Featured Post

नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

August 31, 2012

आरक्षण नहीं, जाति समस्या है.

[प्रभात खबर में कोटा नहीं, जाति है समस्या शीर्षक से 1-09-2012 को प्रकाशित]

देखने में यह बहुत मासूम सा तर्क लगता है. आरक्षण खत्म कीजिये, जाति अपने आप चली जायेगी. फिर यह तर्क कहीं भी टकरा सकता है. एक दिन उच्चवर्ग में शामिल हो जाने के सपने देखती मध्यवर्गीय आँखों में, अन्ना हजारे के ‘आंदोलन’ में लहराते ‘क्रांतिकारी’ मनुवादी मोर्चे के झंडे में, चेहरों की उस नयी किताब की दीवालों में, कही भी. यह तर्क देने वाले ज्यादातर लोग हमारे ही वर्ग से आते हैं. यह तर्क देते हुए उनकी आवाज में अंतिम सच जान चुके होने की आश्वस्ति होती है. वे जानते हैं आरक्षण देश के विकास के लिए घातक है, योग्यता के खिलाफ है और अगर यह ठीक भी हो तो कैसे इसका लाभ जरूरतमंदों तक न पंहुच दलित-बहुजन वर्ग के अपने अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है.

पर फिर यहीं एक सवाल बनता है कि इस तर्क की राजनैतिक और दर्शनशास्त्रीय अवस्थिति क्या है? यह तर्क खड़ा कहाँ से होता है? ज्ञानमीमांसा को तो छोड़ ही दें, क्या इस तर्क में किसी को सत्यान्वेषण के लिए तैयार कर सकने की भी तार्किक संगगता है? या फिर विशुद्ध समाजवैज्ञानिक सन्दर्भों में देखें तो इस तर्क की वैधता और विश्वसनीयता है भी या नहीं और है तो कितनी है?
कार्य-कारण की सबसे भोथरी समझ के साथ भी देखते ही यह तर्क भरभरा के ढह जाता है. ऐसे कि ऐसे कि आरक्षण जाति के पहले नहीं बाद में आता है. ऐसे कि आरक्षण कारण नहीं परिणाम है. परिणाम भी ऐसा नहीं कि खुद ही से निकल आया हो. यह ऐसा परिणाम है जो कारण के कुप्रभावों से पैदा हुए असंतोष से, प्रतिकार से निकला है. समाजविज्ञान की एक विशिष्ट धारा मनोविज्ञान से उधार लिए हुए शब्दों में कहें तो यह उद्दीपन-प्रतिक्रिया वाली क्लासिकीय अनुकूलन (कंडीशनिंग) के विपरीत उद्दीपन-जीव-प्रतिक्रिया वाला वह सिद्धांत जो 'जीवन' को चुनाव की स्वतंत्रता देता है, भले ही इस स्वतंत्रता का ज्यादा उपयोग दंड के द्वारा कुछ इंसानों द्वारा बाकी इंसानों को कब्जे में रखने के लिए ही किया गया है.

आरक्षण खत्म करिये, जाति खत्म हो जायेगी के तर्क के पीछे की मनोग्रंथि यही है. उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षों के उफान वाले आज के दौर में सत्ता और संसाधनों पर काबिज वर्गों द्वारा यथास्थिति बनाये रखने को गढ़ ली गयी वह राजनीति है जो वह राजनीति है जो अपने शब्दों को शगूफों सा हवा में उछालती रहती है और फिर इन तर्कों के विरोधियों के जेहन में भी घुस जाने का इन्तेजार करती रहती है. बीते लंबे दौर से इस राजनीति का केन्द्रीय कार्यभार ही रहा है कि समस्या को जाति से खिसका कर आरक्षण पर ला खड़ा किया जाये, और यह अगर नहीं भी हो सके तो आरक्षण को भी जाति के बराबर की ही समस्या तो बना ही दिया जाय. अपने इस प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं.

इस तरह कि कि अब तमाम बार सामाजिक न्याय की लड़ाइयों के साथ खड़े साथियों के सवालों में भी आरक्षण और जाति चेतना एक ही तरह न भी सही, एक साथ तो आने ही लगी हैं. बेशक आरक्षण जातिप्रथा के अंत के लिए न तो अंतिम विकल्प है न सबसे कारगर. बाबासाहेब अम्बेडकर के ही विचारों को याद करें तो जाति के ब्रह्मराक्षस को खत्म करने का असली तरीका अंतरजातीय विवाह हैं क्योंकि वे श्रेणीगत पहचानों में बंटे समाज में बंटवारे और ऊंचनीच की मूल इकाई को ही ध्वस्त कर देंगे. पर जब तक ऐसा नहीं हो पा रहा है तब तक क्या करें? तब तक क्या जाति और आरक्षण दोनों को समस्या मान लें जैसा कि प्रगतिशील खेमे के कुछ साथी भी करने लगे हैं? यह स्वीकार करते हुए भी कि सामाजिक न्याय की राजनीति भी अपने अंतर्विरोधों का शिकार हुई है, पर इससे आरक्षण की धारणा को ही समस्याप्रद नहीं माना जा सकता. और फिर, ऐसे दौर में हल्की चूकें भी विमर्श का प्रस्थान बिंदु ही बदल देती हैं

ठीक बात है कि अस्मिताओं की राजनीति की एक सीमा होती है, उसकी अस्तित्वगत सीमा. कायदे से किसी भी अस्मितावादी आंदोलन का अन्तिम लक्ष्य अपनी 'अस्मिता'  माने अपनी पहचान को खत्म करने का ही हो सकता है, उसी में मुक्ति भी होती है. उदाहरण के लिए जैसे दलित आंदोलन का केन्द्रीय कार्यभार होगा उस दिन को लाना होगा सब समाज में जातिगत गैरबराबरी और उत्पीड़न के ढाँचे ही ध्वस्त हो जाएँ और दलित शब्द एक अस्मिता के रूप में खत्म हो जाये. पर इस सपने की राह में इस राजनीति के केन्द्रीय नेतृत्व के अपने स्वार्थ ही एक बड़े रोड़े के बतौर खड़े हो जाते हैं.

जाति के खात्मे की इस लड़ाई को बराबरी के, मुक्ति के अम्बेडकरवादी सपनों के साथ एक 'मिशन' की तरह शुरू करने वाले नेतृत्व के बारे में आज यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि वह अब भी इस मुक्तिकामी आदर्श के साथ खड़ा हुआ है. उसकी मूल दिक्कत ही यही है कि अगर वह अस्मिता खत्म करने के मूल कार्यभार पर लगे रहें तो उनका स्वयं की नेतृत्वकारी स्थिति और इसके साथ आने वाली तमाम सुविधाएँ भी खतरे में पड़ जायेंगी. इतना ही नहीं, इन अस्मिताओं के अंत के लिए प्रयास करने पर इनके भीतर आरक्षण की ही वजह से पैदा हुए उस छोटे से वर्ग की महत्वाकांक्षाओं को नुक्सान होगा जिसे हम तथाकथित उच्च जातियों की तुलना में तो नहीं पर अपने स्तर पर एक मध्यवर्ग के बतौर देख सकते हैं.

यही वह कारण है जो रिपब्लिकन पार्टी को तमाम धडों में बांटता है और जातिविरोधी आकांक्षाओं की प्रतिनिधि रही बसपा को हिंदूवादी राजनीति की अलम्बरदार भाजपा के साथ खड़ा कर देता है. इसी जगह पर आ कर मुद्दा बुनियादी व्यवस्था में परिवर्तन का नहीं बल्कि अपने प्रभाव को बनाए रखने का हो जाता है. पर इससे भी न आरक्षण के औचित्य पर कोई सवाल उठता है न इसे समस्या के बतौर देखा जा सकता है. सत्य यह है कि आज भी जाति ही समस्या है और इस बात के सबूत जनगणनाओं से लेकर अन्य तमाम सर्वेक्षणों में मिलने वाले संसाधनों से लेकर सत्ता तक में जातिगत विभेदन के आंकड़ों में देखे जा सकते हैं. 

आरक्षण को लेकर एक और सवाल है जो कुछ 'प्रगतिशीलों' के दिमागों में भी खटकता है. यह सवाल है आरक्षण की तथाकथित अंतहीनता का. उन्हें लगता है कि 'आरक्षण' सिर्फ दस सालों के लिए दिया गया था फिर इसे अब तक क्यों बढ़ाया जा रहा है. इस बात के जवाब में दो बाते हैं, पहली तो यह कि यह दस साल का नुक्ता वह झूठ है जिसे यथास्थितिवादी लगातार प्रचार की गोयेबल्सियन शैली में तथ्य सा बनाने में सफल हो गए हैं. दस साल का आरक्षण सिर्फ संसद में था, और वह भी अन्य शर्तों के साथ था. नौकरियों में आरक्षण का सवाल उससे बहुत अलग है और यह एक तरफ तो संविधानप्रद्दत विभेदन को रोक समानता को बढ़ाने वाले मूल अधिकारों से निकलता है और दूसरी तरफ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयास करने की उस जिम्मेदारी से जिसके लिए संविधान के नीतिनिर्देशक सिद्धांतों के तहत 'राज्य' वचनबद्ध है. फिर उस आरक्षण के साथ इसको जोड़ देना चूक नहीं साजिश है. इसके साथ एक और भी नुक्ता जुडता है. यह कि क्या सच में जातिगत विभेदन और उससे पैदा होने वाली गैरबराबरी खत्म हो गयी है और अब समस्या जाति नहीं आरक्षण है? सरकारी सेवाओं में बहुलता की कमी से लेकर नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो तक के आंकड़े देखे जाएँ तो जवाब मिलेगा कि नहीं, देश के अधिसंख्य दलित-बहुजन नागरिक आज भी न केवल अन्याय और उत्पीड़न के तमाम प्रकारों के शिकार हैं बल्कि वह संसाधनों और शक्तिसंबंधों से खारिज भी हैं.   

अब एक दूसरी जगह से भी देखें तो आरक्षण के अंतहीन होने से परेशान लोगों को विक्सित देशों में सकारात्मक विभेदन नाम से जाने जानी वाले आरक्षण का अब तक चलते आना देखना चाहिए. वस्तुतः वहाँ की उत्पीड़ित अस्मिताओं से आने वाले बराक ओबामा और कोंडलीजा राइस जैसे लोग अगर शिखर तक पंहुच पाते हैं तो इसी व्यवस्था की वजह से. अब यह देश तो भारत से तमाम मामलों में बहुत आगे हैं, फिर वह आरक्षण क्यों चलाये जा रहे हैं? दूसरे, इन देशों में सकारात्मक विभेदन सिर्फ सरकारी क्षेत्र में नहीं बल्कि निजी क्षेत्र में भी अनिवार्य है. आसान शब्दों में कहें तो वहां किसी भी संस्था का 'समान अवसर नियोजक' होना ही पड़ता है, यानी कि वर्ण, लिंग, और नृजातीयता के आधार पर सिर्फ नकारात्मक विभेदन न करने को नहीं बल्कि नियुक्तियों की दृष्टि से बहुलतावादी होने को मजबूर हैं इसीलिए वहां के ऑफिस हों या सीरियल्स/फिल्मों से छनकर हमतक पंहुचने वाला सामाजिक जीवन, ब्लैक, एशियाई, गोरों, हिस्पैनिक जैसी बहुल पहचानों का समुच्चय ही होता है.

अब जरा अपने देश के निजी क्षेत्र पर नजर डालें जहाँ अभी हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ नोर्थ ब्रिटिश कोलम्बिया के डी अजित और अन्यों के किये अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं. भारत की शीर्ष 1000 निजी कंपनियों के निदेश बोर्डों में सवर्ण 93 प्रतिशत, ओबीसी 3.8 प्रतिशत और दलित 3.5 प्रतिशत हैं! इससे ज्यादा और कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं होनी चाहिए. यही तर्क भी है आरक्षण के कमसेकम तब तक जारी रखने का जब तक भारतीय समाज बहुलवादी न हो जाय. आखिर को किसी भी समाज के उत्थान की कोशिशें के लिए उसके अंदर एक खास वर्ग का होना जरूरी है. आप चाहे उसे मध्यवर्ग कहें, या वामपंथ की भाषा में हरावल, जब तक रोज दिहाड़ी करके खाने की चिंता से मुक्त ऐसा वर्ग अस्मिताओं के अंदर पैदा नही होगा उनके मुक्त होने की संभावना बहुत कम होगी. आरक्षण ने तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के अंदर ऐसा ही वर्ग खड़ा करने में सफलता पाई है. आरक्षण लागू रखने के पीछे सबसे मजबूत तर्क बस यही है. और यह भी कि एक ऐसा वर्ग खड़ा हो जाने के बाद सामाजिक शक्ति-संबंधों में आने वाले बदलावों से जाति को बड़ा धक्का लगेगा और तब शायद आरक्षण की जरूरत ही न रह जाये.  

3 comments :

  1. Very accurate analysis. I agree with your thought.

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छा आलेख. अनुमति दें, इसे अपने ब्लॉग पर लिंक कर रहा हूँ.
    कृपया word verification हटा दीजिए.

    ReplyDelete
  3. कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

    ReplyDelete