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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

August 15, 2012

रेडियोतरंगों के रथ पर सवार राष्ट्रभक्त हैं, और एक शोकगीत भी.

कैसा तो मौसम है. रेडियोतरंगों के रथ पर सवार राष्ट्रभक्ति है, एफ एम पर बज रहे गीत हैं, मालों में एमआरपी से ‘आजादी’ की ‘सेल’ है. बारों में पबों में फ्री का मतलब बियर है, हैप्पी आवर है.  राष्ट्र के नाम दिए जा रहे सन्देश हैं, रामलीला मैदान से निकल आंबेडकर स्टेडियम तक की यात्रा को राष्ट्र के लिए मर मिटने वाला महाप्रयाण बताने वाली घोषणाएं हैं. हलके में कहें तो देश खुश है, गर्व है कि छलकने नहीं बाँध तोड़ बह निकलने को आमादा है. अपने अरमानों का जुलूस निकाल चुके दूसरे गांधी और तीसरे जेपी की यादें हैं, जो नहीं आयी उस जनता के लगाए भारत माता की जय के नारे हैं. ‘इनबाक्स’ भर दे रहे एसएमएस हैं, देश के लिए पूनम पाण्डेय के कुछ नया करने की घोषणा के इन्तेजार में दबी दबी सी ख्वाहिशें हैं. हिन्दुस्तानी होने के नाज से भरे ये सब हैं क्योंकि ऐसा ही होने की रवायत है. ये सब हैं कि दस्तूर यही है.

बाकी बस ये कि नाज है किस पर. उस मुल्क पर जिसके 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और इसे राष्ट्रीयशर्म बताने वाले प्रधानमंत्री साहब देश का अनाज सब्सिडी देकर यूरोप-अमेरिका के जानवरों के चारे के लिए भेजने पर आमादा हैं? उस मुल्क पर जिसके ‘दागी’ राष्ट्रपति अपने शपथग्रहण भाषण में भूख को सबसे बड़ा अपमान, सबसे बड़ी शर्म बताते हैं फिर पेट भर खा के सो जाते हैं? उस देश पर जिसके गोदामों में अरबों का अनाज सड़ जाता है पर सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उसे भुखमरी के शिकार लोगों में वितरित नहीं करती? मुझे भी भारतीय होने पर गर्व होना चहिये शायद, 2020  में महाशक्ति बनने के सपने वाले देश में भूख से मर रहे बच्चों को देख कर नहीं हो पाता, क्या करूं?

आप मुझे दुनिया की ‘आईटी’ राजधानी बंगलौर की चमचमाती कांच वाली इमारतें दिखाएँ मुझे आदिलाबाद से लेकर विदर्भ तक के आत्महत्या करने को मजबूर किसान याद आते हैं. आप मुझे 11 प्रतिशत (जो अब नहीं रही) की वृद्धिदर के आंकड़े दिखाएँ, मुझे देश की कृषि में गहराता संकट याद आता है. बताइये तो कैसे गर्व करूं उस देश पर जिसमे 10 साल में एक लाख से ज्यादा किसानों ने इस ‘महान राष्ट्र’ में जीने पर मौत चुन ली हो. उस में जिसमे 2001 से 2010 के बीच लगभग सात करोड़ किसान गायब, हाँ गायब, हो गए. नहीं उन्होंने आत्महत्या नही की. वे तो बस अपनी जिंदगियों के मुश्किल होते जाने से मजबूर होकर पहले आपदा और फिर आवारा पलायन (footloose migration) को मजबूर हो गए. आप देश में मोबाइल कनेक्शनों की संख्या बतायें, मुझे योजना आयोग का 28 और 32 रुपये का जादूई आंकड़ा भी याद आता है और उनका लाखों का ‘वाशरूम’ भी.

जानता हूँ कि इस सबके बाद भी एक दिन हिन्दुस्तानी होने पर गर्व करने की सलाहें हैं. ओलम्पिक में मेडल जीत लाये छह जियालों की तस्वीरों में अनचाहे टैगों से हलकान आभासी अस्तित्व है. सिलिकान वैली में हो रही तिरंगा परेडों में शामिल मल्लिका सेहरावतें हैं. प्लेबॉय के आवरण पर पहली बार किसी हिन्दुस्तानी के होने के गर्व से लैस अनावृत शर्लिन चोपड़ायें हैं. (वैसे वर्जना तोड़ने के पहलू से देखें तो और बात वरना तो प्लेबॉय भी मर्दों की घटिया ख्वाहिशों के यज्ञ की ही आहुति है). पर फ़िर ठीक वहीं गुवाहाटी में सरेआम यौन हिंसा की शिकार उस लड़की की तस्वीरें हैं जो हमारी बहन, बेटी, प्रेमिका कुछ भी हो सकती थी. सुशासनिया बिहार में गैंगरेप की शिकार हुई लड़की के अपराधियों को बचाने की कोशिशें हैं. मनोरमा के न्याय के लिए कपड़े उतार देने को मजबूर माँयें हैं. कैटरिना कैफों के युवा आदर्श होने के दौर में इरोम शर्मिला होने की हारें हैं. आप बेशक गर्वान्वित हों, उन्मादित हों, मैं न हो पाऊंगा.   

आप बधाइयाँ गायें, मैं सैमुएल जोंसन को याद करूँगा. ये कि ‘राष्ट्रभक्ति दुष्टों/दुर्जनों की आखिरी पनाहगाह है. 

3 comments :

  1. अब एक दिन तो छोड़ दो यार -काहें शर्मिंदा किये जा रहे हों !

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  2. अरविन्द सर--
    छोड़ ही देते अगर जनता जबरदस्ती जयहिंद बुलवाने पे आमादा न होती. फोन/मेल/फेसबुक सब में भारत माता भर आयी हैं. वह भी उन भक्तों के साथ जो कल तक मनमोहन सिंह वाली यूपीए की वजह से शर्मिंदा थे! मन हलकान हो गया है टैग हटाते हटाते!
    सो सोचा कि जवाब तो बनता है.

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  3. हाँ, इन बातों पर शर्म तो हमें भी आती है, लेकिन फिर भी पन्द्रह अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने से ये शर्म रोक नहीं पाती. कम से कम और बात नहीं, तो देश के लिए फांसी चढ़ जाने वाले शहीदों को याद तो ज़रूर कर लेते हैं. वैसे तो उनको भी याद करने का कोई एक दिन नहीं है मेरे लिए, लेकिन उम्मीद जिलाए रखने के लिए आज के दिन ज़रूर याद करते हैं. इस बात से ये उम्मीद मजबूत होती है कि जब अंग्रेजी शासन और उसकी दमनकारी नीतियों के बावजूद उन्होंने 'आज़ादी' की आशा बनाए राखी, तो आज के दौर की तमाम विडम्बनाओं के बाद भी हमें 'व्यवस्था परिवर्तन' की आशा नहीं छोडनी चाहिए.

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