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August 06, 2012

संस्कृति लड़कियों के कपड़ों में नहीं बसती आखेटकों!!


वे निकल पड़े हैं. अबकी बार यूं ही नहीं निकले हैं वो. लाठी डंडों, हथियारों भगवा साफों, भारत माता की जय जैसे नारों वाले अपने पुराने औजारों के साथ साथ इस बार तो कैमरों से भी लैस होकर निकले हैं वो. जरूरी भी था भाई, भारी बड़ा काम आ पड़ा हैं उनके नाजुक राष्ट्रवादी कन्धों पर. वैसे भगवा ही क्यों, मसला संस्कृति को, तहजीब को बचाने का हो तो भगवा और हरे झंडे वालों में कोई फर्क बाकी नहीं रह जाता.

पर यहीं एक बड़ी दिक्कत आ खड़ी होती है. अब काम इतना बड़ा हो और जहनियत इतनी छोटी तो मुश्किल तो होती ही है न. अब भारत माता के इन जियालों को ये तो पता था कि राष्ट्र की संस्कृति खतरे में है पर यह नहीं पता था कि राष्ट्र की वह संस्कृति रहती कहाँ है. सो उन्होंने बहुत सोचा, बहुत दिमाग लड़ाया और आखिर में तय किया कि संस्कृति लड़कियों के कपड़ों में रहती है. हाँ, रोज होने वाली दहेज हत्याओं में संस्कृति नहीं रहती. सो जितने ज्यादा बड़े कपड़े, उतनी सुरक्षित संस्कृति. सो बस. जियाले निकल पड़े संस्कृति बचाने.

वे बंगलौर में निकले थे. श्रीराम सेने के नेता प्रमोद मुथालिक के रूप में. घुस गए थे पबों में. खूब कहर बरसाया था उन्होंने वहाँ मौजूद लड़कियों पर. वे मेरठ में निकले थे. पहले तो ऑपरेशन मजनू चला कर जिसमे उन्होंने शहर भर में कार्यवाही कर लड़कियों के साथ यौनहिंसा करने वाले 200 से ज्यादा शोहदों को गिरफ्तार कर उनकी परेड निकाली थी. यह और बात कि उन्होंने उन शोहदों को 'यौनहिंसक' नहीं बस मनचला भर बताया था और उन्हें गिरफ्तार करने में भी अपनी प्रेम माने की स्वतंत्र चुनाव विरोधी मानसिकता का अखूब मुजाहिरा किया था. सोचिये तो जरा, कि यौनहिंसकों को मजनू नाम देने में कौन सी ग्रंथि काम करती है? उस बेचारे मजनू का जो लड़कियों को 'छेड़ता' नहीं था बल्कि अपने प्रेम के सम्मान में दुनिया से लड़ जाने को तैयार होता था.

और फिर तो उन्होंने हद ही कर दी थी. वे इन्स्पेकर अल्का पाण्डेय के नेतृत्व में गाजियाबाद में कूद पड़े थे. इस बार वे मजनुओं नहीं, बल्कि लैलाओं की तलाश में निकले थे. उन्होंने इस बार सार्वजनिक पार्कों की घेराबंदी की थी. उनमे किसी भी ‘पुरुष’ मात्र के साथ मौजूद लड़कियों को पीटा था, उनके बालों से घसीटा था और उन्हें सरेआम बेइज्जत किया था. प्रेम, या फिर प्रेम करने के लिए किसी से मिल सकना भर दुस्साहस है आखिर. ‘भारतीय संस्कृति’ के लिए सबसे बड़ा खतरा है. फिर किसी लड़की को ये इजाजत कैसे दी जा सकती है वह अपनी मर्जी से प्रेम कर सके. अपना जीवनसाथी चुन सके.

किया तो उन्होंने यह कई बार और भी था. कभी भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लड़कियों को जींस न पहनने देने के फरमान के बतौर. और कभी उनके ठीक उलट होने का दावा करने वाली काश्मीरी मुस्लिम महिलाओं के संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ के द्वारा लागू किये गए ‘ड्रेस कोड’ के बतौर. कहने की जरूरत ही कहाँ है कि इन संगठनों ने कभी ‘पुरुषों’ के लिए कोई ‘कोड’ कोई ‘आचार संहिताएं’ जारी नहीं की.

पर आचार संहिताएं जारी करना आसान काम है और यौन हिंसकों से लड़ना जरा मुश्किल. बेवजह थोड़े ही है कि भारतीय संस्कृति/इस्लामी संस्कृति/राष्ट्रीय संस्कृति के इन ठेकेदारों की असली यौन हिंसकों को देखते ही फूंक निकल जाती है. (इस्तेमाल तो कुछ और ही, बहुत ही गंदे शब्द करना चाहता था पर इनके जितनी बेशर्मी कमा ही कहाँ सका कभी. अपनी माँ की दी हुई सीख हमेशा साथ रहती है न). आपने कभी देखा है इन्हें गुवाहाटी में अतानु भुइयाँ के भेजे हुए गुंडे (पत्रकार) गौरब ज्योति निओग के निर्देशन में अमरज्योति कालिता के द्वारा की जा रही यौन हिंसा के खिलाफ लड़ते हुए? या राजस्थान में भंवरी देवी का यौन शोषण और फिर हत्या करने वाले कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ सड़क पर उतरते? या फिर अभी आज ही आयी अनुराधा बाली उर्फ फिजा यानी कि भजनलाल के पूर्व(?) पुत्र चंद्रमोहन की पूर्व पत्नी की आत्महत्या/हत्या के खिलाफ मोर्चा निकालते हुए?

नहीं. आप नहीं देखेंगे इनके कभी ऐसा कुछ करते हुए. क्योंकि सड़क पर उतर शोषकों के खिलाफ लड़ना बड़ा मुश्किल होता है जबकि किसी बार, किसी पार्टी में मौजूद लड़कियों के कपड़े फाड़ना बहुत आसान. पर शायद यही वक्त भी है इन्हें यह बताने का कि अब नग्न परेडों की बारी इनकी है. आप तैयार हैं? अगर नहीं तो तैयार रहिये अपने परिवार की लड़कियों/महिलाओं को इनके जुल्मों का शिकार बनता देखने के लिए. अगर हाँ तो इन्हें यह बताने के लिए की संस्कृति लड़कियों के कपड़ों में नहीं बसती आखेटकों.

28 comments :

  1. काश इन मूर्खों को यह सब पढ़ कर कुछ अक्ल आये !

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  2. बहुत सही लिखा है....पर ...:(

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  3. इन भटके हुए नौजवानो से कहीं अधिक बड़े अपराधी वे सयाने लोग हैं जो इन्हें ऐसी सद्बुद्धि देते हैं और खुद संसद में बैठ कर पॉर्न देखते हैं ।

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  4. i have myself raised this issue so many times on the hindi blog front and i am surprised every time i do it on naari blog , i am sure to get a get comment "how characterless i am " and how i am trying to spoil the sanskriti by telling woman that constitution and law has given them equal rights to do what the want , which includes wearing their choice of clothes

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  5. हिमांशु भाई, पम्मी जी, 'मिसिर' जी और रचना जी..
    वक्त अब इन मूर्खों को ज्ञान देने का नहीं बल्कि इन्हें 'इनाम' देने का है. इनकी 'नग्न परेड' कराने वाली पंक्ति सिर्फ पंक्ति नहीं, आह्वान समझी जाए.

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  6. समर
    अगर आप इनकी नग्न परेड भी निकाल दे तब भी इन्हे क़ोई फरक नहीं पडेगा क्युकी यही तो ये कहते हैं की स्त्री को दबे ढंके रहना होगा, शरीर दिखाने का अधिकार केवल और केवल पुरुष का हैं
    मै बिना दुविधा कह सकती हूँ की नग्न परेड को अपनी शान समझे गे और फिर बाकायदा ये यही करेगे ताकि जीने शर्म आये वो अन्दर रहे
    आज भी आप को जगह जगह खुले में ये लोग बिना हिचक सार्वजनिक मल मूत्र त्यागते दिखते हैं इस लिये नहीं क्युकी आस पास क़ोई टोइलेट नहीं होता बल्कि इस लिये क्युकी "ये इनका जन्म सिद्ध अधिकार हैं " . जो परेशानी टोइलेट ना होने से एक स्त्री को होती हैं वही इनको होनी चाहिये लेकिन नहीं इनके लिये सब कुछ आसान बना दिया गया हैं
    और अगर आपत्ति करो तो सुनाई देता हैं हमने आप को कब मना किया , आप भी बैठ जाओ .
    बहुत से ऑफिस में , शोपिंग काम्प्लेक्स में जहां लेबर काम करती हैं वहाँ स्त्री के लिये बने शौचालय की चाबी क़ोई ना क़ोई मेल सुपरवाइजर रखे रहता हैं और किसी महिला को वहाँ जाना हो तो बड़े ही विद्रूप ढंग से मुस्कुरा कर चाभी देता हैं

    मै जानती हूँ की आप जो कह रहे वो गलत नहीं हैं पर ये समाधान नहीं हैं , क्युकी यही उनकी मानसिकता हैं
    हमे अगर कुछ ठीक करना हैं तो law abiding citizen बनाने की प्रक्रिया को शुरू करना होगा .

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  7. एक सार्थक आह्वाहन!सटीक कटाक्ष अधूरे प्रयासों पर!
    कुँवर जी,

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  8. हाँ अब वे जिस्म को उधेड़ रहे हैं .......यह सब करने से किसी को क्या मिलता है ?

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  9. ये जो नौजवान इस परेड में शामिल हो रहे हें या फिर धावा बोल कर लड़कियों और महिलाओं के लिए आचार संहिता बनाने की बात करते हैं , उन्हें खुद नहीं पता है कि वे किसके इशारे पर कर रहे हैं? ये वो छुट्टा जानवर है कि इन्हें जहाँ भी हांक दिया जाय वही चल देते हैं और वही करके निकल जाते हैं . उसके मतलब और उद्देश्य से वाकिफ तक नहीं होते हैं . इन्हें इस्तेमाल किया जाता है. संस्कृति से इनका कोई भी लेना देना नहीं है. संस्कृति तो देश के चंद रसूख वालों की जेब में पड़ी रहती है. चाहे चाँद मुहम्मद हों, ध्रुव नारायण हों, अमरमणि त्रिपाठी हों. इनके लिए सब कुछ जायज है. एक औरत की भावनाओं से खेलना इनकी संस्कृति में शामिल है एक क्यों दो और चार कहिये क्योंकि जो सामने से गुजर गया वह उजागर हो गया नहीं तो संस्कृति इनकी गुलाम है .
    सही दिशा में तो ले जाने का साहस किसी में नहीं होता है. बस चर्चा में रहने का एक मसाला चाहिए . लड़कियों के विरुद्ध बातें करना या फिर उनके चरित्र पर कीचड उछालना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. कोई क़ानून इस देश में नहीं बना जो ऐसे लोगों को काबू में लगा सके.

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  10. मगर लडकियां रेसिस्ट क्यों करती हैं,गांधीगीरी दिखलायें प्यार की लप्पी झप्पी दें,कपडे उतारने के बाद फिर शर्म कैसी? -

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  11. क्या हमारे मित्र यही सलाह अपने घर में भी देते होंगे? यह न कहिए कि उनके परिवार की स्त्रियाँ तहों में ढकी रहती होंगी। त्वचा तो कभी किसी ने देखी ही न होगी। याद रहे जो आपके लिए सुसंस्कृत ढका छिपा है वही किसी अन्य के लिए नग्न है। जो आपके लिए उद्दीपन है वह किसी अन्य के लिए सामान्य है।
    मुझे याद है कि पूरी बाँह के, पूरी पीठ को ढकते, साड़ी तक आते, ऊँची कॉलर वाले ब्लाउज भी साऊदी अरब में पुरुषों को विचलित कर जाते थे और वे हमें टोकते थे। इरान में तो स्त्री के पाँव भी मोजों में ढके होने चाहिए अन्यथा उन्हें देख पुरुष बेचारा...! अब पुरुष की फिक्सेशन का क्या... यदि सिर के बाल हों, पाँव हों, नाक हो या कान !
    समस्या कपड़े पहनने वाले या कहिए वाली की नहीं, समस्या एक्स रे दृष्टि वालों की है जो शायद नवजात बच्ची देख भी विचलित हो जाते होंगे। बताते न होंगे यह अलग बात है। शायद इसी स्थिति से बचने को अपने परिवार में स्त्री भ्रूण हत्या करवाते होंगे। वनमानुष यदि शहरी मानुष के अन्दर छिपा घूमे टहले तो वह अपने रोग का इलाज करवाने की बजाए अन्य को दोष दे उनपर झपटने लगता है। आजकल तो बहुत इलाज आ गए हैं इन हॉर्मोन्स की बाढ़ को कम करने को.
    जो वस्त्र संस्कृति के रखवाले पहनाते हैं वे ही किसी अन्य स्थान में बेहूदे माने जाते हैं। ये वे ही लोग हैं जो न अन्य भाषा, रंग, चेहरों, नाक आँख की बनावट को स्वीकार कर सकते हैं न अन्य की जीवन शैली, कष्ट, मजबूरी को। किसी को कलवा कहते हैं तो किसी को चिंकी, किसी को बाँझ तो किसी को रंडी, किसी का विवाह न होने पर इन्हें शिकायत होती है तो किसी के मनपसन्द विवाह से। ये अन्य को अपने साँचे में ढाले बिना न स्वयं जी सकते हैं न जीने देते हैं। इन्हें आसपास स्वतन्त्र मानव नहीं चाहिए इनके आदर्श मानव मानवी के क्लोन चाहिए।
    समर आपका लेख पढ़ अच्छा लगा जानकर कि सब आखेट पर नहीं निकले हुए हैं। आभार।
    घुघूती बासूती

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  12. आखेटक तो अन्दर-बाहर हर जगह हैं. कितने दिन हो गए इस बात से लड़ते हुए, पर कोई फर्क आता नहीं दीखता. बस संतोष इस बात का है कि तुम्हारे जैसे कुछ दोस्त हैं, जो हमारे साथ खड़े हैं. नहीं तो मन कब का निराशा में डूब गया होता.

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  13. हा हा हा , वैसे तो यह सब आए दिन समाचारों की सुर्ख़ियों में होता है और बहुत से कमेन्ट भी साथ होते हैं, फिर भी यह विषय बना रहेगा. तब तक- जब तक कि पिछली पीढ़ी के संस्कृति को ढोने वाले "अब कुछ फायदा नहीं" समझ हार न जाएँ. मै पहले अपना नजरिया स्पष्ट कर दूं, मै स्त्री को पुरुषों के बराबर तो क्या, उबसे कुछ ऊपर रखते और समझते आया हूँ और इसके बहुत से कारण हैं, जननी होने समेत. बात इस टोपिक की है तो यह एक स्वाभाविक उठा-पटक का नतीज़ा है जिसके पीछे कुछ "हार जाने" "खो जाने" या "लुट जाने" का दर्द भी है. आपको कुछ देर के लिए अपने घरों में भी झांकना होगा. क्या आपने किसी मां को अपनी बेटी को डांटते नहीं सुना कि ऐसे कपड़े मत पहन पापा डांटेंगे, या देर से घर क्यों आई, बता? बहुत सी ऐसी लडकियां हैं जो साड़ी या सलवार-सूट छोड़ कर कभी स्कर्ट या जीन नहीं पहनेंगी चाहे ऑफिस का बोस उसे निकाल दे. क्या आपने मुहल्ले की औरतों को किसी लड़की पर फब्ती कसते नहीं सुना- देखो तो फलां कैसे कपड़े पहन कर/फैशन की मारी घूमती है, मैंने तो अपनी बेटी को मना कर रखा है उससे मिलाने-जुलने से. इसं सबके पीछे केवल मनोविज्ञान है जो एक लेख पढ़ कर, एक बात सुन कर बटन दबाते ही बदला नहीं जाने वाला, यह चलता रहेगा. अंत में गुड या बैड न्यूज... मेट्रो में आम सीन होता है कि तीन लड़के और दो लड़कियां- किसी की कमर से किसी का हाथ, किसी के कंधे पर किसी का सर (कुच्छ बोल्ड होकर कह दूं कि सरे-आम लिपटा-लिपटी). मैंने औरतों को भी यह सब देख कर मुंह फिराते देखा है. और सर्वे में जब लड़के-लड़कियों के यौन यौन-सुख उठाने की उम्र और उनका प्रतिशत जानकारी में आता है तब भी बहस छेड़ने की इच्छा होती है. एक ओर ढलान की ओर जाती बिना ब्रेक् की गाड़ी है, दूसरी ओर एक्सीडेंट से भयभीत कुछ लोग. यह सब रूकने वाला नहीं, क्योंकि यह सब आज की परिस्थिति में होना ही है. हां, एक बहुत बड़ा वर्ग है आज के युवकों का, उनकी खुशी और उत्तेजना की बातें कोई छेड़ेगा कया? सारी बहस बेकार है, मानिए या नहीं.

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  14. समर,
    यह एक घिसा पिटा विषय है और मुझे लगता है तुम्हारी प्रतिभा ऐसे चलताऊ
    विषयों की मुहताज नहीं होनी चाहिए -यह विषय तुम उन कुछ सिसक सिसक गलदश्रु बहाने वालियों
    के लिए ही छोड़ दो वे इस विषय पर बढियां भावनात्मक कचरा बहाती रहती हैं !
    मैंने लाख बार कहा है और फिर कह रहा हूँ कि जो लोग बुद्धि और तर्क के निहायत ही निचले पायदान पर होते हैं
    वे बेशर्मी की हद तक चर्चा में शामिल लोगों के परिवार माँ बाप भाई बहन और परिवार तक उतर आते हैं .....
    बौद्धिक समाज में ऐसी अधकचरी और भोंडी बात स्वीकार्य नहीं है ....अगर यह संसार ही माँ बाप भाई बहनों का ही महज एक परिवार होता तो सृष्टि का मूल उद्येश्य ही तिरोहित होता ..
    चाहे हो हम जैवीय उद्दीपनों को अनदेखा नहीं कर सकते -पश्चिम में रेस्टोरेंट में अनावृत वक्ष की वेट्रेस होती हैं और लोग सहसा ही ग्राहकों के हाथ निपल की और बढ़ जाते हैं -और यह सब व्यवसाय के चतुर प्रबंध में ही शामिल है ..विज्ञापनों में लम्बी टांगों को भी प्रत्यक्षतः अकारण अकारण दिखाया जाता है मगर उद्येश्य नजरों को खीचना ही होता है ...
    पुरुष निर्वस्त्र घूम सकते हैं नागा साधुओं की भीड़ तुमने भी कुम्भ के दौरान देखी होगी ? मगर अनावृत नग्न साध्वियां ? कभी देखी ? क्या कारण है कभी सोचा ?
    बहुत कुछ देश काल परिस्थति पर निर्भर होता है -भारत को कुछ तो भारत रहने दो ....बौद्धिकता का तकाजा यह कदापि नहीं है कि नग्न सच्चायियों को छोड़ हमेशा एक वायुवीय स्वप्न लोक में रहा जाय ..
    बाटम लाईन: युवतियों को उत्तेजक अंगों की सार्वजनिक नुमाईश से बचना चाहिए -खुद उनके भले के लिए!
    अंततः : तुम्हे साधुवाद भी कि कुछ तो विचारोत्तेजक और एलानिया लिख रहे हो अन्यथा तो ब्लॉग जगत में मुर्दानगी छाई हुयी है इन दिनों!

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  15. @रचना जी.. यकीन करिये कि मामला इतना सीधा नहीं है. बचपन से ही 'अपराधियों' को गधे पर बैठा कर नंगा कर परेड कराये जाते हुए देखता रहा हूँ और इसके खिलाफ रहा हूँ क्योंकि यह ज्यादातर वंचित शोषित तबकों के साथ ही होता रहा है. परन्तु तथाकथित 'उच्च वर्णीय' उच्च जातीय लोग भी इन परेडों से उतना ही डरते हैं. किसी और के कपडे उतार उसे घुमाना आसान है, अपनी 'परेड' संभालना मुश्किल खास तौर पर उस मुल्क में जो 'इज्जत' के झूठे आख्यानों पर ही जीता रहा हो. इसीलिये समाधानों की अनुपस्थित तक मौजूद विकल्पों का उपयोग होना ही चाहिए.

    @घुघूती बासूती -- आपकी बात से पूरी सहमति है.

    @मुक्ति- कुछ लड़ाइयां सारी उम्र लड़े जाने के लिए होती हैं, उनमे से यह भी एक सही.

    @रेखा जी -- शब्द अलग हो सकते हैं पर भाव हम दोनों के एक ही हैं.

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  16. @अरविन्द सर..
    Senior is always right की इलाहाबादी परम्परा का सम्मान करते हुए भी यह कहना चाहूँगा कि इस मसले पर आपसे घनघोर असहमतियां है. मुझे लगता है कि "मगर लडकियां रेसिस्ट क्यों करती हैं,गांधीगीरी दिखलायें प्यार की लप्पी झप्पी दें,कपडे उतारने के बाद फिर शर्म कैसी?" लिखते हुए आपका इरादा तंज का रहा होगा पर फिर भी इस बात में तमाम सैधांतिक अंतर्विरोध हैं. जैसे सबसे पहला तो यह कि कपड़ों का शर्म से कोई सीधा अंतर्सबंध नहीं होता. विवाह के बरसों बाद भी कपडे बदलने के लिए 'बाथरूम' जाने वाले पति/पत्नियों के तमाम उदाहरण इसीलिये तो मिलते हैं. या इसके ठीक उलट कमर के ऊपर निर्वस्त्र रहने वाले आदिवासी समुदायों को देखिये जहाँ ऐसे बलात्कार और हमले नहीं होते. या उतनी दूर भी क्या जाना, अभी हाल फिलहाल तक पुरबिया गांवों में तमाम स्त्रियाँ ब्लाउज नहीं पहनती थीं/हैं न ही शर्मिंदा होती हैं.

    दूसरे, कपडे उतारने की agency का सवाल वह सवाल है जो आपके कमेन्ट में कहीं छूट जा रहा है. मसला किसी लड़की के अपनी मर्जी से कपडे उतारने का नहीं है, होता तो 'बर्न द ब्रा' आंदोलन नारीवादी संघर्षों के एक सबसे शानदार अध्यायों में से एक न होता. सवाल है कि किसी महिला के साथ दूसरों के द्वारा की गयी यौन हिंसा का, उनके कपडे जबरिया फाड़ने की मानसिकता का.

    झप्पी देने का अधिकार भी उन्ही का चुनाव होना चाहिए. और यकीन करिये कि मैं ऐसे दोनों परिवेशों का 'इनसाइडर' हूँ जहाँ झप्पी देना आम भी है और लगभग प्रतिबंधित भी. बस्ती जिले के बभनान नाम जिस छोटे से कसबे पला-बढा हूँ वहां 'लड़कियां' झप्पी नहीं देतीं, दे ही नहीं सकतीं और फिर बरास्ते इलाहबाद-दिल्ली अब जिस शहर में पंहुचा हूँ वहां छोटे कपडे और झप्पियाँ दोनों आम बात हैं. पर फिर वही चुनाव लड़की का होना चाहिए, हमें कोई हक नहीं है उन्हें यह बताने का कि वे क्या करें और क्या न करें.

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  17. @अरविन्द सर..
    इस विषय के घिसा पिटा होने की भी आपकी बात से सहमत नहीं हूँ. यह विषय घिसा पिता है ही इसीलिये क्योंकि स्त्रियों के खिलाफ यौन अपराध रोजबरोज हो रहे हैं और होते ही जा रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे आजादी के बासठ साल बाद ही दलितों के खिलाफ हिंसा रुकी नहीं है. इसीलिये मुझे तो लगता है कि ऐसे विषयों पर रोज रोज लिखा जाना चाहिए.
    बाकी बातों में परिवार लाना मुझे भी थोड़ा असहज करता है, उदाहरण के लिए मैं विचारों से वामपंथी हूँ और व्यवहार में तो लगभग बोहेमियन वाममार्गी भी. पर मेरी माँ मेरी तमाम बातों/आदतों/लेखन से सहमत नहीं है. ये एक लड़ाई है जो हमलोगों के बीच चल रही है, चलती रहेगी. पर मुझे मेरे 'व्यक्ति' के आधार पर परखा जाना चाहिए यह मैं मानता हूँ.

    हाँ इसके बाद वाली जैवीय उद्दीपनों वाली आपकी बात से घनघोर असहमति है. पश्चिम में अनावृत वक्ष चाहे हों, उन वक्ष वालियों पर हमले नहीं होते. उन्हें न कहने का अधिकार होता है. और अगर हमले हों भी तो अपराधियों को सजा मिलती है उन स्त्रियों के 'चरित्र' का हवाला दे अपराधियों को माफ नहीं कर दिया जाता. पश्चिम तो छोड़िये ही यहाँ हांगकांग और बीजिंग में ही अक्सर लिपटे हुए जोड़ों को देखता हूं, पर उन पर तो कोई हमले नहीं करता.

    और हमारे यहाँ पांच साल की बच्ची से भी बलात्कार होते हैं. वहाँ कौन सा जैवीय उद्दीपन होता होगा? मामला मेरे लिए साफ़ है कि यौन अपराध अपराध हैं और दोष अपराधी का ही होता है न कि कुछ भी पहने हुए स्त्री का.
    यह बात न मानें तो फिर हमें यह भी मान लेना चाहिए कि जेब काटने में जेबकतरे का नहीं हमारी जेब में पर्स/धन के होने का दोष है.

    बाकी आपका स्नेह बना रहे लिखने की कोशिश करता ही रहूँगा..

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  18. असहमत होना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है :-) खूब होईये मगर इसका विज्ञापन न कीजिये बार बार ...बिना इसकी घोषणा के भी बात कही जा सकती है :-)
    आप असहमत होते जाईये और अस्मतों को लुटती पिटती देखते जायिये और आप नहीं तो घडियाली आंसूं बहाने वालों की कमी नहीं है इस देश में... :-(
    मेरा कुल जमा इतना कहना है कि भारत में लड़कियों को सार्वजनिक जीवन में उत्तेजक अंगों को अनावृत न रखने वाले परिधान पहनने चाहिए जो सुरिचिपूर्ण हो शालीन हों और अनचाहे अनजाने आमंत्रण देने वाले न हों .....अन्यथा यह देश अभी उतना स्टिमुलस अनबाउंड नहीं हुआ है!
    बाकी आप युवाओं की आप ही जानो !

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  19. १-और आपने वाममार्ग की जो बात की मजा आया -हमारे यहाँ भी पारम्परिक वाममार्गी होते आये हैं -वामाचार्य...और उनकी तंत्रसाधना -योनि साधना के अद्भुत प्रयोग :-) सकूं है आप वह वाला वाम मार्गी नहीं है ... :-) घ्रणित भी है वह!
    2-बाल यौन शोषण में लड़के लड़कियों दोनों की मौजूदगी है ०शिकार और शिकारी दोनों में -हाँ इनमें उम्रदराज लोगों द्वारा की गयी चेष्टायें यौन विकृति है अपराध है -मानता हूँ ..
    ३-किशोरावस्था और उपरान्त के भी यौन अपराध,बलात्कार ही हैं मगर उनका रूट काज सभी में नहीं मगर कुछ मामलों में लिबास हो सकते हैं मैं इस बिंदु के जैवीय पहलू को सामने ला रहा था -बाकी आपसे असहमति नहीं है -अब थोडा श्लेश या तंज भी समझा करो न भाई ! भाई बहन लोग परिवार तक आ पहुंचते हैं, हम अब इत्ती भी अपनी आत्मरक्षा के लिए गए गुजरे हो गए ...? :-)

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  20. @अरविन्द सर..
    किसी भी लोकतांत्रिक विमर्श में असहमतियों की घोषणा तो करनी ही पड़ती है वरना तो किसी मतविभाजन में क्यों पूछा जाता है कि कौन सहमत है खैर नही. पर आपको घोषणाओं से परहेज है तो कोई नहीं, नहीं करता.

    आगे यह कि आप जैसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले व्यक्ति से तथ्यों के आधार पर धारणाएं बनाने का आग्रह तो रखा ही जा सकता. और कम से कम स्त्रियों के साथ होने वाले अपराध तमाम 'अंडर रिपोर्टिंग' के बावजूद नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों में मिल ही जाते हैं.
    अब उसी के मुताबिक़ बीते साल यानी कि २०११ में भारत में हुए कुल 24,270 बलात्कारों में से 2,582 यानी कि 11 प्रतिशत चौदह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ हुए थे. इन्होने ऐसा क्या पहना होगा वैसे जो 'उद्दीपन' का जिम्मेदार बने? आगे बलात्कार की शिकार अन्य स्त्रियों में 19.0% यानी कि 4,646 पीदिताएं 14-18 बरस की (अब भी नाबालिग) थीं. मतलब यह कि कुल बलात्कारों में से 30 प्रतिशत तो नाबालिग लड़कियों से साथ होते हैं.
    आगे इनमे से 267 मामलों यानी कि 1.2% बलात्कारों में पिता/चाचा/भाई शामिल थे जबकि 1,560 यानी कि 7 प्रतिशत मामलों में परिवार के निकट रिश्तेदार! इससे ज्यादा कुछ कहूँ?
    बेशक यह तो उद्दीपन के मामले नहीं होंगे न? बलात्कार के लिए स्त्रियाँ और उनके कपडे नहीं बलात्कारी पुरुषों की ग्रंथियां जिम्मेदार हैं अरविन्द सर और सच बस यही इतना है. बाकी आपकी सुविधा के लिए NCRB का लिंक लगा दे रहा हूँ.
    http://ncrb.nic.in/

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  21. अरविन्द सर..
    वाम मार्ग के पञ्च मकारों में मैथुन के सिवा भी बहुत कुछ है. और मैथुन भी कुछ उतना जरूरी कहाँ है.. आप तो बनारसी हैं औघड़ों को जानते हैं, समझते हैं.
    मैं निजी जीवन में अराजकता वाला वाममार्गी हूँ.. मत्स्य/मांस/मदिरा/मैथुन/मुद्रा में कुछ से तो बिलकुल ही दूर और कुछ में बिलकुल अराजक.. सूरज अस्त वाली परम्परा का योग्य जियाला..
    बाकी तो सब ताराचंदी वरिष्ठों से सीखे अजाब हैं..

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  22. क्या कोई प्रकाशित आकड़ा बच्चों (मेल ) के साथ यौन अपराधों का भी है ?

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  23. @अरविन्द सर.. (मेल) बच्चों के साथ यौन अपराधों पर भी प्रकाशित आंकड़े हैं. तमाम संगठन इस पर काम भी कर रहे हैं. हाँ इन अपराधों में भी पुरुष ही सबसे ज्यादा संख्या में हैं..
    यह लिंक देखें..
    http://thealternative.in/articles/boys-dont-cry

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  24. अरविंद जी आपके कहने का यह मतलब है कि लड़ियों के छोटे कपड़े पहनने से ही उनपर होने वाले अपराधों की अधिक संभावना है?? आप इस बात को सही ठहरा रहे हैं, तो आपको देश भर में होने वाली हिंसक प्रतिक्रिया भी ठीक लगनी चाहिए। क्योंकि आपका मत तो यही है कि किसी को उकसाओगे तो वह प्रतिक्रिया देगा ही। और शायद फिर आप उन तमाम बलात्कारों की घटनाओं को भी नकार देंगे जो गांओ और ऐसी जगहों में होते हैं जहां यकीनन महिलाएं स्कर्ट पहन कर नहीं घूमतीं।

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  25. अरविंद जी..
    प्रकाशित मामलों की बात न ही करें तो बेहतर हैं। क्योंकि देश में होने वाले अपराध और और सामने आने वाले आंकड़ों के सच को सभी जानते हैं। उस पर भी आज की मीडिया किस तरह काम करती है ये सभी जानते हैं। आपका यह प्रश्न आर्श्चर्यजनक है।

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  26. http://chitthacharcha.blogspot.in/2012/07/blog-post_13.html
    http://www.praveenshah2.blogspot.in/2012/07/blog-post_28.html

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  27. sharing here--


    https://www.facebook.com/groups/ThinkersForumGroup/?bookmark_t=group

    hope u dont mind....

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