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जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

November 27, 2012

ओबामा की जीत दरअसल रिपब्लिकन रुढ़िवाद की हार हैं.

जिस मुल्क का सैन्य बजट बाकी की पूरी दुनिया के सैन्य बजट के लगभग आधे के बराबर हो, जिसकी सेना कम से कम 46 देशों में फैले 900 से ज्यादा सैन्य केन्द्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हो और जिसका घोषित लक्ष्य सारी दुनिया का ‘फुल स्पेक्ट्रम डोमिनेन्स’ हो, उसके राष्ट्रपति के चुनाव में बाकी सारी दुनिया की दिलचस्पी स्वाभाविक ही है. यह भी की उसका एक बड़ा हिस्सा आक्रामक तेवर वाले रिपब्लिकन मिट रोमनी के ऊपर डेमोक्रेट बराक हुसैन ओबामा के दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर राहत की सांस ले. पर फिर, सवाल यह है की ओबामा की इस जीत के निहितार्थ क्या हैं?
यही वह सवाल है जिसका जवाब वह परतें खोलता है जो अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को अद्भुत अंतर्विरोधों का सामंजस्य बनाता है. पहला यह कि अमेरिकी चुनाव अपने मूल चरित्र में एक नहीं बल्कि दो बिलकुल अलग अलग चुनाव है और दो बिलकुल अलग जगहों पर लड़ा जाता है. इनमे से पहला मोर्चा है अमेरिका की विदेश नीति और उस पर अमेरिकी चुनावों का प्रभाव. इसका दूसरा मोर्चा उनकी अपनी सीमाओं के अन्दर खुलता है और चुनाव के बाद आने वाले नीतिगत परिवर्तनों का आम अमेरिकी नागरिकों पर प्रभाव इस मोर्चे का सबसे जरूरी सवाल होता है. दूसरा अंतर्विरोध यह भी है कि इन दोनों मोर्चों की अंतर्सबंधीय परस्परता का एक बहुत छोटा सा हिस्सा छोड़ दें तो इनका आपस में कोई रिश्ता नहीं होता.

पहले मोर्चे को ध्यान से देखें तो अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में में किसी भी पार्टी या व्यक्ति की जीत अमेरिका की विदेश नीति और उससे गहरे रूप से जुडी सैन्य नीति पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं डालती. हकीकत यह है कि अमेरिकी विदेश नीति और उससे जुड़ी घरेलू नीतियाँ दशकों पहले से वहाँ के राजनैतिक नेतृत्व के हाथ से निकल कर सैन्य-औद्योगिक संकुल ( मिलिटरी इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स) के नाम से जाने जाने वाले उस हित समूह के पास चली गयी हैं जिसके कुप्रभावों के बारे में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर ने 1961 में अपना पद छोड़ते हुए ही आगाह कर दिया था. आइजनहावर की चिंता और चेतावनी दोनों साफ़ थी कि अगर इसके प्रभाव को रोका या कम से कम संतुलित नही किया गया तो अमेरिकी नीतियाँ सिर्फ और सिर्फ इसी संकुल के प्रभाव में बनेंगी और चलेंगी.

तब से अब तक के पांच दशकों में यह चेतावनी लगभग सभी अर्थों में इस हद तक सही साबित हुई है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बाद सेना को अमेरिकी राजनीति का तीसरा खम्भा माना जाने  लगा है. राजनीति में सेना की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि परिवर्तन की, असैन्यीकरण न सही कम से कम अपने जवानों को घर वापस लाने की राजनीति करने वाले ओबामा को भी अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए ‘बहुत मजबूत’ सेना रखने की जरूरत पर बल देना पड़ता है. 

मतलब साफ़ है कि निकट भविष्य में विदेशी जमीनों पर मौजूद अमेरिकी सैनिकों के बैरकों में लौट जाने के ख्वाब देखने वाले वास्तविकता से उतनी ही दूर हैं जितना अरब बसंत के बाद तमाम अरब देशों में लोकतंत्र आ जाने की ख्वाहिश वाले लोग थे. हाँ, ओबामा की जीत इस मायने में महत्वपूर्ण जरूर है कि अब ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ को धता बताते हुए अमेरिकी दखल का खतरा जरूर कम हो गया है और इस मामले में भी की पाकिस्तान जैसे देशों में जहाँ अमेरिका गैर-राज्य शत्रुओं से छाया युद्द में उलझा हुआ है वहां स्थिति और गंभीर नहीं होगी. आखिरकार ड्रोन हमले लोकतंत्र के हित में हों या न हों, ओबामा के पूर्ववर्ती रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर की कारपेट बोम्बिंग से कम हिंसक तो हैं ही.

यह अमेरिकी चुनाव का दूसरा, घरेलू मोर्चा है जिस पर एक तरफ लगातार गहराती आर्थिक मंदी के कुप्रभावों से जूझ रहे वंचित अमेरिकियों और दूसरी तरफ अस्मितागत पहचानों जैसे अश्वेत, हिस्पैनिक, समलिंगी, अकेली या बिनब्याही माओं का तबका है जिसके लिए ओबामा की जीत बड़ी राहत बन कर आयी है.  इनमे से पहला तबका वह है जिसके लिए रिपब्लिकन पार्टी और उसके लिबर्टेरीअन (इच्छास्वातंत्र्यवादी) खेमे का प्रतिनिधित्व करने वाले मिट रोमनी की जीत उनके ताबूतों में आखिरी कील साबित हो सकती थी. आर्थिक मंदी के फलस्वरूप बड़े स्तर पर अपने कर्जे के घर खो चुके इस तबके के लिए लगातार मंहगी और पंहुच के बाहर होती जा रही बुनियादी सेवाओं को बचाना सबसे बड़ी लड़ाई थी. और वे साफ़ देख पा रहे थे की सभी, ख़ास तौर पर गरीब, अमेरिकियों को सस्ती और सुनिश्चित स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य वाली ओबामा की महत्वाकांक्षी ‘रोगी सुरक्षा एवं वहनयोग्य देखभाल (पेशेंट प्रोटेक्शन एंड अफोर्डेबल केयर एक्ट) और चिकत्सकीय देखभाल एवं शिक्षा सामंजस्य एक्ट (हेल्थ केयर एंड एजुकेशन रिकोंसिलियेशन एक्ट) अमेरिकियों की सामाजिक सुरक्षा के स्वास्थ्य पहलू को सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.

इन कानूनों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था की इनके लागू होने के बाद बीमा कम्पनियां बीमारियों की दृष्टि से उच्च-जोखिम माने जाने वाले समूहों को न तो बीमा देने से इनकार कर सकती थीं न ही वे इनसे अतिरिक्त प्रीमियम उगाह सकती थीं. इसीलिये इन कानूनों के पास होने का सीधा प्रभाव इन कंपनियों के फायदे पर पड़ना था और फिर लाजमी था की वह इस सार्वभौमिक स्वास्थ्य योजना का तीखा विरोध करें और इसे पारित होने से रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दें. मुक्त बाजार एवं कम से कम सरकारी हस्तक्षेप की समर्थक होने की वजह से ऐतिहासिक रूप से अमीरों की हितपोषक समझे जानी वाली रिपब्लिकन पार्टी का इन कानूनों का विरोध करना भी लाजमी ही था, मगर यह किसी ने नहीं सोचा होगा कि इस विरोध में रोमनी 47 प्रतिशत अमेरिकियों को राज्य-पराश्रित और परजीवी घोषित करते हुए अपनी जीत की स्थिति में इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर देंगे. वह भी तब जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने इन कानूनों के संविधान-असम्मत होने के उनके तर्क को खारिज करते हुए ओबामा को इन्हें लागू करने की इजाजत दी थी.

इस तबके के ओबामा पर यकीन में जो थोड़ा संशय रह भी गया होगा वह अमेरिकन इतिहास की सबसे बड़े और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक हरीकेन सैंडी ने आकर दूर कर दी. इस तूफ़ान की लायी तबाही से जूझ रहे अमेरिकी गरीबों की स्मृतियों में न्यू ओरलियंस में आये हरीकेन कैटरीना से निपटने में रिपब्लिकन जार्ज बुश की लगभग आपराधिक अक्षमता भी ताजा थी और यह समझ भी की ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए एक सक्षम और सक्रिय केन्द्रीय सरकार की जरूरत होती है न की ऐसी सरकार की जो अपना हस्तक्षेप कम से कम करने और सब कुछ बाजार पर छोड़ देने में यकीन करती हो.

पर रिपब्लिकन मिट रोमनी की जीत के कुप्रभाव आर्थिक समस्यायों की मार से जूझ रहे इस तबके से बहुत ज्यादा वंचित अस्मिताओं पर पड़ने वाले थे. यूं तो रिपब्लिकन पार्टी हमेशा से दक्षिणपंथी ईसाईयत वाले रुझान की थी मगर बीते डेढ़ दशकों में उसका यह रुझान लगातार और खतरनाक होता गया है. व्यक्तिगात स्वातंत्र्य से जुड़े हुए सभी अधिकारों जैसे महिलाओं को गर्भपात के चुनाव का अधिकार, स्त्री पुरुष बराबरी का अधिकार, समलिंगी विवाह का अधिकार पर इस दौर में न केवल रिपब्लिकन पार्टी के हमले बढ़ें हैं बल्कि अपने प्रभुत्व वाले राज्यों में उसने इन अधिकारों को रोकने के सक्रिय प्रयास भी बढ़ाये हैं. इसके ठीक उलट बराक ओबामा न केवल इस वर्ग के साथ खड़े रहे हैं बल्कि उन्होंने सेना जैसी पितृसत्तावादी जगह में भी समलैंगिकों के प्रति भेदभावपूर्ण ‘न पूछो, न बताओ’ नीति को ख़त्म कर उन्हें सेना में गरिमामयी प्रवेश देने जैसे बड़े कदम भी उठाये हैं. ठीक यही नीति उनकी समलिंगी विवाह और गर्भपात के अधिकार को लेकर भी रही है.

ऐसे में आर्थिक मंदी की मार झेल रहे होने और उससे निपटने में असफल रहे ओबामा की नीतियों से असंतुष्ट होने के बावजूद इस वर्ग के पास इस चुनाव में अन्य कोई विकल्प था ही नहीं. ओबामा का विकल्प बन सकने वाले रोमनी इन सारे मुद्दों पर न केवल उनके खिलाफ खड़े थे बल्कि इन अधिकारों को छीन लेने पर भी आमादा थे. इन सब विषयों पर रोमनी की राय से पहले ही असहज आम अमेरिकियों को आप्रवासियों, और ख़ास तौर पर अवैध आप्रवासियों को लेकर उनका कटुतापूर्ण विद्वेष और भी असहज कर रहा था. यह विद्वेष, और अवैध आप्रवासियों को जबरन वापस भेज देने की रोमनी की घोषणा आखिरकार उस मूल भावना के ही विरोध में खड़ी थी जो अमेरिका को अप्रतिम संभावनाओं  और सफलताओं का देश बनाती है और विश्व राजनीति से लेकर उद्योगजगत तक में अमरीकी सफलता की कहानी आप्रवासियों ने ही लिखी है.

इसीलिये ओबामा की यह जीत वस्तुतः उनकी जीत नहीं बल्कि एक तरफ रोमनी और रिपब्लिकन दक्षिणपंथ की हार है तो दूसरी तरफ अब भी अमेरिका की मूल भावना में यकीन करने वाले आम अमेरिकी की जीत. पिछला चुनाव ओबामा ने ‘बदलाव’ के वादे पर कमाए समर्थन के दम पर जीता था, इस बार बदलाव के जमीनी समर्थन ने उन्हें जिताया है.

बेशक इससे अमेरिका की विदेश नीति और अन्य देशों के आतंरिक मामलों में उसके अनुचित हस्तक्षेपों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा पर अमेरिकी गरीब लोगों के जीवन में छोटा ही सही एक सकारात्मक बदलाव जरूर कर सकेगी. इस चुनाव का यही पाठ किया जा सकता है.  

November 19, 2012

Indian Army: Little Glory, Loads of Gore

[Published in Kashmir Times in two parts, on 16 and 17 November 2012, From my column OBVIOUSLY OPAQUE in the UTS Voice, 16-30 October, 2012]


In the popular discourse mere mention of Indian Army evokes two extreme and mutually incompatible responses. The believers see it as the last standing holy cow of the chaos called Indian nation, one that is incorruptible in the face of corruption that has become the new normative and remains fiercely apolitical when everything else is politically inclined, and dirty by extension. Ask the wretched fellows stranded on the wrong side of post-colonial history, and Indian army comes as a brutal occupying force that derives sadistic pleasures, and of course patriotism, from maiming, raping and killing the very people it is supposed to protect.


Intriguingly, the conspicuous contradictions run along the axes of geo-political realities and not along the premodern structures like caste, creed and religion that produce a million fissures underneath the modern and democratic body politic of the nation. If, contrary to this, they really do, then Indian army deserves a lot of praise for concealing them with exceptional aplomb. It maneuvers its ruthlessness in a continuum that is directly proportional to its operational distance from the national boundaries and, thus, earns a genial and almost affable image exactly where it matters.

Isn’t a sight where one find minorities, particularly Muslims, otherwise almost always persecuted by the law-enforcing agencies rooting for army in the middle of any riots as much a condemnation of a state claiming to be a secular, socialist and democratic republic as it is an honour for the Army? Haven’t we found this to be the case more often than not, be it Uttar Pradesh, Andhra or Gujarat? In fact, many a studies have corroborated the allegations against the local civil and armed police and found them siding with the rioters belonging to the majority community and ensuring heavy losses of life and property over the hapless minorities.

Army, as opposed to them, has almost always found to be impartial law-enforcer. Indian army has merely bolstered its image with its dogged opposition to the government’s attempts of dragging it to contain the ‘Maoist’ insurgency that has spread over many parts of erstwhile peaceful parts of central India. Its treatment of the problem as a civilian conflict which should be dealt by the civilian administration has not only helped its case of not getting dragged into a war with its own people but also has stopped the insurgency from fanning out into a full-blown civil war. This army, unlike many others in the subcontinent, seems to know the rules of engagement with citizens as against the enemy.

Not really, for the rosy pictures gives way to a thorny reality once one starts getting close to the international borders. The same army which enjoys the confidence of the minorities even in a state as communally volatile as Gujarat loses all of that in Manipur. Think of it, Manipuri Hindus belonging to the majority religion of India are as fearful, and scornful, of the Indian army as are the Christians of Nagaland and Muslims of Kashmir. Interestingly, in these ‘disturbed’ areas, the army that takes pride in its secular credentials starts speaking a language rooted in theology and vouches for black laws like Armed Forces Special Powers Act, 1956(AFSPA) as being pious and indispensable for its operations.. Ask them how they contain riots in rather mainstream parts without such protection, and they repeat that AFSPA is pious.

Dig a little deeper and a thousand skeletons come tumbling out of the closets of the Indian army. The skeletons are of those who are otherwise buried inside yellowing files that declare them to be ‘missing’, sometimes for decades and deny, in the process, closure to their kith in kin. The skeletons must have belonged to someone like us, alive, before finding their bullet-ridden bodies getting summarily buried in over 2,700 unmarked graves scattered across three districts of Kashmir. Think of the existence of 2,700 unmarked graves whose existence even Indian government could not wish away and was shamed into ordering a probe into. Sometimes the dead scream louder than the living, don’t they?

The stories of such bravery of Indian army are not limited to otherwise serene and scenic province of Jammu and Kashmir alone. It has received many such medals in the North-East of the country, ironically, just as scenic as Kashmir and therefore dubbed as the ‘lost paradise’ in the ‘incredible India’ campaign launched by the tourism department of Indian government. Paradise it certainly is, at least for those who were sent to their graves by the Indian army. In these parts of the country, epitaphs do not remain as epitaphs; they turn into the medals decorating the officers of Indian army. Look intently at them and one can read the stories of bravery of army officers inscribed in bright red letters on these epitaphs.

Top brass of both the Army and the civilian administration is well aware of the situation. They keep on responding to the enormity of the problem as well. The responses center around warning the ‘erring officials’ and ‘repeated’ adoption of policies named like ‘zero tolerance regarding human rights violations’. They also keep directing their field commanders to ‘exercise maximum restraint’, appeal them to ‘use minimum force’, that too ‘in good faith’. Then the field commanders respond by nabbing a young, unarmed surrendered militant to compensate for their failure to apprehend real ones, drag him inside a medical shop, and come out with the dead body of his. That a heavily pregnant unarmed civilian Rubina was also killed in the ensuing melee is beside the point for Indian army does believe in the idea of ‘collateral damage’ even if it does not acknowledge that. They could have justified even this had Tehelka, a reputed newsmagazine, not brought out definitive photographic evidence of him being unarmed.

Then the field commanders in Kashmir follow it up by shooting to kill teenagers pelting stones at their armoured convoys knowing fully well that the stones contain no significant risk either to the vehicle or the soldiers inside. They do it with such aplomb that even the Prime Minister of the country has to wake up from his slumber and take note. It does not really matter that it takes him more than two months and fifty killings for doing so, does it? He then acknowledges that militant activities in the state had been ‘curtailed’ and now it was the ‘public order dimension’ that has become ‘a cause of serious concern’. Standing true to his affable image, he called upon the officers for revisiting the ‘standard operating procedures and crowd control measures to deal with public agitations with non-lethal, yet effective and focused measure.’

The same Indian army which has doggedly refused to be dragged in ‘civilian strife’ raging in the jungles of central India does not think twice before shooting at teenage protesters! Do the responses seem to come out of the same forces? Not really, for its not only the Army but Indian polity itself which is so fiercely divided over the ways to deal with the ‘insurgency’ or the ‘public order’ problem or whatever it is in the border areas. Nothing defines this rupture more than juxtaposing the calls of Omar Abdulla, the Chief Minister of Jammu and Kashmir and those of Cabinet Committee on Security. Mr. Abdullah’s appeal to the security forces for exercising ‘maximum restraint’ was followed by Cabinet Committee ordering the same forces for ‘maximum crackdown on the miscreants’.

How does, then, the army maintains its affable and pro-people image in the largely peaceful northern and southern provinces of the country. Simple, it does that by employing the same methods which it does to maintain its ‘clean’ and ‘incorruptible’ image despite having a long and shady history being knee deep in corruption. It keeps itself aloof from the local nexus of corrupt officials and influential politicians and steers clear of controversies. The ‘image’ of the army gets a much bigger boost, though, from the fact that it does never meddle into muddy waters of ‘politics’.

Politics being ‘the dirty thing’ for the middle classes; an apolitical army got to be loved by the middle classes, is not it? It is politics, after all, that stands as the single biggest hindrance to their efforts of usurping all sources of power including the public opinion and dissent. The army, however, does not return the favour. It views and treats the ordinary folks with a little disgust; a disgust betrayed by the way the army men look down upon ‘civilians’.

This is the contradiction that defines the behavior of army men right from the level of ordinary soldier to top general. They perceive themselves as the Brahmins of Indian society, pure, incorruptible and virtuous unlike the ordinary civilians. Dig a little deeper, however, and this façade collapses like a house of cards. The inside stories from this holy cow institution are not only haunted by a thousand scams, they have had shady characters like Adnan Khashoggi and Chandraswami as their lead protagonists.

The bogey of the scams within army that started with Jeep scam soon after the independence and ended up making Jawaharlal Nehru cry during the debate in the parliament did never end. Forget the ones like Tatra trucks and Bofors, the arms lobby that operates within the army, in fact, did not think twice even before minting money out of the coffins of soldiers who laid their life for the country in the Kargil war. So much to support the claims of army being the infallible institution defining the country!

This is why the army needs to confront with itself to resolve all these contradictions. The honour of the Indian army lies in the fact that unlike its counterparts in many other countries, including Pakistan and Bangladesh, it has never ever challenged the constitution that imbues sovereignty in the people and makes them supreme. It had won laurels for the patience it showed in tough operations like Operation Blue Star. It has earned respect for its dogged refusal to get dragged into civilian conflicts like the one raging in Bastar and other parts of central India.

The same army, however, recently has been in news for all the wrong reasons. Its soldiers have repeatedly violated the fundamental rights of the citizens they are duty bound to protect in areas dubbed as ‘disturbed’ under a draconian and bad in law act Armed Forces Special Powers Act. There had been skirmishes between the soldiers and the officers. Its formal general has gone to the Supreme Court against the government that had appointed him, a first in the hitherto unblemished history of Indian Army’s complete submission to the civilian administration that is the most crucial guarantee for a functioning democracy. To top it all, it has, reportedly, moved two of its units towards Delhi without prior permission of the government. It is no one’s case that the practice was an attempt of coup or something like that, yet, the fact it happened with the general being embroiled in a legal battle with the government makes it alarming.

The point is simple, it is high time for the army to reengage not only with its own soldiers but also the general population which it disdainfully refers to as ‘civilians’. It must sensitise its soldiers against violating the human rights of ordinary citizens of India irrespective of wherever they live. It must immediately stop to treat states like Jammu and Kashmir, Nagaland, Manipur and Assam as enemy territories and their people as enemy combatants. It must instill within them the same sense of confidence it evoked within the minorities of Gujarat facing the worst ever pogrom against them, orchestrated and led by the state authorities.

Unfortunately, this seems to be a tall order for an army that tries to goes out of the way to protect its officers guilty of violating human rights of their fellow citizens. Remember the former general V.K Singh who confessed that he could not do anything against the person, including senior army officers, who offered him a bribe for making arms deal, and the job looks like an impossible one. The stakes are rather high, though, to let the job of reforming army from within unfinished.

The laws of the land and rights of its citizen are one and the same. We must realize that if an army officer can get away with impunity after violating the rights of a fellow citizen in Kashmir, however deeply entrenched in mainstream India we are, we would not remain safe for long. Every such violation of the rights of a citizen of India, therefore, threatens the democracy. We have not gone the Pakistan, or Bangladesh way till now partly because our army did not go that way either and we need to keep the record unblemished. Sensitising the army men regarding the human rights of citizens and demolishing the arms lobby can be a beginning.

November 14, 2012

सुतली बमों से उड़ा दिए गए तमाम घरौंदों के नाम


बचपन का त्यौहार थी दीवाली. दिए अच्छे लगते थे पर जान तो पटाखों में ही बसती थी और उनमे  भी सबसे ज्यादा हरे 'एटम बम' (शहरी हो जाने के पहले के उन दिनों में उच्चारण बम्ब होता था ) और कसबे के आतिशबाज से लाये उन सुतली बमों में जिनकी आवाज पर आज तक कोई और आवाज भारी नहीं पडी. उन बमों के इस्तेमाल भी तमाम होते थे. आख़िरी, पर सबसे प्रिय, काम होता था बीतती रात के साथ कम होते जा रहे सुतली बमों से बहनों के बड़ी मेहनत से बनाए घरौंदों को उड़ा देना. अब फिर कस्बाई सामाजिकता में जिसमे अपनी बहनें ही नहीं बल्कि मोहल्ले की सारी लड़कियां बहनें होती थीं, घरौंदे कम नहीं पड़ते थे बस बम ख़त्म हो जाते थे.  फिर सुबह होती थी और बहनों का रोना. एकाध बार माँ से पिट जाना भी हो जाता था पर वो बस एकाध बार ही होता था बाकी तो उन्हें चुप होने की सलाहें ही होती थीं, घरौंदा ही तो था की डाँट के साथ.

बहनों के घरौंदे उड़ा कर खुश होने वाले उन समयों में पितृसत्ता के बारे में कहाँ पता था. इसका भी कि इन तमाम त्यौहारों का कितना करीब का रिश्ता है उस व्यवस्था को बनाए और बचाए रखने में. पितृसत्ता की हमारी कक्षाएं तो पैदा होने के साथ ही शुरू हो जाती थीं शायद, तबसे जब हमें बोलना भी नहीं आता था पर अपनी ही बहन का घरौंदा उड़ा देने वाली हिंसात्मक पितृसत्ता से सीधी मुठभेड़, या आत्मसाक्षात्कार का बायस दीवाली ही बनती थी. हाँ, यह तब खटकता नहीं था.

खटकता तो शायद और भी बहुत कुछ नहीं था. जैसे यह कि और तमाम त्योहारों के मुकाबले दीवाली बहुत आभिजात्य, बहुत दिखावे वाला, और उत्सवधर्मिता को खारिज करने की हद तक निजी त्यौहार है. न तो इसमें वह गंगाजमनी सामाजिकता है जिसमे पूरा का पूरा क़स्बा होली में एक दूसरे के साथ खुशी बाँटते रंग लगाते बह जाता है न वह गर्मजोशी जो ईद में लगभग अजनबियों को भी गले लगाते हुए महसूस होती थी. इन सबके उलट दीवाली इस सामाजिकता को बांटने वाला, लोगों को उनके सबसे छोटे घेरे में ले जाने वाला त्यौहार ही है, बस तब समझ नहीं आता था अब समझ आता है. वाली अब भी याद है कि कस्बों की वर्गीय आधार पर मिली जुली बसावटों में दीपावली रईसी की दिखावट के साथ साथ गरीबों को मुंह चिढ़ाने का सबसे बढ़िया वक़्त होता था. बात पर थोड़ी भे असहमति हो तो गई रात तक मंहगे पटाखे फोड़ते बच्चों को सूनी आँखों से देखते गरीब बच्चों को याद करिए और सोचिये की क्या यह दिवाली का सबसे आमफहम दृश्य नहीं है?

हाँ, दिवाली के ठीक अगले दिन आने वाले ‘परुआ’ की बात और होती थी. वह दिन जो ‘हिन्दू पंचांग का शायद सबसे अशुभ दिन माना जाता है. इतना अशुभ कि माँ तक बताती थी की इस दिन कलम पकड़ना तक पाप होता है. (इसीलिये तब के बाल-विद्रोही समर बाबू और किसी दिन अपने मन से पढ़ें लिखें या न पढ़ें लिखें, इस दिन वह पढ़ते भी थे और लिखते भी.) ऐसा दिन जिसमे कस्बे की सारी दुकानों पर ताले लटके होते थे और बाजार में शमशानी सन्नाटा पसरा होता था. अब चूंकि कस्बों में दैनिक दिनचर्या से अलग कुछ करने को कोई ख़ास काम होते हैं न घूमने जाने को पार्क/माल, सो बंद दुकानों वाली सारी भीड़ कस्बे की दो टूरिंग टाकीजों में जमा हो जाती थी. कमाल यह की उस दिन यह भीड़ फिल्म के परे जाकर फिल्म देखती थी, फिल्म कोई भी हो, चारों शो हाउसफुल जाने ही जाने हैं. मुझे अब भी लगता है की मेट्रो, महानगरीय हिन्दुस्तान में दीवाली ‘बम्पर कलेक्शन’ का दिन हो, मुफस्सिल हिंदुस्तान में यह तमगा ‘अशुभ’ परुआ ही ले जाता होगा. वैसे परुआ अशुभ क्यों होता था ये आज तक पता नहीं चला.

खैर, जिन्दगी के सफ़र में वो बचपन वाली दीवाली तो न जाने कब खो गयी. और अच्छा ही हुआ कि खो गयी, न खोती तो आज भी न समझ आया होता की सम्मान हत्यायों की मंजिल तक पंहुचने वाले सफ़र की शुरुआत बहनों के घरौंदे उड़ाने से ही होती थी. उस खोयी दीवाली की याद मगर अक्सर आ जाती है. तब जब उल्लू पर बैठ के आने वाली लक्ष्मी की कपोल कल्पनाओं की बधाई कोई दोस्त दे जाए, तब जब अब बड़ी हो गयी बहन अपने बच्चे को पटाखे दिलाये और वही पूजा करती मिले जो माँ करती थी. तब जब फेसबुक वाइरल बधाईयों की बाढ़ से बह सा जाए.

और तब जब आप दिवाली के दिन भी ऑफिस में काम करते हुए देख/सुन पा रहे हों क्योंकि आप जिस मुल्क में हैं वहां दिवाली पर कोई छुट्टी नहीं होती. वह भी तब जब उस मुल्क में ‘40000 से ज्यादा हिन्दू रहते हों. काश अपने वतन के धर्मध्वजाधारी देख पाते यह, और समझ पाते की न तो बहुसंख्यक होने का सुख सिर्फ उनका है न अल्पसंख्यक होने की त्रासदी उनके चुने हुए दुश्मनों की.
तब तक एक आत्म स्वीकार-- नास्तिक हो चुके होने के बाद की यह पहली दीवाली है जिस पर घर, दोस्त, वतन सब बहुत याद आये. त्यौहार की वजह से नहीं, बस सिर्फ इसलिए कि इस बार दीवाली को दूर से, लगभग निस्पृहता से देखने को मजबूर था. उस शहर के अकेलेपन से जिसमे पटाखे फोड़ने को भी पुलिस की परमीशन लेनी पड़ती है (और वह मिलती नहीं.) कल्पना करिए ऐसे शहर की, अपने मुल्क के बरक्स जहाँ भगवा और हरे दोनों तरफ के बमबाज बम विस्फोट के लिए भी किसी की इजाजत नहीं लेते.

November 06, 2012

Punish private profiteers responsible for stealing children's food

This is an AHRC statement.


In yet another shocking revelation private companies have been found to be stealing food earmarked for welfare schemes aimed at arresting malnutrition, the biggest 'national shame' according to the Prime Minister Manmohan Singh and 'humiliation like none other' according to President Pranab Mukherjee. The only thing that is more shocking than the revelation is the enormity of the loot from the one of the flagship project of the incumbent United Progressive Alliance government. The companies have been stealing more than 1000 Crore INR, or USD 185 Million in the state of Maharashtra alone. The report estimates total stolen amount to be close to 8000 Crore INR and finds that all this is done in direct contravention of various orders of the Supreme Court in the Civil Writ Petition 196/ 2001 (PUCL vs. UOI).

The findings are from the report of Biraj Patnaik, Principal Adviser, Commissioners to the Supreme Court and were submitted to the court with reference to SLP (Civil) No. 10654 of 2012 in the matter of Vyankateshwar Mahila Auyodhigik Sahakari Sanstha v. Purnima Upadhyay and Others listed along with Civil Writ Petition 196 of 2001 (PUCL v. UOI). The report explores into the iron grip maintained by the private profiteers in collusion with the vested interests deeply entrenched in both political and administrative hierarchy and traces the modus operandi they use to siphon off rations earmarked for the millions of starving Indians.

The report shows how private companies had usurped the supply chains of the Integrated Child Development Scheme by floating fake 'mahila mandals' (women collectives) which are in fact nothing more than fronts of their private for profit operations. The usurpation clearly contravenes the clear-cut and binding order of the Supreme Court delivered on 13th December 2006 that directed Chief Secretaries of all states and union territories 'to submit affidavits giving details of the steps that have been taken' with regard to an earlier order of the Court directing that 'contractors shall not be used for supply in Anganwadis and preferably ICDS funds shall be spent by making use of village communities, self-help groups and Mahila Mandals for buying of grains and preparation of meals.
But it does not stop at merely contravening the Court's order. It also shows that the Indian executive has not merely become absolutely inefficient and incompetent to discharge their mandate but has also capitulated to the vested interests to the extent of enforcing the Supreme Court's order. The report, further, shows that this is not merely public money but also children's lives that these profiteers are playing with. The report very clearly indicates at the collusion of the suppliers and the solitary lab they use for quality check as every single random sample of the take home ration (THR) taken to the government lab failed miserably on the nutrition standard. This was also the finding, the report notes, of an independent quality check of THR by investigation bureau of English newspaper Daily News and Analysis through a private lab yielded similar results. Needless is to say that this endangers the lives of the children consuming these rations.

Most unfortunately, the findings might be limited to the implementation of the ICDS but this is the state of affairs prevailing in the implementation of almost all other schemes. In fact, the very recommendation of the Commissioners to the Court is a telling comment on the executive and its nexus with the corrupt corporate and political players. The commissioners want an independent inquiry, under the supervision of the apex court, to be conducted for investigating the possible nexus "between politicians, bureaucrats and private contractors in the provisioning of rations to ICDS, leading to large scale corruption and leakages".

The AHRC strongly endorses the recommendation and demands for not only an impartial and time bound investigation into the issue but also stern punishment for those responsible for multiple crimes of stealing public money and putting the lives of Indian children at risk. India will have no moral right to claim itself as even a democracy; leave alone the largest democracy of the world, if it fails to stop this culture of impunity and establishes rule of law in the true sense of the word.