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August 12, 2012

मायाविनी सब्जियों के शहर में- उर्फ हांगकांग-1

बड़ा प्यारा सा शहर है हांगकांग. समंदर और बारिशों का शहर. पहाड़ों और जंगलों का शहर. कंक्रीट और टनेल्स का शहर. ऐसा शहर जिसमे खबर ही नहीं होती कि कौन से मोड़ से बसें आसमान छूती इमारतों से उपजती 'संवृत-स्थान-भीति' (कसम से कतल कर देंगे ये लोग हिन्दी को) मतलब कि claustrophobia से निकल क्षितिज के अन्त तक जा रहे समंदर के बराबर वाली सड़क पर दौड़ने लगे. ऐसा शहर जिसके काफी कुछ अपने कनाट प्लेस जैसे आर्थिक ह्रदय 'सेन्ट्रल' (वैसे इस 'सेन्ट्रल में कनाट सर्कस' नाम की जगह तो है) नाम के कंक्रीट के जंगल के बीचों बीच एक असली हरा सा जंगल न केवल महफूज़ हो बल्कि गुलज़ार भी. 

पर हजरात, इस शहर से ऐसी खूबसूरत मुठभेडें हम परदेसियों को रोज नसीब कहाँ. हफ्ते के ज्यादातर दिन तो यूँ हाँफते हुए ही निकल जातें हैं कि अलसुबह 8.30 पर ऑफिस के लिए बस पकड़ते हुए खबर नहीं होती कि लौटना 8.30 पे होगा या और बाद में. और हफ्ते भर अपने ही अत्याचारों का मारा बदन वीकेंड उर्फ सप्ताहांत में बगावत कर देता है कि भाई, हम न करेंगे कुछ. सो इस इतवार की अलसाई सी दोपहर को घंटों से बिस्तरनशीं (और लेटे रहने की वजह से पीठ दर्द का शिकार हुए)  माबदौलत ने सोचा कि न मियाँ, यहाँ हैं तो शहर तो देख के, जी के मानेंगे. अब सिर्फ उतने से न मानने वाले जितना बसों, मेट्रो और टैक्सियों की खिड़की से दीखता है. और देखेंगे, तो लिखेंगे भी. हांगकांग डायरी सा कुछ, कि  इस अजनबी शहर में गुजर रहा वक्त ताकी सनद रहे वाले अंदाज में दर्ज हो जाये.

पर फिर लिखने का फैसला करना सच में लिखने से बहुत बहुत आसान काम ठहरा. सच कहूँ तो लिखने की बात सोचते ही बचपन की वो सारी समयसारणियाँ (अरे वही, टाइमटेबल) याद आने लगती हैं जो हर परीक्षा के बाद बंटी थीं और जिनके पालन की कुल मियाद हफ्ते भर से ज्यादा नहीं होती थी. (हफ्ते भर भी तब जब कोई खास पेपर/विषय बहुत खराब कर के आये हों). बचपन तो जाने कहाँ गया पर तय करके कुछ लिखने की ये आदत अब भी वही है. सो फिर सोचा, बहुत सोचा और तय किया कि न मियाँ, अब ये डायरी तो लिख के ही मानेंगे. सो सफ़ेद (सी) स्क्रीन पर दर्ज हो रहे इन काले (से) अल्फाज़ को आप हजरात पर दे मारने के लिए ये मौका  मुनासिब भी माकूल भी. सो लें, संभलें/संभालें.

एक सनद भी कि मोहतराम, मेरे पहले के बयान से इस शहर के मुहब्बताना मिजाज को लेकर मुतमईन न हो जाएँ. बेशक शहर बहुत प्यारा है, मेहमाननवाज भी, पर इसकी मुहब्बतों की बारिश में एक पेंच है. आपके खाने पकाने की आदतों का पेंच. सामिष हों आप (सरल 'हिन्दी' में नॉन-वेज) तो इस शहर से बेहतर कुछ नहीं. कहते हैं कि ये शहर हवाई जहाज छोड़ उड़ने वाली हर चीज, पानी के जहाज छोड़ तैरने वाली हर चीज और बस/ट्रेन छोड़ चलने वाली हर चीज खाता है, खिलाता है. पर कहीं गलती से आप निरामिष उर्फ वेज निकले तो-- अल्लाह करम करे आप पे. इस शहर का 'वेजीटेरियन' चीजों का फलसफा ये है कि जो भी मीट हो उस पर सब्जियां, बोले तो पत्तागोभी डाल के ले आओ. और फिर कहीं आप ऐसे निरामिष निकले जिसे चीनी खाना भी न पसंद हो तब तो बस, करेला खाली नीम चढ़ा नहीं, नीम की फुनगी पे चढ़े करेले जैसा मामला हो जाएगा.

तो साहिबान, यही नियति ठहरी अपनी इस शहर में. या खुद पकाओ या मन को समझाओ कि मियां हम 'डाईट' पे हैं. या फिर (उफ़, हम कामरेडों की जिंदगी में ये होना भी बाकी था) ये कि मैकडोनाल्डस जाओ और कोई भी बर्गर 'नो मीट' के नुक्ते के साथ ले आओ! बेशक शहर में तमाम हिन्दुस्तानी रेस्टोरेंट्स भी हैं, पर उनमें से ज्यादातर हिन्दुस्तानी खाना नहीं हिन्दुस्तानी खाने का स्वाधीन अहसास भर पकाते हैं, और जो असली वाला पकाते हैं वे रोज खा सकने की जद से अपने 'तेल' और दाम दोनों की वजह से बाहर होते हैं.

हमने फिर तय किया कि भाया, हमसे न होगा ये मैकडोनाल्डस पे जीना. हम तो बस पका लेंगे. फिर वही कि 'फ्राइंग पैन' गैस चूल्हे पर और फोन कान में. हाँ माँ, अब तेल गरम हो गया. अब क्या डालूँ. सच कहूँ तो माँ से पूछ के बनायी गयी सब्जियों को काटने में बारहा कटी अँगुलियों से पहले उन माँ, बहनों, चाचियों, बुआओं और मौसियों की अंगुलियां पे पड़े तमाम निशान कभी दिखे ही न थे. फिर उन दीदियों, भाभियों की अँगुलियों की याद तो शायद आज भी ख्यालों से खारिज है जिनके प्रति यह संबोधन सिर्फ 'अपने घर' में काम करने की वजह से पैदा होते थे. 500 रुपये महीने में खटने वाली अंगुलियां. कमाल यह कि अपना दावा हमेशा से वर्ग विभाजन और पितृसत्ता दोनों के खिलाफ खड़ा होने का है.

मुद्दे से बहक जाने के लिए माजरत चाहता हूँ हजरात. कहाँ शहर हांगकांग के किस्से और कहाँ यह यादें पर क्या करें, मुई राजनीति यूँ घुस गयी है रगों में कि मौका मिले न मिले फूट पड़ती है.

हाँ तो मैं बात कर रहा था सब्जियों की. माँ से पूछ पूछ पकती सब्जियों के बीच फिर ख्याल आया कि आओ गूगल से भी पूछ के देखते हैं. और फिर तो कमाल हो साहिबान. गूगल जी कब आंटी में तब्दील हो गयीं, खबर ही नहीं हुई. रेसिपीज़ (विधियों) के साथ वीडियो में बना के दिखाने वाली आंटी. भूख के साथ स्वाद का भी ख्याल रखने वाली आंटी. अब ज्यादा क्या कहूँ, अभी आज ही आंटी के सघन नेतृत्व में हरे प्याज की सब्जी बनाने का कार्यक्रम अपार सफलता के साथ संपन्न किया है. मतलब यह कि गोभी (पत्ता भी और फूल भी), बैंगन, शिमला मिर्च, मटर, ब्रोकोली, आलू नाम की कुल जमा सब्जियों में एक और इजाफा. वाला

पर इसी मुकाम पर ये शहर फिर हाज़िर हो जाता है. ऐसे कि इस शहर की सब्जियां भी बड़ी मायाविनी होती हैं.. ऐसे कि आपने रूप रंग और शारीरिक सौष्ठव के आधार पर लौकी दिख रही सब्जी को खरीदा, लौकी जैसा ही पकाया और आइला-- खाया तो वह करेला निकल गयी! बिटरगार्ड कहते हैं उसे यहाँ. या 'लाल गोभी' खरीदी (जी होती है) और पकाई तो कुछ अजीब सा कटहल जैसा बना!

और फिर खरीदने के सुख के तो कहने ही क्या. सुपरस्टोरों में खरीदने से बचता हूँ (कामरेडाना ट्रेनिंग है भाई). सो 'वेटमार्केट्स' के नाम से जानी जाने वाली सब्जी/मीट/और तमाम अन्य चीजों की फुटकर दुकानों वाली इमारतों में हाजिर होना ही विकल्प बचता है. और वाह, वहाँ का कमाल यह कि सारी पढ़ाई लिखाई के बाद भाषायी अनपढ़ होने का सुख. उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और मुझे कैंटोनीज. सो बस आँखों हाथों के इशारे और सब्जी पोलीथीन में कैद. पैसे देने का यह कि 'शैम-पो' जैसी एक ध्वनि छोड़ कुछ समझ नहीं आया आजतक, और मतलब तो उसका भी नहीं पता.  सो अंदाज से पैसे दे दीजिए और दाम काट के बाकी वापस. लोग बताते हैं कि इसमें कोई बेईमानी नहीं करता, लगता भी यही है.

सो साहिबान  शहर के ऊपर के विवरण में यह भी जोड़ लें अब.
समंदर और बारिशों का शहर. पहाड़ों और जंगलों का शहर. कंक्रीट और टनेल्स का शहर. वेटमार्केट्स की तेज गंधों वाला शहर. पढ़ेलिखों को अनपढ़ बना देने वाला शहर. शब्दों की जगह मुस्कुराहटों से काम चलाने वाला शहर. मायाविनी सब्जियों का शहर. 

7 comments :

  1. तुम वेज निकले कामरेड ...हम्मे होना चाहिए था वहां...और बेट्टा भाषण देने से बचे समय में थोड़ा खाना पकाना सीख लेते तो ई दिन न देखना पड़ता..हम्मे का..हम तो मजे ले रहे हैं..

    इसे लिख डालो सीरिज की तरह, हम जैसे भी देस-विदेस के (असल में तुम्हारे:) मजे ले सकेंगे.

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  2. मैं आपको 'मटन पप्पू' खिला सकता हूँ , जब भी हम दोनों एक साथ हुए. ये एक अद्भुत डिश है. वैसे तब तक आप मैगी खाइए. वहाँ नहीं मिलती क्या ? :-)

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  3. कैसे कामरेड हैं अरे भाई जैसा देश वैसा भेष ....पक्के तराचंदी नहीं लगते -डेलीगेसी में तो नहीं रहते थे मियाँ ?-) या किसी को इम्प्रेस करने के लिए ये समां बाधा है ? कामरेडों की कई कहानियां हैं इसलिए उनपे भरोसा नहीं :-)

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  4. @अरविन्द सर..
    ताराचंद को बड़े हलके में ले रहे हैं आप. श्रीयुत राजीव भटनागर (परम सम्माननीय बबलू श्रीवास्तव जी के गुरु) से लेकर 'प्रक्रिया के तहत' माता सर तक की दुर्धर्ष परम्पराएँ एकसाथ झेल लेने वाला छात्रावास है सर. (मैं तो उन्ही श्रीयुत भटनागर साहब के कमरे की पर्ची कटा/फीस भरा अन्तःवासी माने 'लीगल' रहा हूँ.
    रही बात 'कामरेडों' की तो सर सूर्यनारायण सर को भूल गए? आज तक लाल झंडा साधे हुए हैं. कामरेड कृष्ण मोहन उर्फ 'केएम'? छात्रावास में छोटी ही सही हम वामपंथियों की भी बड़ी गौरवशाली परंपरा है सर.

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  5. मुझे बहुत पसंद है हांगकांग,जिसका चीनी नाम श्‍यांगकांग है। 25 साल पहले खूब घूमा है। उस आवारगी के रेशे आज भी हरे हैं। खूब जम का लिखें और जिएं। कब तक हैं आप हांगकांग में...एक अध्‍याय छुंगकिंग मैंशन पर भी हो। यह कभी हिंदुस्‍तानियों और पाकिस्‍तानियों को इलेक्‍ट्रानिक सुपरमार्कट हुआ करता था।

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  6. मैं ताराचंद के कामरेडों की पट्टीकुलर बात नहीं कर रहा था ...जनरल कामरेडों -सुश्री ..और उनके पतिदेव ..खैर छोडिये ....
    :-)

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  7. अजय ब्रह्मात्मज सर,
    जी अब भी बनारस के उस होटल में हांगकांग पे हुई छोटी सी पर गंभीर चर्चा याद है. और उस 'मायावी' स्याही का जिक्र भी जो सिर्फ हांगकांग में मिलती है.
    बखैर, चुंगकुंग मेंशन आज भी बराबर आबाद है बस अब इलेक्ट्रानिक्स के साथ साथ देशी खाने और पीने के सामानों का स्रोत स्थल भी बन गया है. कमाल ये कि हल्दीराम की नमकीनों से लेकर मसालों और रेडीमेड पकवानों की तो छोड़े हीं, वहाँ तो 'चैनी खैनी' तक मिलती है, हाँ दाम रुपयों में नहीं हांगकांग डालर में लगते है.
    सो जबलपुरिया अंदाज में निसफिकर रहें सर, आपकी आवारगी की विरासत मजबूत हाथों में है, जाया न होने दी जायेगी. जाया की तो छोड़े हीं, उल्टा हर्फ़ बन यहाँ शाया भी की जायेगी.

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