यह कि, इस बार स्थाई निवासी हो जाने से पहले इस शहर से हुई तमाम मुठभेड़ों में बेहतर अंग्रेजी की वजह से गर्व से लैस सहकर्मियों को इन स्थितियों में फंसते देख ‘अंग्रेजीदां आभिजात्य’ की सीमाएं समझने के मजों से भरपूर मौके भी बहुतायत से दिए हैं. और ऐसे हर मौके पर समझ आया कि साझा शब्दों की अनुपस्थिति में हम गँवई, जाहिल कहे जाने वाले लोग आभिजात्य वर्ग वालों से बहुत बेहतर संवाद स्थापित कर पाते हैं. अपनी तमाम क्रांतिकारिता के बावजूद अचेतन में कहीं बची रही कुलीन हो जाने की ख्वाहिश को थोड़ा थोड़ा कर निपटते देखने का सबब भी शब्दों को अर्थहीन बना देने वाले यही हादसे हैं.

ऐसा नहीं है कि ये हादसे खटकते नहीं. बहुत खलता है जब आप अपनी समझ से लौकी खरीद कर लायें और वह करेला निकल जाए. या तब जब कोई आम सी चीज खरीदने के लिए इशारों से -वह वाला, नहीं नहीं उसके बगल वाला पैकेट- बताते हुए पीछे लग आई पंक्ति खुद को असहज करने लगे. पर सबसे ज्यादा तब जब अंग्रेजी को लेकर लगभग कुंठित अपना समाज याद आ जाता है. कभी नहीं देखा कि दो चीनी मिले हों और अंग्रेजी में बात करने लगे हों. बसों और मेट्रो में लोगों के हाथ में ज्यादातर अंग्रेजी नहीं, चीनी पत्रिकाएं और किताबें ही दिखती हैं, यहाँ तक कि मोबाइल फोन से लेकर लैपटॉप तक कुछ भी खरीदें, उसका मूल सेटअप चाइनीज में ही होता है. अक्सर लगता है कि तकनीक अगर चाइनीज में हो सकती है तो हिंदी/तमिल/बांगला में भी हो ही सकती है.

पर अंततः संवाद का साधन भर होने वाली भाषा को आभिजात्य का प्रतीक बनाये बैठे लोग वह क्यों कर होने देंगे. 

November 08, 2013

Irom Sharmila’s ‘Attempted Suicide’ Enters 14th Year, Democracy's Murder 56th

[This is an AHRC Article.]

Irom Sharmila Chanu’s story is a bizarre, almost schizophrenic, tale of absurdities. It has a woman who has not eaten a morsel for a full 13 years. It has a state that has kept her incarcerated for most part of all these years and is force feeding her through a tube in her nose. The fast has wasted her body from within. It has caused her to stop menstruating. Medical reports indicate severe damage to many of her internal organs.

Nothing of this, though, moves the state that claims to be the largest democracy of the world. Not even on the date when she entered fourteenth year of her fast this year. She had started her fast on 5 November 2000, after personnel of the Assam Rifles had shot dead 10 civilians waiting at a bus stop in Malom, Manipur. None of the rogues in uniform responsible for the massacre were punished. Thanks to the impunity provided to them by the Armed Forces (Special Powers) Act 1958, none of them would ever get.

The Act, imposed in Manipur since 1980, gives even a non commissioned officer of the security forces a statutory right to kill with impunity on mere suspicion. The Act, first enacted by the British colonialists, is an obvious negation of all that a democracy stands for and therefore doesn't deserve a place even in the statues books of India. And there it is, invoked on Indian citizenry with all the horrors it entails. Needless is to say that horrors include murder of democracy as a state can only be democratic or undemocratic, nothing in between. This is why Irom, while going on the fast, wanted nothing more than the Act getting repealed.

None of her demands are even remotely anti-India, despite the fact that one cannot wish away strong anti-India sentiments in all of the North East. She is demanding what the Indian constitution guarantees to all its citizens in the first place. Equality before law is the bedrock of her nonviolent protest, longest in human history. All she is asking for is an end to the culture of impunity. She is asking the Indian state to respect the law of the land instead of invoking draconian colonial laws over a section of its own citizenry. Is any of that demand illegal?

She wants the cessation of mindless violence inflicted on people of the North East, Manipuris in particular. She wanted an end of the culture of impunity that lets security personnel get away with everything from extrajudicial executions, abductions, torture including custodial rape and extortion.  She wants to snatch her people back from the dehumanized existence that the ruthless cycle of self reinforcing violence has condemned them into.

The government of India, however, would have none of it even while conceding that AFSPA has got some real serious problems. The problems are so serious that Justice J S Verma Commission, formed after the brutal Delhi Gang rape that shook the conscience of the nation, would recommend taking sexual offences committed by the security personnel off the impunity provided to them by AFSPA. They would be serious enough to make Omar Abdullah, Chief Minister of Jammu and Kashmir, demand its revocation and P Chidambaram, the then union home minister promise to revisit it.

The moves, though, almost always be scuttled by the army. Senior army officers like Lt. General B. S. Jaswal would assert that AFSPA is pious to ‘entire Indian Army and the government will bow down into inaction. Unfortunately, no one would ask exactly when did the secular democracy that India is turn into a theocracy to take recourse of religious language.

So the state will not listen to Irom. It needed not as Manipur has never caught the imagination of powers that may in Delhi. It was just an outpost in the past. Now it’s even worse of, a disturbed area to be reined in by brute force. Now it’s a no brainer that military understanding of ‘controlling’ a troublesome population on the peripheries of the nation inherently involves sexual assault as a weapon. It is precisely for this reason that the state would provide the personnel of Assam Rifles with condoms as an integral part of the travel kit to be used while on patrol duty, forget reining in the sexual predators in their uniforms.

The state had not bothered to listen to Irom for a full six years by the time the elderly mothers of Manipur would have had enough of the assaults and go to the headquarters of the Assam Rifles, disrobe themselves and hoist a banner reading “INDIAN ARMY RAPE US” on its iron gates. State would not listen to them as well. It would let security forces kill Sanjits, Rubinas, Manorama Devis and countless others. It would not even blink at the reports of 1500 fake encounters. It would not until the Supreme Court would take up the issue and find all six randomly chosen ones for investigations to be really fake and order a probe by the National Human Rights Commission, a measure too little and too late.

The state, meanwhile, will criminalize the conscience keeper and would arrest Irom for ‘attempting suicide’, a criminal offence under the law of the land. Irom would be an unlikely offender though, one respected by even the judge who would eventually put her on trial. “I respect you but the law of the land does not permit you to take your life,” is what Akash Jain, Metropolitan Magistrate of a Delhi court, would meekly admit while ordering to frame charges against 40-year-old Irom under section 309 (attempting to commit suicide).

She had pleaded ‘not guilty’ to the charges against her. ‘I love life. I do not want to take my life but I want justice and peace’ is what she had told the court. ‘I do not want to commit suicide. Mine is only a non-violent protest. It is my demand to live as a human being”, she had then calmly added. She assured the state that she would eat, again, if AFSPA is revoked. The Court, as expected, told her that the issue of revocation of an Act is a question of a ‘political process’ whereas it was concerned only with the ‘individual case’ it was dealing with.

The fast, therefore, would continue. So would atrocities committed on hapless citizens by the Indian armed forces. What no one would think about, though, is that not listening to sane voice of peace and harmony can merely give way to an unending circle of violence. More and more actors, both state and non state, would join the fray that gives huge, unaudited dividends to all concerned while inflicting unimaginable miseries on common people. The number of armed insurgent groups, commonly known as the underground, would proliferate with the corresponding suspicion of the state. The suspicion would lead to everything, from harassment to extrajudicial executions. The anger against the same would get new recruits to the underground.

The democracy would still not listen to Irom. It would not lend a sympathetic ear to the people it claims of being its own. It would keep Irom incarcerated while respecting her. If only it knew that Irom, perhaps, is its last chance at peace. It cannot win a war against its own people unless winning their hearts. Treating them as lesser, and unreliable, citizens is not going to let that happen. India would better save Irom, one of its worthiest daughters following in the footsteps of Mahatma Gandhi, the father of the nation. India, therefore, can begin with accepting just, and absolutely legal, demand of Irom instead of defending murderers and rapists in uniforms.

The democracy would better remember that even the British colonials didn’t let Mahatma Gandhi starve to death. Period.

October 31, 2013

Fallen through the cracks: Malnourished children in Growing Gujarat



[This is an AHRC article.] 
The fact that every third child of Gujarat is malnourished comes as no revelation. It cannot be for a state whose Chief Minister Narendra Modi, now Prime Ministerial Candidate of the main opposition party in the country, had infamously blamed the growing malnutrition in his state on ‘beauty conscious girls’ trying to maintain slim figures. Here is what he told to Wall Street Jornal. "Gujarat is by and large a vegetarian state. And secondly, Gujarat is also a middle-class state. The middle-class is more beauty conscious than health conscious - that is a challenge. If a mother tells her daughter to have milk, they'll have a fight. She'll tell her mother, 'I won't drink milk. I'll get fat'." The irony that the statement, citing vegetarianism as the other major factor responsible for increasing malnutrition in the state, referred to girls under 5 years of age was not lost on many.

It cannot be, alas, for a nation where hunger keeps returning to haunt the public discourse. India is a country after all, whose Prime Minister had to publicly concede that more than 42 per cent of country’s children being malnourished is a ‘national shame’. It is just that it is not merely a shame. It is nothing less than a scandal as betrayed by the acceptance speech of President Pranab Mukherjee meekly accepting that there is no bigger humiliation than hunger.
Neither do the cacophonous reactions to this sordid saga of malnutrition exposed by the report of the Comptroller and Auditor General of India reveal anything new. Almost all of them came along expected political lines defined more by the political locations than hard facts. They are bound to be in these highly politically charged environments prevailing in a poll-bound India. Judging by the highly polarizing persona of the Chief Minister of Gujarat, the reactions sounded a bit stifled in fact.
The message of the report is loud and clear that the government of Gujarat has acted at least as badly as any other provincial government if not worse. Therein lays the singular biggest failure of Mr Modi. Addressing the serious problem of malnutrition among children would have added sheen to his claims in a country that is home to hunger. Think of a Gujarat with no, or at least negligible, levels of malnutrition in a country with half of its children wasted. That would have made the Gujarat model of development the decisive answer to what he keeps referring to as inefficient governance by the Congress led United Progressive Alliance. But then, putting words to practice is certainly not that easy.
Had the Government of Gujarat gone on an overdrive to plug the gap instead of going in a denial mode, it could have saved itself from the embarrassment. Though almost all provincial governments faced with pressing socioeconomic problems take recourse to the same route, the case of Gujarat must have been a different one. The reason behind this is simple. Gujarat, led by Mr. Modi, has been positing it as hotbed of growth and development in an otherwise impoverished India lagging behind. Mr. Modi himself has been trying to hard sell the so- called Gujarat model of development as the panacea for all ills plaguing the country. The idea has been a main poll plank of his party, main opposition party in centre.
Unfortunately for Mr. Modi, the CAG report exposing such high levels of malnutrition in the state has called the bluff. It has also forced the need for an explanation, hopefully not as absurd as offered to the Wall Street Journal. To add to the pain, the government of Gujarat does not have the option of taking recourse to its routine escape route; of blaming everything to be a conspiracy in order to malign the chief minister. It cannot do so as it was not merely aware of the situation but also has admitted it time and again. For an example, Vasuben Trivedi, Women and Child Development Minister of Gujarat, has admitted in the state assembly that at least 6.13 lakh children were malnourished or severally malnourished in just 14 districts of the state. The figures would have been much higher if the data for remaining 12 districts was available.
Ironically, Ahemdabad, the state capital, topped the chart with more than 85,000 children identified as malnourished or extremely malnourished. Out of these, she admitted as reported by reputed English Daily ‘The Hindu’, 54,975 malnourished and 3,860 extremely malnourished children lived in Ahmedabad city alone. Can anyone expect the situation to be better in deep interiors of the state if the capital is faring this badly? The data, from the state government itself, shows that the situation is equally bad almost across the state.
The government, as the CAG report brings out, has not done much to arrest the situation. It has failed in even reaching around 28 percent, or more than one fourth, of the eligible beneficiaries under the Supplementary Nutrition (SN) programme under the Integrated Child Development Scheme (ICDS). In numbers, that was 63.37 lakh deserving beneficiaries being squarely left out of total 223.16 lakh. Similar was the shortfall in providing nutrition days annually, a whopping 96 out of targeted 300, or 32 percent. Ironically for a state whose Chief Minister could blame 5-year-old girls to be ‘beauty conscious’ and thus being responsible for their own under nutrition, 27 to 48 percent shortfall in the implementation of nutrition programme for adolescent girls sounds ominous.
The report found the state wanting in almost all other aspects. Take for example, the fact that despite the government claims of having provided supplementary nutrition to the targeted children between 2007 and 2012, its own monthly progress report put the number of underweight children at an staggering high 33 per cent as of March 2012. This was bound to happen in a state where only 52,137 anganwadi centres were sanctioned as against the 75,480 needed. And if this more than 30 percent Shortfall in anganwadis, the central node in the fight against malnutrition in children under-6, was not enough, a further 1912 of them were non functional. That is letting almost 2000 hamlets, or about 40000 families fall through the cracks.
Let’s be clear on one thing though. Unlike many of the problems of Gujarat, rabid fundamentalism and state supported communal hatred being the most important of them, malnutrition is not a problem of Gujarat alone. It is, as I have said earlier, not unique to Gujarat. Name a state, any state with an exception of Kerala, and one would find that they have all performed at least equally bad if not worse than Gujarat. Clearly, whatever pushes so many of our children into starvation is not limited to Gujarat.
The crisis of hunger is a crisis of the growth model that India has relentlessly pursued irrespective of the regime. Be it the current incumbent Indian National Congress led United Progressive Alliance or its predecessor Bhartiya Janata Party led National Democratic Alliance, both have ardently pursued same policies dictated by the World Bank and the International Monetary Fund that have been found to be detrimental to the interests of the poor and pauperized across the world.
None of this, of course, would stop Mr Modi’s detractors from rubbishing his ‘Gujarat Model’ of growth. None of this, however, would give the hungry citizenry any hopes till they dispense with this inhuman model that privileges economic growth over human life and dignity.

October 26, 2013

गुलाम आँखों में आजादी के सपने देखने वाली लड़कियों के नाम (हांगकांग 4)

[दैनिक जागरण में अपने कॉलम 'परदेस से' में 'गुलाम लडकियाँ' शीर्षक से 26-1-2013 को प्रकाशित]
उस खो गई लड़की की तलाश के लिए लगाये गए पोस्टर को देख कभी मेरी सहकर्मी रही दयान मारिआनो की आँखों में गहरी उदासी उतर आई थी. हांगकांग में भी ऐसे पोस्टर बहुत लगते हैं समर, बस वहाँ उनपर इन्सानों की नहीं बल्कि पालतू जानवरों की तस्वीरें होती हैं, फिर थोड़ा रुक कर उसने कहा था. 
अब याद नहीं कि कैविटे शहर में स्थापित फिलीपींस के सबसे बड़े एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (विशेष आर्थिक क्षेत्र उर्फ़ एसईजेड का स्थानीय नाम) में ट्रेड यूनियन के साथियों के साथ गुजारी उस शाम में अचानक उमस क्यों बढ़ गयी थी.  हाँ, यह जरुर पता है कि वह 70 लाख की कुल आबादी वाले हांगकांग में 3.5 लाख से ज्यादा की संख्या के बावजूद लगभग अदृश्य रहने वाली ‘विदेशी घरेलू नौकरानियों’ की जिंदगी से मेरी पहली सीधी मुठभेड़ थी. 
न, ऐसा नहीं कि पहले उन्हें देखा नहीं था. उलटे वीजा बढ़वाने के लिए इम्मीग्रेशन कार्यालयों में बिताई दोपहरियों से लेकर सुपरस्टोर में खरीददारी करते वक़्त तक तमाम बार स्थानीय आबादी से साफ़ साफ़ अलग दिखने वाले इस समुदाय से लगभग रोज ही साबका पड़ता रहा था. और फिर सफ्ताहांतों में तो सेन्ट्रल और काजवे, यानी शहर के सबसे पोश इलाकों में हर सार्वजनिक जगह पर अपने जनपथ जैसी लेडीज़ मार्केट से खरीदी सस्ती मगर बेहद खूबसूरत पोशाकों में सजी इन लड़कियों का ही कब्ज़ा होता है. और फिर चैटर पार्क से लेकर हार्बर तक की जारी जगहें चीनी आईफोन पर चहकती इन लड़कियों के सपनों से भर जाती हैं. 
पैसे कमा के घर भेजने से शुरू हो अपने स्थानीय बॉयफ्रेंड से शादी करके हांगकांग का स्थायी निवास हासिल कर लेने के चरम तक जाने वाले ये सपने भी कमाल होते हैं. पर उससे भी कमाल है इन लड़कियों का अपने सपनों का पीछा करने का वह हौसला जो उन्हें मलेशिया और इंडोनेशिया के इस्लामी और फिलीपींस के रोमन कैथोलिक रुढ़िवादी समाजों से हांगकांग जैसे बेहद खुले समाज में ले आता है और फिर बिना किसी छुट्टी के दो साल तक कैद रखता है. अनुबंध पत्र के मुताबिक़ दो साल में सिर्फ एक बार घर जाने की छुट्टी पाने वाली इन लड़कियों को रविवार की उन दोपहरों में उन्मुक्त हंसी हंसती लड़कियों को देखें और आप यकीन नहीं कर पायेंगे कि ये अपना घर परिवार और रिश्ते नाते ही नहीं बल्कि अपनी जिंदगी भी पीछे छोड़ आयीं हैं. शायद रविवार इनके लिए सिर्फ एक दिन नहीं बल्कि स्थाई अवसाद को जीवन के उत्सव में बदल देने की जिद होता है. फिर उस उत्सव में चाहे माइकल जैक्सन के गानों में थिरकना रोक नमाज पढ़ना और फिर थिरकने लगना शामिल हो. यह युग अतियों का हो न हो, विरोधाभासों को जीने का तो है ही.  
पर फिर उतरती शाम के साथ इनके चेहरों पर उतरती उदासी देखें और समझ आएगा कि इनके साथ जीवन कितना क्रूर है. दिन को और लम्बा कर सकने की असफल कोशिश के बाद मेट्रो में लौट किसी और के घर में वापस जाकर हफ्ते भर नीरस घरेलू काम करने को अभिशापित इन लड़कियों का चेहरा देखें, और आपके कानों में दुनिया का सबसे दुखभरा शोकगीत बज उठेगा. 
फिलीपीनी लडकियाँ घरेलू नौकरानी बनने हांगकांग जाती ही क्यों हैं, मैंने दयान से पूछा था. और विकल्प क्या हैं? यहाँ नौकरियां ही कहाँ हैं? हमेशा खिलखिलाती रहने वाली दयान की आवाज अब भी भारी थी. यहाँ स्नातक लड़कियों को भी पहले तो काम ही नहीं मिलता और मिल भी जाय तो 10000 (२००० हांगकांग डॉलर) पेसो से ज्यादा का नहीं. और उसमे शहर में एक कमरे में 8 से 10 लड़कियों के साथ रहना, खाने से लेकर आने जाने तक का खर्चा और फिर घर भेजने के लिए कुछ बचता ही कहाँ है? फिर यह गायब हो जाने का डर. हांगकांग में न्यूनतम वेतन 4200 डॉलर है और फिर रहना और खाना दोनों नियोक्ता की जिम्मेदारी. वह भी उसके ही घर में, उसके जैसा ही खाना. ऐसे में डिग्रियां बेमानी हो जाती हैं. मेरी प्रश्नातुर आँखों ने और जवाबों के रास्ते खोल दिए थे. 
पर इन जवाबों ने बस सवाल ही बढ़ाये थे. 1970 के बाद अचानक बहुत तेजी से विकास की राह में दौड़ पड़ने वाले हांगकांग के क़ानून के शासन पर यकीन को डगमगा देने वाले सवाल. हांगकांग की एक बात शुरुआत से ही बहुत अच्छी लगती थी, यह शहर आप्रवासी निवासियों और नागरिको में ज्यादा फर्क नहीं करता. और फिर लगातार 7 साल रह लें तो नागरिक ही मान लेता है, वोट देने का ही नहीं बल्कि चुनाव तक लड़ने का अधिकार दे देता है. हाँ, सिर्फ उन्हें जिन्हें वह इस काबिल मानता है और यह काबिलियत आमदनी से तय होती है, नौकरियों से तय होती है. ऐसे में ‘नौकरानियों’ के अनुबंधों में उनको स्थाई निवास न देने की शर्त होनी तो लाजमी ही है. हाँ, इस एक शर्त से क़ानून के सामने सबकी बराबरी के दावे ताश के महल से ढह जाते हैं. यह ढह जाना ही पूँजीवाद के दिखाये बराबरी के, मुक्त प्रतिस्पर्धा के सपनों की नियति भी है और नीति भी।
बचती है तो बस इस सबके बाद भी उन लड़कियों की आँखों में चमक और उनके होठों में खिलती मुस्कराहट. और यह यकीन की जिन्दा सपने कभी हार नहीं मानते. 

October 25, 2013

Supreme Court blasts the government for turning citizens into guinea pigs

This is an AHRC Statement
It should not have taken a Supreme Court order for the Indian government to know that it cannot turn its citizenry into guinea pigs for private companies. This is one of the very basic duties, the raison d'être in fact, of a government bound to protect the lives and dignity of its citizens. Sadly, the Government of India cannot take recourse to the argument of ignorance or that it did not know. It has been well aware of the unethical practices adopted by the private interests as evidenced by the outrage over the death of seven girls in post-licensure clinical trials conducted on tribal girls in Khammam in Andhra Pradesh and Vadodara in Gujarat in 2010. The trials, jointly conducted by the Indian Council of Medical Research (ICMR) and the state governments to test the efficacy of the human papillomavirus (HPV) vaccine, were suspended after the uproar. The inquiry committee formed to look into the issue found serious violations of the ICMR guidelines, mostly over consent related issues, and yet chose not to fix any criminal culpability of those responsible on the pretext that there was no deliberate or planned attempt to cause damage to persons taking part in the trials.
Civil society and health activists have been warning for a long time that the Indian clinical trials industry has turned the country into a safe haven for drug trials on humans by multinational pharmaceutical companies. The government, however, seems to have no clue of this.  A recent editorial in the Economics and Political Weekly, a reputed journal, exposes the gravity of the situation.  It shows that the government itself admitted that the clinical trials have caused 2644 deaths across the country in a short span of seven years from 2005 to 2012. Civil society organizations like the Swasthya Adhikar Manch, a petitioner in this case, contest the figures as highly inaccurate, not in the least because they come from the same companies which conducted the trials. The absurdity of the data is betrayed, also, by the fact that in response to a right to information (RTI) petition the government admitted 2,061 clinical trial-related deaths between 2008 and 2011.
Worse still, the governments confessed that compensation was paid in just 22 of these cases. Can a government treat the lives of its citizenry worse than that; ensuring compensation to a mere 22 out of 2061 deaths as per its own admission? It could at least tighten the rules and guidelines that pharmaceutical companies violate at will. This was exposed, again, way back in 2011 by The Independent, a reputed British Daily. In an industry dominated by asymmetry of information making the doctor's word final, the investigation had found the law enforcers to be criminally lax in enforcing even the then guidelines, for example, private companies enlisted hundreds of tribal girls for a study without parental consent, the use by drug companies of survivors of the world's worst poisonous gas disaster without proper informed consent and tests carried out by doctors in the city of Indore.
They can enjoy this impunity not only because the 'peculiar situation' of India forces millions and millions of its starving citizens to take up whatever ways of making a little money that can get them and their family the next meal. They do this with impunity because of the corruption, evidenced by the Supreme Court blasting the government for nor tacking the 'menace 'of rackets of multinational companies, which let the guilty go scot free . The anguish of the Supreme Court on being shown merely the draft rules despite even the Parliamentary Committee having accepted the presence of such rackets is understandable. This is more so because the government had been letting the Drug Advisory Committees (NDACs) permitting drug trials in complete violation of an earlier order of the court that had put in place a new mechanism consisting of the new, technical committee and apex committee.
It is in this respect that the AHRC welcomes the honourable Supreme Court's decision of halting 157 drug trials with immediate effect. The need of the hour, in fact, is to go beyond this and put a complete moratorium of conducting such trials until a fully functional foolproof system of monitoring is put in place. The AHRC congratulates the Swasthya Adhikar Manch and other activists for their relentless struggle against the trails that dehumanize Indian citizens.

October 20, 2013

हम तुम्हारे गुनहगार है शाहबानो. और आपके भी आरिफ़ भाई.

आज अचानक मोहम्मद अहमद खान साहब याद आ गए. ऐसे कि ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे थे. उन्हें
Courtesy: The Hindu
जानते हैं आपनहीं नकैसे जानेंगेअंशु मालवीय की एक शानदार कविता के हवाले से याद दिलाने की कोशिश करूँ तो शाहबानो का तलाक सब जानते हैंकौन जानता है उसके निकाह के बारे मेंकुछ समझ आया? नहीं? सो जनाब मोहम्मद अहमद खान साहब शाहबानो के तलाक का बायस माने उनके वो शौहर थे जिन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव में पहले उन्हें घर से निकाल बाद में तलाक दे दिया था. जब ये मामला हुआ था तब अपन बहुत छोटे थे, दिमाग में कुछ ठीकठीक दर्ज हो जाय उस उमर तक पंहुचने में कुछ साल बाकी होने की उमर में थे. पर जाने क्यों ये कहानी याद रही. शायद इसलिए कि इस कहानी के एक किरदार ने 1989, यानी यादों की गठरी बाँधने की शुरुआत के समयों में बगल के लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और तब के उस शख्स के किस्से अब भी दिमाग की डायरी में दर्ज हैं.

छोटे में किस्सा यह कि 1975 में अहमद साहब ने शाहबानो को घर से निकाल दिया. अब हर तरफ से बेसहारा शाहबानो के पास अपने बच्चों की परवरिश का कोई रास्ता न था सो 1978 में उन्होंने अदालत जाकर अहमद साहब से गुजारे भत्ते की दरकार दी. इंसाफ़ की हिन्दुस्तानी रवायत के मुताबिक अदालत दर अदालत रेंगते हुए पूरे बरस बाद मुद्दा जब सुप्रीम कोर्ट पँहुचा तो उसने वही किया जो कोई भी इंसाफ़पसंद अदालत करती,  क्रिमनल प्रोसिज्योर्स एक्ट का सेक्शन 125 लगाते हुए शाहबानो को गुजारा भत्ता देने का आदेश दे दिया.

पर फिर एक अकेली, बुजुर्ग और बेसहारा औरत को गुजारा भत्ता देने की गुस्ताखी मजहब वाले कैसे बरदाश्त कर लेते? सो उन्होंने वही किया जो ऐसे हालात में दुनिया के सारे मजहबों के ठेकेदार करते हैं.. खतरे में पड़ जाने का ऐलान. मुए मजहबों की की खतरे में पड़ जाने की ये बीमारी भी अजब है.. एक बेसहारा औरत को गुजारा भत्ता देने से इस्लाम खतरे में पड़ जाता है तो मीरा नायर की एक फिल्म में समलैंगिकता के जिक्र से हिंदुत्व. हाँ, ये दोनों तब खतरे में नहीं पड़ते जब उनके मानने वाले लाखों लोग भूख से लड़ाई हार कर मर रहे होते हैं. तब भी नहीं जब उनके झंडाबरदार अपनी बेटियों को इज्जत के नाम पर जिबह कर रहे होते हैं. पर यह कहानी मजहब वालों की तो है नहीं, सो वापस लौटते हैं.

सो कुल जमा हुआ यह कि मजहब पर ऐसे हमले से खफ़ा इस्लाम वालों ने तब की कांग्रेस सरकार को निशाने पर ले लिया. अब कांग्रेस ठहरी धर्मनिरपेक्ष सो ऐसे हमले से डर गयी. डरे भी क्यों न, कितना आसान होता है कौम के ठेकेदारों को साध उनको खुश रखना और फिर उनकी आबादी के बड़े हिस्से को भूख और गरीबी की तंग गली के बीच जीने को मजबूर कर भी उनका मसीहा बने रहना. और फिर पूरे बहुमत वाले 1986 के उन शानदार दिनों में तो ये और भी आसान था. सो कांग्रेस ने वही किया भी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तो बदल नहीं सकती थी तो उसने मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986) लाकर संविधान ही बदल दिया. इस नए क़ानून ने मुताबिक़ तलाक देने वाले शौहर पर अब तलाकशुदा बीबी को बस इद्दत (वह समय जिसमे महिला शादी नहीं कर सकती) भर ही गुजारा भत्ता देना था, उसके बाद यह जिम्मेदारी वक्फ़ बोर्ड की होनी थी.

पर कहानी तो मैं शाहबानो की भी नहीं कह रहा था. यह कहानी असल में आरिफ भाई की है. एक आदमी में कई आदमी होने की कहानी. आर फिर उनमे बस अच्छे वाले आदमी के हार जाने की कहानी. आसान अलफ़ाज़ में कहूँ तो यह कहानी उस आरिफ मुहम्मद खान की है जो शाहबानो मामले में इस्लामिक कठमुल्लों के खिलाफ खड़ा हो पाने का हौसला दिखाने वाला इकलौता मुसलमान था. उस आरिफ खान की कहानी जो अपनी ही पार्टी कांग्रेस के लाये बिल के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक लड़ा था. उस आरिफ भाई की कहानी जिसने इस मुद्दे पर पार्टी छोड़ दी थी.

उसके बाद जो हुआ वह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के दामन पर लगा हुआ सबसे बड़ा दाग है. आरिफ मोहम्मद खान के अकेले पड़ते जाने का दाग. जितना याद है वह यह कि वही दौर रिलायंस से लगायत तमाम औद्योगिक घरानों पर जंग छेड़ अकेले पड़ जाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह के कांग्रेस से बाहर आने का भी दौर था. वह दौर जिसमे वी पी सिंह ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देकर इलाहाबाद से फिर से चुनाव लड़ा था जिसमे कांग्रेस ने तब के ‘राम’ अरुण गोविल को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया था. (भारतीय राजनीति में राम की असली ‘इंट्री’ यहाँ से हुई थी, भारतीय जनता पार्टी उर्फ़ भाजपा के राम मंदिर आन्दोलन से नहीं पर वह किस्सा फिर कभी).

कमाल उपचुनाव था वह. मिस्टर क्लीन से मैले हो गए राजीव गांधी के खिलाफ एक जमीनी संघर्ष की शुरुआत का ऐलान करता हुआ चुनाव. वह चुनाव जिसे भारतीय राजनीति कि दशा और दिशा दोनों बदल देनी थी. वह चुनाव जिसे बाद में भारत में गठबंधन राजनीति की शुरुआत के बतौर जाना जाना था. अब चुनाव इतना बड़ा हो तो बेशक सबकी ख्वाहिश होगी उसकी हिस्सा बनने की सो आरिफ भाई की भी थी. पर होना कुछ और था. कहते हैं कि आरिफ भाई के इलाहाबाद आने की ख्वाहिश सुन वी पी सिंह के माथे पर पसीना छलक आया था. कहते हैं कि उन्होंने यह कहकर आरिफ भाई को प्रचार में न आने के लिए कहा था कि उनके आने से मुसलमान वोट कट जायेंगे.

आरिफ भाई ने इस पर क्या कहा यह पता नहीं. यह जरुर पता है कि फिर वह मुख्यधारा की राजनीति में अलग थलग पड़ते चले गए. यह भी कि उनके बाद फिर किसी मुसलमान नेता ने मुल्लों की, इस्लामिक कट्टरपंथियों की मुखालफ़त की हिम्मत नहीं की. यह भी कि फिर हिन्दुस्तानी सेकुलरिज्म का मतलब अकिलियत की, अल्पसंख्यकों की आबादी के बड़े हिस्से को किस्मत के हवाले छोड़ कौम के ठेकेदारों को खुश रखना हो गया.

खैर, वक्त के साथ आरिफ भाई अपनी भी यादों से खारिज होते चले गये थे. एक बार याद आये तब जब उनके भाजपा में शामिल हो जाने की खबर आई थी. तब पहले बेतरह चौंका था और फिर समझ गया था. हिन्दुस्तानी सेकुलर पार्टियों से खारिज होने को अभिशप्त एक सेकुलर मुसलमान की नियति और हो भी क्या सकती थी?


आज अहमद मोहम्मद खान को ट्रेंड करते देख आप याद आये आरिफ भाई. (या आप संघी रवायत में ‘जी’ हो गए हैं अब तक? मत होइएगा.. आरिफ जी बहुत चुभेगा..) हम सब आपके गुनहगार हैं आरिफ भाई... हम सब  शाहबानो के गुनहगार हैं. हम सबने धर्मनिरपेक्षता को छला है. पर यकीन करिये, हम सब ठीक कर देंगे एक दिन. तब कोई किसी शाहबानो पर जुल्म करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा. तब किसी आरिफ को इंसाफ के हक में खड़े होने की सजा नहीं मिलेगी. 

October 18, 2013

मुक्ति की जगह सिर्फ सेक्सुआलिटी विमर्श? और करेंगे वह भी स्त्री देह पर ही?

वैसे असली कहानी कुछ और ही थी. एक लड़की के (फिर वह जितनी भी महत्वाकांक्षी क्यों न रही हो) का अश्लील वीडियो बना लिए जाने की कहानी, उसके प्रतिरोध पर उस वीडिओ को सार्वजनिक कर दिए जाने की कहानी. और फिर उस लड़की द्वारा इस मामले में मौजूद एक प्रतिष्ठित संपादक से (फिर उसके उस संपादक से रिश्ते जो भी रहे हों) द्वारा हस्तक्षेप करने की माँग करने की कहानी और इस माँग के पूरा होने के पहले एक मारपीट और उसमे पुलिस आने की कहानी. कहानी तो खैर और भी थी, उस संपादक द्वारा पहले पुलिस को आने से रोकने की कोशिश करने और फिर आ जाने पर बहुत बढ़िया शराब के प्रस्ताव के साथ मामले को रफा दफ़ा करने की कोशिश की कहानी.

पर कहानियाँ जैसी होती हैं वैसी रह कहाँ पाती हैं. सो इस कहानी में उस लड़की (और उसके साथियों) की बेवकूफियों के चलते पहले तो पत्रकार होने का दावा करने वाला आशीष कुमार अंशु नामक एक घोर संघी, और अतिसंदिग्ध विश्वसनीयता वाला मोदीभक्त साम्प्रदायिक चरित्र कूदा जिसने कुछ एक और वामपंथी का शिकार कर लेने के उत्साह और कुछ टीआरपीखोरी में इस कहानी को सुना तो पूरा पर अपने ब्लॉग पर टुकड़ों में छापना शुरू किया. वह भी पत्रकारीय नैतिकता की (वैसे उसको पता न होगा कि ऐसी भी कोई बला होती है) ऐसी की तैसी करते हुए उस लड़की के नाम और तस्वीर के साथ. उस संघी ने एक और कमाल किया. उस आदमी को जिसे लड़की लगातार बाप समान कह रहा था उसे मुख्य अभियुक्त बना देने का कमाल और जिस पर वीडियो बनाने और सार्वजनिक करने की धमकी देने का आरोप था उसे अपने चरित्र के मुताबिक़ एक ‘नौकर’ भर बना दृश्य से गायब कर देने का कमाल. फिर तो उस संदिग्ध विश्सनीयता वाले संघी के साथ इस लड़की की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाने के सिवा होना भी क्या था? सो वही हुआ, और साथ में एक और कमाल हुआ. यौनहिंसा के मामलों में पीड़िता/शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखने,उस पर निजी हमले न करने की रवायत लोगों ने ब्लॉग ब्लॉग, फेसबुक फेसबुक रौंद डाली. रौंदते भी क्यों न, लड़की के अपने नाम और चेहरे के साथ सार्वजनिक हो जाने का तर्क तो इस संघी ने उन्हें दे ही दिया था.

सो साहिबान.. फिर इस कहानी में और तमाम किरदार कूदे. और किरदारों का तो क्या है कि वे जहाँ कूदते हैं अपनी जहनियत (फिर जिसमे अच्छाई हो या कुंठाओं से उपजा कमीनापन) ले कर ही कूदते हैं. सो कहने का यह हिस्सा (जो मैं पेश कर रहा हूँ) यह सब हो जाने के बाद का हिस्सा है.

मैने पहले ही शर्त रख दी थी कि मैं आपसे सिर्फ महिला लेखिकाओं और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बात करना चाहता हूं.

वे राजी थे  और जरा खुश भी. (अनिल यादव... राजेन्द्र यादव विरुद्ध ज्योति कुमारी मामले में बोलते हुए)

सिर्फ महिला लेखिकाओं (खाली लेखिकाओं भी पर्याप्त होता पर फिर) और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बातचीत... इससे धमाकेदार विषय प्रवर्तन हो भी सकता है. बाकी समझ नहीं आया कि अनिल बाबू कहना क्या चाहते हैं.. यह कि उनके मुताबिक राजेन्द्र यादव की क्रिएटिविटी  सेक्स पर निर्भर है या महिलाओं के पास अपनी क्रिएटिविटी को व्यक्त करने का कोई जरिया नहीं है. आपको आ गया हो तो समझा जरुर दीजियेगा. अब आगे बढ़ते हैं..

और साहिबान.. विषय प्रवर्तन इतना शानदार हो, अंडे की भुजिया से उठ रही भाप हो, हाथ में पहला पेग हो तो साहित्यकारों की चर्चा में नई सनसनी का चला आना स्वाभाविक ही होगा. बाकी सनसनी? ज्योति कुमारी तो लेखिका हैं न, अनिल यादव के लिए वह सनसनी में कबसे और कैसे बदल गयीं पता ही नहीं चला. आपको पता चले, तो यह भी बताइयेगा. खैर.. अनिल जी (जो पहले कुछ ‘पुरानी लेखिकाओं के बारे में’ सुनना चाहते थे) को राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी की  पैतृक पृष्ठभूमि, कलही दाम्पत्य, अलगाव, बीमार विचार का डिक्टेशन, बेस्ट सेलर लेखिका, नामवर सिंह की समीक्षा, महत्वाकांक्षा वगैरा से ऊबा डालने की सीमा पर ले जाकर कहा था “अच्छी लड़की है...उन्होंने गर्व से कहा. उसके बिना मैं अब कुछ नहीं कर पाता.”

अनिल बाबू ने लेकिन सुना कुछ और. क्या सुना? यह कि “मैने सुना...मेरे  अनुकूल लड़की है. इन दिनों जीवन में जो अच्छा है उसी की वजह से है.” और फिर वे खुद को कहाँ रोक सके? पूछ ही लिया- “अब तो शरीर निष्क्रिय हो चुका होगा. आप क्या कर पाते होंगे.” अच्छी लड़की है, उसके बिना मैं कुछ नहीं कर पाता वाली राजेन्द्र यादव की बात अनिल यादव के लिए उसके साथ कुछ कर पाने की बात में कैसे और क्यों बदल गयी मुझे समझ नहीं आया. आपको आया हो तो यह भी समझाइएगा. और हाँ, कोई भ्रम हो रहा हो तो खातिर जमा रखिये... अनिल यादव ने अगले सवाल में सब कुछ साफ़ कर दिया है.. ‘ये तो कोई चमत्कार ही होगा कि आप इस उम्र में भी सेक्सुअली एक्टिव होंगे.” पर रवायत तो बदनाम, बदचलन लड़कियों की बातों को सेक्स तक पंहुचाने की थी, अनिल बाबू ने राजेन्द्र यादव की ‘अच्छी लड़की’ को वहाँ तक कैसे पंहुचा दिया?

जी, यही वह सवाल है जिसके जवाब में अनिल यादव की मानसिकता के ही नहीं बल्कि यौन कुंठा, जातीय दंभ, धार्मिक घृणा और स्त्रीद्वेश के मूल चरित्र वाली हिंदी पट्टी की जहनियत को समझने के सूत्र मिलते हैं.
सोचिये तो, एक सद्यप्रसिद्द साहित्यकार की हिंदी के सबसे बड़े मठाधीशों में से एक से मिलने पर दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, मार्क्सवाद या ऐसा ही कुछ और नहीं बल्कि महिला लेखिकाओं (जी, दोनों एक साथ) सेक्स और क्रिएटिविटी के रिश्तों पर बात करने की ख्वाहिश रखता है. बल्कि यह कहें कि सिर्फ ख्वाहिश नहीं बल्कि यही उसकी शर्त भी होती है. (और साथ में यह मान लें कि राजेंद्र यादव ने मज़बूरी में यह शर्त मान ली नहीं तो इन जनाब से न मिल पाने पर उनका कितना बड़ा नुक्सान हो जाता). इस इंटरव्यू को पढ़ने के बाद से ही विश्व साहित्य ऐसा कोई और उदाहरण ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ जिसमे एक बड़े खूंटे ने नए बछड़े की शर्तों पर उसे बाँधा हो, मुझे तो मिला नहीं आपको मिले तो मुझे भी बता दीजियेगा.

खैर, इसके बाद जो हुआ वह हिंदी साहित्य के सबसे ज्यादा बिकने और पढ़े जाने वाले लेखक श्री मस्तराम के भदेस, लगभग जुगुप्साजनक विवरणों के ठीक उलट लगभग आध्य्तामिक निस्सारता लिए हुए है. फल की चिंता से मुक्त कर्मयोगी का उत्तर देते हुए बकौल अनिल, राजेंद्र यादव कहते हैं कि.. ‘मन नहीं मानता’... ‘कभी सीने से चिपका विपका लियासहला दिया. और क्या होना है.  ध्यान रखियेगा कि राजेन्द्र यादव का यह बयान ‘बकौल अनिल’ है.  यह भी याद रखियेगा कि जाने कब हुई इस बातचीत के बारे में अनिल यादव साहब को सब कुछ याद है. यहाँ तक कि यह भी कि यह कहते हुए राजेन्द्र यादव ‘कुर्ते के गले के ऊपर ऊपर बेचैनी से पंजा हिला’ रहे थे. (रहम शराब पाक का कि न उन्होंने दूसरे पंजे का जिक्र नहीं किया न यह बताया कि राजेन्द्र यादव की बेचैनी उन्हें और कहाँ कहाँ ले जा सकती थी.  ऐसी याददाश्त की दाद मगर बनती है जिसे पंजों की पोजीशन तक ठीक ठीक याद हो).

हाँ इसके बाद जो है वह शाहकार है. अपनी कुंठा भरी इस भड़ास को ऐसे विमर्शकारी स्वर में तब्दील कर देना  इतना आसान थोड़े है महाराज! माने लगभग पागलपन की हद तक शुचिता (पढ़ें यौन इच्छाओं के दमन) के आग्रही इस समाज में एक पुरुष मठाधीश द्वारा संबंधों की अंतरंगता के स्वीकार और उन्हीं संबंधों को ज्योति कुमारी द्वारा पिता पुत्री का सम्बन्ध बताये जाने की पेंचीदगी को अनिल बाबू बरास्ते कामसूत्र, नियोग और न जाने क्या क्या सेक्सुआलिटी के विमर्श की जरूरत तक ले पंहुचते हैं. (कैसे यह हिमांशु पांड्या भाई ने अपने लेख में विस्तार से बताया है सो उस पर समय और ऊर्जा क्या लगाना. यहाँ पढ़ लें वह हिस्सा).

एक बात कमाल है. किसी भी पुरबिया गाँव की ट्यूबवेल (या नहर) की पुलिया पर बैठ दहेज़ की लालसा पूरी न हो पाने की वजह से विवाह में हो रही देर से कुंठित युवाओं की बातचीत के मूल स्वर वाली (अमे सुनबो, फलाने कै बिटियवा बहुत लाइन देत रही यार.. एक दिन लय गयेन भगान वाली अरहरिया में- कैशोर्य के एक मित्र की वीरगाथा है यह) इस बातचीत से स्त्री पक्ष वैसे ही गायब है जैसे उन तमाम बातचीतों से होता था. माने अनिल बाबू क्या मानते हैं कि राजेन्द्र यादव जैसे लोगों ने जो बोल दिया वही अंतिम सत्य है? या यह कि ज्योति कुमारी का सनसनी होना उनके द्वारा “खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए” किये गए ऐसे ही किसी और “मैन्यूपुलेशन” से हुआ होगा? माने अनिल यादव पुरुष हैं तो अपनी प्रतिभा की वजह से लेखक हुए और ज्योति कुमारी स्त्री हैं तो अपनी यौनिकता को हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाली सनसनी जिसे कुछ लोग लेखिका मान भी सकते हैं?

हो सकता है कि अनिल बाबू वाली उस हसीन शाम से उलट  आपके कान बिना शराब पिए ही गरम हो जाएँ अगर मैं यह पूछूं कि ऐसा क्यों न मान लिया जाय कि अनिल यादव की हालिया सारी प्रसिद्धि उनके पुरुष संपादकों, समीक्षकों और आलोचकों से बनाए यौन संबंधों की बदौलत है? (स्त्री कहता पर अभी तक हिंदी साहित्य की इन चुनिन्दा जगहों पर पुरुष ही भरे पड़े हैं न). अरे.. स्तब्ध क्यों हो गए आप? पुरुषों के लिए भी कास्टिंग काउच कोई ऐसी अनसुनी बात तो है नहीं. अब फैशन इंडस्ट्री में हो सकती है तो हिंदी साहित्य में क्यों नहीं? (वैसे भी हिन्दुस्तानी साहित्य में ऐसे प्रसंग मिलते रहे हैं). यही नहीं, राजेंद्र यादव और तमाम पुरुष मठाधीशों से उपकृत ऐसे तमाम सनसनी पुरुषों की सफलता की वजह यही हो?

जी, यही असहजता है जो इस पूरे मामले का अगला पहलू खोलती है. स्त्री है तो अयोग्य है, बाकी जो है किसी की वजह से है. और फिर तो कितना आसान हो जाता है उस स्त्री की देह पर मुक्ति का विमर्श रचना.. उसे ज्ञान देना. और दुनिया को बताना कि वह लड़की राजेन्द्र यादव को पिता समान सिर्फ ‘एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए’ कर रही है. निष्कर्ष का आधार? दो पुरुषों की ऐसी बातचीत जिसमे वह स्त्री शामिल ही नहीं है. वह बातचीत जिसमे उसका पक्ष तक नहीं है? वह बातचीत भी जिसमे अनिल यादव का स्वयंभू नैतिक तेज है?

यहाँ एक बात साफ़ कर देना लाजमी है, यह कि न तो मैं राजेन्द्र यादव और ज्योति कुमारी के संबंधों पर कोई टिप्पणी कर रहा हूँ, न ही मैं समझता हूँ कि किसी को भी उस पर टिप्पणी करने का कोई हक है. दो बालिग़ लोग (उम्र का अंतर कितना भी बड़ा हो तमाम स्वयंभू नैतिकता दरोगाओं की कुंठा से कम ही लग रहा है) अपनी मर्जी से क्या सम्बन्ध बनाते हैं और क्यों बनाते हैं उस पर राय देने का किसी का कोई हक नहीं है.) आपको ज्योति कुमारी के सनसनी बन जाने से दिक्कत है तो उनके लेखन पर राय दीजिये, उसपर किताबों से लेकर इंटरनेट तक सब कुछ काला कर दीजिये पर यह जो आप कर रहे हैं अक्षम्य है.

अब दूसरी बात, कि आप अगर नैतिकता के संघियों से भी बड़े झंडाबरदार हैं, वामपंथ के प्रमोद मुथालिक हैं, प्रलेस/जलेस/जसम या किसी भी और संगठन के अन्दर मौजूद शिवसेना हैं तो भी इस मामले में दो मामले हैं और आपको दोनों अलग करके देखने होंगे. पहला मामला है राजेन्द्र यादव-ज्योति कुमारी के संबंधों का, जो आपकी नैतिकता को जितनी भी चोट पंहुचाये, आपराधिक मामला नहीं है. यहीं दूसरा मामला है ज्योति कुमारी का अश्लील (वहाँ भी ज्यादा दिमाग, या जो कुछ भी आप लगा सकते हैं मत लगाइए, अश्लील को बस अश्लील ही मानिए) वीडिओ बनाये जाने का या कम से कम उसकी धमकी दिए जाने का. यह आपराधिक मामला है और आपको ‘बेचारे प्रमोद’ से जितनी भी हमदर्दी उमड़ पड़ रही हो, वीडिओ बनाये जाने का जिक्र उसी ने किया है (तहलका की ‘स्टोरी’ के मुताबिक़ किशन भैया ने उसे बताया था) और फिर उस वीडिओ का जिक्र कर ज्योति कुमारी को राजेंद्र यादव के घर आने से मना करने का शाहकार कारनामा भी उसी शख्स ने अंजाम दिया है.

कमाल है कि तमाम लोगों को यह नुक्ता न दिख रहा है न समझ आ रहा है. ‘तहलका’ जैसी गंभीर पत्रिका भी ‘अनकहा पक्ष’ लेते हुए प्रमोद के वीडिओ वाले बयान को तो नजरअंदाज करती ही है, यह तक नहीं पूछती कि ज्योति कुमारी को राजेन्द्र यादव के घर आने से रोकने वाला प्रमोद कौन होता है? माने राजेन्द्र यादव ने मना किया नहीं, उनकी बेटी (जिनके नाम उस फ़्लैट के होने की खबर है उसने किया नहीं और यह साहब फोन करके उसे आने से मना कर रहे हैं और तहलका को दोनों बातें बड़ी नहीं लगतीं.  तहलका को तो खैर यह पूछने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई कि वीडिओ बनाया किसने, और किस इरादे से? किसी स्त्री का अश्लील वीडिओ बना लेना कोई आपराधिक कृत्य थोड़े है आखिर, कलात्मकता है).

दिखा तो यह पक्ष अनिल यादव को भी नहीं, साहब ने प्रमोद को एक पंक्ति में निपटा दिया. वैसे साहिबान, पितृसत्तात्मक समाजों की ख़ास पहचान मरदाना कुंठा और असहज कर देने वाली महत्वाकांक्षाओं के बीच की तंग गली में अक्सर मिलने वाली यह जगह वही जगह है जहाँ अक्सर 'निष्पक्ष' संघी अपनी कुंठाओं के ठेले लगा लेते हैं.. पर फिर इसमें उनका क्या कसूर?

कसूर हमारा है, हमारी नारीवादी साथियों का है जिन्हें इस मसले का सबसे बड़ा नुक्ता या दिख ही नहीं रहा या उस नुक्ते को उन्होंने उस लड़की की निजी जिंदगी के निर्णयों से इस कदर जोड़ दिया है जिसके बाद उन्हें और कुछ दिख ही नहीं रहा.. मैं सिर्फ यह करूँगा कि उन नुक्तों को एक बार फिर साफ़ साफ़ रख दूं...

१. ज्योति को महत्वाकांक्षी कह उनके आरोप को ख़ारिज करने की कोशिश क्या हमारे अन्दर बच गयी पितृसत्ता का सबूत नहीं है? महत्वाकांक्षी होना अपराध कब से हो गया? आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं? मैं नहीं हूँ? क्या बहुत बड़ा पत्रकार, नेता, या जो भी हमारा चुनाव है बन जाना हमारे सपनों में नहीं आता? फिर एक महिला की महत्वाकांक्षा को जो किसी और को नुक्सान नहीं पँहुचा रही उसी के खिलाफ हथियार बना देना सीधे सीधे सीधे अपनी प्रगतिशीलता के खिलाफ नहीं खड़ा हो जाता?

२. किसी स्त्री की महत्वाकांक्षा या उसकी निजी जिंदगी के निर्णय क्या किसी पुरुष को यह अधिकार दे देते हैं कि वह उसका अश्लील वीडियो बना ले/बना लेने की धमकी दे (तहलका के मुताबिक भी प्रमोद ने माना है कि वीडियो बनाने की जानकारी ज्योति कुमारी को उसने खुद दी थी, बाकी तहलका ने इसके आगे कुछ पूछा ही नहीं) और उसको किसी और के घर में आने से रोकने के लिए फोन करे? और फिर ऐसे आदमी को पीड़ित मानना, उसके लिए सहानुभूति से भर भर जाना, यह किस किस्म की समझ है?

३. और अंत में.. क्या आपराधिक मामलों में सामाजिक नैतिकता का घालमेल करना दक्षिणपंथी रवायत नहीं है? और लगे तो मथुरा बलात्कार मामले (तुकाराम विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार, एआईआर 1979 सुप्रीम कोर्ट 185) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया मिसोजायनिस्ट यानी स्त्रीद्वेषी और जातीय पूर्वाग्रहपूर्ण फैसला हो (जिसमे उसने बॉम्बे उच्च न्यायालय का दो पुलिसकर्मियों को मथुरा नाम की नाबालिग के बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सजा देने का फैसला यह तर्क देकर उलट दिया था कि पीडिता 'एक अनपढ़ और अनाथ आदिवासी लड़की' है और इसी कारण चरित्रहीन होगी याद करिये और इस फैसले का नारीवादी प्रतिकार भी. और हाँ...

स्त्री मुक्ति के विमर्श किसी स्त्री की देह पर नहीं किये जा सकते साथी.