Featured Post

नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

August 31, 2012

आरक्षण नहीं, जाति समस्या है.

[प्रभात खबर में कोटा नहीं, जाति है समस्या शीर्षक से 1-09-2012 को प्रकाशित]

देखने में यह बहुत मासूम सा तर्क लगता है. आरक्षण खत्म कीजिये, जाति अपने आप चली जायेगी. फिर यह तर्क कहीं भी टकरा सकता है. एक दिन उच्चवर्ग में शामिल हो जाने के सपने देखती मध्यवर्गीय आँखों में, अन्ना हजारे के ‘आंदोलन’ में लहराते ‘क्रांतिकारी’ मनुवादी मोर्चे के झंडे में, चेहरों की उस नयी किताब की दीवालों में, कही भी. यह तर्क देने वाले ज्यादातर लोग हमारे ही वर्ग से आते हैं. यह तर्क देते हुए उनकी आवाज में अंतिम सच जान चुके होने की आश्वस्ति होती है. वे जानते हैं आरक्षण देश के विकास के लिए घातक है, योग्यता के खिलाफ है और अगर यह ठीक भी हो तो कैसे इसका लाभ जरूरतमंदों तक न पंहुच दलित-बहुजन वर्ग के अपने अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है.

पर फिर यहीं एक सवाल बनता है कि इस तर्क की राजनैतिक और दर्शनशास्त्रीय अवस्थिति क्या है? यह तर्क खड़ा कहाँ से होता है? ज्ञानमीमांसा को तो छोड़ ही दें, क्या इस तर्क में किसी को सत्यान्वेषण के लिए तैयार कर सकने की भी तार्किक संगगता है? या फिर विशुद्ध समाजवैज्ञानिक सन्दर्भों में देखें तो इस तर्क की वैधता और विश्वसनीयता है भी या नहीं और है तो कितनी है?
कार्य-कारण की सबसे भोथरी समझ के साथ भी देखते ही यह तर्क भरभरा के ढह जाता है. ऐसे कि ऐसे कि आरक्षण जाति के पहले नहीं बाद में आता है. ऐसे कि आरक्षण कारण नहीं परिणाम है. परिणाम भी ऐसा नहीं कि खुद ही से निकल आया हो. यह ऐसा परिणाम है जो कारण के कुप्रभावों से पैदा हुए असंतोष से, प्रतिकार से निकला है. समाजविज्ञान की एक विशिष्ट धारा मनोविज्ञान से उधार लिए हुए शब्दों में कहें तो यह उद्दीपन-प्रतिक्रिया वाली क्लासिकीय अनुकूलन (कंडीशनिंग) के विपरीत उद्दीपन-जीव-प्रतिक्रिया वाला वह सिद्धांत जो 'जीवन' को चुनाव की स्वतंत्रता देता है, भले ही इस स्वतंत्रता का ज्यादा उपयोग दंड के द्वारा कुछ इंसानों द्वारा बाकी इंसानों को कब्जे में रखने के लिए ही किया गया है.

आरक्षण खत्म करिये, जाति खत्म हो जायेगी के तर्क के पीछे की मनोग्रंथि यही है. उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षों के उफान वाले आज के दौर में सत्ता और संसाधनों पर काबिज वर्गों द्वारा यथास्थिति बनाये रखने को गढ़ ली गयी वह राजनीति है जो वह राजनीति है जो अपने शब्दों को शगूफों सा हवा में उछालती रहती है और फिर इन तर्कों के विरोधियों के जेहन में भी घुस जाने का इन्तेजार करती रहती है. बीते लंबे दौर से इस राजनीति का केन्द्रीय कार्यभार ही रहा है कि समस्या को जाति से खिसका कर आरक्षण पर ला खड़ा किया जाये, और यह अगर नहीं भी हो सके तो आरक्षण को भी जाति के बराबर की ही समस्या तो बना ही दिया जाय. अपने इस प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं.

इस तरह कि कि अब तमाम बार सामाजिक न्याय की लड़ाइयों के साथ खड़े साथियों के सवालों में भी आरक्षण और जाति चेतना एक ही तरह न भी सही, एक साथ तो आने ही लगी हैं. बेशक आरक्षण जातिप्रथा के अंत के लिए न तो अंतिम विकल्प है न सबसे कारगर. बाबासाहेब अम्बेडकर के ही विचारों को याद करें तो जाति के ब्रह्मराक्षस को खत्म करने का असली तरीका अंतरजातीय विवाह हैं क्योंकि वे श्रेणीगत पहचानों में बंटे समाज में बंटवारे और ऊंचनीच की मूल इकाई को ही ध्वस्त कर देंगे. पर जब तक ऐसा नहीं हो पा रहा है तब तक क्या करें? तब तक क्या जाति और आरक्षण दोनों को समस्या मान लें जैसा कि प्रगतिशील खेमे के कुछ साथी भी करने लगे हैं? यह स्वीकार करते हुए भी कि सामाजिक न्याय की राजनीति भी अपने अंतर्विरोधों का शिकार हुई है, पर इससे आरक्षण की धारणा को ही समस्याप्रद नहीं माना जा सकता. और फिर, ऐसे दौर में हल्की चूकें भी विमर्श का प्रस्थान बिंदु ही बदल देती हैं

ठीक बात है कि अस्मिताओं की राजनीति की एक सीमा होती है, उसकी अस्तित्वगत सीमा. कायदे से किसी भी अस्मितावादी आंदोलन का अन्तिम लक्ष्य अपनी 'अस्मिता'  माने अपनी पहचान को खत्म करने का ही हो सकता है, उसी में मुक्ति भी होती है. उदाहरण के लिए जैसे दलित आंदोलन का केन्द्रीय कार्यभार होगा उस दिन को लाना होगा सब समाज में जातिगत गैरबराबरी और उत्पीड़न के ढाँचे ही ध्वस्त हो जाएँ और दलित शब्द एक अस्मिता के रूप में खत्म हो जाये. पर इस सपने की राह में इस राजनीति के केन्द्रीय नेतृत्व के अपने स्वार्थ ही एक बड़े रोड़े के बतौर खड़े हो जाते हैं.

जाति के खात्मे की इस लड़ाई को बराबरी के, मुक्ति के अम्बेडकरवादी सपनों के साथ एक 'मिशन' की तरह शुरू करने वाले नेतृत्व के बारे में आज यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि वह अब भी इस मुक्तिकामी आदर्श के साथ खड़ा हुआ है. उसकी मूल दिक्कत ही यही है कि अगर वह अस्मिता खत्म करने के मूल कार्यभार पर लगे रहें तो उनका स्वयं की नेतृत्वकारी स्थिति और इसके साथ आने वाली तमाम सुविधाएँ भी खतरे में पड़ जायेंगी. इतना ही नहीं, इन अस्मिताओं के अंत के लिए प्रयास करने पर इनके भीतर आरक्षण की ही वजह से पैदा हुए उस छोटे से वर्ग की महत्वाकांक्षाओं को नुक्सान होगा जिसे हम तथाकथित उच्च जातियों की तुलना में तो नहीं पर अपने स्तर पर एक मध्यवर्ग के बतौर देख सकते हैं.

यही वह कारण है जो रिपब्लिकन पार्टी को तमाम धडों में बांटता है और जातिविरोधी आकांक्षाओं की प्रतिनिधि रही बसपा को हिंदूवादी राजनीति की अलम्बरदार भाजपा के साथ खड़ा कर देता है. इसी जगह पर आ कर मुद्दा बुनियादी व्यवस्था में परिवर्तन का नहीं बल्कि अपने प्रभाव को बनाए रखने का हो जाता है. पर इससे भी न आरक्षण के औचित्य पर कोई सवाल उठता है न इसे समस्या के बतौर देखा जा सकता है. सत्य यह है कि आज भी जाति ही समस्या है और इस बात के सबूत जनगणनाओं से लेकर अन्य तमाम सर्वेक्षणों में मिलने वाले संसाधनों से लेकर सत्ता तक में जातिगत विभेदन के आंकड़ों में देखे जा सकते हैं. 

आरक्षण को लेकर एक और सवाल है जो कुछ 'प्रगतिशीलों' के दिमागों में भी खटकता है. यह सवाल है आरक्षण की तथाकथित अंतहीनता का. उन्हें लगता है कि 'आरक्षण' सिर्फ दस सालों के लिए दिया गया था फिर इसे अब तक क्यों बढ़ाया जा रहा है. इस बात के जवाब में दो बाते हैं, पहली तो यह कि यह दस साल का नुक्ता वह झूठ है जिसे यथास्थितिवादी लगातार प्रचार की गोयेबल्सियन शैली में तथ्य सा बनाने में सफल हो गए हैं. दस साल का आरक्षण सिर्फ संसद में था, और वह भी अन्य शर्तों के साथ था. नौकरियों में आरक्षण का सवाल उससे बहुत अलग है और यह एक तरफ तो संविधानप्रद्दत विभेदन को रोक समानता को बढ़ाने वाले मूल अधिकारों से निकलता है और दूसरी तरफ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयास करने की उस जिम्मेदारी से जिसके लिए संविधान के नीतिनिर्देशक सिद्धांतों के तहत 'राज्य' वचनबद्ध है. फिर उस आरक्षण के साथ इसको जोड़ देना चूक नहीं साजिश है. इसके साथ एक और भी नुक्ता जुडता है. यह कि क्या सच में जातिगत विभेदन और उससे पैदा होने वाली गैरबराबरी खत्म हो गयी है और अब समस्या जाति नहीं आरक्षण है? सरकारी सेवाओं में बहुलता की कमी से लेकर नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो तक के आंकड़े देखे जाएँ तो जवाब मिलेगा कि नहीं, देश के अधिसंख्य दलित-बहुजन नागरिक आज भी न केवल अन्याय और उत्पीड़न के तमाम प्रकारों के शिकार हैं बल्कि वह संसाधनों और शक्तिसंबंधों से खारिज भी हैं.   

अब एक दूसरी जगह से भी देखें तो आरक्षण के अंतहीन होने से परेशान लोगों को विक्सित देशों में सकारात्मक विभेदन नाम से जाने जानी वाले आरक्षण का अब तक चलते आना देखना चाहिए. वस्तुतः वहाँ की उत्पीड़ित अस्मिताओं से आने वाले बराक ओबामा और कोंडलीजा राइस जैसे लोग अगर शिखर तक पंहुच पाते हैं तो इसी व्यवस्था की वजह से. अब यह देश तो भारत से तमाम मामलों में बहुत आगे हैं, फिर वह आरक्षण क्यों चलाये जा रहे हैं? दूसरे, इन देशों में सकारात्मक विभेदन सिर्फ सरकारी क्षेत्र में नहीं बल्कि निजी क्षेत्र में भी अनिवार्य है. आसान शब्दों में कहें तो वहां किसी भी संस्था का 'समान अवसर नियोजक' होना ही पड़ता है, यानी कि वर्ण, लिंग, और नृजातीयता के आधार पर सिर्फ नकारात्मक विभेदन न करने को नहीं बल्कि नियुक्तियों की दृष्टि से बहुलतावादी होने को मजबूर हैं इसीलिए वहां के ऑफिस हों या सीरियल्स/फिल्मों से छनकर हमतक पंहुचने वाला सामाजिक जीवन, ब्लैक, एशियाई, गोरों, हिस्पैनिक जैसी बहुल पहचानों का समुच्चय ही होता है.

अब जरा अपने देश के निजी क्षेत्र पर नजर डालें जहाँ अभी हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ नोर्थ ब्रिटिश कोलम्बिया के डी अजित और अन्यों के किये अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं. भारत की शीर्ष 1000 निजी कंपनियों के निदेश बोर्डों में सवर्ण 93 प्रतिशत, ओबीसी 3.8 प्रतिशत और दलित 3.5 प्रतिशत हैं! इससे ज्यादा और कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं होनी चाहिए. यही तर्क भी है आरक्षण के कमसेकम तब तक जारी रखने का जब तक भारतीय समाज बहुलवादी न हो जाय. आखिर को किसी भी समाज के उत्थान की कोशिशें के लिए उसके अंदर एक खास वर्ग का होना जरूरी है. आप चाहे उसे मध्यवर्ग कहें, या वामपंथ की भाषा में हरावल, जब तक रोज दिहाड़ी करके खाने की चिंता से मुक्त ऐसा वर्ग अस्मिताओं के अंदर पैदा नही होगा उनके मुक्त होने की संभावना बहुत कम होगी. आरक्षण ने तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के अंदर ऐसा ही वर्ग खड़ा करने में सफलता पाई है. आरक्षण लागू रखने के पीछे सबसे मजबूत तर्क बस यही है. और यह भी कि एक ऐसा वर्ग खड़ा हो जाने के बाद सामाजिक शक्ति-संबंधों में आने वाले बदलावों से जाति को बड़ा धक्का लगेगा और तब शायद आरक्षण की जरूरत ही न रह जाये.  

August 29, 2012

आज अखबारों में कितना कुछ था.


आज अखबारों में कितना कुछ था. कोयले की खदानों में अवाम की गाढ़ी कमाई को लूट कांग्रेस का बनाया मोटा माल था. इस मोटे माल को पहचानने वाली परम ईमानदार बेलारी वाले रेड्डी बंधुओं की भाजपाई माँ सुषमा स्वराज थी. सबसे गरीब मजदूर की खरीदी माचिस तक से काटे गए टैक्स की चोरी पर जवाब देने की जगह शेर पढता घुन्ना प्रधानमंत्री था. भाजपा को करारा जवाब देने की घोषणाएं करती सोनिया गांधी थीं. कभी सिर्फ कांग्रेसी लुटेरों को पहचानने वाली टीम अन्ना का भाजपा कांग्रेस दोनों पर चढाई करता बचा खुचा हिस्सा था. इस बचे खुचे हिस्से से भी बच गयी, भाजपा को बेहतर बता रही पूर्व पुलिस अधिकारी थीं.

पर समाज में तो कितना कुछ और भी था जिसको इन अखबारों के भीतर के पन्नों में बॉक्स भर की जगह न मिलनी थी. जैसे बलात्कारी सुशासन वाले नीतीशिया राज में गैंगरेप का शिकार हुई लड़की के अपराधियों का जिक्र. जैसे ‘सिविल सोसायटी’ के काफिलों की राहों में न पड़ने वाले फारबिसगंज में अल्पसंख्यकों की हत्या कर उनकी लाश पर कूदने वाले ‘बहादुर सिपाहियों’ को सजा मिलने का जिक्र. जैसे उसी ‘सुशासन’ के कारिंदों द्वारा पत्रकारों को आफिस में अधमरा कर देने का जिक्र. जैसे सारी जिंदगी अवाम को बेहतर कला देने में खपा देने वाले ए के हंगल की अंतिम यात्रा में सत्यमेव जयते मार्का आमिर खानों तक के न पंहुचने का जिक्र.

जैसे 1894 में सिखों के नरसंहार का नेतृत्व करते जगदीश टाइटलरों और सज्जन कुमारों के अब भी माननीय होने का जिक्र. जैसे कांग्रेस के राज में मेरठ के हाशिमपुरा में मुसलमानों को मार के नहर में फेंक देने के जिम्मेदार लोगों को सजा का जिक्र. जैसे गुजरात में हुए नरसंहार के मुख्य आरोपी के अब तक माननीय मुख्यमंत्री बने रहने का जिक्र. जैसे उन्ही भगवा हत्यारों द्वारा उड़ीसा के कंधमाल में ईसाई आदिवासियों के जनसंहार का जिक्र.

जैसे यौन अपराधियों द्वारा तेज़ाबी हमले से झुलस गए चेहरे और और जिंदगी वाली सोनाली का जिक्र. जैसे उन अपराधियों को न्याय दिलाने के लिए अब तक लड़ रही इस बहादुर लड़की की मांगो को अनसुना करते आए और फिर भी देश के कर्णधार बने बैठे खादी वाले धवल कुर्तों का जिक्र. जैसे महाशक्ति बनने का सपना देखते और फिर भी अमरीकी साम्राज्यवाद के सामने बिछ बिछ जाते हमारे जैसे देशों के दौर में जूलियन असांज को शरण दे उपनिवेशवाद को आख़िरी चुनौती देते इक्वाडोर का जिक्र. 

जैसे देश के 42 प्रतिशत बच्चों के कुपोषण का शिकार होने को राष्ट्रीय शर्म बताने वाले उस चुप्पे प्रधानमंत्री द्वारा कोई कदम न उठाने का जिक्र. जैसे अपने शपथ ग्रहण में भूख से बड़ा कोई अपमान न होने की बात कर चैन से सो जाने वाले राष्ट्रपति का जिक्र. जैसे निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बता मार दिए जाने पर सिर्फ ‘सॉरी’ कहने वाले पूर्व गृहमंत्री का जिक्र. जैसे दशक भर से ज्यादा से लड़ रही इरोम चानू शर्मिला का जिक्र. जैसे ‘राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल’ द्वारा महेश्वर बाँध में 154 मीटर की ऊंचाई तक पानी भरने के आदेश के बाद वहाँ के विस्थापितों द्वारा जल समाधि ले लेने के फैसले का जिक्र.

पर इससे यह न समझ लीजियेगा कि इन इनका जिक्र कभी आया ही नहीं. जिक्र तो आया है, बाजाप्ता आया है. अखबारों ने रस्म अदायगी में कभी कमी नहीं बरती है. उनका जिक्र दिल्ली में अपने हक के लिए लड़ने पंहुचे लाखों मजदूरों की वजह से दिल्ली में हुए ट्रैफिक जामों की वजह से भी आया है और उसके उलटे एक दिन सोनाली के लिए टेसुए बहाते सरोकारी पत्रकारों के रस्मी गुस्से की वजह से भी आया है. बस यह कि सास बहू मार्का सीरियलों की कहानियों पर टनों कागज खर्चा करने वाले अखबारों को इन कहानियों को ‘फोलो’ करने का ख्याल कभी नहीं आया. आये भी क्यों, आज के मीडिया के ग्राहक दूसरे हैं. उन्हें पता है कि सुबह की चाय के साथ अखबार पढते अपने मध्यवर्गीय ग्राहकों  को ‘निगेटिव’ न्यूज देना भारी भी पड़ सकता है. फिर सरोकारों का, सच का, समयों का करना भी क्या है अगर ये ग्राहक और उनसे आने वाले विज्ञापन न हुए तो?

पर फिर यह तय कौन करता है कि किसकी ख़बरें ख़बरें है और किसकी ख़बरें फूटनोट? कौन तय करता है कि किन ख़बरों का फालोअप करना हैं और किन्हें एक कोलम में दफ़न कर देना है? क्या शहर दर शहर खरपतवार से उग आये पत्रकारिता के संस्थान सिखाते हैं अपने विद्यार्थियों को कि ख़बरों का मतलब ग्लैमर है, मध्यवर्ग है चलो अमेरिका वाले सपने हैं? और उनमे से कुछ सिखाते भी हों तो कभी मिशन समझे जाने वाले इस पेशे में आ रहे नए रंगरूटों को क्या हो जाता है कि वह मान भी लेते हैं? कहाँ से प्रेरणा मिल रही है उन्हें? बरखा दत्तों से? वीर सांघवियों से? नीरा राडियों से? या अपराधियो को, धोखेबाजों को सजा देने में रोज असफल हो रहे अपने समाज से? राडियागेट के इतने बरस ब आद भी रोज नैतिकता पर प्रवचन देती बरखा दत्त का 'आदर्श' बन जाना शायद लाजमी ही है. 

ऐसे आदर्शों से, मगर, न अखबार चलते हैं न समाज.  बस उन्हें ये पता नहीं होता कि जिक्र रोक देने से न लोग गायब हो जाते हैं न उनकी जिंदगियों की जद्दोजहद. और जिक्र तक से खारिज ये लोग उनसे बहुत ज्यादा हैं जिन्हें अखबार अपना ग्राहक समझते हैं. ऐसे में धीरे धीरे एक चीज छीज जाती है, वह चीज जिसका नाम विश्वास है. और विश्वास खो गया तो लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का दर्प सत्ता के महल के पाए में बदल जाने की शर्म में तब्दील हो जाता है.  

August 24, 2012

Fall Of The Fanatic: Is Advani The New Rakhi Sawant Of Indian Politics?

[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in the UTS VOICE, 16-31 August, 2012. Republished in the Counter CurrentsThe Kashmir Monitor and The Milli Gazette]


‘You should write a political marsia for L.K. Advani’, suggested a friend of mine last Friday. ‘A political marsia’, he repeated, ‘Arabic for elegy, a dirge or a funeral song.’

I was stunned and uncertain. This was an uncertainty caused by not knowing what shocked me more: the request of writing one for someone whose ideas and deeds I find sickening, or with the term itself – as one does not, generally, talk badly of someone who has already gone.
‘He has not yet retired yet’, was all that I could manage as a response.

He gets all over the news every once in a while’, was my feeble follow-up volley.

'So does Rakhi Sawant’, pat came the retort. ‘Does it make her a good actress, or a name to reckon with in whatever else she does? If not, then how does Advani’s being in news, every once in a while, make him any better?’

L.K. Advani was, once, a toughie’, he continued, ‘a rabble rouser who stirred the passions of impoverished masses and never thought twice about letting them loose on equally, or, often more, impoverished ones. Creating chaos came naturally to him. It was bound to. He came from that part of pre-partition India that is now Pakistan, the land of chaos, after all. Being born in Karachi in those communally charged times was reason enough in itself to become a fanatic, and then this one joined the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) – that fountainhead of sectarian hatred. What else can you expect of someone born out of such a heady, explosive concoction?’

‘Yet, he was political unlike many of his protégés.’

Hearing this from my friend, who has despised the man and his party as much as I do, was a shocker. His rath-yatra left a trail of blood and gore perhaps worse than the one Narendra Modi orchestrated and administered on Muslim minorities in his state in 2002. Yet, my friend continued, almost condescendingly ignoring the disbelief written all over my face.

The man has a politics, however regressive, but still politics. With all his active support to the politics of violence, it was never the end for him’, he noted. ‘The end was something more sinister, yet something far less violent, in terms of physical violence that is. It is the only thing that explains his later acceptability in the National Democratic Alliance. No doubt, NDA was very hesitant, unlike the insider's treatment that Atal Behari Vajpayee got. Yet, he was not loathed, as Narendra Modi was by the likes of Nitish Kumar. Why? Because, he had a politics unlike the later ones, who believed in violence for the sake of violence, and engaged in massacres for the sake of massacres.

Now, being the last politician standing, amongst the thugs espousing Hindutva in the country, he deserves a political obituary, doesn't he?’ was the question put to me.

We were sitting in a house 5000 kilometers away from where Advani was. The beautiful evening, which would herald us into a much awaited weekend, had started on a promising note: with me lustily staring at the wine bottle. To top it, the living room was huge, almost palatial, in a city that has taken the idea of being cramped to altogether new heights, literally. Palatial here, by the way, means 700 square feet for a full apartment.

What is more, we had agreed to refrain from discussing all that is ugly in the big bad world out there as we get more than enough of that in our professional lives as human rights defenders. Hunger, death, corruption, extra-judicial killings, massacres – our lives, and desks, are so full of doing our bit in dealing with them five days a week, fifty weeks a year!

The ambience was surreal. Lazing around, with nothing much to talk, we had decided not to talk about negatives. But, positive things get exhausted so quickly. This was a magical silence, one that helped us get enchanted with late Ustad Nusrat Fateh Ali Khan’s voice seeping out of player. Baba, as we fondly call him, is our constant companion, the redeemer of redemption of our voice in a city whose language often renders us into silence.

Bliss it was.

And, then I made the blunder of switching the television on. Gosh, there he was. Shouting and apologizing alternatively. That is how Advani infiltrated our blissful evening. That is how he jolted us out of a lazy Friday. It was the moment of revelation: good things really do not last long.

‘This Advani, will he ever retire?’ It was the first question to commemorate this unwanted intrusion. ‘What he is up to now’, was the second one. Rapid fire rants continued with an assertion: ‘He must have said something dirty and then taken it back, apologizing.

This was bang on target, as we were to learn later. The veteran, toughie that he once was, has shot himself in the foot, yet again. And, that too, on a day he was supposed to lead Bhartiya Janata Party’s charge against a government already cornered inside and outside parliament. It was a perfect setting, a perfect launch pad for the agitator’s comeback.

The government was under one of the most vicious attacks it has ever endured since the 2G days. With several of his deadlines for bringing the black money back expiring unattended, Baba Ramdev had decided to march to the Parliament. Ramdev, one has to concede, for his pet cause, had got the address of black money right. Unlike Team Anna, he had quite a few supporters cheering him. Adding to the woes of government was the popular anger against the regime's failure to arrest the violence in Assam, a state ruled by Congress itself.

Advani messed it all up. He started with the roar of a lion, calling UPA illegitimate, and soon ended up in a meow, explaining what he had meant and what he had not. The aggression followed by the hasty retreat had achieved something as rare as Sonia Gandhi leading the counter-attack from the front. Additionally, it was not a reluctant defense, like the one she had to put after the no-holds-barred misogynist attack on her person by Pramod Mahajan, when he compared her to Monika Lewinski

As an aside: misogyny is hardwired into the very structure of RSS/BJP, in fact, and keeps oozing out of the statements of its tallest leaders like Atal Behari Vajpayee, who once taunted Sonia Gandhi for being a 'widow' as if she 'chose' it and then completing the insult by reminding her that he too was a 'bachelor.' Whether he was eligible or not, he chose not to elaborate, much to the relief of a disgusted citizenry. Judging by his statements, Advani comes up, surprisingly, as less of a misogynist than many members of his partly, including Sushma Swaraj of the I-will-live-like-a-widow-if-Sonia-becomes-Prime-Minister fame. But, that is, counting his speeches and not his worldview, of course.

Returning to Advani’s meow: Sonia sprang into a thunderous rebuttal on the allegation of ‘illegitimacy’, terming it 'as an insult to the electorate.' This was a lightening assault, pushing the veteran on the back-foot. With the counter-attack, premised on insult of the mandate, Advani found himself fumbling. He had managed to add yet another feather to his cap: that of making another non-performer perform – quite like Indian bowlers are notorious for doing: providing immense opportunities for out of form batsmen to score centuries and find form.

This follows Advani’s miraculous feat of bringing the best ever statement, out of the otherwise always do-nothing-say-nothing Prime Minister Manmohan Singh, who has dubbed him 'Permanent Prime Minister in waiting'.

Advani's meow had an interesting outcome. It was now the BJP in a totally defensive mode, on a day the pain should have been that of the Congress. The Congress party had survived yet another day that it should not have and did not deserve to; and the credit went not to its worthless fire-fighter, but the general of the opposition camp. The glee on the faces in Congress camp was for all to see, as was the gloom in the BJP benches.

Ominously, for him and his party, this was not the first time Advani had committed a self-goal. He seems to have put in a lot of effort to become an expert at self-goals. Even the apology to Sonia was nothing new. He had done the same earlier. He had, on an earlier occasion, named Sonia Gandhi as one who has stashed black money in tax havens abroad, only to retreat into an apology as soon as Sonia hit back. He has done it at Mohammad Ali Zinna's mausoleum, calling him secular, and, in the process, unwittingly taken a little venom out of his party's tireless campaign against minorities.

He has done it on his blog
, predicting the ascent to power of a non-Congress-non-NDA alliance in the 2014 polls, and invited the wrath of the ever-vitriolic Bal Thackeray. As if calling him a 'losing' general was not enough, Thackeray rubbed salt onto his wounds by offering his 'learned' counsel to clear Advani's doubts and boost his morale. Think of the gravity of a Hindutva minnow teaching its chief architect. One can feel the pain this insult must have caused Advani.

Advani, evidently, has lost the plot. Worse, even for him, is that he has no clue where or how he lost it in the first place. The politics he has decided to be part of stands defeated by the very ones he has handpicked as his successors, especially Narendra Modi, the chosen one. No one stands for the ideals – i.e. if you can call a belief in subjugating women, dalits, minorities and all others as ideals – he has so painstakingly tried to inflict on the body-politic of the nation. He does not find a taker of his idea of a 'Hindu nation' in his own party, though there are a thousand squabbling for the coveted post of the Prime Minister, which has eluded him all along.

He is a defeated man – defeated, not by the enemy, but by his own self-goals and the realities of his own camp – defeated, not by a realization about how venomous the politics he has espoused all his life was, but, by all the sex, sleaze, and subversions his heirs use to make it succeed. He might have been political, as my friend suggests, but his politics was a regressive and reprehensible one. His rath, the chariot he rode to power, has left a trail of blood behind it.

That he did not pay the price, but enjoyed the power that emanated out of all the blood on his hands is a failure of the system we live in, and not his success. He might have never been convicted.
Yet, his role in causing all that mayhem is clear to me.

He was responsible for 1990. And for 2002.

He might have lost his personal battle. The poison he has infused in the veins of nation is yet to be purged. It is going to be a hard task, but, I would much rather be part of that.
Let him live with this ignominious defeat of his. I will never write a marsia, political or otherwise for him. Period.

August 16, 2012

The Independence Day Speech They Would Never Deliver!

[This is an AHRC article, first published by the Asian Human Rights Commission.

There is nothing amiss here. The nation is in celebratory mode and it is celebrating with aplomb. The national flag, the tricolour, is everywhere: being waved in the hands of children, tattooed on the cheeks of enthusiastic youth, flying high on the walls. And, it has, for a change, ensured a full meal to the street children selling it. The celebration is orchestrated to the last details of the ritual. It began, and has remained so, for more than six decades, with the Prime Minister hoisting the national flag on the ramparts of Red Fort, followed by his Independence Day speech.

The customary speech of the Prime Minister has taken into account the state of the nation. Everything that matters, as per the government's perception of course, has figured in it: the joys of progress it has made and the concerns it has are all there. The Prime Minister is happy that the internal security situation of the country has improved, including in a troubled area like Jammu and Kashmir. Similarly, 'disturbed' areas like North-East, however, failed to find a mention. The Prime Minister voiced his concerns regarding the lack of political consensus slowing down the growth and vowed to 'do everything' to boost the economy. He called upon all stakeholders including the political parties to work together for 'reducing' corruption.

He promised to create new jobs and to expand the National Rural Health Mission all over India. He assured the villages living in darkness, in the era of information technology, of his will to connect them to electricity. Good intentions, indeed! Even better is that he knows, despite all the customary celebrations, real independence will come to India only when "we will be able to banish poverty, illiteracy, hunger and backwardness from our country." How we will do that, though, is something he chose not to discuss.

He would not want to, perhaps, for it is not for the first time that these problems have revealed themselves to him. He has talked about them many a-time. He devoted a full-paragraph to the problem of hunger in last year's Independence Day speech when he told his brothers and sisters that:
"Malnutrition in our women and children is a matter of concern for all of us. We have taken a number of steps to tackle this problem, including two new schemes. We have also decided that we will start implementing an improved Integrated Child Development Services scheme within the next six months so that the problem of malnutrition in children can be effectively addressed."

This, however, was not the first time he mentioned this either. He had assured the nation that the government was 'working for food safety and social security net' in 2010 as well. He has expressed his 'ardent desire' for not allowing that 'even a single citizen of India should ever go hungry.'

Mr. Singh had promised a food security law that would provide families living below the poverty line 'a fixed amount of food grains every month at concessional rates.' Resolving to root out malnutrition from the country, he seemed particularly candid that year. He pledged to bring all children below the age of 6 years under the protective cover of Integrated Child Development Scheme (ICDS) by March 2012. The date has come and gone without the government claiming success or explaining reasons behind failure. It could not, for none other than the President himself would have called the bluff in his acceptance speech.
Conceding that there was no 'humiliation more abusive than hunger', the new President Pranab Mukherjee was dead honest on his day. To add insult to the injury of his government's botching of the issue, Mr. Mukherjee added that 'trickle-down theories' did not 'address the legitimate aspirations of the poor.'

Judging by the Prime Minister's obsession with economic growth continuing unabated, that observation would seem intriguing to say the least. Unmistakably, the President and his government are not in the same boat. Not that the Prime Minister differs on the count of diagnosis of the disease, as he too claims to be ashamed of the fact that 42% Indian children are malnourished. He just seems unable to walk his talk.

The Prime Minister is very serious on corruption as well. It is just that for him such high rate of malnourishment among children is not a form of corruption in itself. This happens because of large-scale siphoning off from the funds earmarked for welfare initiatives like ICDS and Public Distribution System (PDS) bothers him even less. His stoic silence over his own government's role in bending the rules to help private entities minting money out of scams like 'humanitarian' export of non-Basmati rice to several African countries is proof enough for the fact. Yet, one would have to acknowledge that it takes some 'courage' to feed hungry of the world with million starving in one's own backyard.

As pointed out earlier, the government's lack of seriousness on the issue is betrayed by the fact that Prime Minister's National Council on Nutrition, set up with a definitive mandate of tackling malnutrition way back in 2008, has not met but once ever since. That not a single decision, taken in that single meeting, such as ‘revitalizing ICDS’, has ever been implemented is beside the point.

That the nation is well equipped to eradicate hunger merely aggravates the wound of India being home to hunger. There is no shortage of funds; after all, we are a country pursuing the project of sending a manned mission to moon. Neither is there any dearth of food grain. We have a buffer stock many a times bigger than we need, a significant amount of which rots for lack of storage capacities. In fact, the situation has alarmed the Supreme Court of India, directing the government to give the grains 'to hungry poor' instead of it 'going down the drain'.

The Prime Minister, ever serious for alleviating hunger in his Independence Day speeches, took no time to oppose the directive while curtly telling the Supreme Court not to 'get into the realm of policy formulation.' Thankfully, though, he did not elaborate on whether the policy formulation focused on keeping the poor hungry. This seems to be exactly the case, considering a subsequent decision of the Cabinet Committee on Economic Affairs (CCEA) approving the export of two million tonnes of wheat from Government stock, at subsidized rates, as fodder for livestock in the developed world.

Speeches matter more to the government than action. But then, the same is the case with the citizenry as well, isn't it? It would want to listen to an Independence Day speech announcing, in President Pranab Mukherjee's words, announcing the erasure of poverty from 'the dictionary of modern India.'

It would want to listen to the government announcing not only the development of another intercontinental ballistic missile but also a scheme that would cover all Indians, irrespective of their socioeconomic status, in a social security net.

But, they would, perhaps never, deliver that speech. For, doing so would require a radical restructuring of the republic and its institutions, which is something the deep, vested interests, entrenched in the system, would not want for the fear of losing power. It would require making the institutions, and people in power, responsible to the citizenry, which would unsettle the empire of corruption, vested interests have so painstakingly built. Therein lies the catch. A democracy can be nothing else but deficient with so many hungry stomachs. Superpowers do not run on hungry stomachs either.

August 15, 2012

रेडियोतरंगों के रथ पर सवार राष्ट्रभक्त हैं, और एक शोकगीत भी.

कैसा तो मौसम है. रेडियोतरंगों के रथ पर सवार राष्ट्रभक्ति है, एफ एम पर बज रहे गीत हैं, मालों में एमआरपी से ‘आजादी’ की ‘सेल’ है. बारों में पबों में फ्री का मतलब बियर है, हैप्पी आवर है.  राष्ट्र के नाम दिए जा रहे सन्देश हैं, रामलीला मैदान से निकल आंबेडकर स्टेडियम तक की यात्रा को राष्ट्र के लिए मर मिटने वाला महाप्रयाण बताने वाली घोषणाएं हैं. हलके में कहें तो देश खुश है, गर्व है कि छलकने नहीं बाँध तोड़ बह निकलने को आमादा है. अपने अरमानों का जुलूस निकाल चुके दूसरे गांधी और तीसरे जेपी की यादें हैं, जो नहीं आयी उस जनता के लगाए भारत माता की जय के नारे हैं. ‘इनबाक्स’ भर दे रहे एसएमएस हैं, देश के लिए पूनम पाण्डेय के कुछ नया करने की घोषणा के इन्तेजार में दबी दबी सी ख्वाहिशें हैं. हिन्दुस्तानी होने के नाज से भरे ये सब हैं क्योंकि ऐसा ही होने की रवायत है. ये सब हैं कि दस्तूर यही है.

बाकी बस ये कि नाज है किस पर. उस मुल्क पर जिसके 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और इसे राष्ट्रीयशर्म बताने वाले प्रधानमंत्री साहब देश का अनाज सब्सिडी देकर यूरोप-अमेरिका के जानवरों के चारे के लिए भेजने पर आमादा हैं? उस मुल्क पर जिसके ‘दागी’ राष्ट्रपति अपने शपथग्रहण भाषण में भूख को सबसे बड़ा अपमान, सबसे बड़ी शर्म बताते हैं फिर पेट भर खा के सो जाते हैं? उस देश पर जिसके गोदामों में अरबों का अनाज सड़ जाता है पर सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उसे भुखमरी के शिकार लोगों में वितरित नहीं करती? मुझे भी भारतीय होने पर गर्व होना चहिये शायद, 2020  में महाशक्ति बनने के सपने वाले देश में भूख से मर रहे बच्चों को देख कर नहीं हो पाता, क्या करूं?

आप मुझे दुनिया की ‘आईटी’ राजधानी बंगलौर की चमचमाती कांच वाली इमारतें दिखाएँ मुझे आदिलाबाद से लेकर विदर्भ तक के आत्महत्या करने को मजबूर किसान याद आते हैं. आप मुझे 11 प्रतिशत (जो अब नहीं रही) की वृद्धिदर के आंकड़े दिखाएँ, मुझे देश की कृषि में गहराता संकट याद आता है. बताइये तो कैसे गर्व करूं उस देश पर जिसमे 10 साल में एक लाख से ज्यादा किसानों ने इस ‘महान राष्ट्र’ में जीने पर मौत चुन ली हो. उस में जिसमे 2001 से 2010 के बीच लगभग सात करोड़ किसान गायब, हाँ गायब, हो गए. नहीं उन्होंने आत्महत्या नही की. वे तो बस अपनी जिंदगियों के मुश्किल होते जाने से मजबूर होकर पहले आपदा और फिर आवारा पलायन (footloose migration) को मजबूर हो गए. आप देश में मोबाइल कनेक्शनों की संख्या बतायें, मुझे योजना आयोग का 28 और 32 रुपये का जादूई आंकड़ा भी याद आता है और उनका लाखों का ‘वाशरूम’ भी.

जानता हूँ कि इस सबके बाद भी एक दिन हिन्दुस्तानी होने पर गर्व करने की सलाहें हैं. ओलम्पिक में मेडल जीत लाये छह जियालों की तस्वीरों में अनचाहे टैगों से हलकान आभासी अस्तित्व है. सिलिकान वैली में हो रही तिरंगा परेडों में शामिल मल्लिका सेहरावतें हैं. प्लेबॉय के आवरण पर पहली बार किसी हिन्दुस्तानी के होने के गर्व से लैस अनावृत शर्लिन चोपड़ायें हैं. (वैसे वर्जना तोड़ने के पहलू से देखें तो और बात वरना तो प्लेबॉय भी मर्दों की घटिया ख्वाहिशों के यज्ञ की ही आहुति है). पर फ़िर ठीक वहीं गुवाहाटी में सरेआम यौन हिंसा की शिकार उस लड़की की तस्वीरें हैं जो हमारी बहन, बेटी, प्रेमिका कुछ भी हो सकती थी. सुशासनिया बिहार में गैंगरेप की शिकार हुई लड़की के अपराधियों को बचाने की कोशिशें हैं. मनोरमा के न्याय के लिए कपड़े उतार देने को मजबूर माँयें हैं. कैटरिना कैफों के युवा आदर्श होने के दौर में इरोम शर्मिला होने की हारें हैं. आप बेशक गर्वान्वित हों, उन्मादित हों, मैं न हो पाऊंगा.   

आप बधाइयाँ गायें, मैं सैमुएल जोंसन को याद करूँगा. ये कि ‘राष्ट्रभक्ति दुष्टों/दुर्जनों की आखिरी पनाहगाह है. 

August 12, 2012

मायाविनी सब्जियों के शहर में- उर्फ हांगकांग-1

बड़ा प्यारा सा शहर है हांगकांग. समंदर और बारिशों का शहर. पहाड़ों और जंगलों का शहर. कंक्रीट और टनेल्स का शहर. ऐसा शहर जिसमे खबर ही नहीं होती कि कौन से मोड़ से बसें आसमान छूती इमारतों से उपजती 'संवृत-स्थान-भीति' (कसम से कतल कर देंगे ये लोग हिन्दी को) मतलब कि claustrophobia से निकल क्षितिज के अन्त तक जा रहे समंदर के बराबर वाली सड़क पर दौड़ने लगे. ऐसा शहर जिसके काफी कुछ अपने कनाट प्लेस जैसे आर्थिक ह्रदय 'सेन्ट्रल' (वैसे इस 'सेन्ट्रल में कनाट सर्कस' नाम की जगह तो है) नाम के कंक्रीट के जंगल के बीचों बीच एक असली हरा सा जंगल न केवल महफूज़ हो बल्कि गुलज़ार भी. 

पर हजरात, इस शहर से ऐसी खूबसूरत मुठभेडें हम परदेसियों को रोज नसीब कहाँ. हफ्ते के ज्यादातर दिन तो यूँ हाँफते हुए ही निकल जातें हैं कि अलसुबह 8.30 पर ऑफिस के लिए बस पकड़ते हुए खबर नहीं होती कि लौटना 8.30 पे होगा या और बाद में. और हफ्ते भर अपने ही अत्याचारों का मारा बदन वीकेंड उर्फ सप्ताहांत में बगावत कर देता है कि भाई, हम न करेंगे कुछ. सो इस इतवार की अलसाई सी दोपहर को घंटों से बिस्तरनशीं (और लेटे रहने की वजह से पीठ दर्द का शिकार हुए)  माबदौलत ने सोचा कि न मियाँ, यहाँ हैं तो शहर तो देख के, जी के मानेंगे. अब सिर्फ उतने से न मानने वाले जितना बसों, मेट्रो और टैक्सियों की खिड़की से दीखता है. और देखेंगे, तो लिखेंगे भी. हांगकांग डायरी सा कुछ, कि  इस अजनबी शहर में गुजर रहा वक्त ताकी सनद रहे वाले अंदाज में दर्ज हो जाये.

पर फिर लिखने का फैसला करना सच में लिखने से बहुत बहुत आसान काम ठहरा. सच कहूँ तो लिखने की बात सोचते ही बचपन की वो सारी समयसारणियाँ (अरे वही, टाइमटेबल) याद आने लगती हैं जो हर परीक्षा के बाद बंटी थीं और जिनके पालन की कुल मियाद हफ्ते भर से ज्यादा नहीं होती थी. (हफ्ते भर भी तब जब कोई खास पेपर/विषय बहुत खराब कर के आये हों). बचपन तो जाने कहाँ गया पर तय करके कुछ लिखने की ये आदत अब भी वही है. सो फिर सोचा, बहुत सोचा और तय किया कि न मियाँ, अब ये डायरी तो लिख के ही मानेंगे. सो सफ़ेद (सी) स्क्रीन पर दर्ज हो रहे इन काले (से) अल्फाज़ को आप हजरात पर दे मारने के लिए ये मौका  मुनासिब भी माकूल भी. सो लें, संभलें/संभालें.

एक सनद भी कि मोहतराम, मेरे पहले के बयान से इस शहर के मुहब्बताना मिजाज को लेकर मुतमईन न हो जाएँ. बेशक शहर बहुत प्यारा है, मेहमाननवाज भी, पर इसकी मुहब्बतों की बारिश में एक पेंच है. आपके खाने पकाने की आदतों का पेंच. सामिष हों आप (सरल 'हिन्दी' में नॉन-वेज) तो इस शहर से बेहतर कुछ नहीं. कहते हैं कि ये शहर हवाई जहाज छोड़ उड़ने वाली हर चीज, पानी के जहाज छोड़ तैरने वाली हर चीज और बस/ट्रेन छोड़ चलने वाली हर चीज खाता है, खिलाता है. पर कहीं गलती से आप निरामिष उर्फ वेज निकले तो-- अल्लाह करम करे आप पे. इस शहर का 'वेजीटेरियन' चीजों का फलसफा ये है कि जो भी मीट हो उस पर सब्जियां, बोले तो पत्तागोभी डाल के ले आओ. और फिर कहीं आप ऐसे निरामिष निकले जिसे चीनी खाना भी न पसंद हो तब तो बस, करेला खाली नीम चढ़ा नहीं, नीम की फुनगी पे चढ़े करेले जैसा मामला हो जाएगा.

तो साहिबान, यही नियति ठहरी अपनी इस शहर में. या खुद पकाओ या मन को समझाओ कि मियां हम 'डाईट' पे हैं. या फिर (उफ़, हम कामरेडों की जिंदगी में ये होना भी बाकी था) ये कि मैकडोनाल्डस जाओ और कोई भी बर्गर 'नो मीट' के नुक्ते के साथ ले आओ! बेशक शहर में तमाम हिन्दुस्तानी रेस्टोरेंट्स भी हैं, पर उनमें से ज्यादातर हिन्दुस्तानी खाना नहीं हिन्दुस्तानी खाने का स्वाधीन अहसास भर पकाते हैं, और जो असली वाला पकाते हैं वे रोज खा सकने की जद से अपने 'तेल' और दाम दोनों की वजह से बाहर होते हैं.

हमने फिर तय किया कि भाया, हमसे न होगा ये मैकडोनाल्डस पे जीना. हम तो बस पका लेंगे. फिर वही कि 'फ्राइंग पैन' गैस चूल्हे पर और फोन कान में. हाँ माँ, अब तेल गरम हो गया. अब क्या डालूँ. सच कहूँ तो माँ से पूछ के बनायी गयी सब्जियों को काटने में बारहा कटी अँगुलियों से पहले उन माँ, बहनों, चाचियों, बुआओं और मौसियों की अंगुलियां पे पड़े तमाम निशान कभी दिखे ही न थे. फिर उन दीदियों, भाभियों की अँगुलियों की याद तो शायद आज भी ख्यालों से खारिज है जिनके प्रति यह संबोधन सिर्फ 'अपने घर' में काम करने की वजह से पैदा होते थे. 500 रुपये महीने में खटने वाली अंगुलियां. कमाल यह कि अपना दावा हमेशा से वर्ग विभाजन और पितृसत्ता दोनों के खिलाफ खड़ा होने का है.

मुद्दे से बहक जाने के लिए माजरत चाहता हूँ हजरात. कहाँ शहर हांगकांग के किस्से और कहाँ यह यादें पर क्या करें, मुई राजनीति यूँ घुस गयी है रगों में कि मौका मिले न मिले फूट पड़ती है.

हाँ तो मैं बात कर रहा था सब्जियों की. माँ से पूछ पूछ पकती सब्जियों के बीच फिर ख्याल आया कि आओ गूगल से भी पूछ के देखते हैं. और फिर तो कमाल हो साहिबान. गूगल जी कब आंटी में तब्दील हो गयीं, खबर ही नहीं हुई. रेसिपीज़ (विधियों) के साथ वीडियो में बना के दिखाने वाली आंटी. भूख के साथ स्वाद का भी ख्याल रखने वाली आंटी. अब ज्यादा क्या कहूँ, अभी आज ही आंटी के सघन नेतृत्व में हरे प्याज की सब्जी बनाने का कार्यक्रम अपार सफलता के साथ संपन्न किया है. मतलब यह कि गोभी (पत्ता भी और फूल भी), बैंगन, शिमला मिर्च, मटर, ब्रोकोली, आलू नाम की कुल जमा सब्जियों में एक और इजाफा. वाला

पर इसी मुकाम पर ये शहर फिर हाज़िर हो जाता है. ऐसे कि इस शहर की सब्जियां भी बड़ी मायाविनी होती हैं.. ऐसे कि आपने रूप रंग और शारीरिक सौष्ठव के आधार पर लौकी दिख रही सब्जी को खरीदा, लौकी जैसा ही पकाया और आइला-- खाया तो वह करेला निकल गयी! बिटरगार्ड कहते हैं उसे यहाँ. या 'लाल गोभी' खरीदी (जी होती है) और पकाई तो कुछ अजीब सा कटहल जैसा बना!

और फिर खरीदने के सुख के तो कहने ही क्या. सुपरस्टोरों में खरीदने से बचता हूँ (कामरेडाना ट्रेनिंग है भाई). सो 'वेटमार्केट्स' के नाम से जानी जाने वाली सब्जी/मीट/और तमाम अन्य चीजों की फुटकर दुकानों वाली इमारतों में हाजिर होना ही विकल्प बचता है. और वाह, वहाँ का कमाल यह कि सारी पढ़ाई लिखाई के बाद भाषायी अनपढ़ होने का सुख. उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और मुझे कैंटोनीज. सो बस आँखों हाथों के इशारे और सब्जी पोलीथीन में कैद. पैसे देने का यह कि 'शैम-पो' जैसी एक ध्वनि छोड़ कुछ समझ नहीं आया आजतक, और मतलब तो उसका भी नहीं पता.  सो अंदाज से पैसे दे दीजिए और दाम काट के बाकी वापस. लोग बताते हैं कि इसमें कोई बेईमानी नहीं करता, लगता भी यही है.

सो साहिबान  शहर के ऊपर के विवरण में यह भी जोड़ लें अब.
समंदर और बारिशों का शहर. पहाड़ों और जंगलों का शहर. कंक्रीट और टनेल्स का शहर. वेटमार्केट्स की तेज गंधों वाला शहर. पढ़ेलिखों को अनपढ़ बना देने वाला शहर. शब्दों की जगह मुस्कुराहटों से काम चलाने वाला शहर. मायाविनी सब्जियों का शहर. 

August 10, 2012

Of Hotel Jantar Mantar and Irom Sharmila’s Prison Cell!


[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in the UTS VOICE, 01-15 August]

The photograph tells an interesting tale. A far more interesting one in fact, than those in the photograph would want. It has everything that upwardly mobile Indian middle classes would want: two self-assured men stealing a well deserved rest from whatever they were engaged in with their doting wives in attendance. As clichéd, as it can get, the picture has a 'feel' to it. It has a feel of a family, of old friends' reunion, of a thrilling and adventurous escape from the humdrum of everyday life.

It's just that the picture is not from a family album. It was not clicked on a lazy Sunday spent in the wild. Quite on the contrary, it was taken at Jantar Mantar, the capital of all 'democratic' and non-violent protests in the country. The men in it are not merely looking self-assured, they actually are. They have made it big. So big that they can afford to pick and chose what to take on and when to let it go. They take, for example, the smallest of the accusations against any leader of the United Progressive Alliance, particularly those from Congress, rather seriously, and fill all those television screens with their angry screams.

They decide to leave alone, on the other hand, the gravest of the graft charges against leaders of the Bhartiya Janta Party. Their lists of 'corrupt' ministers miraculously manage to leave the likes of Bookanakere Siddalingappa Yeddyurappa and the infamous Reddy Brothers out. Corruption has got a colour, you know. And for them, it can be anything but saffron. How they get away with this, one might ask. The answer is rather simple. They lie about their non-partisanship.  They lie about it so many times that people start forgetting that these are lies. Noone has an idea if they actually subscribe to this ideology as well or not, though there are enough reasons to suspect that they do but their belief in the efficacy of the Goebellesian propaganda apparatus is beyond doubt.  They get away with even this because they are not nobodies, not mango people as nobodies are often referred to. They are big ones, self-designated voice of the Indian nation.

And mind it; a few thousand actually listen to them. They are Arvind Kejriwal, a bureaucrat who went on a fully paid study leave and never returned to his work, and Manish Sisodia a journalist turned social activist. They are riding high on their image as core members of Team Anna. Amusingly, the irony of running a supposedly popular movement in the name of an individual seems to be lost on them and the few thousand who listen to them.  They truly believe that this individual, a self-proclaimed Gandhian who not only believes in public flogging being the correct sentence for rule (and not the law of the land) breakers, and actually implements it in his village, is the living articulation of the aspirations of Indian masses.  

Needless to say, their idea of India and its people does not take into account millions of those whose lives are haunted by hunger. They seem to be completely oblivious to the existence even of more than hundred thousand peasants of our country who were compelled to commit suicide because of the deepening agricultural crisis. They do not appear to be aware of easily curable diseases like Japanese Encephalitis and gastrointestinal ailments claiming thousands of our children every year. They are nothing less than modern-day Arjuna, that mythical character of Mahabharata who trained his eyes to see nothing else but his target. All they seem to be bothered with is corruption, that too the one at the higher echelons that troubles big corporations that fund them and their movement.

Ask them if that corruption is linked to and sustained by social institutions or not, and all one gets is a shrug and a counter allegation of being a stooge of the corrupt. Ask them if corruption can be eliminated without radically restructuring the pre-modern structures of caste, kinship, clans and the hierarchical distribution of land and power in society, and they get Anna Hazare breaking his fast with juice offered by a Dalit and a Muslim girl, labeling them for life in the process. But then, this and much more has been already written about.So let us go back to the picture, as it reveals a few fascinating facts about their mental makeup. Much more than what they would have wanted.

At the very outset, the picture exposes the differential treatment given to different participants of the 'movement'.  It screams aloud something until now unheard in Indian politics, especially in the resistance part of it. Did one ever hear a radical leader on fast having a room of his/her own to retire to? Forget the old age satyagrahis from the freedom struggle, whose very idea of struggle was of enduring the same pain as their people. Even the relatively new leadership never compromised on their unity with the struggling masses.

Did Medha Patkar ever have a room of her own during those fasts that lasted weeks on end? She did not. She slept on the same mats that her people from Narmada valley slept on. She ate the same food. She sang the same songs. Aruna Roy? Did she ever retire to a 'private' zone of comfort in the middle of an ongoing struggle? She did not. She, instead, did not appropriate even the process of decision-making and rather invited everyone in. It included people from the villages, those who hawk their material to earn a livelihood, those who sell eggs on carts and so on. And they succeeded together in winning the Right to Information that revolutionized common citizen's governance in India. Incidentally, these are the common people Anna Hazare accuses of selling themselves out for a hundred rupees and a bottle of liquor.

The only other such room we have known in the glorious history of fasts and struggles is that of Irom Sharmila, the woman whose very existence punctures all tall claims of India being the largest democracy of the world. Mascots of Team Anna have gone hungry for just about a week and this woman has not had a morsel of grain for more than a decade. Her body is wasted from within. She was arrested and dumped into a 'private' room of a hospital by the Indian state. The state has kept her alive ever since by force-feeding her through a tube thrust down her nose. Yet, we hear of no distress calls from her or her supporters. She, in fact, removes the tubes at every opportunity to resist. The one time she was able to do so, she escaped from that room and traveled to Delhi to lodge her protest. Yet, it's not her, but Team Anna that is sinking.

Arvind Kejriwal's 'private' room is, therefore, a first in the history of politics of resistance in India.
Look at it from Sharmila’s window, and it is quite a disturbing first as well. It is a room insulated from the very people it claims to be the sole representative of. A room sanitized and secured against those who will be directly affected by both, the victory or the defeat of the leaders resting in it. It is a room that seems to be as distant from common Indian citizenry as is the government it self-allegedly is opposed to. We are so definitely living in interesting times where a ‘movement’ is as aloof from the people as the government that has stopped listening to the peaceful movements as per Arundhati Roy, famous author and activist.

But then, a glance back to the picture shows that the room is not unsettling merely due to its existence. It has something much more disquieting about it. For one, it catapults women to the forefront of a movement that was noticed more for their absence and the misogynist comments of its ‘supreme’ leader Anna Hazare. But then, the women in the picture do not come out as modern, independent women having their own say. Here, they are wives and nothing more than that. All they have to do is stand behind, and not by, their husbands, as they steer ‘their’ India to ‘their’ dreams. The men own everything. The dream, the vision, the strategies and the movement, everything belongs to them. They own the room. And the women.

This is not exactly what one would expect of a movement that claims to be enlightened enough to have the final word and the final document on how to fight corruption. Still, they cannot, perhaps, be faulted as they did never did claim to be fighting against patriarchy, did they? Expecting a gender-sensitive approach from a movement that abuses the parliament as ‘baanjh aurat’ (barren woman) would in fact be as futile as expecting the Congress or the BJP to weed out corruption. It is, also, as futile as expecting those to understand and respect the issues of representation of Dalits and other disadvantaged sections of Indian society who do not think twice before using casteist abuses like ‘chandal chaukdi’ to vent their ire against ministers.

Aah, I had almost forgotten about those steel glasses! Opaque, exclusive, divisionary! The definitive markers of the home from the outside. In other words, they represent all that these men and their so called movement is claiming to be fighting against. Remember all those shops that use to serve tea in glasses,  never using steel. Remember that the steel has always been a preserve of the ‘home’ with separate glass or china clay utensils earmarked for the outsider, for the so called ‘lower castes’. Good that these men are using those. It helps us getting another insight into their world.

They are doing their masters’ job. Struggles against hierarchies has defined the resistance until now, they are trying their best to get hierarchy internalized to it. Unfortunately for them, it’s a task much beyond their minds. Okay, I concede that it requires meanness, which is something they have. It is just that they do not have enough of it. Neither have their supporters got it. They have proven to be worse than their leadership on all counts. What does one expect of supporters who assault women journalists just because they are telling the truth: there are no crowds with Anna? What does one expect of supporters who decide to make a full show of their anti-reservation stand in public, and thus rubbishing all the meek defenses supporters of Youth for Equality like Kejriwals could offer?  Cherry on the cake, though, is reserved for the one in Patna who first compared slain Brahmeshwar Mukhiya, the founder of dreaded Ranvir Sena responsible for many massacres of Dalits in Bihar, and then told the audience that he is a member of India against Corruption.

Thankfully, the reality is slowly dawning upon them. The crowds have already deserted them. Whatever little of it they get now is delivered to them by Baba Ramdev who was mocked at as Akbar In the morning, Jodhabai by the eve, not long ago by their jester-in-chief Kumar Vishwash

It is time for them to listen to their own distress calls and call it quits before it gets too late. After all we know that history repeats itself as farce, but no one knows what farce repeats itself as. 

यत्र नार्यस्तु पूज्यते वहाँ बलात्कार की सजा प्रमोशन है!


ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के कुछ माननीय न्यायाधीश रूचिका गिरहोत्रा नाम की एक उभरती बैडमिंटन खिलाड़ी का यौन उत्पीड़न कर उसको आत्महत्या के लिए मजबूर कर देने वाले एसपीएस राठौर नाम के सजायाफ्ता बलात्कारी के ‘कनविक्शन’ पर कोई निर्णय न लेते हुए भी उसकी पेंशन बहाल कर देते हैं. अब आप चाहें तो इन न्यायाधीशों को ‘माननीय’ कह भी लें.

ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह कि हरियाणा की कांग्रेस सरकार का एक मंत्री एक युवा लड़की के सपनों ही नहीं बल्कि खुद उसका भी क़त्ल करके फरार हो जाता है. और फिर यह कि गीतिका शर्मा नाम की उस एयरहोस्टेस को आत्महत्या करने पर मजबूर करने कांग्रेसी मंत्री गोपाल कांडा का बचाव करने वाला वकील के टी एस तुलसी राष्ट्रीय मीडिया पर आकर ‘विधि यानी कि क़ानून के शासन’ पर प्रवचन देता है.

जैसे कि यह कि गुवाहाटी में बीस लोगों की भीड़ के साथ सड़क पर एक लड़की के साथ यौन हिंसा करवाने वाले अतानु भुइयाँ मजे में घूमता है और अरुणाचल प्रदेश में झील के किनारे अपनी ‘खूबसूरत’ तस्वीरें ट्विटर पर पोस्ट करता है. जैसे कि यह कि उसी यौन हिंसा का मुख्य खलनायक अमर ज्योति कालिता उर्फ बोंड ‘गिरफ्तारी’ के बाद भी अपनी फेसबुक प्रोफाइल डिलीट कर सकता है.

ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह कि मातृशक्ति का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी उस राम जेठमलानी की सबसे बड़ी समर्थक होती है जो जेसिका लाल मुकदमे में मनु शर्मा जैसों का बचाव करता है. इतनी सादा सी खबर कि जैसे यही जेठमलानी फिर राष्ट्रपति चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर राय देता है और राष्ट्रवादी उसकी सलाहों पर लेट लेट जाते हैं.

ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह कि अपनी खुद की बेटी की ‘इज्जत हत्या’ उर्फ honour killing करने के लिए सजायाफ्ता अकाली नेता जागीर कौर न केवल जेल से पैरोल पाती हैं बल्कि उनको पैरोल पर ले जाने के लिए ‘लाल बत्ती’ वाली कार आती है.
ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह कि जेसिका लाल की हत्या के अपराधी सजायाफ्ता मनु शर्मा को अपनी उस माँ की बीमारी की वजह से ‘पैरोल’ मिल जाता है जो माँ ‘ब्यूटी पार्लर्स’ का उद्घाटन करती घूम रही हो. खबरों का ही कमाल होगा कि इस पैरोल के लिए सिफारिश उस ऑल इण्डिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस से आती है जो सोनी सूरी जैसों पर माननीय(?) उच्चतम न्यायालय के ‘निर्देशों’ के बावजूद निर्णय नहीं ले पाता और सोनी सूरियों के यौनांगों में पत्थर भर देने वाले पुलिसिये वीरता’ का राष्ट्रीय पदक ले कर घूमते हैं.

ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे कि यह इन मनु शर्माओं को पैरोल पे रिहा करने की सिफारिश दिल्ली की उस मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यालय से आती है जो तमाम सौम्या विश्वनाथन की हत्या के बाद ‘लड़कियों को शाम के बाद घर से न निकलने की सलाह’ देती है. ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. जैसे मधुमिता शुक्ला नाम की उभरती कवियत्री की हत्या करने/करवाने वाले अमरमणि त्रिपाठी को विधायक/मंत्री बनाने की दौड में लगी पार्टियों के घोषणापत्रों में नारी हिंसा के खिलाफ बड़े बड़े वादे हैं.

ख़बरें बड़ी सादा सी हैं. पर ख़बरों का क्या है. चौबीस घंटे, सातों दिन यानी कि 24*7 चैनल चलाने हैं तो ख़बरें तो ढूंढनी ही पड़ती हैं न. और हर खबर के जवाब में एक श्लोक ढूँढा जा सकता है. ऐसे कि जैसे कि ऊपर लिखा हुआ सब कुछ झूठ है. सच यह है कि हम स्त्रियों का सबसे ज्यादा सम्मान करने वाले देश में रहते हैं. हामरे ग्रंथों में लिखा है – यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता.

बाकी सब झूठ है. गलत बयानी है. हमारी संस्कृति पर हमला है. 

August 08, 2012

जिनके लिए मानसून मौत का नाम है.


[दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 08-08-12 को प्रकाशित मेरे लेख का (जरा सा ) विस्तारित रूप ]

मानसून का मौसम हमारे मुल्क के लिए इन्तेजार का मौसम होता है. हो भी कैसे न, आज भी सिंचाई के लिए ज्यादातर बारिशों पर ही निर्भर ह मारी कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था का भविष्य मानसून ही तय करता है. यूं मानसून सिर्फ किसानों के लियी ही नहीं बल्कि बीते दशक में हमारे मुल्क में कुकरमुत्तों की तरह उग आये खबरिया चैनलों के लिए भी बड़ी राहत लेकर आता है. इस महीने में उन्हें खबरें तलाशनी नहीं पड़तीं, न ही सास बहू मार्का टीवी सीरियल्स को खबर बनाना पड़ता है. यह महीना उनके लिए केरला में तैनात अपनी ओबी वैनों को मानसून के आते ही उसके पीछे दौड़ा देने का होता है.

मगर अफ़सोस, इसी मुल्क में तमाम जगहें ऐसी भी हैं जहाँ मानसून का जिक्र भर लोगों को अंदर तक सिहरा देता है. यूं तो इन लोगों की भी जिंदगी खेती, और इसीलिये मानसून, पर निर्भर है पर फिर भी इनके लिए मानसून बारिश का नहीं मौत का नाम है. इनकी रिहाइशॉन में मानसून कभी अकेला नहीं आता, वह हमेशा अपने साथ जापानी इंसेफ्लाइटिस और एक्यूट इंसेफ्लाइटिस नाम की बीमारियाँ, आम भाषा में दिमागी बुखार, लेकर आता है.

मानसून के साथ आने वाली इन दोनों बीमारियों ने बीते बरस सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 1358 बच्चों की जान ली थी. केन्द्रीय सरकार के स्वास्थ्य राज्य मंत्री सुदीप बंदोपाध्याय ने राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में 15 नवंबर 2011 को माना था कि उस तारीख तक 884 बच्चों की जान जा चुकी थी, और इनमे से 501 तो अकेले उत्तर प्रदेश से ही थे. इस निर्मम स्वीकारोक्ति बाद उन्होंने बीमारी को रोकने के लिए कदम उठाने के दस्तूरी वादे किये, इसकी रोकथाम के लिए स्वदेशी टीका विकसित करने की घोषणा की और दावा किया की फरवरी तक यह टीका सभी प्रभावित इलाकों में पंहुच जाएगा. बस यह कि ऐसा कुछ हुआ नहीं और इस साल फिर यह बीमारी फिर मौत बरसा रही है.

आसानी से रोकी जा सकने वाली एक ऐसी बीमारी जिसका टीका भी है हर साल इतने बच्चों की जान ले ले यह बात अपने आप में इस देश के हुक्मरानों को शर्मसार करने के लिए काफी होनी चाहिए. या सिर्फ शर्मनाक नहीं बल्कि आपराधिक है. साफ़ है कि ये बच्चे मर नहीं रहे हैं, इनकी हत्या हो रही और इन हत्यायों के लिए टीकाकरण और समुचित चिकित्सकीय व्यवस्था उपलब्ध करा पाने में नाकाम प्रदेश और केंद्र सरकार जिम्मेदार हैं.

सबसे बुरा तो यह कि यह कोई नयी समस्या नहीं है. मस्तिष्क ज्वर के यह दोनों रूप तीन दशक से ज्यादा से कहर बरपा रहे हैं. और अगर सबसे अनुदार अनुमानों को भी माना जाय तो बीते 34 सालों में इनका शिकार हुए बच्चों की संख्या 34000 से भी ऊपर है. अनुदार इसलिए कि यह आंकड़े सिर्फ अस्पतालों में दर्ज मौतों के आधार पर बनाए गए हैं. जिन बच्चों को अस्पताल पंहुच पाने तक का मौका नहीं मिला उनकी मौतें इन आंकड़ों तक से खारिज हैं. अनुदार इसलिए भी कि इन आंकड़ों में इस महामारी के शिकार गांवों की दुर्गम परिस्थितियों के लिए कोई जगह नहीं है. इसीलिये, सामाजिक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता मानते हैं कि दिमागी बुखार ने इस देश में कम सेकम 50000 बच्चों की बलि ली है और फिर यह कि यह आंकड़ा भी उदार अनुमान ही है.

स्थिति की भयावहता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इतनी मौतें तब भी हो रही हैं जब सिर्फ इस बीमारी पर नजर रखने और उसकी रोकथाम के लिए सरकारों के पास 54 ‘सेंटीनेल’ और 12 ‘अपेक्स रेफरल लेबोरेटरीज’ जैसे संसाधन मौजूद हैं. यह तंत्र कितना प्रभावी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि केवल इस साल मरने वाले बच्चों की संख्या 700 के पार तब जा पंहुची है जबकि सितम्बर महीना यानी इस बीमारी का चरम दौर काफी दूर है. इस तंत्र के बावजूद यह बीमारी इतने बच्चों की बलि क्यों ले लेती है इस सवाल का जवाब खोजें तो बस यह मिलेगा कि सरकारी बेपरवाही, निष्क्रियता और उदासीनता है.

बीमारियों पर नियंत्रण करने के सभी सरकारी प्रयास तो असफल नहीं होते. इतिहास गवाह है कि सरकारों ने चाहा है तो बीमारियों पर नियंत्रण ही नहीं उन्हें लगभग समूल नष्ट भी कर दिया है. सबूत के बतौर पिछले दशक के मध्य में दिल्ली में डेंगू के प्रकोप को देखा जा सकता है. सरकार को न तो डेंगू पर नियंत्रण करने में ज्यादा वक्त लगा न ही और उसके बाद इसकी रोकथाम में. लगातार चलाये जाने सफाई अभियान हों या मच्छर पनप सकने की संभावना वाली किसी भी जगह पर नजर रखने वाले सरकारी दस्ते, डेंगू को लेकर सरकार की गंभीरता और राजनैतिक इच्छाशक्ति साफ़ दिखाई देती है.

दिल्ली में डेंगू को लेकर इतनी गंभीर सरकार फिर गोरखपुर, देवरिया या कुशीनगर जैसे इलाकों में दिमागी बुखार के प्रति निर्ममता की हद तक उदासीन क्यों हो जाती हैं? क्या यह जगहें भारतीय गणतंत्र का दिल्ली से कम हिस्सा हैं या इनमें रहने वाले लोग दिल्ली और अन्य महनगरों में रहनेवालों से ‘कम नागरिक’ हैं? अगर नहीं तो महानगरों की स्वास्थ्य सुरक्षा को युद्ध स्तर पर लेनी वाली सरकारें पिछड़े इलाकों के प्रति आपराधिक रूप से लापरवाह क्यों होती हैं?

सरकारें उदासीन हों भी तो सवाल बनता है कि राष्ट्रीय मीडिया इस विषय को गंभीरता से क्यों नहीं लेता? बेशक मीडिया इस विषय को उठाता है, सबूत के लिए इस लेख में इस्तेमाल किये गए ज्यादातर आंकड़े मीडिया में आई खबरों से ही लिए गए हैं. हाँ इस मसले को लेकर मीडिया एक बनेबनाये खांचे में काम करता दीखता है. बीमारी का प्रकोप फैलने के साथ ही स्थानीय मीडिया में ख़बरें आती हैं, राष्ट्रीय मीडिया में एकाध सम्पादकीय और खबरिया चैनल एकाध कार्यक्रम प्रसारित कर देते हैं. और उसके बाद वह खामोशी जो अगले साल फिर इसी प्रक्रिया से टूटती है बस पीडितों के बदले नामों के अलावा मौत के प्रेक्षागृह तक वही रहते हैं.

मीडिया की उदासीनता इसलिए भी अखरती है कि यही मीडिया हर अन्याय के प्रति ऐसे ही उदासीन नहीं होता. साल दर साल कहर बरपाने वाले दिमागी बुखार की रिपोर्टिंग की तुलना ‘जस्टिस फॉर जेसिका’ जैसे मीडिया अभियानों या दिल्ली के बलात्कार राजधानी में बदलते जाने को लेकर मीडिया के गुस्से से करें और फर्क साफ़ नजर आता है. इन सारे मामलों पर मीडिया शुरुआती खबरनवीसी के बाद चुप नहीं बैठा था. उसने जनता के गुस्से को आवाज दी थी और हुक्मरानों को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया था. यही उचित भी था क्योंकि क़ानून के शासन वाले किसी भी देश में न्याय हर नागरिक का धिकार होता है और लोकतंत्र के चौथे खम्भे के बतौर मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह बुनियादी अधिकारों पर ऐसे घृणित हमलों के खिलाफ पूरी ताकत से लड़े, उनके खिलाफ राष्ट्रीय चेतना पैदा करे.

पर फिर जापानी इंसेफ्लाइटिस पर ऐसी खामोशी क्यों? वह इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों या सरकारों के खिलाफ अभियान क्यों नहीं चलाता? खबरिया चैनल इस विषय पर ऐसी पैनल चर्चाएं क्यों नहीं आयोजित करते जिनसे अपने घरों में आराम से बैठे मध्यवर्ग को स्थिति की भयावहता का अंदाजा लग सके. शासक तो गरीब और उत्पीड़ित तबकों को भूलते ही हैं, पर क्या हम मीडिया से भी यही उम्मीद कर सकते हैं? ठीक है कि इस बीमारी के ज्यादातर शिकार नए मीडिया के ‘ग्राहक’ नहीं हैं, उसके अपने वर्ग के नहीं हैं पर फिर कहीं दूर सीरिया में हो रही मौतों से प्रभावित होने वाले मीडिया को अपने देश के बच्चों को लेकर भी चिंतित होना ही चाहिए.

ऐसा क्यों नहीं होता इस सवाल के जवाब उन बुनियादी दोषों में छिपे हैं जो हमारे देश के त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र को परिभाषित करती हैं. वे गैरबराबरी के उस आधारभूत ढाँचे में मिलते हैं जो ऊंचनीच पर आधारित उस सामाजिक श्रेणीबद्धता को जन्म देती है जो अपने ही समाज के ‘निचले’ पायदानों पर खड़े लोगों को मानवीय गरिमा से खारिज और इसीलिए सहज त्याज्य मानती है. दिमागी बुखार ही नहीं, ऐसी तमाम बीमारियों से मारे जाने वाले लोग इस व्यवस्था के लिए इंसान ही नहीं हैं. उनकी जिंदगियां बेहद सस्ती हैं. श्रम के अलावा उनके जीवन में ऐसा कुछ नहीं है जिसकी भविष्य की महाशक्ति भारत को जरूरत है.

अफ़सोस, हमारे जैसी जनसँख्या वाले देश में कुछ हजार लोगों के मर जाने से श्रम की उपलब्धता पर भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता. मर गए लोगों की जगह लेने को लोग सदैव उपलब्ध हैं. शासकों के लिए या लोग नहीं सिर्फ जनसँख्या हैं और फिर उन्हें तो हमेशा से ही बताया गया है कि जनसँख्या इस देश की सबसे बड़ी समस्या है. फिर जो लोग जनसँख्या हैं वो समस्या ही हुए और उनके मर जाने से फिर किसी को क्यों दिक्कत होनी चाहिए? शायद यही वजह है कि उत्तर प्रदेश जैसा 'गरीब' राज्य भी इस बीमारी के मद में 18 करोड़ देने का मजाक करते हुए एक पार्क पर 685 करोड़ रुपये खर्च कर सकता है.

परन्तु मानव जीवन के ऐसे आपराधिक अपमान के बावजूद ऐसी खामोशी, सामुदायिक आक्रोश की ऐसी अनुपस्थिति के पीछे के कारण समझ लेने भर से कोई भी दोषमुक्त नहीं हो जाता. हमारे नौनिहालों की हर बरस हो रही इन हत्यायों के लिए हम सब जिम्मेदार हैं. मीडिया, नागरिक समाज, सरकार और यहाँ तक की हम भी, जो सब देखते हुए भी चुप है.